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Full text of "Padma Puran Gita Press Gorakhpur"

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नम्र निवेदन 


डास्रोमें पुराणोकी बड़ी महिमा हे । उन्हे साक्षात्‌ लीं तो यह कोई त्प्रभकी बात नहीं है । 

श्रीहरिका रूप बताया गया है । जिस प्रकार सम्पूर्ण भोगकी सामग्रियोका भी यह लाभ नहीं हे कि 
जगत्करो आलोकित करनेके छ्य भगवान्‌ सूर्यरूपम उनसे इन्दियोको तृप्र किया जाय; जितने भोगेसि ` 
प्रकट होकर हमारे बाहरी अन्धकारको नष्ट करते है, उसी जीवन-निर्वाह हो जाय, उतने ही भोग हमारे स्यि पर्याप 
प्रकार हमारे हदयान्धकार--भीतरी अनधकारको दूर हैँ तथा जीवन-निर्वाहका- जीवित रहनेका फर यह 
करनेके लिये श्रीहरि ही पुराण-विग्रह धारण करते हैँ ।#* नहीं है कि अनेक प्रकारके कमेकि पचडेमे पड़कर इस 
जिस प्रकार त्रैवर्णिकोके लिये वेदोंका खराध्याय नित्य लोक या परलोकका संसारिक सुख प्राप किया जाय । भ 
करनेकी विधि हे, उसी प्रकार पुरार्णोका श्रवण भी उसका परम ल्भ तो यह है कि वास्तविक तत्वको- ग 
सबको नित्य करना चाहिये-- "पुराणं श्ृणुयान्नित्यम्‌' । भगवत्तत्तको जाननेकी रद्ध इच्छा हो ।' | 
पुराणोमें अर्थ, धर्म, काम, योक्ष--चारोका बहुत ही यह तत्त्व-जिज्ञासा पुराणोके श्रवणसे भलीभाति ` 
सुन्दर निरूपण हुआ है ओर चारोका एक-दूसरेके साथ जगायी जा सकती है । इतना ही नही, सारे साधनोका 
क्या सम्बन्ध है--इसे भी भलीभांति समञ्ञाया गया है। फक है--भगवानकी सन्नता प्राप्त कृराः1.श्यह 


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। श्रीमद्धागवतमे छिखा है- । भगवत्प्ीति भी पुराणोके श्रवणसे सहजमें हौ प्राप खी जा 
| धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्यते । सकती है । पद्मपुराणमें किखा है-- 
नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः ॥ तस्माद्यदि हरेः भ्रीतेरुत्पादे धीयते मतिः । 3 
कामस्य जेन्दरियभरीति्त्ीभो जीवेत यावता । श्रोतव्यमनिहो पुम्भिः पुराणं कृष्णरूपिणः ॥ | 
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः॥ (पद्य स्वर्ग ६२1 घर) ` क. 
(१।२। ९-१०) इसछ्ियि यदि भगवानको प्रसन्न करनेका मनमे ` 

धर्मका . फल है--संसारके बन्धनोंसे मुक्ति, सङ्कल्प हो तो सभी मनुष्योको निरन्तर श्रीकृष्णके 

भगवानूकी प्रापि। उससे यदि कुछ सौसारिक सम्पत्ति अङ्गभूत पुराणोका श्रवण करना चाहिये ॥ इसीख्यि ˆ ~ 
उपार्जन कर री तो यह उसकी कोई सफलता नही है। पुराणोका हमारे यँ इतना आदर रहाहै। `“ 

इसी प्रकार धनका फर हे--एकमात्र धर्मका अनुष्ठान वेदोकी भाति पुराण भी हमारे यहाँ अनादि ध # 

५: बहन करके यदि कुछ भोगकी सामग्रियां एकत्र कर गये है । उनका रचयिता कोई नहीं हे। ती 
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# यंथा ` सूर्यवपुर्भूत्वा प्रकाशाय चरेद्धरिः । सर्वेष जगतामेव हरिरारोकहेतवे (2 तव 1 
तथैवान्तःप्रकादाय पुराणावयवो हरिः। विचदिह भूतेषु पुराण पावनं परम्‌॥ = ` 


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"1" क माायतावातकि भी उनका स्मरणं ही करते है । पद्यपुराणमे छिखा 
८९ 7 पुराणं सर्वंडाखत्राणां थमे ब्रह्मणा स्मृतम्‌ । 
ष इनका विस्तार सौ करोड़ (एक अरब) ङलोकोका माना 
गया है- ङातकोटिमिविस्तरम्‌ "उसी प्रसङ्खमें यह भी 


कहा गया है किं समयक परिवर्तनसे जब मनुष्यकी आयु 





\ कम हो जाती है ओर इतने बड़े पुराणोंका श्रवण ओर 
^~ पठन एक जीवनमें मनुष्योके स्यि असम्भव हो जाता है 
तन उनका संक्षेप करनेके किय स्वयं भगवान्‌ भ्त्येक 

इपर युगमें व्यासरूपसे अवतीर्णं होते है ओर उन्हे 
अठारह भागोमें बांटकर चार लख इरोकोमिं सीमित 
„कर देते हे । पुराणोंका यह संक्षिप्त संस्करण ही भूलोकमे 
/  अकाडित होता है । कहते हँ स्वर्गादि रोकोमे आज भी 
, एक अर इल्ोकोका विस्तृत पुराण विद्यमान है ।* इस 
श्रकार भगवान्‌ वेदव्यास भी पुराणोके रचयिता नहीं 
' अपितु संक्षेपक अथवा संग्राहक ही सिद्ध होते है। 
इसीख्ियि पुरार्णोको “पञ्चम वेद' कहा गया है-- 
"इतिहासपुराणं पञ्छमं वेदानां वेदम्‌" (छान्दोग्य 
उपनिषद्‌ ७।१।२) । उपर्युक्त उपनिषद्वाक्यके अनुसार 
यद्यपि इतिहास-पुराण दोनोंको ही “पञ्चम वेद" की 
`  गौरवपूर्ण उपाधि दी गयी है, फिर भी वाल्मीकीय 
रामायण ओर महाभारत जिनकी इतिहास संज्ञा है 
क्रमराः .महरषिं वाल्मीकि तथा वेदव्यासद्रारा प्रणीत 
 होनेके कारण पुराणोंकी अपेक्षा अर्वाचीन ही हे । इस 
` म्रकार पुराणोकी पुराणता सवपिक्षया प्राचीनता सुतरा 
। सिद्धःहो जाती ै। इसीरि वेदोकि बाद पुराणोका हो 
` हमारे यहाँ सबसे अधिक सम्मान है । बल्कि कहीं-कहीं 
तो उन्द वेदसे भी अधिक गौरव दिया गया हे। 















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जो ब्राह्मण अङ्ग एवं उपनिषदोसहित चासं 
जान रखता है; उससे भी बडा शत चारे वेदोका 
पुराणोका विकञेष ज्ञाता यान्‌ वेह है जो 
ता हे।' यहाँ श्रद्धालुओं 
स्वाभाविक भी यह शङ्का हो सकती है किः उपम 
रलोकोमें वेदोकी अपेक्षा भी पुराणोके ज्ञानको श्रष्ठ क्यो 
बतलाया हेत शाङ्काका दो भरकारसे समाधान किया 
जा सकता हे । पहली नात तो यह दहै कि उपर्युक्तं 
रटेकके “विद्यात्‌ ओर `" विजानाति'- इन दो 
क्रियापदोपर विचार करनेसे यह ङाङ्का निर्मूरु हो जाती + 
हे । बात यह है कि ऊपरके वचनम वेदोकि सामान्य ` 
ज्ञानक ऊपिक्षा पुराणोके विरिष्ट ज्ञानका वैरिष्य बताया । 
गया है, न कि वेदोकि सामान्य ज्ञानकी अयक्षा पुराणेक 
सामान्य ज्ञानका अथवा वेदोके विरिष्ट ज्ञानकी अपेक्षा + 
पुराणोके विरिष्ट ज्ञानका । पुराणोमें जो कुछ है, वह ¦ 
वेदोका ही तो विस्तार--विदादीकरण है । ेसी दशमे , 
पुराणोका विरिष्ट ज्ञान वेदोका ही विरिष्ट ज्ञान है ओर 
वेदोका विरिष्ट ज्ञान वेदोके सामान्य ज्ञानसे ऊँचा होना , | 
ही चाहिये । दूसरी बात यह है कि जो बात वेदय 
सूत्ररूपसे कदी गयी है, वही पुराणोमें विस्तारसे वर्णित 
है । उदाहरणके लिये परम तत्के निर्गुण-निराकार 
रूपका तो वेदों (उपनिषद) में विराद वर्णन मिता है 
परन्तु सगुण-साकार तत्त्वतका बहुत ही संक्षपमे 
कहीं-कहीं वर्णन मिरता है । एसी दामे जह पुराणेकि | 
विरिष्ट ज्ञाताको सगण-निर्गुण दोनों तरत्वोका विरिष्टं | 
ज्ञान होगा, वेदोके सामान्य ज्ञाताको केवर निगण- | 
निराकारका ही सामान्य ज्ञान होगा । इस प्रकार 


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रल्ोककी संगति भलीभति बैठ जाती है ओर 

जो महिमा चास्रं वर्णित है, वह अच्छी तरह ॥ 

आ जाती है। अस्तु, ४ | 
पुराणोमिं पदयपुराणका स्थान बहुत ऊचा ह त ।, 


श्रीभगवान्‌करे पुराणरूप विग्रहका हदयस्थानीय ॥ 





ब्रह्मा संग्रहा्थं॑युगे युगे ॥ 


ई ५५ 


गया है-- “हदयं पद्यसंज्ञकम्‌।' वैष्णवोंका तो यह 
सर्वस्व ही है। इसमे भगवान्‌ विष्णका माहास्य 
 विरोषरूपसे वर्णित होनेके कारण ही यह वैष्णवोको 
अधिक प्रिय हे । परन्तु पद्यपुराणके . अनुसार सर्वोपरि 


देवता भगवान्‌ विष्णु होनेपर भी उनका ब्रह्माजी तथा 


भगवान्‌ शङ्करके साथ अभेद प्रतिपादित हुआ है । उसके 
अनुसार स्वयं भगवान्‌ विष्णु ही ब्रह्मा होकर संसारकी 
सृष्टम प्रवृत्त होतेह तथा जबतक कल्पकी स्थिति बनी 
रहती है, तबतक वे भगवान्‌ विष्णु ही युग-युगमे 
अवतार धारण करके समूची सृष्टिकी रक्षा करते है । पुनः 
कल्पका अन्त होनेपर वे ही अपना तमःप्रधान रुद्ररूप 
प्रकट करते हँ ओर अत्यन्त भयानक आकार धारण 
करके सम्पूर्ण प्राणिरयोका संहार करते हैँ । इस प्रकार सब 
भूतोका नाडा करके संसारको एकार्णवके जल्मे निमय 
कर वे स्वरूपधारी भगवान्‌ स्वयं रोषनागकी ₹इाय्यापर 
इडायन करते हँ । पुनः जागनेपर ब्रह्माका रूप धारण करके 
वे नये सिरेसे संसारकी सृष्टि करने रगते है । इस तरह 
एक ही भगवान्‌ जनार्दन सृष्टि, पालन ओर संहार 
करनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु तथा रिव नाम धारण करते 
हे ।* पद्मपुराणमें तो भगवान्‌ श्रीकृष्णके यहोतक वचन 
हे सूर्य, रिव, गणेश, विष्णु ओर दाक्तिके उपासक 
सभी मुञ्चको ही प्राप्त होते हैँ । जैसे वर्षाका जल्‌ सब 
ओरसे समुद्रम ही जाता है, वैसे ही इन पांचा रूपके 
उपासक मेरे ही पास आते हें । वस्तुतः मेँ एक ही ह । 
ट्ीलाके अनुसार विभिन्न नाम धारण कर पांच रूपोमिं 
प्रकट हू । जैसे एक ही देवदत्त नामक व्यक्ति पुत्र-पिता 
आदि अनेक नामोसे पुकारा जाता है, वैसे ही मुञ्ञको 
भिन्न-भिन्न नामोँसे पुकारते हँ । † एेसी ही बातें अन्यान्य 
पुराणेमिं भी पायी जाती हँ । वैष्णवपुराणं हिव ओर 
बरह्माजीको विष्णुसे तथा हौवपुराणोमें भगवान्‌ विष्णु एवं 
ब्रह्माजीको राङ्करजीसे अभिन्न माना गया हे । अतएव जो 





# सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद्‌ ब्रह्मविष्णुरिवात्मकः। स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः ॥ (पद्य सृष्टि० २1 ९ १४) ` ` श = 
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† सौरश्च रोवा गाणेडा वैष्णवाः राक्तिपूजकाः । मामेव ्॒र्ुवन्तीह वर्षीपः सागर यथा ॥ < 


लोग :पुराणोमें साग््रदायिकताका - गन्ध ~ पाते . है, वे 
वास्तवमे भूर करते हैँ यही प्रमाणित होता हे । 
पद्मपुराणमें भगवान्‌ विष्णुके माहात्यके साथ. 
साथ भगवान्‌ श्रीराम तथा श्रीकृष्णके अवतार-चरखिरिं 
तथा उनके परात्पर रू्पोंका भी विरादरूपसे वर्णन हआ 
हे । पातारुखण्डमे भगवान्‌ श्रीरामके अश्वमेधं यज्ञकी 
कथाका तो बहुत ही विस्तृत ओर अद्धुत वर्णन हे । 
इतना ही नही, उसमें श्रीअयोध्या ओर श्रीधाम 
वृन्दावनका माहात्म्य, श्रीराधा-कृष्ण एवं उनके पार्षदोका 
वर्णन, वैष्णवोकी द्वादराराद्धि, पांच भ्रकासकी पूजा, 
शालग्रामके स्वरूप ओर महिमाका वर्णन, तिरूककी 
विधि, भगवत्सेवा-अप्रराध ओर उनसे छटनेके उपाय, 
तुुसीके वृक्ष तथा भगवन्नाम-कीर्तनकी महिमा, 
भगवानकरे चरण-चिह्वोका परिचय तथा प्रव्येक मासमें 
भगवानकी विहोष आराधनाका वर्णन, मन्त्रचिन्तामणिका 
उपदेडा तथा उसके ध्यान आदिका वर्णन, दीक्षा-विधि 
निर्गुण एवं सगुण-ध्यानका वर्णन, भगवद्धक्तिके लक्षणः 
वैडाख-मासमें माधव-पूजनकी महिमा, वैदाख, ज्येष्ठ 
ओर आषादढ्मे जलस्थ श्रीहरिके पूजनका माहात्य 
अश्वत्थक महिमा, भगवान्‌ श्रीकृष्णका ध्यान 
पित्रारोपणकी विधि, महिमा तथा भिन्न-भिन्न मासेमिं 
श्रीहरिकी पूजाम काम आनेवाङे विविध पुष्पका वर्णन, 
बदरिकाश्रम तथा नारायणकी महिमा, गङ्गाकी महिमा, 
त्रिरात्र तुरुसीत्रतकी विधि ओर महिमा, गोपीचन्दनके ` 





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तिलककी महिमा, जन्माष्टमी-त्रतकी महिमा, बारह ` 

महीनोकी एकादशियोकि नाम तथा माहाल्य, एकादङ्ीकी ` ` 
विधि, उत्पत्ति-कथा ओर महिमाका वर्णन, भगवद्‌- ` । 
भक्तिकी श्रेष्ठता, वैष्णवोके लक्षण ओर महिमा भगवान्‌ , ` 


विष्णुके दसो अवतार्ोकी कथा, श्रीनृसिंहचतुर्दीके 
त्रतकी महिमा, श्रीमद्धगवदरीताके अटारहों अध्यारयोका ° 
अल्ग-अरूग माहात्म्य, श्रीमद्धागवतका माहात्य तथां 





` "~~ ~ --------~-- ------ ~ च्््व-~ ~- > @9 
४.4 * ५.१ 


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^. (ग~~ नि ` 
#४ ४. ^ भ् ९ , 9 मः ,§ £ ~ ं 3 + क. | 
पुत्राद्याह्वाननामभि (( > शर उत्तर्‌ ~~~# ~> = ९. < 27 ५ ` ६ ¶ ५ ल 2. 
पञ्चधा जातः क्रीडया नामभिः किल्‌ । देवदत्तो यथा कश्चित्‌ : ॥ (पद्म उत्तर०९० | €3 -£ १4" 
एकोऽहं च्चै ९, " ° ११५९ च = "4१४. „ध १ । ©. ॥ ` न> ‰ 1 छे र ^ क । 
न 1 ब व 








श्रीमद्धागवतके व विधि, नीलाचल- 
| निवासी. भगवान्‌ पुरुषोत्तमकी महिमा आदि-आदि एेसे 
५ अनेकों विषयोका समावेडा हआ है, जो वैष्णवोके स्यि 
+ बड़े ही । महत्त्वके है । इसीचल्िये वैष्णवेमिं पद्यपुराणका 
विरोष समादर हे। | | | 
। इनके अतिरिक्त सुष्टिक्रमका वर्णन, युग आदिका 
काल-मान, ब्रह्माजीके द्वारा रचे हए विविध सर्गोका 
वर्णन, मरीचि आदि प्रजापति, रुद्र तथा स्वायम्भुव मनु 
आदिकी उत्पत्ति ओर उनकी सन्तान-परम्पराका वर्णन, 
देवता, दानव, गन्धर्व, नाग ओर राक्षसोँकी उत्पत्तिका 
वर्णन, मरुद्र्णोकी उत्पत्ति तथा चौदह मन्वन्तरोका वर्णन, 
पृथुके चस तथा सूर्यवंडाका वर्णन, पितरों तथा श्राद्धके ` 
विभिन्न अङ्गका वर्णन, श्राद्धोपयोगी तीर्थोका वर्णन, 
विविध आ्रद्धकी विधि, चन्द्रमाकी उत्पत्ति, पुष्कर आदि 
विविध तीर्थोकी महिमा तथा उन ती्थेमिं वास करने- 
वारक द्वारा पालनीय नियम, आश्रमधर्मका निरूपण, 
अन्नदान एवं दम आदि धर्मोकी प्रहोसा, नाना प्रकारके 
त्रत, स्नान ओर तर्षणकी विधि, तालार्बोकी प्रतिष्टा, 
वृक्षारोपणकी विधि, सत्सङ्गकी महिमा, उत्तम ब्राह्मण 
` तथा गायत्री-मन्त्रकी महिमा, अधम ब्राह्यणोंका वर्णन, 
ब्राह्मणोके जीविकोपयोगी कर्म ओर उनका महत्व तथा 
गौओंकी महिमा ओर गोदानका फल, द्विजोचित आचार 
`. ' तथा रिष्टाचारका वर्णन, पितुभक्ति, पातित्रत्य, समता, 
अद्रोह ओर विष्णु-भक्तिरूप पांच महायज्ञोके विषयमे 
 . पाँच -आख्यान, पतित्रताकी महिमा ओर कन्यादानका 
फर, सत्यभाषणकी महिमा, पोखरे खुदाने, वृक्ष रगान, 
 पीपल्की पूजा करने, पौसङे चलाने, गोचरभूमि.छोडन, 
देवाय बनवाने ओर देवताओंकी पूजा करनेका 
4 , रुद्राक्षकी उत्पत्ति ओर महिमा, श्रीगङ्गाजीकी 
उत्पत्ति, गणेदाजीकी -महिमा ओर उनकी स्तुति एवं 
ताकि क्षण. भगवान्‌ सूरयका तथा संक्रान्ति 
, ` सूर्यकी । उपासना र उसका 















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मनुष्ययोनिमे त 
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ब 11 त 
..४.२..२.४..२.1. 1.1.27 च 
४.४.४.२.1.7. 2५ 
..४.४.१.१. चच 
1 





नय ११,१०५४५. १ 


४ + + 





4 नैमित्तिक तथा आभ्युदयिक आदि दानोंका वर्णन 
दहकगे उत्पत्ति, उसकी अपवित्रता, जन्म-मरण ओर 


जीवनके कष्ट तथा संसारकी दुःखरूपताका वर्णन, पापों 


ओर पुरण्योके फलका वर्णन, नरक ओर स्वर्गमे 
जानेवाङे पुरुषोका वर्णन, ब्रह्मचारीके पालन करने योग्य 
नियम, ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म, स्नातक एवं गृहस्थके 
धर्मोका वर्णन, गृहस्थधर्मे भक्षयाभक्ष्यका विचार तंथा 
दानधर्मका वर्णन, वानप्रस्थ एवं सन्यास-आश्रमेकि 
धर्मोका . वर्णन, संन्यासीके नियम, खी-सङ्घकी निन्दा, 
भजनकी महिमा, ब्राह्मण, पुराण ओर गङ्गाकी महत्ता, 
जन्म आदिके दुःख तथा हरिभजनकी आवदइयकता, ` 
तीर्थयात्राकी विधि, माघ, वैराख तथा कार्तिक मासका 
माहात्म्य, यमराजकी आराधना, गृहस्थाश्रमकी प्ररंसा, 
दीपए्वली-कृत्य, गोवर्धन-पूजाः तथा यमद्वितीयाके दिन 
करने योग्य कृत्यका वर्णन, वैराम्यसे भगवद्धजनमे 


= भ्रवृत्ति आदि-आदि अनेकों सर्वोपयोगी तथा सबके लिय 


ज्ञातव्य एवं धारण करने योग्य धार्मिक विषयोका वर्णन 
हुआ है, जिनके कारण पद्मपुराण आस्तिक हिंटूमात्रके 
खयि परम आदरकी वस्तु हे । | 
पद्मपुराणकी इस सर्वोपयोगिताको लक्ष्यमें रखकर्‌ 
ही कल्याणः में इसका संक्षिप्त अनुवाद छापनेकी 
आयोजना की गयी थी । इससे भारतकी धार्मिक जनताका 
यदि कुछ भी उपकार हुआ होगा तो हम अपने प्रयासको 
सफल तथा अपनेको धन्य मानेगे । अनुवादका कार्य 
आदिसे अन्ततक पे० श्रीरामनारायणदत्तजी शास््ीन बड़े 
परिश्रम एवं मनोयोगके साथ किया है तथा अनुवादक 
वत्ति तथा सम्पादन कसे एवं भ्रूफ-संदोधन आदि 
कसनमे सम्पादकीय विभागके सभी जन्धुओं तथा अन्य ` 
कई भ्रमी महानुभावोका प्रमपूर्णं एवं बहुमूलः क | 
्राप् हुआ है, जिसके किये उन्हं धन्यवाद देना तो = 
कार्यके महत्त्वको घटाना होगा । ये सभी महानुभाव 0 । 
ही है; ेसी दङामें उनकी बड़ाई अपनी ही बड़ाई हग । 


वाध 
अन्तमें हम अपना यह क्षुद्र प्रयास थ 
चरणेमिं अर्पित करते है ओर अपनी ्रयियेकि लि पुनः 


सबसे हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हे । हरिः ॐ तत्सत्‌ ॥ स 4 


यन्द 
विनीत- | # 







विषय ` 
सृष्टि-खण्ड 
१-ग्रनथका उपक्रम तथा इसके सखरूपका पस्चिय 
-भीष्म ओर पुरस्त्यका संवाद-सृष्टि-क्रमका 
वर्णन तथा भगवान्‌ विष्णुकी महिमा 


..३-ब्रह्माजीकी आयु तथा युग आदिका कामान, ` 


:-:. भगवान्‌ वराहद्वारा पृथ्वीका रसातलसे उद्धार 


` .. ओर ब्रह्माजीके द्वारा सचे हुए विविध सर्गोका 


वर्णन 


४-यज्ञके लिय ब्राह्मणादि वर्णो तथा अन्नकी सृष्टि, 


मरीचि आदि प्रजापति, रुद्र॒ तथा खायम्भुव 
मनु आदिकी उत्पत्ति ओर उनकी संतान- 
परम्पराका वर्णन 
/८-लक्ष्मीजीके प्रादुर्भावकी कथा, समुद्र-मन्थन 
ओर अमृत-प्राप्ति 
-सतीका देहत्याग ओर दक्ष-यज्ञ-विध्वंस -. . 
७-देवता, दानव, गन्धर्व, नाग ओर राक्षसोंकी 
उत्पत्तिका वर्णन 
८-मरुद्र्णोकी उत्पत्ति, भिन्न-भिन्न समुदायके 
राजाओं तथा चौदह मन्वन्तरोका वर्णन . - 
९-पुथुके चरित्र तथा सूर्यवंराका वर्णन 
१०-पितरों तथा श्राद्धके विभिन्न अङ्खोका वर्णन 
११-एकोदिष्ट आदि श्राद्धोंकी विधि तथा 
श्रद्धोपयोगी तीर्थोका वर्णन 
` १२-चन््रमाकी उत्पत्ति तथा यदुवंश एवं (~ 
सहस्रार्जुनके प्रभावका वर्णन 
 १२-यदुवंशके अन्तर्गत क्रोष्ट आदिके वंडा तथा 
श्रीकृष्णावतारका वर्णन 
१४-पुष्कर तीर्थकी महिमा, वहां वास करनेवाले 


लोगेकि छ्यि नियम तथा आश्रम-धर्मका ` 


निरूपण 
१५-पुष्कर क्षत्रमे ब्रह्माजीका यज्ञ ओर सरस्वतीका 
प्राकस्य 
१६-सरस्वतीके नन्दा नामं पड्नेका इतिहास ओर 
उसका माहात्म्यं 
१७-पुष्करका माहात्म्य, अगस्त्याश्रम तथा महर्षि 
अगस्त्यके प्रभावका वर्णन 


१८-सपर्षि-आश्रमके प्रसङ्गमे सपर्षियोकि अलोभका ` 


वर्णन तथा ऋषियेकि मुखसे अन्नदान एवं 
दम आदि धर्मोकी प्ररोसा 


॥ श्रीहरिः ॥ 


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विषय 


विषय-सूची (1 


पृष्ठ-संख्या 


१९-नाना प्रकारके त्रत, स्नान ओर तर्पणकी विधि 
तथा अन्नादि पर्वतेकि दानकी मङोसाम्रे राजा 
धर्ममूर्तिकी कथा 
२०-भीमद्रादरी-त्रतका विधान ¦ 
२१-आदित्य-शयन ओर रोहिणी-चन्द्र-दायन-त्रत, 
तडागकी प्रतिष्ठा, वृक्षारोपणकी विधि तथा 
सोभाग्य-ङयन-व्रतका वर्णन 
२२-तीर्थ-महिमाके प्रसङ्गे वामन-अवतारकी 
कथा, भगवानका बाष्कल दैत्यसे त्रिलोकीके 
राज्यका अपहरण 
२३-सत्सङ्गके प्रभावसे पांच प्रेतका उद्धार ओर 
पुष्कर तथा ग्राची सरस्वतीका माहात्म्य = -- - 
र४-मार्कण्डेयजीके दीर्घायु होनेकी कथा ओर 
श्रीरामचन्द्रजीका लक्ष्मण ओर सीताके साथ 
पुष्करमें जाकर पिताका श्राद्ध करना तथा 
अजगन्ध शिवकी स्तुति करके लौटना 
२५ब्रह्माजीके यज्ञके ऋत्विजोंका वर्णन, सब 
देवता्ओंको ब्रह्माद्वारा ` ` वरदानकी अधि, 
श्रीविष्णु ओर श्रीरिवद्वारा ब्रह्माजीकी स्तुति 
तथा ब्रह्माजीके द्वारा भिन्न-भिन्न तीर्थेभिं अपने 
नामों ओर पुष्करकी महिमाका वर्णन 
२६-श्रीरामके द्वास राम्बूकका वध ओर मेरे हए 
ब्राह्मण-बारुकको जीवनकी प्राति 
महर्षिं अगस्त्यद्रारा राजा तके उद्धारकी कथा 
२८-दण्डकारण्यकी उत्पत्तिका वर्णन 
२९-श्रीरामका र्का, रामेश्वर, पुष्कर एवं मथुरा होते 
हए गङ्गातटपर जाकर भगवान्‌ श्रीवामनकी 
स्थापना. करना 
३०-भगवान्‌ श्रीनारायणकी महिमां, युरगोका पर्चिय 
प्रल्यके जलम मार्कण्डेयजीको भगवान्‌के 
दर्शन तथा भगवानकी नाभिसे कमल्की 


७9 ७ 9 च ७ 9०० ० ० ७ ७०७० क ०७७००००० 


३१-मधु-कैटभका वध तथा सृष्टि-परम्पराका वर्णन १ 


३२-तारकासुरके जन्मकी कथा, तारककी तपस्या 
उसंके द्वारा देवता्ओंकी पराजय.ओर ब्रह्माजी 
का देवताओंको सान्त्वना देना .+-- °^ “~ 


३३-पार्वतीका जन्म, मदन-दहन पार्वतीकी तपस्या 





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पष्ट-संख्या 


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९७ 


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१९०९ 
९४ 


९९६ 
९९९ 


१२२ 









` ३४-गणेड ओर कार्तिकेयका जन्म तथा कार्तिकेय 
द्वारा तारकासुरका वध ------.------.- 
 ३६-अधम ब्राह्य्णोका वर्णन, पतित विप्रकी कथा 
ओर गरुडजीका चरित्र 
३७-त्राह्मणोकि जीविकोपयोगी कर्म ओर उनका 
महत्व तथा गोओंकी महिमा ओर गोदानका 


वर्णन 
३९-पितुभक्ति, पातित्रत्य, समता, अद्रोह ओर 
विष्णुभक्तिरूप पांच महायज्ञोके विषयमे 
ब्राह्मण नरोत्तमकी कथा 
४०-पतित्रता ब्राह्मणीका उपाख्यान, कुरुटा सियोके 
सम्बन्धे उमा-नारद-संवाद, पतिव्रताकी 
महिमा ओर कन्यादानका फल 
४९-तुलाधारके सत्य ओर समताकी प्रहोसा, सत्य- 
भाषणकी महिमा, खोभ-त्यागके विषयमे एक 
डद्रकी कथा ओर मूक चाण्डारु आदिका 








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+ ४र-पोखेरे खदाने, वृक्ष गाने पूजा 
करने, पसे (प्याऊ) चाने, गोचरभूमि 
छोडने, देवाय बनवाने ओर देवताओंकी पूजा, 





`  दे-रुद्राक्षकी 7 उत्पत्ति ओर महिमा तथा आओंवलेके 
फरुकी महिमां तरेतोकी कथा ओर तुरुसी- 
ॐ ध ४ ५ = दलका ठ्‌ ध करा माहात्म्य ~°“ "` 
क ` ४४-तुलसी-सतोत्रका वर्णन 
क -रग्ञाजोकी मदमा ओर उनकी उति 
जीकी महिमा मा ओर उनकी स्तुति एवं 





















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पृष्ठ-संख्या 


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३५-उत्तम ब्राह्मण ओर गायत्री-मन्त्रकी महिमा १५० 


२५५ 


९६० 


९६६ 


१६७० 


१८२९ 


९१८९ 


१९२ 


९९६ 


२०२९ 
२०२ 


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विषय 


५९-सोमरार्माकी पितुभक्ति 


५२-सुत्रतकी उत्पत्तिके प्रसङ्गः सुमना ओर 


शिवरर्माका संवाद--विविध प्रकारके रोका 
वर्णन तथा दुर्वासाद्रारा धर्मको शाप 
५२-सुमनाके द्वारा ब्रह्मचर्य, साङ्गोपाङ्ग धर्म तथा 
धर्मात्मा ओर पापियोकी मृत्युका वर्णन 
५४-वसिष्ठजीके द्वारा सोमरामाकि पूर्वजन्मसम्बन्धी 
शुभारुभ कर्मोका वर्णन तथा उन्हे भगवानके 
भजनका उपदेरा 
५५-सोमडामकि द्वारा भगवान्‌ श्रीविष्णुकी आराधना, 
भगवानका उन्हं दर्न देना तथा सोमरार्माका 
उनकी स्तुति करना 
५६-श्रीभगवान्‌के वरदानसे सोमरार्माको सुत्रत 
नामक पुत्रकी प्राप्ति तथा सुत्रतका तपस्यासे 
माता-पितासहित वेकुण्ठलोकमें जाना 
५.७-राजा पृथुके जन्म ओर चरित्रिका वर्णन 
५८ -मृत्युकन्या सुनीथाको गन्धर्वकुमारका हाप, 
अङ्खकी तपस्या ओर भगवान्‌से वर-प्राप्ति 
५९-सुनीथाका तपस्याके ख्ये वनमें जाना, रम्भा 
आदि सखियोंका वहो पर्हुचकर उसे मोहिनी 
विद्या सिखाना, अङ्खके साथ उसका गान्धर्व 
विवाह, वेनका जन्म ओरं उसे राज्यकी प्राप्ति 
६०-छद्मवेषधारी पुरुषके द्वारा जेन-धर्मका वर्णन, 
उसके बहकावेमें आकर वेनकी पापम प्रवृत्ति 
ओर सपर्षियोद्रारा उसकी भुजाओंका मन्थन 
६१-वेनकी तपस्या ओर भगवान्‌ श्रीविष्णुके द्वार 
उसे दान-तीर्थ आदिका उषदेडा 
६२-श्रीविष्णाद्वारा नैमित्तिक ओर आभ्युदयिक 
आदि दानोंका वर्णन ओर पलीतीर्थके ्रसङ्गमे 


सती सुकलाकी कथा 
६३-सुकलयका रानी सुदेवाकी महिमा बताते हुए 


एक शकर ओर शुकरीका उपाख्यान सुनाम 


डुकरीद्रारा अपने पतिक पूर्वजनमका वर्णन 


द४-हुकरीद्वारा अपने पूर्वजन्मके वृततात्तक वध 
तथा रानी सुदेवाके दिये हुए पुण्यसे उसका 





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विषय 
६६-सुकलाके स्वामीका तीर्थयात्रासे लौटना ओर 
धर्मकी आज्ञासे सुकलके साथ श्राद्धादि 
करके देवताओंसे वरदान प्राप्त करना 
६७-पितृतीर्थके प्रसङ्गमें पिप्परूकी तपस्या ओर 
सुकर्माकी पितुभक्तिका वर्णन, सारसके कहनेसे 


पिप्पका सुक्मकि पास जानी ओर सुकर्माका 
उन्हँं माता-पिताकी सेवाका महत्त बताना 


६८-सुकर्माद्रारा ययाति ओर मातक््कि संवादका 


उल्रेख-मातक्िके द्वारा देहकी उत्पत्ति, 8 


उसकी अपवित्रता, जन्म-मरण ओर जीवनके 

कष्ट तथा संसारकी दुःखरूपताका वर्णन 
६९-पापों ओर पुण्योके फर्का वर्णन 
७०-मातक्के द्वारा भगवान्‌ रिव ओर श्रीविष्णुकी 
महिमाका वर्णन, मातक्िको विदा करके राजा 
ययातिका वेष्णवधर्मके प्रचारद्रारा भूलोकको 
वैकुण्ठतुल्य बनाना तथा ययातिके द्रबारमें 
काम आदिका नाटक खेलना 
७१-ययातिके डउरीरमं जरावस्थाका प्रवे, 
कामकन्यासे भेंट, पृरुका यौवन-दान, 
ययातिका कामकन्याके साथ प्रजावर्गसहित 
वेकुण्ठधाम-गमन 
७२-गुरुतीर्थके प्रसङ्गमें महर्षि च्यवनकी कथा- 
कुञ्जर पक्षीका अपने पुत्र उज्ज्वलको ज्ञान, 
त्रत ओर स्तोत्रका उपदेह 
७३-कुञ्जकका अपने पुत्र विज्वरूको उपदेश-- 
महर्षिं जैमिनिका सुबाहुसे दानकी महिमा 
कहना तथा नरक ओर सर्गम जानेवाछे 
पुरुषोका वर्णन 
७४-कुञ्जलका अपने पुत्र विज्वकको श्रीवासुदेवाभि- 
धान-स्तोत्र सुनाना 
७८-कुञ्जरु पक्षी ओर उसके पुत्र कपिञ्जरूका 
संवाद--कामोदाकी कथा ओर विहृण्ड 
दैत्यका वध 
७६-कुञ्जलका च्यवनको अपने पूर्व-जीवनका 
वृत्तान्त बताकर सिद्ध पुरुषके कहे हए ज्ञानका 


उपदेडा करना, राजा वेनका यज्ञ आदि करके . 


विष्णुधाममे जाना तथा पद्मपुराण ओर 
ग~ भूमिखण्डका माह्मन्म्य ०९०७० ७००७० ००००७००७ 


॥ ९ 








पृष्ट-संख्यां तिषय पृष्ठ-संख्या 
स्वर्ग-खण्ड 1 
७७-आदि सृष्टिक क्रमका वर्णन ~°“ ~“ ˆ ` ` ३३२ 
९०९ ७८-भारतवर्षका वर्णन ओर वसिष्ठजीके द्वारा 
पुष्कर तीर्थकी महिमाका बखान “--* “° ° २२३३ 
७९-जम्बूमार्ग आदि तीर्थ, नर्मदा नदी, अमर- 
कण्टक पर्वत तथा कावेरी-सङ्गमकी महिमा ३३६ 
९८९ ८०-नर्मदाके तटवरतीं तीर्थोका वर्णन ----- --- ३३८ 
 ८९-विविध तीर्थोकी महिमाका वर्णन ---* ° - ~ दे 
. <२-धर्मतीर्थ आदिकी महिमा, यमुना-स्नानका 
माहात््य-हेमकुण्डल वैर्य ओर उसके 
3 पत्रौकी कथा एवे स्वर्गं तथा नरकमे ठे 
५. जानेवाठे उुभाडुभ कर्मोका वर्णन --*--- ३४९ 
८२-सुगन्ध . आदि तीर्थोकी महिमा तथा कारी- 
पुरीका माहात्म्य ----------- "~~ - ३५८ 
८४-पिाचमोचनकुण्ड एवं कपर्दीश्चरका 
क माहात्य--पिशाच तथा राङ्ककरणंमुनिके मुक्त 
होनेकी कथा ओर गया आदि तीर्थोकी महिमा ३६१ 
८५-ब्रह्मस्थुणा आदि तीर्थो तथा प्रयागकी महिमा; ॥ 
इस प्रसङ्खके पाठका माहात्म्य *.*--*०-* °. ३६६ 
== ८६-मार्कण्डयजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको 
म्रयागकी महिमा सुनाना *-**-**-*----- - ३६८ 
८७-भगवानके भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा ३७५. 
३१० <८ब्ह्चारीके पर्न करनेयोग्य नियम ~^“ ३७८ ` 
८९ ब्रह्मचारी रिष्यके धर्म... ३८३ । 
९०-स्नातक ओर गृहस्थके धर्मोका वर्णन ~ ~~ ३८७ 
९१-व्यावहारिक रिष्टाचारका वर्णन =-= -- - ३९० “~ 
३१५ र९र-गृहस्थधर्ममे भक्याभक्ष्यका विचार तथादान- 
धर्मका वर्णन ६.०००.००० ०००. स 
३९८ ९३-वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मका वर्णन -----*-* ३९७ 
९४-संन्यास-आश्रमके धर्मका वर्णन ८.२९ 
९ ५-संन्यासीके निय न ००० ००. & 
३२२ ९द-भगवद्भक्तिकी प्ररोसा, खी -सङ्गकी निन्दा, ` 
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3 पाताक-खण्ड 
 ९८-रेषजीका वात्स्यायन मुनिसे रामाश्चमेधकी कथा 
| आरम्भ करना. , श्रीरामचन्द्रजीका लङ्खासे 
अयोध्याके स्यि विदा होना 
९९-भरतसे मिरूकर भगवान्‌ श्रीरामका अयोध्याके 
निकट आगमन 
१०० -श्रीरामका नगर-परवेङा, माताओंसे मिलना 
राज्य ग्रहण करना तथा रामराज्यकी सुव्यवस्था 
१०९१-देवताओद्वारा श्रीरामकी स्तुति, श्रीरामका 
उन्हें वरदान देना तथा रामराज्यका वर्णन 
१०२-श्रीरामके दरबारमें अगस्त्यजीका आगमन, 
उनके द्वारा रावण आदिके जन्म तथा तपस्याका 
वर्णन ओर देवताओंकी प्रार्थनासे भगवानका 
अवतार छेना 
९०३-अगस्त्यका अश्वमेध यज्ञकी सलाह देकर 
अश्चकी परीक्षा करना तथा यज्ञके स्यि आये 
, ` हए ऋषिर्योद्रारा धर्मकी चर्चा 
 ९ठ४-यज्ञसम्बन्धी अश्चका छोड़ा जाना ओर श्रीरामका 
` उसकी रक्षाके छ्य उात्रुघ्रको उपदे करना 
१०५-दत्रघ्र ओर पुष्कर आदिका सबसे मिरूकर 
^ ^ सनासहित घोडेके साथ जाना, राजा सुमदको 
६. कथा तथा सुमदके द्वारा शात्रुघ्रका सत्कार “ ` 
| |. ९०द-शत्रघ्रका राजा सुमदको साथ केकर आगे जाना 
+“ ओरच्यवनमुनिके आश्रमपर पहचकर सुमतिके 


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 सुकन्यासे न्यासे व्याह 695 
७-सु न्याके द्वारा पतिकी सेवा, च्यवनको योवन- 
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पृष्ठ-संख्या 


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विषय ` 
९९ ९- चक्राङ्का नगरीके राजकुमार दमनद्रारा घोड़ेका 
चका जाना तथा राजकुमारका भ्रतापामूयको 
युद्धम परास्त करके स्वयं पुष्कल्के द्वारा 
' पराजित होना -----°०., 
९९२-राजा सुबाहुका भाई ओर पुत्रोसहित युद्धमे 
आना तथा सेनाका क्रोञ्च-व्यूहनिर्माण 
१९३-राजा सुबाहुकी प्रहंसा तथा लक्ष्मीनिधि ओर 
सुकेतुका दरन्द्र-युद्ध 


११४-पुष्ककके हारा चित्राङ्गका वध, हनुमानूजीके 


चरण-प्रहारसे सुबाहुका रापोद्धार तथा उनका 
आत्मसमर्पण 
११५-तेजःपुरके राजा सत्यवान्‌की जन्मकथा-- 
सत्यवान्का रखात्रुघ्रको सर्वस्व-समर्पण 
११६-ङातुघ्रके द्वारा विद्युन्माटी ओर उग्रदष्टका वध 
तथा उसके द्वारा चुराये हुए अश्चकी प्राप्ति 


 ११.७-रातरुघ्र आदिका घोडेसहित आरण्यक मुनिके 


आश्रमपर जाना, मुनिकी आत्म-कथामें 
रामायणका वर्णन ओर अयोध्यामें जाकर उनका 
श्रीरघुनाथजीके स्वरूपमें मिरु जाना 
११९८-देवपुरके राजकुमार रुवमाङ्गदद्रारा अश्चका 
अपहरण, दोनों ओरकी सेनाओमें युद्ध ओर 
पुष्कलके बाणसे राजा वीरमणिका मूर्छित होना 
११९-हनुमान्‌जीके द्वारा वीररसिंहकी पराजय 
वीरभद्रके हाथसे पुष्करका वध, शाङ्करजीके 

द्वारा इत्रुघ्रका मूर्छित होना, हनुमानके पराक्रमसे 
दिवका सन्तोष,. हनुमानजीके उद्यीगसे मरे 

हए वीरोका जीवित होना, श्रीरामका प्रादुर्भाव 

ओर वीरमणिका आत्मसमर्पण 
१२०-अश्चका गात्र-स्तम्भ श्रीरामचस्तर-कीर्तनसे 
स्वर्गवासी ब्राह्मणका राक्षसयोनिसे उद्धार 

तथा अश्वके गात्र-स्तम्भकी निवृति . स 
-राजा स्रथके द्वारा अश्चका पकड़ा अ" 
र त उनौर उनके प्रभावका वर्णन, 
अङ्गदका दूत बनकर राजाके यहा जाना ओर 
राजाका युद्धके स्यि तैयार होना 565८६ 


१२२-युद्धमें चम्पकके द्वारा पुष्करूका न =! जाना 
'हनुमानूजीका चम्पकको मूर्छित पुष्कलको 














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विषय 
१२३-वाल्मीकिके आश्रमपर कवद्वारा घोडेका धना 
ओर अश्च-रक्षकोंकी भुजाओंका काटा जाना 
१२४-गुप्तचरोसे अपवादकी बात सुनकर श्रीरामका 
भरतके प्रति सीताको वनम छोड आनेका 
अदेडा ओर भरतकी मूच्छ 
१२५-सीताका अपवाद करनेवाले धोनीके पूर्वजन्मका 
वृत्तान्त 
१२६-सीताजीके त्यागकी बातसे शातरुघ्रकी भी मूर्च्छा, 
लक्ष्मणका दुःखित चित्तसे सीताको जंगल 
छोडना ओर वाल्मीकिके आश्रमपर कव-कुडाका 
जन्म एवं अध्ययन 
१२७-युद्धमें कुवके द्वारा सेनाका संहार, कालजित्का 
वध तथा पुष्कल ओर हनुमान्‌जीका मूर्छित 
होना 
१२८-रातरघ्रके बाणसे रवकी मूर्च्छा, कुडाका रण- 
त्रम आना, कुडा ओर कूवकी विजय तथा 
सीताके प्रभावसे इात्ुघ् आदि एवं उनके 
सेनिकोकी जीव-रक्षा ०००००..-०--.००-. 
१२९-रत्रुघ आदिका अयोध्यामे जाकर 
श्रीरघुनाथजीसे मिलना तथा मन्त्री सुमतिका 
उन्हे यात्राका समाचार बतलाना 


१३०-वाल्गीकिजीके द्वारा सीताकी शुद्धता ओर | 


अपने पुत्रोका परिचय पाकर श्रीरमका सीताको 
लानेके छ्य लक्ष्मणको भेजना, लक्ष्मण ओर 
सीताकी बातचीत, सीताका अपने पुत्रको 
भेजकर स्वयं न आना, श्रीरामकी प्ररणासे पुनः 


लक्ष्मणका उन्हं बुलानेको जाना तथा रोषजीका. 


वात्स्यायनको रामायणका परिचय देना 
१३१-सीताका आगमन, यज्ञका आरम्भ, अश्चकी 
मुक्ति, उसके पूर्वजन्मकी कथा, यज्ञका उपसंहार 
ओर रामभक्ति तथा अशमेध-कथा-श्रवणकी 
महिमा 
१३२-व॒न्दावन ओर श्रीकृष्णका माहात्म्य 
१३३-श्रीराधा-कृष्ण ओर उनके पार्ष्दोका वर्णन तथा 
नारदजीके द्वारा व्रजमें अवतीर्णं श्रीकृष्ण ओर 
राधाके दर्हन 


१३४-भगवानके परात्पर सखरूप--श्रीकृष्णकी महिमा 


न च 


तथा मथुराके माहात्म्यका वर्णन 


पृष्ठ-संख्या; विषय 


८,९१ 


५५९२ 


५१८ 


५९२१ 


५२८ 


५.२९ 


५,२७ 


५२९ 


"२.1 
८,५9 


१३५-भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा व्रज तथा द्वारका्े 
निवास करनेवार्कोकी मुक्ति, वैष्णवोंकी द्राददा 


रद्धि, पच प्रकारकी पूजा, शाक्गरामके खरूप ` 


ओर महिमाका वर्णन, तिलककी विधि, अपराध 

ओर उनसे छूटनेके उपाय, हविष्यान्न ओर 
तुलसीकी महिमा 
१३६-नाम-कीर्तनकी महिमा, भगवानके चरण- 
चिका परिचय तथा प्रत्येक मासमे भगवानूकी 
विहोष आराधनाका वर्णन 
१२३७-मन्त्रचिन्तामणिका उपदेडा तथा उसके ध्यान 
आदिका वर्णन 
१३८-दीक्षाकी विधि तथा श्रीकृष्णके द्वारा रुद्रको 
 युगल-मन्त्रकी प्राप्ति 
१३९-अम्बरीष-नारद-संवाद तथा नारदजीके द्वारा 
निर्गुण एवं सगुण ध्यानका वर्णन 
१४०-भगवद्धक्तिके लक्षण तथा वैडाख-स्नानकी 
महिमा 
१४१-वैराख-माहात्म्य 
१४२-वैशाख-सनानसे पाँच प्रर्तोका उद्धार तथा. 
"पाप-प्रडामन' नामक स्तोत्रका वर्णन 
१४३-वैराख मासमे सान, तर्षण ओर श्रीमाधव- 
पूजनकी विधि एवं महिमा 
१४४-यम-ब्राह्मण-संवाद- नरक तथा स्वर्गमें ठे 
जानेवाङे कर्मोका वर्णन 
१४५-तुसीदरु ओर अश्चत्थकी महिमा तथा 
वैशाख-माहात्यके सम्बन्धे तीन मरेतकि 
उद्धारक कथा 
१४६-वैराख-माहाव्यके अ्रसङ्गमे राजा महीरथकी 
कथा ओर यम-ब्राह्मण-संवादका उपसंहार 
१४७-भगवान्‌ श्रीकृष्णका ध्यान 
उत्तरखण्ड 


१४८-नारद-महीदेव-संवाद्- बदरिकाश्रम तथा ` 


नारायणकी महिमा 


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१४९-गङ्गावतरणकी संक्षिप्त कथा ओर हरिद्रारकां । ॑ न 







पृष्ठ-संख्या 





५६१ 


8 ५ 
५६८ 
५५७१ 
(५७५५ 


८ © 
(८३ 


८८ ८ 
८.८९ 


५९३ 


५९६ 


व 





९५२त्रिरात्र ` तंरुसीत्रेतकी विधि ओर महिमा 
 १५३-अन्नदान, जरदान, तडाग निर्माण, वृश्षारोपण 
^ ` , तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा 

| ९४-मन्दिरमें पुराणकी कथा कराने ओर सुपात्रको 
` दान देनेसे होनेवाली सद्रतिके विषयमे एक 
आख्यान तथा गोपीचन्दनके तिरूककी महिमा 
१५५-संवत्सरदीप-त्रतकी विधि ओर महिमा 
१५६-जयन्ती संज्ञावाखी ` जन्माष्टमीके त्रत तथा 
विविध प्रकारके दान आदिकी महिमा 

९ ,/६५७-महारज दङर्थका इानिको संतुष्ट करके 
| लेकका कल्याण करना 
१८८-त्रिस्पुशात्रतकी विधि ओर महिमा 
१९५९ -पक्षवर्धिनी एकादस्री तथा जागरणका माहात्म्य 
१६०-एकादरीके जया आदि भेद्‌, नक्तत्रतका 
स्वरूप, एकादरीकी विधि, उत्पत्तिकथा ओर 





महिमाका वर्णन --*------- 9 # 
९६१-मार्गहीर्ष खुक्कपक्षकी “मोक्षा एकादरीका 
माहात्म्य =०.००००००००००००००००००००००. 
१६२-पौष्‌ मासकी “सफला' ओर “पुत्रदा नामक 
एकादङडीका माहात्म्य *-*----*-* ~“ ~" - ` 
 ९६३-माघ मासकी “षटतिला ओर “जयाः 
|  एकादसीका माहात्म्य --*----“-“"-* 
९६४-फाल्गुन मासकी “विजया तथा “आमरुकी 
एकादक्षीका माहात्म्य .. -- - ` - 8 £ 





१६५-चैतर 1 मासकी “पापमोचनी' तथा कामदा 










मासकीं १ 
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पुष्ठ-संख्या 


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९९६ 
६२८ 


८२९ 
६२५ 
६२५७ 
६३९ 
६२२ 
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९४९ 
६५१ 
६५२ 
६५८ 
६६५ 
६६.२९ 
६६५५ 


६६७ 


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९७२-कार्तिक मासकी रमा 


१८६-कार्तिक-त्रतका 


१८९-कर्तिक-त्रतके नियम ओर उद्यापनकी विधि 


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विषय 

पृष्ठसंख्या 
ओर ्रबोधिनीः 
एकादरीका माहाल्य -.--..+--. 


१७३-पुरुषोत्तम मासकी कमला ओर कामदा 
एकादरीका माहात्म्यं ~... 
९.७४-चातुर्मास्य व्रतकी विधि ओर उद्यापन ..... 
९७५-यमराजकी आराधना ओर गोपीचन्दनका 
माहात्म्य 
१७६-वैष्णवोके रक्षण ओर महिमा तथा श्रवण- 
द्रादी-त्रतकी विधि ओर माहात्य-कथा .. 
१७७-नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहसरनाम- 
स्तोत्रका वर्णन 
१७८ -गृहस्थ-आश्रमको प्रहोसा तथा दान-धर्मकी 
महिमा :;35 6 ५ १01 
१.७९-गण्डकी नदीका माहात्य तथा अभ्युदय एवं 
ओ्ध्वदेहिक नामक स्तोत्रका वर्णन 
१८०-ऋषिपञ्चमी-त्रतकी कथा, विधि ओर महिमा 
१८१-न्याससहित अपामार्जन नामक स्तोत्र ओर 
उसकी महिमा 
१८२-श्रीविष्णुकी महिमा--भक्तप्रवर पुण्डरीकक 
कथा 
१८३-श्रीगङ्गजीकी महिमा, वैष्णव पुरुषोके लक्षण 
` तथा श्रीविष्णु-प्रतिमाके पूजनका माहाल्य -† 
१८४-चैत्र ओर वैदाख मासके विरोष उत्सवका 
वर्णन, वैराख, ज्येष्ठ ओर आषाढे जलस्थ 
श्रीहरिके पूजनका महत्त्व 
१८ -पवित्रारोपणकी विधि, महिमा तथा भिन्न-भिन्न 
मासमे श्रीहरिकी पूजामें काम आनेवाठे विविध 


पुष्पका वर्णन 


६५७७ 
६८० 


६८४ 


६८८ 


९६९१ 
७२ 


७२५ 
७२८ 
००७०० ०७०००००५०७०००७०००००७००  \9 २ [*) 

७३२५ 


५७४२९ 


७४५ 


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2 च, ` 






७४४७ 


माहात्म्य--गुणवतीको 


का्तिकत्रतके पुण्यसे भगवानक्ती प्रपि 
१८७-कार्तिककी शरष्ठताके प्रसङ्गे दङ्खासुरके 
वेदकि उद्धार तथां “तीर्थराजः के उत्कर्षकौ कथा 


१८८-कार्तिक मासमे खान ओर पूजनकी विधि 


















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पुण्यदानसे ~ र उद्धार \9 1 ६ ६२९ । 
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विषय 
पृष्ठ-संख्या विषय ृष्ट-संख्या 
-पुण्यात्मा 
स स व २१६ ० नवें ओर दस्वेँ अध्यार्योका ¦ 
-अराक्तावस्थामें ~! ~ माहत्व 4 ८२८ 
1 ५०२ २१७-श्रीमद्धगवद्रीताके ग्यारहवें अध्यायका माहात्म्य ८३२ 
करतेयोग्यनियम ७७ क. 1 ग 
१९५५-ग्रसङ्गतः माघस्नानकी महिमा, रुकरक्ेत्रका ११ मतन 
माहात्म्य तथा मासोपवास-त्रतकी विधिका व अध्यार्योका माहात्म्य न ८३७ 
९९६-दालमरामरिलाके पूजनका माहाल्य „~. य २२०-श्रीमद्धगवदरीताके पद्रहवे तथा सोहें 
१ ९७-भगवत्पूजन, दीपदान, यमतर्षण, = अध्यार्योका माहात्प्य °= ===. ८४० 
कृत्य, गोवर्धन-पूजा ओर यमद्वितीयाके दिन ९२९.श्रीमद्धगवदरीताके सृत्रहवै ओर अयरहवे 
करने योभ्य करत्योका व 0 अध्या्योका माहात्म्य -..-.-----०-०--* ८४२ 
१९८-प्रबोधिनी एकादङी ओर उसके जागरणका महत्त्व २२२ देवि नारदकी सनकादिसे भेर तथा नारदजीके 
तथा भीष्मपञ्चक-व्रतकी विधि एवं महिमा .. ७८२ द्वारा भक्ति, ज्ञान ओर वैराग्यके वृत्तान्तका वर्णन ८४५ 
१९९-भक्तिका स्वरूप, शालगोमादालाकी महिमा २२३-भक्तिका कष्ट दूर कनके छियि नारदजीका 
तथा वैष्णव पुरुषोंका माहाल्य . ---- “~~: ७८४ उदोग ओर सनकादिके दर ऊनहं साधनकी प्रपि ८४९ 
२००-भगवत्स्मरणका प्रकार, भक्तिकी महत्ता २२४-सनकादिद्वारा श्रीमद्धागवतकी महिमाका वर्णन 
भगवततत्वका ज्ञान, प्रारन्धकर्मकी अनलता तथा कथा-रससे पृष्ट होकर भक्ति, ज्ञान ओर 
तथान्त त वैरग्यका प्रकट होना ८५२ 
२०९१-पुष्कर आदि तीर्थोका वर्णन -*----*..~-~- ७९० २२५-कथामे भगवानका प्रादुर्भाव, आत्मदेव । 
२०२-वेत्रवती ओर साभ्रमती (साबरमती) नदीका ्राहमणकी कथा--धुःधुकारी ओर गोकर्णकी 
माहात्म्य = ~ ७९१ उत्पत्ति तथा आत्मदेवका वनगमन ० ८८६ 
२०३-साभ्रमती नदीके अवान्तर तीर्थोका वर्णन ... ७९५ ररद-गोकर्णजीकी भागवत-कथासे धुधुकारीका ‹ ~ 
२०४-अभ्रितीर्थ, हिरण्यसंगमतीर्थ, धर्मतीर्थं आदिकी भेतयोनिसे उद्धार तथा समस्त श्रोताओंको 
महिमा व परमधामकी प्राप्ति ~" "~" ८६१ 
२०५-साभ्रमती-तटके कपीश्वर, एकधार, सप्तधार ‡ २२७-श्रीमद्धागवतके सप्ताह-पारायणकी विधि तथा 
ओर ब्रह्मवल्ली आदि तीर्थोकी महिमाका वर्णन ७९९ भागवतान ८६५५ 
२०६-साभ्रमती-तरके बालक, दुर्ध्षि्वर तथा . २२८-यमुना-तटव्तीं 'इद्धभस्थ' नामक तीर्थकी 
खद्धार आदि तीर्थोकी महिमाका वर्णन --. ८०२ माहाव्यकथा "~ ८७० 
` २०७-वात्रघ्री आदि तीर्थोकी महिमा --~- ~~~“ ८०६ २२९-निगमोद्बोध नामक तीर्थकी ` महिमा-- 
२०८-श्रीनसिंहचतुर्दडीके त्रत तथा श्रीनृसिंहतीर्थकीः िवङामीके पू्वजनकी कथा ~>" ८७३ 
महिमा ८१० २३० -देवल मुनिका शरभको राजा दिरीपकी कथा 
२०९-श्रीमद्धगवद्रीताके पहठे अध्यायका माहात्य ८९४ सुनाना--राजाको नन्दिनीकी सेवासे पुत्रकी ` 
२१० -श्रीमद्धगवदीताके दूसरे अध्यायका माहाल्य ८१५. प्राप्ति न नन ८७९ 
२११-श्रीमद्धगवदरीताके तीसरे अध्यायका माहाल्य ८१७ २३१-रभको देगीकी आराधनासे पुत्रकी प्राप्तिः ` 
२९२-श्रीमद्धगवद्रीताके चौथे अध्यायका माहाल्य ८२० रिवडामाकि पूर्वजन्मकी कथाका ओर र 
२९३-श्रीमद्धगवदी ताके पांचवे अध्यायका माहात्य ८२२ निगमेद्रोधक तीर्थकी महिमाका,उपसंहार ~. ८७९ 
२९४-श्रीमद्धगवद्रीताके छठे अध्यायका माहाल्य ८२३ २३२-इन्रभस्थके द्वारका, कोसल, मधुवन, वदरी द ५ 
२१५-श्रीमद्भगवदरीताके सातवे तथा आठवें हरिद्र, पुष्कर, प्रयाग, कारी, काञ्ची ओर क: 
अध्यार्योका माहात्म्य *---°०**------० ° ८२५. गोकर्णं आदि तीर्थोका महालय + ५.“ 


नि + क ५ च ५" ऋ | न च, 4 प ` 4 = १ 
~ १ प 4: ~: बवे - 
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[ ९४ ] 
पृष्ठ-संख्या विषय 
वसिष्ठजीका दिलीपसे तथा भृगुजीका मन्थनसे 'छृक्षमीजीका भदुभाव ओर पृष्ठसंख्या 
विद्याधरसे माघसनानकी महिमा बताना तथा द्वादरीका माहात्य ---.-.. 
माघसनानसे विद्याधर्की कुरूपताका दूर होना ८८४ २ ५० -नसिंहावतार एवं 0 ९३५ 
ङे-मृगङ्गं मुनिका भगवानसे वरदान पराप्त करके ९५९-वामन-अवतारके वैभवका वर्णन -...-. .. र 
अपने षर कटना ~“ “ˆ -* ८८७ २५२-परडुरामावतारकी कथा „..--.,.. स 
॥ २३५-मूगशृङ्गं मुनिके द्वारा माघके पुण्यसे एक २५३श्रीरामावतारकी कथा--जन्मका प्रसङ्ख ९४९ ` 
 दाथीका उद्धार तथा मरी हुई कन्याओंका २५४-श्रीरामका जातकर्म, नामकरण, भरत आदिका 
४; । 2 जालितलाना0 ८९० जन्म, सीताकी उत्पत्ति, विश्ामित्रकी यज्ञरक्षा 
^ २३६-यमखकसे खटी हई कन्याओकि द्वारा वहाकी तथा राम आदिका विवाह -------*-..~. ९५१ 
१ अनुभूत बातोँका वर्णन ----*---------- ८९५ २५५-श्रीरामके वनवाससे लेकर पुनः अयोध्यामे 
1 २२३७-महात्मा पुष्करके द्वारा नरकमें पड़े हए जीवोँका आनेतकका प्रसङ्ख ~“ --------“ ९८४ 
भल 4 ९०० २५६-श्रीरामके राज्याभिषेकसे परमधामगमनतकका 
२३८-म॒गश्ङ्खका विवाह विवाहके भेद तथा गृहस्थ- प्रसङ्ग न= ९६० 
आश्रमका धर्म ------------- ९०२ २५७-श्रीकृष्णावतारकी कथा--त्रजकी टीलाओंका 
२३९-पतित्रता खियेके रक्षण एवं सदाचारका वर्णन ९०७ प्रसङ्क ०-०-०० ९६४ 
 २४०-मृगशरङ्खके पुत्र मृकण्डु मुनिकी काडी-यात्रा २५८-भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मथुरा-यात्रा, कंसवध 
कारी-माहात्म्य तथा माताओंकी मुक्ति ˆ*-- ९९० ओर उग्रसेनका राज्याभिषेक -----“- - - - ° ९६९ 
२४१-मार्कण्डेयजीका जन्म, भगवान्‌ रिवकी २५९-जरासन्धकी पराजय, द्रारका-दुर्गकी रस्चना, 
, , आराधनासे अमरत्व-मरापि तथा मृत्युञ्जय- काल्यवनका वध ओर मुचुकुन्दकी मुक्ति -‡ ९७५ 
॑ स्तो्रका वर्णन =<" ९१९२ २६० -सुधर्मा-सभाकी पराप्त, रुक्मिणी-हरण तथा 
५ | ८८ २४२-माघसनानके स्वि मुख्य-मुख्य तीर्थं ओरनियम ९१७ रुविमणी ओर श्रीकृष्णका विवाह ˆ - * ˆ व ९७७ 
` २४३-माघ मासके सानसे सुत्रतको दिव्यरोककीं २६१-भगवानके अन्यान्य विवाह, स्य 
५८६ ९१९ कथा, नरकासुरका वध तथा पारिजातहरण ९७९ 
९२९ २६२-अनिरुद्धका ऊषाके साथ विवाहः ` ˆ“ ˆ" ९८९ 
२६३-पौण्ड्क, जरासन्ध, रिडुपार्‌ ओर दन्तवक्त्र- 
९२३ का वध, व्रजवासिर्योकी मुक्ति, सुदामाको 
1 एशर्यप्रदान तथा यदुरकुलका उपसहार ˆ ˆ * ` थः 
¢ ध. र र 0 द व धि थ 
- ` २४ + भगवान स्थितिका वर्णन न महिमा तथा श्रीरामके १०८ | 
अय मगति मगा । । २९५ अम गकम म 
स्वना ` ८ रइ नामका माहात्म्य ˆ“ 





२६६-तिदेवोमिं श्रीविष्णुकी श्रेष्ठता तथा ग्रन्का 


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द ॥ उॐॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ 
क्षप पद्मपुराण 
च्च अश ------ 
सृष्टिखण्ड 
=== ॐ === 


अन्थकता उपक्रम तथा इसके स्वरूपा परिचय 


इ, वा "क महलिर्योसे एेसा कहकर भगवान्‌ अन्तर्धान हो गये ओर 
ब्रह्मद्धूतिप्रसक्तर््रतनियमपरैः सेविते विभरमुख्यैः। वह धर्म-चक्र नैमिषारण्यके गङ्खावर्तं नामक स्थानपर 
ॐश्काराल्कङ्कुतेन त्रिभ्रुवनगुरुणा ब्रह्मणा दृष्टिपूतं गिरा। तब ऋषियेनि निमि | चीर्ण होनेके कारण उस 
संभोगाभोगरम्ये जलमञ्युभहरं पोष्करं नः. पुनातु ॥* स्थानका नाम नेमिष' रखा ओर . नैमिषारण्ये 
श्रीव्यासजीके शिष्य परम बुद्धिमान्‌ ल्रेमहर्षणजीने दीर्धकारतक चाट रहनेवाङे यज्ञोका अनुष्ठान आरम्भ 
एकान्तम बेठे हुए [अपने पुत्र] उग्रश्रवा नामक सूतसे कर दिया । वहीं तुम भी जाओ ओर ऋषि्योके पृञनेपर 
कहा-- "बेटा ! तुम ऋषिययोके आश्रमोपर जाओ ओर उनके धर्म-विषयक संरार्योका निवारण करो 1" 
उनके पृष्छनेपर सम्पूर्णं धर्मोका वर्णन करो । तुमने मुड्ञसे तदनन्तर ज्ञानी उग्रश्रवा पिताकी आज्ञा मानकर 
जो संक्षेपमें सुना है, वह उन्हं विस्तारपूर्वक सुनाओ । मैने 
महर्षि वेदव्यासजीके मुखसे समस्त पुराणोंका ज्ञान प्राप्त 
किया है ओर वह सब तुम्हे बता दिया है; अतः अब 
मुनियोके समक्ष तुम उसका विस्तारके साथ वर्णन करो । 
प्रयागमें कुछ महर्षियेनि, जो उत्तम कुलमिं उत्पन्न हुए थे, 
साक्षात्‌ भगवानसे प्रश्र किया था। वे [यज्ञ करनेके 
योग्य] किसी पावन प्देडाको जानना चाहते थे । भगवान्‌ 
नारायण ही सबके हितैषी है, वे धर्मानुष्ठानकी इच्छा 
रखनेवाठे उन महर्षियोकि पूनेपर बोके--मुनिवरो ! 
यह सामने जो चक्र दिखायी दे रहा है, इसकी कहीं 
तुलना नहीं है । इसकी नाभि सुन्दर ओर सरूप दिव्य 
है । यह सत्यकी ओर जानेवाला है । इसकी गति सुन्दर 
एवं कल्याणमयी है । तुमलेग सावधान होकर नियम- 
पूर्वक इसके पीे-पीठे जाओ । तुं अपने छियि हितकारी | ८८ 
स्थानकी प्ति होगी । यह धर्ममय चक्र यसे जारहाहै। = _ _ ` २ . 
` जति-जति {जिस स्थानपर इसकी नेमि जीर्ण-सीरणं होकर उन मुनीश्चरोके पास गये तथा उनके चरण पकड़कर हाथ 
गिर पड़े, उसीको पुण्यमय प्रदेशा समञचना ।' उन सभी जोड़कर उन्हेनि प्रणाम किया । सूतजी बड़े बुद्धिमान्‌ थे 





ज़ चन्रमा समान उन्न ओर सच्छ है, जिसमें हाथीकी सुडके समान आकारवारे नाकोकि इधर-उधर वेगपूर्वक ` 


स =कर-जपसे विभूषित त्रिभुवन ब्हजन जिसे अपनी दृष्टस पठित किया ह, जो पीनमे सदि है ओर अपनी 


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उन्होने अपनी नम्रता ओर प्रणाम आदिक द्वारा महर्षियोको 
| सन्तुष्ट किया । वे यज्ञम भाग लेनेवारे महर्षि भी 


। सदस्योंसहित बहुत प्रसन्न हुए तथा सबने एकत्रित होकर 
।  सूतजीका यथायोग्य आदर-सत्कार किया । 


ऋषि बोले-देवताओके समान तेजस्वी सूतजी ! 
आप कैसे ओर क्रिस देसे यहाँ आये है 2 अपने 
नेका कारण बताइये । 
 सूतजीने कहा- महर्षयो ! मेरे बुद्धिमान्‌ पिता 
व्यास-शिष्य रोमहर्षणजीने मुञ्चे यह आज्ञा दी है कि 
“तुम मुनि्योकि पास जाकर उनकी सेवामें रहो ओर वे जो 
कुछ पूरे, उसे बताओ ।' आपलोग मेरे पूज्य है । 
बताइये, भै कौन-सी कथा करू 2 पुराण, इतिहास 
अथवा भिन्न-भिन्न प्रकारके धर्म--जो आज्ञा दीजिये, 
वही सुनाऊं । 
सूतजीका यह मधुर वचन सुनकर वे श्रेष्ठ महिं 
बहुत प्रसन्न हुए । अत्यन्त विश्वसनीय, विद्वान्‌ रोमहषण 
पुत्र उग्रश्रवाको उपस्थित देख उनके हदयमें पुराण 
सुननेकी इच्छा जायत्‌ हुई । उस यज्ञम यजमान थे महिं 
इनक, जो सम्पूर्ण शाखोकि विरोषज्ञ, मेधावी तथा 
[वेदक] विज्ञानमय आरण्यक-भागके आचार्य थे । वे 
। सन महर्षियोके साथ श्रद्धाका आश्रय केकर धम सुननेकी 
। इच्छसे बोठे। 
चौनकने कहा--महाबुद्धिमान्‌ सूतजी ! आपने 
इतिहास ओर पुरा्णोका ज्ञान प्राप्त करनेके खये 
नदजनियेिं श्रेष्ठ भगवान्‌ व्यासजीकी भीभोति 
१ (: अराधना की है। उनकी पुराण-विषयक श्रेष्ठ बुद्धिसे 
क ९. त छी: तरह भ॒ उठाया हे । महामते ! यहां जी 
े श्रेष्ठ ब्राह्म ण ¦ त यजमान है, इनका मन पुराणेमिं कग 
$ र । र ह २ ल ण सुनना नना ‡ र ह | ह + अतः आप इन्हें पुराण 
ही कया कर । ये सभी श्रोता, जो यहाँ एकत्रित 


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[ संक्षिप्त पद्मपुराण 


उत्पत्ति कैसे हुई, उससे ब्रह्माजीका आविभीवं किस 
"र हुंजा तथा कमलसे प्रकट हुए ब्रह्माजीने किस 


उनके इस प्रकार पूचनेपर रोमहर्षण कुमार 
सूतजीने सुन्दर वाणीमें सूक्ष्म अर्थसे भरा हुआ न्याययुक्तं \ 
क्चन कहा-- महर्षयो ! आपलोगोने जो मुञ्ञे पुराण 
सुनानेकी आज्ञा दी है, इससे मुञ्चे बड़ प्रसन्नता हुई है 
यह मुङ्खपर आपका महान्‌ अनुग्रह है । सम्पूर्ण धमेकि 
पालनमें रगे रहनेवाठ़े पुराणवेत्ता विद्धानोनि जिनकी 
भलीभांति व्याख्या की है, उन पुराणोक्त विषर्योको मैने । 
जैसा सुना है, उसी रूपमें वह सब आपको सुनाऊँगा। । 
सत्पुरुषोकी द्ष्टिमे सूत जातिका सनातन धर्म यही है कि | 
वह देवताओं, ऋषियों तथा अमिततेजस्वी राजाओंकी । 
वंडा-परम्पराको धारण करे-उसे याद रखे तथा ` 
इतिहास ओर पुराणोमे जिन ब्रह्मवादी महात्माओंका 
वर्णन -किया गया है, उनकी स्तुति करे; क्योकि जब 
वेनकुमार राजा पुथुका यज्ञ हो रहा था, उस समय सूत 
ओर मागधने पहलठे-पहर उन महाराजकी स्तुति ही की 
थी । उस स्तुतिसे सन्तुष्ट होकर महात्मा पृथुने उन 
दोनोको वरदान दिया । वरदानमें उन्होने सूतक सूत 
नामकं देडा ओर मागधको मगधका राज्य प्रदान किया 
था । ्त्रियके वीर्य ओर ब्राह्यणीके गर्भसे जिसका जन ,, 
होता है, बह सूत कहता है । ब्राह्मणोनि सुज्ञ पुराण । 
सुनानेका अधिकार दिया है । आपने धर्मका विचार 
करके ही मुञ्ञसे पुराणकी बाते पूछ है; इसलियि ईस | 
भूमण्डलमे जो सबसे उत्तम एवं ऋषियाद्वाय सम्मानित 
यद्यपुराण है, उसकी कथा आरम्भ करता द । | 
दरेपायन व्यासजी साक्षात्‌ भगवान्‌ चारायणके खरूप 
वे ब्रह्मवादी; सर्वज्ञ, सम्पूर्णं रोकोमिं पूजित तथ! अतयतत 
तजस है। उन्हीसे प्रकट हए पुराणोका मेन 
पिताजीके पास रहकर अध्ययन किया हे । पुरा 









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सुष्टिखण्ड ] * भीष्म ओर पुलस्त्यका संवाद सुटि 


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वर्णन तथा भगवान्‌ विष्णुक्छी महिमा * ३ 


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है ।* समयके अनुसार इतने बड़ पुराणोका श्रवण ओर 
पठन असम्भव देखकर स्वर्यं भगवान्‌ उनका संक्षेप 
करनेके किये प्रत्येक द्वापरयुगमे व्यासरूपसे अवतार 
ठेते हँ ओर पुराणोंको अठारह भागे नोटकर उन्हे चार 
लाख ₹इकोकोमें सीमित कर देते है। पुराणोका यह 
संक्षिप्त संस्करण ही इस भूमण्डले प्रकारित होता है । 
देवलोकोमिं आज भी सो करोड़ इलोकोका विस्तृत पुराण 
मौजूद हे । 

अब मैं परम पवित्र पद्मपुराणका वर्णन आरम्भ 
करता हू । उसमें पांच खण्ड ओर पचपन हजार इक 
हे । पद्यपुराणमें सबसे पहले सृष्टिखण्ड हे । उसके बाद्‌ 


9.1.145... १ 
२.५.२१५ 
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पातारुखण्ड है। तदनन्तर परम उत्तम. उत्तरखण्डका 
वर्णन आया हे । इतना ही पदापुराण हे । भगवान 
नाभिसे जो महान्‌ पद्म (कमल) प्रकट हआ था, जिससे 
इस जगत्कती उत्पत्ति हुईं हे, उसीके वृत्तान्तका आश्रय 
केकर यह पुराण प्रकट हुआ है । इसख््यि इसे पद्मपुराण 
कहते हँ । यह पुराण सभावसे ही निर्मर है, उसपर भी 
इसमें श्रीविष्णुभगवानके माहात््यका वर्णन होनेसे इसकी 
निर्मकता ओर भी बढ़ गयी है । देवाधिदेव भगवान्‌ 
विष्णुने पूर्वकाले ब्रह्माजीके प्रति जिसका उपदेश किया 
था तथा ब्रह्माजीने जिसे अपने पुत्र मरीचिको सुनाया था 
वही यह पद्मपुराण हे । ब्रह्याजीने ही इसे इस जगते 


भूमिखण्ड आता हे । फिर खर्गखण्ड ओर उसके पश्चात्‌ परचक्ित किया है । 
भीष्म ओर पुलस्त्यका संवाद--सुष्टि-क्रमक्तां वर्णन तथा भगवान्‌ विष्णुकी महिमा ` 


सूतजी कहते है महर्षियो ! जो सृष्टिरूप मूल 
प्रकृतिके ज्ञाता तथा इन भावात्मक पदाथेकि द्रष्टा है, 
जिन्होने इस रोककी सचना की है, जो रोकत्वके ज्ञाता 
तथा योगवेत्ता है, जिन्हनि योगका आश्रय लेकर सम्पूर्ण 
चराचर जीवोंकी सृष्टि की है ओर जो समस्त भूतं तथा 
अखि विश्वके स्वामी है, उन सच्चिदानन्द परमेश्वरको मे 
नमस्कार करता ह । फिर ब्रह्मा, महादेव, इद्र, अन्य 
लोकपारू तथा सूर्यदेवको एकाग्रचित्तसे नमस्कार करके 
ब्रह्मस्वरूप वेदव्यासजीको प्रणाम करता ह । उन्हीसे इस 
पुराण-विद्याको प्राप्त करके मै आपके समक्ष प्रकारित 
करता हूं । जो नित्य, सदसत्सरूप, अव्यक्त एलं सनका 
कारण है, वह ब्रह्म ही महत्त्वसे केकर विरोषपर्यन्त 
विदा ब्रह्माण्डकी सृष्टि करता है । यह विद्वानोका 
निश्चित सिद्धान्त है । सबसे पहले हिरण्यमय (तेजोमय) 
अण्डे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ । वह अण्डं सन्‌ ओर 
जलसे धिरा ह । जके बाहर तेजका भेरा ओर तेजके 
बाहर वायुका आवरण है। वायु आकाङसे ओर 







अहंकारको महत्तत्त्वे घेर रखा है ओर महत्तत्त्व 
अव्यक्त मूर प्रकृतिसे धिरा है । उक्त अण्डको ही 
सम्पूर्णं लोकोकी उत्पत्तिका आश्रय बताया गया हे 1 
इसके सिवा, इस पुराणम नदियों ओर पर्वर्तोकी 
उत्पत्तिका बारम्बार वर्णन आया है । मन्वन्तरों ओर 
कल्पोका भी संक्षेपमे वर्णन हे । पूर्वकाले ब्रह्माजीने 
महात्मा पुलस्त्यको इस पुराणका उपदेङा दिया था । फिर 
पुठसत्यने इसे गङ्खाद्रार (हरिद्वार) मे भीष्मजीको सुनाया 
था। इस पुराणका पठन, श्रवण तथा विरोषतः स्मरण 
धन, यदा ओर आयुको बढानेवाखा एवं सम्पूर्ण पार्पोका 
नाहा कसेवाल्र है 1 जो द्विज अङ्गौ ओर उपनिषदोसहित 
चों वेदोका ज्ञान रखता है, उसकी अपेक्षा वह अधिक 
विद्वान्‌ है जो केवर इस पुरणका ज्ञाता हे । † इतिहास 
ओर पुराणोके सहारे ही वेदकी व्याख्या करनी चाहिये; 
वर्योकि वेद अल्पज्ञ विद्रानसे यह सोचकर डरता रहता 
है कि कहीं यह मुञ्ञपर प्रहार न कर बैठे--अर्थका 
अनर्थ न कर बैठे । [तात्पय यह कि पुराणोका अध्ययन 








अहंकार ४ वेदार्थका १ - होता (= ] = 4 
से धिर है। किये बिना  ठीक-ठीक ज्ञान नदीं होता।]‡ 
आकार भूतादि (तामस अर्का) स क: 
† पथमं ब्रह्मणा स्मृतम्‌ त्रिवर्गसाधनं पुण्य रतकोटिभ्रविस्तरम्‌ ॥ (९1 ५३) व 
न चेन्‌ स्गपनिषयो दविजः । परणं च विजानति यः स तस्माद्‌ विचक्षणः ॥ (२।५०-५९) = ` ` 
इतिहासपुराणाभ्या सप्राण ४ वेट्‌ = समुपबृंहयेत्‌ 4 ५4 । 4 | शतात्‌ = द व त ०9: न अ 
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[1 सुनकर ऋषियोनि सूतजीसे पूछा---“मुने ! 
॥ भीष्मजीके साथ पुरुसत्य ऋषिका समागम कैसे हआ ? 
पुलस्त्यमुनि . तो ब्रह्माजीके मानसमुत्र है । मनुष्योको 
उनका दर्शन होना दुर्कभ है । महाभाग ! भीष्मजीको 
। जिस स्थानपर ओर जिस प्रकार पुरुस्त्यजीका दर्छन 
। हआ, वह सब हमें बतत्मरडये ।' | 
। सूतजीने कहा-महात्माओ ! साधुओंका हित 
करनेवाटी विश्वपावनी महाभागा गङ्घाजी जहां पर्वत- 
माखाओंको भेदकर बडे वेगसे बाहर निकली है वह 


। भीष्मजी वहीं निवास करते थे । वे ज्ञानोपदेङा सुननेकी 
. इच्छासे बहुत दिनोंसे महापुरुषोके नियमका पालन करते 
थे । स्वाध्याय ओर तर्पणके द्वारा देवताओं ओर पितरोकी 
तृप्ति तथा अपने रारीरका उषण करते हुए भीष्पजीके 
ऊपर भगवान्‌ ब्रह्या बहुत प्रसन्न हए । वे अपने पुत्र 
मुनिश्रेष्ठ पुरस्त्यजीसे इस प्रकार नोरे--"बेटा ! तुम 
। कुरुवेराका भार वहन करनेवाङे वीरवर देवत्रतके, जिन्हें 
| भीष्म भी कहते है, समीप जाओ । उन्हें तपस्यासे निवत्त 
करो ओर इसका कारण भी बतलाओ। महाभाग भीष्म 
अपनी पितुभक्तिके कारण भगवान्‌का ध्यान करते हुए 
^ गङ्गाद्वारे निवास करते हे । उनके मनम जो-जो कामना 
" हो, उसे दीघ पूर्ण करो; विर्न नहीं होना चाहिये ।' 
 पितामहका वचन सुनकर मुनिवर पुलर्त्यजी 
।  गन्गाद्वारमे आये ओर भीष्पजीसे इस प्रकार बोरे-- 
। . “वीर ! तुम्हार कल्याण हो; तुम्हारे मन्म जो इच्छा हो, 
^ उसके अनुसार कोई वर मांगो । तुम्हारी तपस्यासे साक्षात्‌ 









५ ॐ 
भगवान्‌ नह्याजी प्रसन्न हुए यहाँ भेजा 
` 8 ॥8 -88 8 ॐव. ह "ध ९. 
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८ (क ^") न + #- +. ह~ >^ कः 6 #* ् 
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र: ¬ + --- धि. <~ 9 । न ॐ 
छ 1 हे [0 4) न्द्‌ + ह क] यय - वस्टाच दगा 
 , ® * (0.2 या। 21 ०. + €| 
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महान्‌ तीर्थ गङ्गादवारके नामसे विख्यात है । पितृभक्त ¦ 





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चर्णोका मुञ्चे दर्रान प्राप्त हआ हे । आज आपने दर्शन 
दिया ओर विरोषतः मुञ्चे वरदान देनेके स्यि गङ्गाजीवि 
तटपर पदार्पण किया; इतनेसे ही मुञ्चे अपनी 
सार फक्‌ मिक गया । यह कुदाकी चटाई है 
अपने हाथों बनाया है ओर [जहोतक हो ह क ५ 
बातका भी प्रयल किया है कि यह वैटनेवालेके चयि 
आराम देनेवाल हो; अतः आप इसपर विराजमान हो 
यह पल्ररके दोनेमे अर्घ्य प्रस्तुत किया गया है 
इसमें दूब, चावल, फूल, कुरा, सरसों, दही. राहद, जौ 
ओर दूध भी मिते हुए है । प्राचीन कारके ऋषियेनि 
यह उगष्टाङ्ग अर्घ्य॑ही अतिथिको अर्पण करनेयोग्य 
बतलाया हे ।' 
अमिततेजस्वी भीष्मके ये वचन सुनकर ब्रह्याजीके 
पुत्र पुरस्त्यमुनि कुरासनपर बैठ गये । उन्होने बड़ी 
प्रसन्नताके साथ पाद्य ओर अर्घ्य॒स्वीकार किया। 
भीष्पजीके रिष्टाचारसे उन्हँ बड़ा सन्तोष हुआ । वे प्रसन्न 
होकर बो "महाभाग ! तुम सत्यवादी, दानङीठ 
ओर सत्यप्रतिज्ञ राजा हो । तुम्हारे अंदर कञ्जा, मत्री ओर 
क्षमा आदि सद्रुण शोभा पा रहे हे । तुम अपने पराक्रमसे 





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कः + ऊ 
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सृष्टिखण्ड ओर पुलस्यका सवाद--सृष्टि-क्रमका वर्णन तथा भगवान्‌ विष्युकी महिमा * 


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1 र 
रातरु्ओको दमन करने समर्थ हो । साथ ही धर्मज्ञ 
कृतज्ञ, दयादु, मधुरभाषी, सम्मानके योग्य प्रपाक 
सम्मान देनेवाले, विद्वान्‌, ब्राह्मणभक्त तथा साधुओंपर 
सेह रखनेवारे हो । वत्स ! तुम प्रणामपूर्वक मेरी इरण 
आये हो; अतः मेँ तुम॒पर बहुत प्रसन्न हँ । तुम जो चाहो 
पूञो; मँ तुम्हार प्रत्येक श्रश्रका उत्तर गा । | 
भीष्पजीने कहा-- भगवन्‌! पूर्वकालमें भगवान्‌ 
ब्रह्माजीने किस स्थानपर रहकर देवताओं आदिकी सृष्ट 
की थी, यह मुञ्चे बताइये । उन महात्मने कैसे ऋषियों 
तथा देवताओंको उत्पन्न किया ? कैसे पृथ्वी बनायी ? 
किस तरह आकाराकी सचना की ओर किस प्रकार इन 
समुद्रोको प्रकट किया ? भयङ्कर पर्वत, वन ओर नगर 
कैसे बनाये ? मुनियो, प्रजापतिरयं, श्रेष्ठ सप्र्षियों ओर 
भिन्न-भिन्न वर्णोको, वायुको, गन्धर्वो, यक्षो, राक्षसो, 
तीर्थो, नदियों, सूर्यादि ग्रहा तथा तारको भगवान्‌ ब्रह्मने 
किस तरह उत्पन्न किया ? इन सब बार्तोका वर्णन 
कीजिये । 
पुलस्त्यजीने कहा- पुरुषश्रेष्ठ ! भगवान्‌ ब्रह्मा 
साक्षात्‌ परमात्मा है । वे परसे भी पर तथा अत्यन्त भ्रष्ठ 
है । उनमें रूप ओर वर्णं आदिका अभाव है । वे यद्यपि 
सर्वत्र व्याप्त है, तथापि ब्रह्यरूपसे इस विश्वकी उत्पत्ति 
कसनेके कारण विद्रानेकि द्वारा ब्रह्मा कहलाते हें । उन्हेनि 
पूर्वकालमें जिस प्रकार सृष्टि-स्चना कौ, वह सन मँ बता 
रहा हं । सुनो, सृष्टके प्रारम्भकालमे जब जगत्के स्वामी 
ब्रह्माजी कमुके आसनसे उठे, तन सबसे पहले उन्हेनि 
मह्तवको प्रकट किया; फिर महत्तत्वसे वैकारिक 
(साक), तैजस (राजस) तथा भूतादिरूप तामस - 
तीन कारका अहङ्कार उतपन्न हुआ, जो कर्मन्र्योसहित 
पां ज्ञनेन्दियो तथा पञ्चभूर्तोका कारण है । पृथ्वी, जलः 
तेज, वायु ओर आकाश ये पांच भूत है । इनमेसे 
एक-एकके स्वरूपका क्रमः वर्णन करता हूं । [भूतादि 
नामक तामस अहङ्कारे विकृत होकर ब्द तन्मात्रा 
 उलयन्न किया, उससे ङब्द गुणवाठे आकाराका ्राुरभाव 
हुआ ।] भूतादि (तामस अहङ्कार) ने राब्द-तन्मानारूप 


+ पक दू मरे सभी भूत दात, घे जै मू रत व 


आकाडाको सब ओरसे आच्छादित किया । [ तब रन्द- 
तन्मात्रारूप आकाडाने विकृत होकर स्पर्शा -तन्मात्राकी 
रचना की ।] उससे अत्यन्त बलवान्‌ वायुका प्राकट्य 
हुआ, जिसका गुण स्प माना गया है । तदनन्तर 
आकारासे आच्छादित होनेपर वायु-तत्त्वमें विकार आया 
ओर उसने रूप-तन्मात्राकी सृष्टि की । वह वायुसे 
अभरिके रूपमें प्रकट हुई । रूप उसका गुण कहता है । 
तत्पश्चात्‌ स्पर्ा-तन्मात्रावाङे वायुने रूप-तन्मात्रावाठे 
तेजको सब ओरसे आवृत किया । इससे अग्रि -तच्तवने 
विकारको प्राप्त होकर रस-तन्मात्राको उत्पन्न किया । 
उससे जरकी उत्पत्ति हुई, जिसका गुण रस माना गया 
है । फिर रूप-तन्मात्रावाखे तेजने रस-तन्मात्रारूप ज 
तत्वको सब ओरसे आच्छादित किया । इससे विकृत 
होकर जकतत्त्वने गन्ध-तन्मात्राकी सृष्टि की, जिससे यह 
पृथ्वी उत्पन्न हुई । पृथ्वीका गुण गन्ध माना गया हे । 
इन्दा तैजस कहती है [वरयोकि वे राजस अहङ्कारसे 
प्रकट हई है] । इन्द्ियोके अधिष्ठाता दस देवता 
वैकारिक कहे गये हैँ [वर्योकि उनकी उत्पत्ति सात्विक 
अहङ्कारसे हुईं है] । इस प्रकार इन्द्रियोके अधिष्ठाता दस 
देवता ओर ग्यारहवां मन-ये वैकारिक माने गये हें । 
त्वचा, चक्षु, नासिका, जिह्वा ओर श्रोत्र- ये पाच 
इन्ियाँ शब्दादि विषयोका अनुभव करानेके साधन द । 
अतः इन पाँचोको बुद्धियुक्त अर्थात्‌ ज्ञानेन्द्रिय कहते हे । 
गुदा, उपस्थ, हाथ, पैर ओर वाक्‌ ये क्रमाः मल- 
त्याग, मैथुनजनित सुख, शिल्प-निमीण (हस्तकोरार) , 
गमन ओर उाब्दोच्ारण-इन करमेमिं सहायक ह । 
इसल्यि इन्दं कर्मेन्द्रिय माना गया हे । 

वीर ! आकारा, वायु, तेज, जरु ओर पुथ्वी- ये 


क्रमदाः डशाब्दादि उत्तरोत्तर गुणोंसे युक्त हँ अर्थात्‌ 


आकाङका गुण शब्द; वायुके गुण शब्द ओर स्पर्ख; 
तेजके गुण राब्द, स्प ओर रूपः; जरुके दाब्द्‌, स्परी, 
रूप ओर रस तथा पुथ्वीके राब्द, स्पर्शी, रूप, रस एवं 


गन्ध- ये सभी गुण है । उक्त पाचों भूत शान्त, घोर ओर 
मूढ़ है । अर्थात्‌ सुख, दुःख ओर मोहसे युक्त ह । अतः 





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रहनेपर भिन्न-भिन्न प्रकारकी राक्तियोसे सम्पन्न है । अत 
परस्पर संगठित हए बिना-- पूर्णतया मिले बिना ये 
प्रजाको सृष्टि करनेमें समर्थं न हो सके। इसख्ियि 
[परमपुरुष परमात्माने संकल्पके द्वारा इनमे प्रवेदा 
किया। फिर तो] महत्तत्त्वतसे केकर विरोषपर्यन्त सभी 
तत्त्व पुरुषद्वारा अधिष्ठित होनेके कारण पूर्णरूपसे 
एकत्वको प्राप्न हुए । इस प्रकार परस्पर मिककर तथा 
एक दूसरेका आश्रय ठे उन्होने अण्डकी उत्पत्ति की । 
-भीष्मजी ! उस अण्डमें ही पर्वत ओर द्वीप आदिके 
सहित समुद्र, ग्रहों ओर तारोंसहित सम्पूर्णं रोक तथा 
देवता, असुर ओर मनुष्यों सहित समस्त प्राणी उत्पन्न हुए 
हें । वह अण्ड पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा दसगुने अधिक जल 
अभि, वायु, आकाङा ओर भूतादि अर्थात्‌ तामस 
अहङ्कारसे आवृत हे । भूतादि महत्तत्त्वसे धिरा है । तथा 
इन सबके सहित महत्त्व भी अव्यक्त (प्रधान या मूल 
प्रकृति) के द्वारा आवृत हे । 
भगवान्‌ विष्णु स्वयं ही ब्रह्मा होकर संसारकी 
सष्टिमें मरवृत्त होते हँ तथा जबतक कल्पकी स्थिति बनी 











| है- राजन्‌ ! ब्रह्माजी सर्वज्ञ 
एवं साक्षात्‌ नरायणके स्वरूप हँ । वे उपचारसे-- 
अरोपद्वारा ही “उत्यन्न हुए" कहलाते है । वास्तवे तो वे 
नित्य ही है। अपने निजी मानसे उनकी आयु सौ वर्षकी 
मानी गयी है। वह ब्रह्माजीकी आयु "पर' कहती है 

` उसके आधे भागको परार्ध कहते है । पंद्रह निमेषकी एक 
ती है। तीस काष्ठाओंकी एक कला ओर तीस 
् एक हूतं होता है । तीस मुहूतेकि कालको 
गया हे । तीस दिन-रातका 
















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ब्रह्माजीकी आयु तथा युग आदिका कालमान, भगवान्‌ वराहद्धारा पृथ्वीका रसातलसे 
$ ८ उद्धार ओर ब्रह्माजीके द्वारा रचे हए विविध सर्गोका वर्णन 


होत; सन्ध्याका। 


| । संक्षि पद्पुराण | 
~. : कन्नगे 
3... 4.1.11. 
४४ 
ये विशेष. कहलाते है । ये पाचों भूत अकूग-अलग रहती है तबतक 


बतक वे ही युग-युगमे अवतार 
समूची सृष्टिकी रक्षा करते है । वे विष्णु क १ 
किये रहते है; उनके पराक्रमकी कोई सीमा १ 
मा नहीं है। 
राजेनद्र ! जब कल्पका अन्त होता है तव वे ही अपना 
तमःप्रधान रौद्र रूप प्रकट करते है ओर अत्यन्त भयानक 
आकार धारण करके सम्पूर्ण प्राणियोका संहार करते है| 
इस भकार सब भूरतोका नार करके संसारको एकार्णवे ` 
जलम निमम्र कर वे सर्वरूपधारी भगवान्‌ स्वयं 
रोषनागकी राय्यापर इायन करते है । फिर जागनेपर 
ब्रह्माका रूप धारण करके वे नये सिरेसे संसारकी सृष्टि 
करने कगते हें । इस तरह एक ही भगवान्‌ जनार्दन सृष्टि 
पार्न ओर संहार करनेके कारण ब्रह्मा, विष्णु तथा रिव 
नाम धारण करते हैँ ।* वे प्रभु खष्टा होकर स्वयं अपनी 
ही सृष्टि करते है, पारक होकर पालनीय रूपसे अपना 
ही पालन करते हँ ओर संहारकारी होकर स्वयं अपना ही 
संहार करते हँ । पुथ्वी, जठ, तेज, वायु ओर आकाड- 
सब वे ही है; क्योकि अविनारी विष्णु ही सब भूतोके 
ईश्वर ओर विश्वरूप है । इसंलियि प्राणियोमें स्थित सर्ग 
आदि भी उन्हीके सहायक है । 








है । अयन दो है, दक्षिणायन ओर उत्तरायण । दक्षिणायन 
देवताओंकी रत्र है ओर उत्तरायण उनका दिन है। 
देवताअकि बारह हजार वषेकि चार युग होते है, ज 
क्रमदाः सत्ययुग, तरता, द्वापर ओर कलियुगके नामसे 
प्रसिद्ध है। अब इन युगोका वर्ष-विभाग सुनो। 
पुरातत्त्वके ज्ञाता विद्वान्‌ पुरुष कहते हँ कि सत्ययुग 
आदिका परिमाण क्रमाः चार, तीन, दो ओर एक हजार 
दिव्य वर्षं है। भ्रत्येक युगके आरम्भमें उतने ही सौ 
वर्षोकी सन्ध्या कही जाती है ओर युगके अन्तमें सन्ध्यार 
होता दै। सन्ध्यादाका मान भी उतना ही है, जितना 
नृपश्रेष्ठ !. सन्ध्या ओर सर्यादके 


भगवानेक एव जनार्दनः ॥ (२। १९४) 





६ च १ 4५८१ #, 

रन 

४ 7 नि 2 
`" न 
९-+ १. 


(1.1.49... 4.4.4..4.1.4.2.4. 4.2. 4.2.4.4.1 


3 3 1 


नीचका जो समय हे, उसीको युग समञ्जना चाहिये । वही 
सत्ययुग ओर त्रेता आदिके नामसे प्रसिद्ध है । सत्ययुग 
त्रेता, द्वापर ओर कलियुग--ये सब मिरूकर चुरयग 
कहलाते है । एेसे एक हजार चतुर्युगोको ब्रह्मका एक 
दिन कहा जाता है । 

राजन्‌ ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते है । 
उनके समयका परिमाण सुनो । सप्तर्षि, देवता, इनदर, मनु 
ओर मनुके पुत्र-- ये एक ही समयमे उत्पन्न होते हैँ तथा 
अन्तम साथ-ही-साथ इनका संहार भी होता हे। 
इकहत्तर चतुर्यगसे कुछ अधिक कारका एक मन्वन्तर 
होता है । † यही मनु ओर देवताओं आदिका समय हे । 
इस प्रकार दिव्य वर्षगणनाके अनुसार आठ लाख, 
बावन हजार वर्षोका एक मन्वन्तर होता हे । महामते ! 
मानव-वरषेसि गणना करनेपर मन्वन्तरका कामान पुरे 
तीस करोड़, सरसठ लाख, बीस हजार वर्ष होता हे । 
इससे अधिक नहीं । ‡ इस कारको चोदह गुना करनेपर 
ब्रह्माके एक दिनका मान होता है। उसके अन्तमे 


` नैमित्तिक नामवाल् ब्राह्य-प्रख्य होता है। उस समय 


भूर्छोक, भुवर्त्क ओर खर्खीक-- सम्पूर्ण त्रिरोकी दग्ध 
होने कगती है ओर महर्लोके निवासं करनेवाठे 


४.५.५.२. 1 
६.१.२.२.. 
{44.14.64 


पुरुष ओंचसे सन्तप्त होकर जनलोके चङे जाते हं । 
दिनके बराबर ही अपनी रात बीत जानेपर ब्रह्माजी पुनः 
संसारकी सृष्टि करते हे । इस प्रकार [पक्ष, मास आदिक 
क्रमसे धीरि धरि] ब्रह्माजीका एक वर्ष व्यतीत होता है 
तथा इसी क्रमसे उनके सौ वर्ष भी पूरे हो जते हे । सो 
वर्ष ही उन महातमाकी पूरी आयु है । 

भीष्मजीने कहा- महामुने ! कल्पके आदिमं 
नारायणसंज्ञक भगवान्‌ ब्रह्मने जिस प्रकार सम्पूणं 
भूतोकी सृष्टि की, उसका आप वर्णन कीजिये । 

पुलवस्त्यजीने कहा-राजन्‌ ! सबकी उत्पत्तिके 
कारण ओर अनादि भगवान्‌ ब्रह्माजीने जिस प्रकार 
प्रजावर्गकी सृष्टि की, वह बताता हू, सुनो । जब पिठ 
कल्पका अन्त हुओं, उस समय रत्रिमे सोकर उठनेषर 
सत्वगुणके उद्रेकसे युक्त परभु ब्रह्माजीने देखा कि सम्पूण 
लोक सूना हो रहा है । तन उन्होने यह जानकर कि पुथ्ली 
एकार्णवके जलम डूब गयी ह ओर इस समय पानीके 
भीतर ही स्थित है, उसको निकालनेकी इच्छासे कुछ 
देरतक विचार किया । फिर वे यज्ञमय वाराहका स्वरूप 
धारणकर जल्के भीतर ्रविष्ट॒हुए। भगवान्‌को 
पातारलोकमे आयाः देख पृथ्वीदेवी भक्तिसे विनम्र हो 


+ युगो तथा ब्रह्माके दिनकी वष-संख्या इस भकार समञ्ञनी चाहिये । सत्ययुगका मान चार हजार दिव्य वर्ष है, उसके आरम्भम्‌ 
चार सौ वर्षोकी सन्ध्या ओर अन्ते चार सौ वर्षोका सन्ध्या होता है, इस प्रकार सन्ध्या ओर सन्ध्यादासहित सत्ययुगकी अवधि चार्‌ 


हजार आढ सौ (४८००) दिव्य वर्षोकी हे । इसी तरह त्रेताका 


युगमान ३००० दिव्य वर्ष, सन्ध्या-मान ३०० वे ओर सन्ध्यां 


मान ३०० वर्ष है, अतः उसकी पूरी अवधि ३६०० दिव्य वर्षोकी हई । द्रापरका युगमान २००० वषं, सन्ध्या-मान २०० वर्ष ओर 
सन्ध्याङा-मान २०० वर्ष है; अतः उसका मान २४०० दिव्य वर्षोका हुआ । कछियुगका युगमान १००० वर्ष, सन्ध्या-मान १०० वषै 


जर सन्ध्याङा-मान १०० वर्ष है; इसल्यि उसकी आयु १२०० 


दिव्य वर्षोकी हई । देवताओंका वर्ष मानव-वर्षसे ३६० गुना अधिक 


होता है; अतः मानव-वर्षके अनुसार कलियुगकी आयु ४,३२,००० वर्षाकी, द्रापरकी ८,६४.००० वर्षोकी, जेताकी ९२,९६५००० 


वर्षाकी तथा सत्ययुगकी आयु १७,२८१००० वर्षोकी है । इनका 


कुरु योग -४३,२०,००० वर्षं हुआ । यह एक चतुरयुगका मान दै । 


रसे एक हजार चतु्युगोका अर्थात्‌ हमारे ४,३२,००,००,००० (चार्‌ = ^ बत्तीस करोड़) वर्षोका ब्रह्माका एक दिन होता हे। 

 - जह्मजीके एक दिनमे चौदह मन्वन्तर होते है, इकहत्तर चतुर्युगोके हिसाबसे चोदह मन्वन्तरोमिं ९९४ चतु्युग होते हँ । परन्तु 
ब्रह्मका दिन एक हजार चतुर्ुगोका माना गया है; अतः छः चतुरयुग ओर बचे । छः चतर्युगका चोदहवों भाग कछ कम पांच हजार 
एक सौ तीन दिव्य वर्षोका होता हे । इस भकार एक मन्वन्तरे इकहत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वषं ओर अधिक होते है ! 


` ‡ यह वर्ष-संख्या पुरे इकहत्त चतुर्यर्गोका 


इकहत्त चतर्युगसे कुछ अधिक कालका मन्वन्तर होता हे 1 


ही होगा । 


मन्वन्तर मानकर निकाली गयी है; इस हिसाबसे ब्रह्माजीके दिनका मान 
४,२९.४०,८०,००० (चार असन, उनतीस करोड़, चालीस लाख, अस्सी हजार) मानव-वर्षं होता है 1 परन्तु पहर जता आये है कि 
| वह अधिक कार है--छः चतुर्युगका चौदहवां भाग । उसको 








। भी जोड़ 
लेनेपर मन्वन्तरका कार ऊपर दी हुईं संख्यासे अधिक होगा ओर उस हिसाबसे ब्रह्माजीका दिनमान चार अस, जत्ीस करोड़ वर्षका 





< * अ्च॑यस्व हषीकेदो यदीच्छसि परं पदम्‌ * 


[1 १.1 

2 £^ 7 ~~ ६ 8 ~ 9 2. 34.4.44. 4.1.11 कक 
॥.४.६.१. ६.१... १ क 
1 








गयीं ओर उनकी स्तुति करने रूगीं । 
पृथ्वी बोलीं भगवन्‌ ! आप सर्वभूतस्वरूप 
परमात्मा हँ, आपको बारम्बार नमस्कार है । आप इस 
पातारुलोकसे मेरा उद्धार कीजिये । पूर्वकालमे मै आपसे 
ही उत्पन्न हुईं थी । परमात्मन्‌ ! आपको नमस्कार है । आप 
सबके अन्तर्यामी है, आपको प्रणाम है । प्रधान (कारण) 
ओर व्यक्त (कार्य) आपके ही स्वरूप है । कारु भी आप 
ही हँ, आपको . नमस्कार है । प्रभो ! जगत्की सृष्टि 
आदिके समय आप ही ब्रह्मा, विष्णु ओर रुद्ररूप धारण 
करके सम्पूर्ण भू्तोकी उत्पत्ति, पालन ओर संहार करते है 
यद्यपि आप इन सबसे परे हैँ । मुमुश्षु पुरुष आपकी 
आराधना करके मुक्त हो परत्रह्य परमात्माको प्राप्त हो गये 
हें । भला, आप वासुदेवकी आराधना किये बिना कौन 
मोक्ष पा सकता हे । जो मनसे गहण करनेयोग्य, नेत्र आदि 
इन्द्रियो द्रारा अनुभव करनेयोग्य तथा बुद्धिके द्वारा 
विचारणीय हे, वह सब आपहीका रूप है । नाथ } आप 
ही मेरे उपादान है, आप ही आधार है, आपने ही मेरी सृष्ट 


, की है तथा मेँ आपहीकी शरणमे ह, इसीखियि इस जगत्के 


लेग मुञ्चे "माधवी' कहते हैँ । 
" पुथ्वीने जन इस प्रकार स्तुलि की, तब उन परम 

















| (५) ४ 
----“ -- रो १९६ ५. 5. र 
~ 0, + ॥| ॥ ९.६ "भ -. 9 र 
$ द 9 0/९): क पो प < ---~ 
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| ९ अ ८/१ 9 वक 
1 स 


च> 


[ संक्षि पद्मपुराण 
कान्तिमान्‌ भगवान्‌ धरणीधरने घर्धर स्वरमें गर्जना की | 
सामवेद ही उनकी उस ध्वनिके रूपमे भकट हा 
उनके नेत्र खिके हुए कमलके समानं रोभापारहे ४ 
तथा शरीर कमकक पततके समान इयाम रेगका था । उन 
महावराहरूपधारी भगवानने पृथ्वीको अपनी 
उठा किया ओर रसातरसे वे ऊपरकी ओर उठे ध 
समय उनके मुखसे निकली हुईं सांसके आघातसे उछले 
हए उस प्ररुयकालीन जलने जनखोकमे रहनेवाले 
सनन्दन आदि मुनिर्योको भिगोकर निष्पाप कर दिया । 
[निष्पाप तो वे थे ही, उन्हें ओर भी पवित्र बना दिया |] 
भगवान्‌ महावराहका उदर जरसे भीगा हुआ था । जिसं 
समय वे अपने वेदमय डरीरको पाते हुए पुथ्वीको 
लेकर उठने लगे, उस समय आकारामें स्थित महर्षिगण 
उनकी स्तुति करने कगे । 

ऋषियोने कहा-जनेश्वरोके भी परमेश्वर 
केराव ! आप सबके प्रभु हँ । गदा, र, उत्तम ख्ख 
ओर चक्र धारण करनेवाले हैँ । सृष्टि, पालन ओर 
संहारके कारण तथा ईश्वर भी आप ही हैँ । जिसे परमपद 
कहते है, वह भी आपसे भिन्न नहीं है । प्रभो ! आपका 
प्रभाव अतुलनीय हे । पृथ्वी ओर आकाराके बीच 
जितना अन्तर है, वह सब आपके ही रारीरसे व्याप्त है। 
इतना ही नहीं, यह सम्पूर्णं जगत्‌ भी आपसे व्याप्त हे। 
भगवन्‌ ! आप इस विश्चका . हित-साधन कीजिये । 
जगदीश्वर ! एकमात्र आप ही परमात्मा हैँ, आपके सिवा 
दूसरा कोई नहीं है । आपकी ही महिमा है, जिससे यह 
चराचर जगत्‌ व्याप्त हो रहा है। यह सारा जगत्‌ 
ज्ञानस्वरूप है, तो भी अज्ञानी मनुष्य इसे पदार्थूप 
देखते है, इसीखि्यि उन्हें संसार-समुद्रम भटकना पड़ता 
है। परन्तु परमेश्वर ! जो रोग विज्ञानवेत्ता है, जिनका 
अन्तःकरण इद्ध ठै, वे समस्त संसारको ज्ञानमय ही 
देखते है, आपका स्वरूप ही समङ्ञते हे । सर्वभूतस्वरूप 
परमालमन्‌ ! आप प्रसन्न होये । आपका स्वरूप ~“ ` 
हे। अभो ! भगवन्‌ ! आप सबके उद्धवके ये ईस 


(2 ¦ < श > ्वीका £ कीजिये ।: 
९7. पृथ्वीका उद्धार एवं सम्पूर्ण जगत्का कल्याण 








ह ^ २४. 
। १9 
^ ति ऋ न~ 9 च>. ह > ॥ि 
4. ॐन, >> १५ प + ४ ४ ॐ ् 
क गि + र = च = कन्त ह "ऋ चक 


स सण्ड 1 * ब्रह्माजी आयु आदिक मान, वराहद्वारा पृथ्वीका उद्धार, ्रह्माजीके सर्गो वर्णान * 1 


४.4 


ब 


रहे थे, उस समय पृथ्वीको धारण करनेवाले परमद 
महावराह रीघ्र ही इस वसुन्धराको ऊपर उठा लाये ओर 
उसे महासागरके जरूपर स्थापित किया। उस 
जलरारिके ऊपर यह पृथ्वी एक बहुत बड़ी नौकाकी 
भोति र्थित ह्ईं । तत्वञ्चात्‌ भगवान्‌ने पुथ्वीके करई 
विभाग करके सात द्रीपोका निर्माण किया तथा भूर्लोक, 
भुवर्करोक, स्वक ओर महर्क--इन चारो कोक 
पूर्ववत्‌ कल्पना की । तदनन्तर ब्रह्माजीने भगवानूसे 
कहा-- “प्रभो ! मैने इस समय जिन प्रधान-प्रधान 
असुरोको वरदान दिया है, उनको देवता्ओंकी भाईके 
छ्ियि आप मार डले । मैं जो सृष्टि रर्चुगा, उसका आप 
पालन कर ।' उनके एेखा कहनेपर भगवान्‌ विष्णु 
"तथास्तु" कहकर चङे गये ओर ब्रह्माजीने देवता आदि 
प्राणियोकी सृष्टि आरम्भ की । महत्तत्वकी उत्पत्तिको ही 
ब्रह्माकी प्रथम सृष्टि समञ्जना चाहिये । तन्मात्राओंका 
आविर्भाव दूसरी सृष्टि है, उसे भूतसर्ग भी कहते हं । 
वैकारिक अर्थात्‌ . सात्विक अहद्कारसे जो इन्दर्योकी 
उत्पत्ति हुई है, वह तीसरी सृष्टि हे; उसीका दूसरा नाम 
देन्य सर्ग है । इस प्रकार यह प्राकृत सर्ग हे, जो 
अबुद्धिपर्वक उत्पन्न हु है। चौथी सृष्टिका नाम हे 
मुख्य सर्ग । पर्वत ओर वृक्ष आदि स्थावर वस्तु्ओंको 
मुख्य कहते है । तिर्यकूखरीत कहकर जिनका वर्णन किया 
गया है, वे (पड-पश्ी, कीट-पतङ्ग आदि) ही पोचवीं 
सष्टिके अन्तर्गत है; उन्हं तिर्यक्‌ योनि भी कहते हे । 
तत्पश्चात्‌ ऊर्ध्वरेता देवताओंका सर्ग है, वही छठी सृष्ट 
है ओर उसीको देवसर्गं भी कहते हैँ । तदनन्तर सातवीं 
सृष्टि अर्वाक्खरोताओंकी है, वही मानव-सगं कहलाता 
ह । आट अनुग्रह-सर्गं है, वह सास्िक भी है ओर 
तामस भी 1 इन आठ सगेमिंसे अन्तिम पंच वैकृत-सर्ग 
माने गये हैँ तथा आरम्भके तीन सर्ग प्राकृत बताये गये 
ह । नवां कौमार सर्ग है, वह प्राकृत भी ह वैकृत भी । 
इस प्रकार जगत्की रचना प्रवृत्त हुए जगदीशर 
प्रजापतिके ये प्राकृत ओर वैकृत नामक नौ सर्ग तुम्हं 
 बतलये गये, जो जगतके मूर कारण है । अब तुम ओर 
` क्या सुनना चाहते हो ? 


॥ त र "न~ 
# भ ४. चि 4 "अ क + - 
7 1 ^ | अ > ` "न क ४ 


1.111.411 ०" = 
॥.1 .1 (1 9 2 
1111... 


भीष्मजीने कहा- गुरुदेव ! आपने देवताओं 
आदिकी सृष्टि थोड़े ही बतायी दै । मुनिश्रेष्ठ ! अब मेँ 
उसे आपके मुखसे विस्तारके साथ सुनना चाहता इ । 

पुलसत्यजीने कहा--राजन्‌ ! सम्पूर्णं रजा अपने 
ूर्वकृत रुभाडुभ कर्मोसि प्रभावित रहती है; अतः 
प्रल्यकालम सबका संहार हो जानेपर भी वह उन 
केकि संस्कारसे मुक्त नहीं हो पाती । जन ब्रह्माजी 
सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त हुए, उस समय उनसे देवताओंसे 
केकर स्थावरपर्यन्त चार प्रकारकी प्रजा उत्पन्न हई; वे 
चारों [ ब्रह्माजीके मानसिक संकल्पसे प्रकट होनेके 
कारण ] मानसी प्रजा कहल्यीं। तदनन्तर प्रजापतिने 
देवता, असुर, पितर ओर मनुष्य--इन चार प्रकारके 
प्राणियोकी तथा जक्की भी सृष्टि करनेकी इच्छासे अपने 
डारीरका उपयोग किया । उस समय सृष्टिकी इच्छावाले 
मुक्तात्मा प्रजापतिकी जङ्खासे पहके दुरात्मा असुरोकी 
उत्पत्ति हई । उनकी सृष्टिके पश्चात्‌ भगवान्‌ ब्रह्याने अपनी 
वयस्‌ (आयु) से इच्छानुसार वयो (पक्षयो) को उत्पन्न 
किया। फिर अपनी भुजाओसि भेड ओर मुखसे 
करकी सचना की । इसी प्रकार अपने पेटसे गायों ओर 
भैसोको तथा पैरोसे घोडे, हाथी, गदहे, नीरगाय, हरिन, 
ऊंट, खचर तथा दूसरे-दूसरे पडशु्ओंकी सृष्टि की 1 
ब्रह्माजीकी रोमावक््योसे फल, मूर तथा भांति-भातिके 
अरन्नोका प्रादुर्भाव हआ। गायत्री छन्द, ऋष्वेद्‌, 
त्रिवृतस्तोम, रथन्तर तथा अग्निष्टोम यज्ञको ग्रजापतिने 
अपने पूर्तवर्तीं मुखसे प्रकट किया। यजुर्वेद्‌, तष्टुप्‌ 
छन्द, पञ्चदरास्तोम, बृहत्साम ओर उक्थकी दक्षिणवाले 


-मुखसे सचना की । सामवेद जगती छन्द्‌, सप्तदशस्तोम्‌ 


वैरूप ओर अतिरात्रभागकी सृष्टि पश्चिम मुखसे की तथा 
एकर्विरास्तोम, अथर्ववेद, आ्तोयाम, अनुष्टुप्‌ छन्द ओर 
वैराजको उत्तरव्ती मुखसे उत्पन्न किया 1 छोटे-बड़ जितने 
भी प्राणी है, सब प्रजापतिके विभिन्न अङ्खासे उत्पन्न हए । ` 
कल्पके आदिमे प्रजापति ब्रह्मानि देवताओं, असुरो, ` 
पितरों ओर मनुष्योकी सृष्टि करके फिर यक्ष, पिहाच, 
गन्धर्व, अप्सर, सिद्ध, किन्नर, राक्षस, सिंह, पक्षी, मृग 











९०७ 


. ४.1 


ब्रह्माने उत्पन्न किया । उन उत्पन्न हुए प्राणियोमिंसे जिन्होनि 
ूर्वकल्पमें जैसे क्म किये थे, वे पुनः बारम्बार जन्म 


विधाताने ही इद्धियोके विषयो, भूतों ओर दारीरोनिं 
विभिन्नता. एवे पृथक्‌-पृथक्‌ व्यवहार उत्पन्न -किया । 
उन्हीने कल्पके आरम्भमें वेदके अनुसार देवता आदि 
प्राणियोकि नाम, रूप ओर कर्तव्यका विस्तार किया । 








भीष्मजीने कहा-- ब्रह्मन्‌ ! आपने अर्वाक्स्रोत 
नामक सर्गका जो मानव सर्गके नामसे भी परसिद्ध है, 
संक्षेपसे वर्णन किया; अब उसीको विस्तारके साथ 
किये । ब्रह्माजीने मनुर्ष्योकी सृष्टि किस प्रकार की ? 
महामुने ! प्रजापतिने चारों वर्णो तथा उनके गुणोंको कैसे 
उत्पन्न किया ? ओर ब्राह्मणादि वणेकिं कोन-कोन-से 
कर्म माने गये हँ 2 इन सब बार्तोका वर्णन कीजिये । 
 पुलस्त्यजी लोले-कुरंश्रष्ठ ! सृष्टिकी इच्छा 
रखनेवारे ब्रह्माजीने ` ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैरय ओर 
ाद्र-इन चार वर्णोको उत्पन्न किया । इनमें ब्राह्मण 
मुखसे, क्षत्रिय वक्षःस्थरुसे, वैरय जाधोंसे ओर ददर 
बरह्माजीके पैरोसे उत्पन्न हए । महाराज ! ये चारों वर्ण 
 यज्ञके उत्तम साधन हैः अतः ब्रह्माजीने यज्ञानुष्ठानकी 
 . सिदिके खयि ही इन सनकी सृष्टि की । यज्ञसे तप्त होकर 
देवताेग जलकी वृष्टि करते है, जिससे मनुप्योकी भी 
नृति होती है; अतः धर्ममय यज्ञ सदा ही कल्याणका हेतु 
आचरणोंका परित्याग कर दिया है 











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* अर्चयस्व हषीकेरां यदीच्छसि परं पदम्‌ > 
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भी यह चराचर जगत्‌ है, सबको आदिकर्त भगवान्‌ 


` केकर वैसे ही कमेमिं वृत्त होते है । इस प्रकार भगवान्‌ 


रट 
यज्ञके त्वये ब्राह्मणादि वर्णो तथा अन्नकी सृष्टि, मरीचि आदि भ्रजापति रुद्र तथा 


स्वायम्भुव मनु आदिकवी उत्यत्ति ओर उनव्छी संतान-परम्यराका वर्णन 


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। ४. इसलिये इहलोकं 9.1 
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। संपत प्मुराण 

ऋषियों तथा अन्यान्य ्राणियोके ब 
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ओर उनके यथायोग्य कर्मौको भी नर ही न 
किया । जिस प्रकार भिन्न-भिन्न तऋतुअओकि च 
आनेपर उनके विभिन्न प्रकारके चिह्न पहकछेके 
भरकर होते हैँ, उसी प्रकार सृष्टिके आरम्भमे सारे च 
पूवं कल्पके अनुसार ही दृष्टिगोचर होते है । सृष्टिक ल्य 

इच्छक तथा सृष्टिकी राक्तिसे युक्त ब्रह्माजी कल्पके 
आदिमे बारम्बार एेसी ही सृष्टि किया करते है । 








अनुसार रची हड॑ प्रजा उत्तम श्रद्धाके साथ श्र 
आचारका पालन करने रुगी । वह इच्छानुसार जहां 
चाहती, रहती थी । उसे किसी प्रकारकी बाधा नहीं 
सताती थी । समस्त प्रजाका अन्तःकरण शुद्ध था । वह 
स्वभावसे ही परम पवित्र थी । धर्मानुष्ठानके कारण उसकी 
पवित्रता ओर भी बढ़ गयी थी। प्रजाओंके पवित 
अन्तःकरणमें भगवान्‌ श्रीहरिका निवास होनेके कारण 
सबको शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता था, जिससे सब लोग 
श्रीहरिके “परनब्रह्य' नामक परमपदका साक्षात्कार कर 
ठेते थे। 

तदनन्तर रजा जीविकाके साधन उद्योग-धंधे ओर 
खेती आदिका काम करने रगी । राजन्‌ ! धान, जौ 
गहू छोटे धान्य, ति, कँगनी, ज्वार, कोद चेना, 
उडद, मुंग, मसूर, मटर, कुरुथी, अरहर, चना ओर 
सन- ये सत्रह ग्रामीण अन्नोकी जातियाँ हँ । ग्रामीण 
अौर जंगली दोनों भ्रकारके मिलाकर चोदह अन्न यज्ञके 
उपयोगमे आनेवाके माने गये है । उनके नाम ये है-- 
धान, जो, उड़द, गेह, महीन धान्य तिल सातवीं कगनी 
ओर आठवी कुरूथी--ये ग्रामीण अन्न हैँ तथा 
तिन्नीका चावल, जरति (वनतिरू), गवेधु, वेणुः 
ओरं मका- ये छः जंगली अन्न है । ये चौदह 
यज्ञाुष्ठानकी सामग्री है तथा यज्ञ ही इनकी 


; साथ ये अन्न प्रजाकी ओः 











| 1 * च्लके छिथ ब्राह्मणादि वरणो तथा अन्ञकी सुषि, मरीचि आदिकी उत्पत्तिका वर्णन * १९ 


2.8.14... 4.4.4.4..4.4.1.1.4.2.1.9 








ज्ञाता विद्वान्‌ पुरुष इन्हीकि द्वारा यज्ञोका अनुष्ठान करते 
रहते हैँ । नृपश्रेष्ठ ! भतिदिन किया जानेवाला यज्ञनुष्ठान 
मनुष्योका परम उपकारक तथा उन्हे रान्ति पदान 
करनेवाल् होता है । [कृषि आदि जीविकाके साधनक 
सिद्ध हो जानेपर] प्रजापतिने प्रजाके स्थान ओर गुणोकि 
अनुसार उनमें धर्म-मर्यादाकी स्थापना की । फिर वर्ण 
ओर आश्रमोके पृथक्‌-पृथक्‌ धर्मं निश्चित किये तथा 
स्वधर्मका भलीभोति पालन करनेवाङे सभी वणेकि लिये 
पुण्यमय लोकोंकी रचना की । 
योगिर्योको अमृतस्वरूप ब्रह्मधामकी प्राप्ति होती है, 
जो परम पद माना गया है । जो योगी सदा एकान्तमें 
रहकर यलपूर्वक ध्यानमें लगे रहते है, उन्हे वह उत्कृष्ट 
पद प्राप्त होता है, जिसका ज्ञानीजन ही साक्षात्कार कर 
पाते है । तामिख, अन्धतामिस्न, महारौरव, रौरव, घोर 
असिपत्रवन, कालसूत्र ओर अवीचिमान्‌ आदि जो नरक 
है, वे वेदोकी निन्दा, यज्ञोका उच्छेद तथा अपने धर्मका 
परित्याग करनेवाटे पुरुषोकि स्थान बताये गये है । 
ब्रह्माजीने पहे मनके संकल्पसे ही चराचर 
भ्राणिर्योकी सृष्टि की; किन्तु जब इस प्रकार उनकी सारी 
प्रजा [पुत्र, पौत्र आदिके क्रमसे] अधिक न बढ सकी, 
तब उन्होनि अपने ही सदा अन्य मानस पुत्रको उत्पन्न 
किया । उनके नाम हैँ--भृगु, पुरुह, क्रतु, अर््गिरा 
मरीचि, दक्ष, अत्रि ओर वसिष्ठ । पुराणमें ये नो ब्रह्मा 
निश्चित किये गये है । इन भगु आदिके भी पहर जिन 
सनन्दन आदि पुत्रको ब्रह्माजीने जन्म दिया था, उनके 
मनम पुत्र उत्पन्न कएेकी इच्छा नहीं हुई; इसख््यि वे 
सृष्टिन्सननके कार्यमें नहीं फंसे । उन सबको स्वभावतः 
विज्ञानकी प्रति हो गयी थी। वे मात्सर्य आदि दोषोसे 
रहित ओर वीतराग थे। इस प्रकार संसारकी सृष्टिके 
कार्यसे उनके उदासीन हो जानेपर महातमा ब्रह्माजीको 
महान्‌ क्रोध हआ, उनकी “भोहि तन गयी ओर कलार 
धसे उदीप हो उडा। इसी समय उनके रूलारसे 
मध्याहकालीन सूर्यके समान तेजस्वी रुद्र प्रकट हूए। 





„ सभवत पुलस्यजीको मिलाकर हो नौ रहम मन गये है। 


~ ४ ४४ 
---- 41644 





उनका आधा शरीर खीका था ओर आधा पुरुषका । वे 
बड़ प्रचण्ड थे ओर उनका इारीर बड़ा विरु था । तब 
ब्रह्माजी उन्हं यह आदेशा देकर कि “तुम अपने डारीरके 
दो भाग करो' वहासि अन्तर्धान हो. गये । उनके एेसा 
कहनेपर रुद्रे अपने इारीरके खरी ओर पुरुषरूप दोना 
भागोको पृथक्‌-पृथक्‌ कर दिया ओर फिर पुरुषभागको 
ग्यारह रूपेमिं विभक्त किया । इसी ्रकार खीभागको भी 
अनेकों रूपोमिं प्रकट किया। खरी ओर पुरुष दोनां 


` भागेकि वे भिन्न-भिन्न रूप सोम्य, क्रूर, दान्त, उयाम 


ओर गोर आदि नाना भरकारके थे । 
तत्पश्चात्‌ ब्रह्माजीने अपनेसे उत्पन्न, अपने ही 

स्वरूपभूत खायम्भुवको प्रजापाकनके छिये प्रथम मनु 
बनाया । खवायम्भुव मनुने ङातरूपा नामकी स्रीको, जो ` 
तपस्याके कारण पापरहित ` थी, अपनी पलीके रूपमे 
स्वीकार किया । देवी ₹ातरूपाने स्वायम्भुव मनुसे दो पुत्र 
ओर दो कन्याओंको जन्मः दिया । पुत्रके नाम थे-- 
परियत्रत ओर उत्तानपाद तथा कन्या अ्रसूति ओर 
आकूतिके नामसे प्रसिद्ध हई । मनुने प्रसूतिका विवाहं 
दक्षके साथ ओर आकूतिका रुचि प्रजापतिके साथ कर 
दिया 1 दक्षने भ्रसूतिके गर्भसे चोबीस कन्यार्एं उत्पन्न कीं । 
उनके नाम है- श्रद्धा, ठक्ष्मी, धति, पुष्टि, तुष्टि, मेधा, 
क्रिया, बुद्धि, रच्ना, वपु, रान्ति, सिद्धि ओर तेरहवीं 


-कीर्तिं। इन दश्ष-कन्याओंको भगवान्‌ धर्मने अपनी 


पल्ियेकि रूपमे महण किया । इनसे छोटी ग्यारह कन्यां 
ओर थी, जो ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, ` 
सन्नति, अनसूया, ऊर्ज, स्वाहा ओर स्वधा नामसे प्रसिद्ध 
हुई । नृपश्रेष्ठ ! इन ख्याति आदि कन्याओंको क्रमाः 
भृगु, रिव, मरीचि, अङ्गिरा ओर मेन (पुलस्त्य) तथा 
पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ; अग्रि तथा पितरोनि ग्रहण 
किया। श्रद्धाने कामको, लक्ष्मीने दर्षको, धृतिने 
दिया मेधाने श्रुतको, क्रियाने दण्ड, नय ओर विनयको 











॥ ९२ 


.४.४.४..१.4.4.. 4.4... 0.9.4.4. 4.4... 8.9. 8.4.4.4.4.4.1 


* अर्चयस्व हषीक्तेशं यदीच्छसि परं षदम्‌ „` 


[ सक्षिप् पद्यपुराण 


४ ४. ४.1 

___ ~ ब ~ 413 3... ॥. ४.1 
| । -----~ ४. न 1 

। २.४... 


व्यवसायको, रान्तिने क्षेमको, सिद्धिने सुखको . ओर 
कीर्तिने याको उत्पन्न किया। ये ही धर्मके पुत्र है । 
कामसे उसकी पली नन्दीने हर्ष नामक पुत्रको जन्म दिया, 
यह धर्मका पोत्र था। भृगुकी पली ख्यातिने लक्ष्मीको 
जन्म दिया, जो देवाधिदेव भगवान्‌ नारायणकी पली है । 
भगवान्‌ रुद्रन. दक्षसुता सतीको पलीरूपमें ग्रहण किया, 
जिन्हेनि अपने पितापर खीञ्चकर रारीर त्याग दिया । 
अधर्मकी स्रीका नाम हिंसा है। उससे अनृत 
नामक पुत्र ओर निकृति नामवाली कन्याकी उत्पत्ति हुई । 
फिर उन दोनोने भय ओर मरक नामक पुत्र ओर माया 


तथा वेदना नामकी कन्याओंको उत्पन्न किया । माया 


भयकी ओर वेदना नरककी पली हई । उनमेसे मायाने 
समस्त प्राणिर्योका संहार करनेवाठे मुत्यु नामक पुत्रको 
जन्म दिया ओर वेदनासे नरकके अदासे दुःखकी उत्पत्ति 
हुं । फिर मृत्युसे व्याधि, जरा, दोक तृष्णा ओर 
क्रोधका जन्म हुआ । ये सभी अधर्मस्वरूप है ओर 
दुःखोत्तर नामसे प्रसिद्ध ह । इनके न कोई खर है न पतर । 
ये सब-के-सन नैष्ठिक ब्रह्मचारी है । राजकुमार भीष्म । 
ये ब्रह्माजीके रद्र रूप हैँ ओर ये ही संसारके नित्य 
प्रख्ये कारण होते हैँ । 


=-= + == 


लेक्ष्मीजीके भ्रादुर्भावकी कथा, ससुद्र-मन्थन ओर अयुत-्रापति 


भीष्पजीने कहा- मुने! मैने तो सुना था 

लक्ष्मीजी क्षीर-समुद्रसे प्रकट हुई है; फिर आपने यह कैसे 
कहा कि वे भुगुकी पली ख्यातिके गर्भसे उत्पन्न हई ? 

पुलस्त्यजी बोत्े--राजन्‌ ! तुमने मुडासे जो प्रश्न 

किया है, उसका उत्तर सुनो । ठक्ष्मीजीके जन्मका 

` सम्बन्ध समुद्रसे हे, यह. लात मैने भी ब्रह्माजीके मुखसे 

सुन रखी है । एक समयकी. नात है, दैत्यों ओर दानवोनि 


बड़ी भारी सेना ठेकर देवताओंपर चढ़ाई की । उस 


युद्धमे दैत्योके सामने देवता परास्त हो गये । तन इद 
आदि सम्पूर्णं देवता अभ्रिको आगे करके ब्रह्माजीकी 


_छ्रणमें गये । बहो उन्होनि अपना सारा हार ठीक-ठीक- 


` कह. सुनाया । ब्रह्माजीने . कहा--“तुमलोग मेरे साथ 
` भगवान शरणमे चरे ' यह कहकर वे सम्पण 
। देवताओं साथ से -शीर-सागरके उततर-तटपर गये 
ओर भगवान्‌ वासुदेवको सम्बोधितः करके बोरे 


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डा दो। फिर मन्द्राचरूको मथानी ओर वासुकि 
नागको नेती (रस्सी) बनाकर समुद्रका सन्थन करते हुए 
उससे अमृत निकारो । इस कार्यमें मै तुमलोगोकी 
सहायता करूगा । समुद्रका मन्थन करनेपर जो अमृत 
निकलेगा, उसका पान करलेसे तुमलेग बरूवान्‌ ओर 
अमर हो जाओगे ।' 





सृष्टिखण्ड ] 


१.1 





१ 4.१.44. .1.1.4.4.1 


* लक्ष्मीजीके भ्रादुर्भावकी कथा, समुद्र-मन्थन ओर अमृत-प्राप्न क 


१२ 


~ 


गये । देव, दानव ओर दैत्य सब मिलकर सब अकारक 
आओषधियों के आये ओर उन्हे क्षीर-सागर्में डालकर 
मन्दराचरूको मथानी एवं वासुकि नागको नेती बनाकर 
बड़े वेगसे मन्थन करने रगे । भगवान्‌ विष्णुकी प्ररणासे 
सब देवता एक साथ रहकर वासुकिकी पूछकी ओर हो 
गये ओर दैत्योको उन्होने वासुकिके सिरकी ओर खडा 
कर्‌ दिया । भीष्मजी ! वासुकिके मुखकी संस तथा 
विषाग्निसे ज्जुकसं जानेके कारण सब दैत्य निस्तेज हो 
गये । क्षीर-समुद्रके बीचमें ब्रह्मवेत्ताओंमे श्रेष्ठ भगवान्‌ 
ब्रह्या तथा महातेजस्वी महादेवजी कच्छप रूपधारी 
श्रीविष्णुभगवानकी पीटपर खड़े हो अपनी भुजाओंसे 
कमरकी भांति मन्दराचरको पकडे हुए थे तथा स्वयं 
भगवान्‌ श्रीहरि कूर्मरूप धारण करके क्षीर सागरके 
भीतर देवताओं ओर दैत्योके बीचमें स्थित थे। [वे 
मन्दराचरको अपनी पीठपर खये डूबनेसे बचाते थे |] 
तदनन्तर जब देवता ओर दानवेन क्षीर-समुद्रका मन्थन 
आरम्भ किया, तब पहले-पहर उससे देवपूजित सुरभि 
(कामधेनु) का आविर्भाव हुआ, जो हविष्य (घी-दूध) 
की उत्पत्तिका स्थान मानी गयी है । तत्पश्चात्‌ वारुणी 
(मदिरा) देवी प्रकट हुई, जिसके मदभरे नेत्र घूम रहे 
थे। वह पग-पगपर लड़खड़ाती चरती थी । उसे 
अपवित्र मानकर देवताओनि त्याग दिया । तब वह 
असुरोके पास जाकर बोली-- दानवो ! मँ बर प्रदान 
करनेवाली देवी ह, तुम मुञ्च ग्रहण करो । दैत्योनि उसे 
ग्रहण कर किया । इसके बाद पुनः मन्थन आरम्भ होनेपर 
पारिजात (कल्पवृक्ष) उत्यन्न हुआ, जो अपनी खोभासे 
देवताओंका आनन्द बढ़निवाला था । तदनन्तर साठ 
करोड अप्सरा प्रकट हई, जो देवता ओर दानर्वोकी 
सामान्यरूपसे भोग्या हैँ । जो लोग पुण्यकर्म करके 


देवलोके जाते है, उनका भी उनके ऊपर समान 


अधिकार होता है। अष्सराओकिं बाद रीत 
किर्णोवाठे चन््रमाका भ्रादुर्भाव हआ, जो देवताओंको 
आनन्द दान करनेवाके थे । उन्हँ भगवान्‌ शङ्करे अपने 
खयि मांगते हए कहा--देवताओ ! ये चन्रमा मेरी 
जटाकि आभूषण होगे, अतः मने इन्दे ठे लिया । 





ब्रह्माजीने "बहुत अच्छा कहकर डाङ्कूरजीकी बातका 
अनुमोदन किया । तत्पश्चात्‌ काखकूट नामक भयङ्कर 
विष प्रकट हुआ, उससे देवता ओर दानव सबको बड़ी 
पीड़ा हई । तब महादेवजीने खेच्छासे उस विषको ठेकर 
पी लिया । उसके पीनेसे उनके कण्ठमें कारा दाग पड़ 
गया, तभीसे वे महेश्वर नीककण्ठ कहने लगे । क्षीर 
सागरसे निकठे हए उस विषका जो अंडा पीनसे बच 
गया था, उसे नागों (सर्पो) ने ग्रहण कर छखिया। 
तदनन्तर अपने हाथमे अमृतसे भरा हुआ 

कमण्डलु लिये धन्वन्तरिजी प्रकट हए। वे धेतवख 
धारण किये हुए थे । वैद्यराजके दर्शनसे सबका मन 
सखस्थ एवं प्रसन्न हो गया । इसके बाद उस समुद्रसे 
उच्चैःश्रवा घोडा ओर रावत नामका हाथी- ये दोनों 
क्रमाः प्रकट हुए। [इसके पश्चात्‌ क्षीरसागरसे 
लक्ष्मीदेवीका प्रादुर्भाव हआ, जो खिर हए कमरपर 
विराजमान थीं ओर हाथमें कमर छ्य थीं । उनकी मभा 
चारो ओर छिटक रही थी। उस समय महर्षियेनि 
श्रीसुक्तका पाठ करते हए बड़ी परसन्नताके साथ उनका 
स्तवन किया। साक्षात्‌ श्षीर-समुद्रने [दिव्य पुरुषके 
रूपमे] प्रकट होकर लक्ष्मीजीको एक सुन्दर माला भट 
की, जिसके कमर कभी मुरञ्ञाते नहीं थे । विश्चकमानि 
उनके समस्त अङ्गम आभूषण पहना दिये । स्नानके 


-पश्चात्‌ दिव्य माल ओर दिव्य वसन धारण करके जब वे 


सब प्रकारके -आभूषणेसि विभूषित हुई, तब इन्द्र आदि 
देवता तथा विद्याधर आदिने भी उन्हं प्राप्त करनेकी इच्छा 


की । तब ब्रह्माजीने भगवान्‌ विष्णुसे कहा-- वासुदेव ! 


मद्रा दी हई इस र्षमदेवीको आप ह ग्रहण कर! | 
मैने देवताओं ओर दानवोको मना कर दिया है- वे इन्हें 
पानेकी इच्छा नहीं करगे । आपने जो स्थिरतापूर्वक इस 
समुद्र-मन्थनके कार्यको सम्पन्न किया है, इससे आपपर 
मै बहुत सन्तुष्ट ह ।' यां कहकर ब्रह्माजी लश्षमीजीसे 
बोले--“देवि ! तुम भगवान्‌ केशवके पास जाओ । मेरे 





दिये हए पतिको पाकर अनन्त वर्षोतक आनन्दका 





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९  * अर्चयस्व हषीकेशं यदीच्छसि परं पदम्‌ ^ 


[ संक्षिप्त पद्मपुराण 


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देवताओके -देखते श्रीहरिके वश्षःस्थलमे चली 


गयीं ओर भगवानसे बोलीं- “देव ! आप कभी मेरा 
परित्याग न करे । सम्पूर्ण जगतके प्रियतम ! मै सदा 
आपके आदेहका पालन करती हुई आपके वक्षःस्थले 
निवास करूंगी ।' यह कहकर लक्ष्मीजीने कृपापूर्ण 
दुष्टिसे देवताओंकी ओर देखा, इससे उन्हे बड़ी प्रसन्नता 
हहं । इधर छक्ष्मीसे परित्यक्त होनेपर दैत्योको बड़ा उद्धेग 
हुआ 1 न्होनि ज्ञपटकर धन्वन्तरिके हाथसे अमृतका पात्र 
छीन छ्िया। तब विष्णुने मायासे सुन्दरी ख्रीका रूप 
धारण करके दै््योको लभाया ओर उनके निकर जाकर 
कहा "यह अमृतका कमण्डल् मुञ्जे दे दो।' उस 
त्रिभुवनसुन्दरी रूपवती नारीको देखकर दैत्योका चित्त 
कामके वडीभूत हो गया । उन्होने चुपचाप वह अमृत 
उस सुन्दरीके हाथमे दे दिया ओर सयं उसका मह 
ताकने रुगे। दान्वोसे अमृत लेकर भगवानने 
देवताओंको दे दिया ओर इन्द्र आदि देवता तत्का उस 
अमृतको पी गये ! यह देख दैत्यगण भांति-भांतिके 
अखर-शस्र ओर तरवारं हाथमे केकर देवताओंपर टूर 
पड़े; परन्तु देवता अमृत पीकर बलवान्‌ हो चुके थे, 
उन्होनि देैत्य-सेनाको परास्त कर दिया । देवताओंकी मार 
पड्नेपर दैत्योनि भागकर चारो दिदाओंकी डारण री ओर 
कितने ही पातारमे घुस गये । तब सम्पूर्णं देवता आनन्द- 








` सतीका देहत्याग ओर 







. भ्रष्पजीने पृषछा--त्रह्मन्‌ ! दक्षकन्या सती तो 


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ममर हो शङ्ख, चक्र ओर गदा धारण कनेवारे 
्रीविष्णुको प्रणाम करके स्वर्गोकको चरे गा 
तबसे सूर्यदेवकी प्रभा स्वच्छ हो गयी । वे अपने 
मार्गसे चलने रुगे । भगवान्‌ अभ्निदेव भी मनोहर दीप्तस 
युक्तं हो प्रज्वलित होने रुगे तथा सब पाणिका मन 
धममें सरम रहने रूगा। भगवान्‌ विष्णुसे सुरक्षित 
होकर समस्त त्रिलोकी श्रीसम्पन्न हो गयी । उस समय 
समस्त रोकौको धारण करनेवाङे ब्रह्माजीने देवताओसे 
कहा- "देवगण ! मने तुम्हारी रक्षके कयि भगवान्‌ 
श्रीविष्णुको तथा देवताओकि स्वामी उमापति 
महादेवजीको नियत किया है; वे दोनों तुम्हारे योगक्षेमका 
निर्वाह करेगे । तुम सदा उनकी उपासना करते रहना, 
क्योकि वे तुम्हारा कल्याण करनेवाठे हैँ । उपासना 
करनेसे ये दोनों महानुभाव सदा तुम्हारे क्षेमके साधक 
ओर वरदायक होगे ।' यों कहकर भगवान्‌ ब्रह्मा अपने 
धामको चरे गये । उनके जानेके बाद इन्द्रने देवलोककी 
राह ली । तत्पश्चात्‌ श्रीहरि ओर राङ्करजी भी अपने-अपने 
धाम- वैकुण्ठ एवं कैलासमें जा ॒पर्हैचे। तदनन्तर 
देवराज इन्द्र तीनों लोर्कोकी रक्षा करने रगे । महाभाग । 
इस प्रकार लक्ष्मीजी क्षीरसागरसे प्रकर हुईं थीं । यद्यपि 
वे सनातनी देवी है, तो भी एक समय भृगुकी पली 
ख्यातिके गर्भसे भी उन्होने जन्म ग्रहण किया था । 


ऋ (--------- ( 
र दक्षयज्ञ 


प्राचेतस, अद्गिरा तथा महातपस्वी वसिष्ठजी भी उपस्थित 
हए । वहां सब ओरसे बराबर वेदी बनाकर उसके ऊपर 
चातुरहोतरकी* स्थापना हुईं । उस यज्ञमं महर्षि वसिष्ठ 
होता, अद्धिरा अध्वर्यु, बृहस्पति उद्राता तथा नारदजी 
ब्रह्मा हए । जब यज्ञकर्म आरम्भ हुआ ओर अभ्रम हवन 
होने रगा, उस समयतक देवताओकि आनेका क्रम जायी 
रहा । स्थावर ओर जङ्गम--सभी प्रकारके प्राणी वहो 
उपस्थित थे। इसी समय ब्रह्माजी अपने पुत्रके सा 
आकर यज्ञके सभासद्‌ हुए तथा साक्षात्‌ भगवान्‌ 








^| 


(ण गणम व ण णी क त म श को रिवषय 


= ` जक ऋ = 
कताय 





सुष्टिखण्ड | 


.४.१.1.4 


* सतीका देहत्याग ओर दक्ष-यज्ञ-विध्वंस + 


४.१... 4.24. 4.4...8.4.4..1. 4.9. 
~ ४ ४४ 


१५ 


1 


श्रीविष्णु भी यज्ञकी रश्षाके स्यि वहाँ पधारे। आं 
वसु, बारहो आदित्य, दोनों अश्चिनीकुमार, उनचासों 
मरुद्रण तथा चौदह मनु भी वहाँ आये थे । इस भकार 
यज्ञ होने रूगा, अधमे आहुतियाँ पड़ने लगीं । वहां 

कष्य-भोज्य सामग्रीका बहुत ही सुन्दर ओर भारी 
ठाट-बाट था। देशर्यकी पराकाष्ठा दिखायी देती थी । 
चारों ओरसे दस योजन भूमि यज्ञके समारोहसे पूर्ण थी । 


वहां एक विडाल वेदी बनायी गयी थी, जहां सब लोग 


एकत्रित थे। शुभलक्षणा सतीने इन सारे आयोजनोको 
देखा ओर यज्ञमे आये हुए इन्द्र॒ आदि सम्पूर्ण 
देवताओंको लक्ष्य किया । इसके बाद वे अपने पितासे 
विनययुक्त वचन बोटीं। 

सतीने कहा- पिताजी ! आपके यज्ञमें सम्पूर्ण 
देवता ओर ऋषि पधारे हैँ । देवराज इन्द्र अपनी धर्मपली 
ङाचीके साथ एेरावतपर चढकर आये है । पापिर्योका 
दमन करनेवाले तथा धर्मात्माओके रक्षक परमधर्मिष्ठ 
यमराज भी धुमोणकि साथ दृष्टिगोचर हो रहे हैँ । जल- 
जन्तुओंके स्वामी वरुणदेव अपनी पती गोरीके साथ इस 
यज्ञमण्डपमें सुशोभित हैँ । यक्षोके राजा कुबेर भी अपनी 
पलीके साथ आये है । देवताओकि मुखस्वरूप अगभ्रिदेवने 
भी यज्ञ-मण्डपमें पदार्पण किया हे । वायु देवता अपने 
उनचास गणोके साथ ओर लोकपावन सूर्यदेव अपनी 
भार्या संज्ञाके साथ पधारे हँ । महान्‌ यरास्वी चन्द्रमा भी 
सपलीक आये हैँ । आठों वसु ओर दोनों अश्चिनीकुमार 
भी उपस्थित है । इनके सिवा वृक्ष, वनस्पति, गन्धं, 
अप्सरा, विद्याधर, भूतोके समुदाय, वेतार, यक्ष, 
राक्षस, भयङ्कर कर्म करनेवाठे पिदाच तथा दूसरे-दूसरे 
 श्राणधारी जीव भी यहाँ मौजूद ह । भगवान्‌ कडयप, 
दिष्योसहित वसिष्ठजी, पुस्त्य, पुरुह, सनकादि महि 
तथा भूमण्डकके समस्त पुण्यात्मा राजा यहाँ पधार है । 
 . अधिक क्या कह, ब्रह्माजीकी बनायी हई सारी सृष्टि ही 
यहाँ आ पहैची है । ये हमारी बहिन ह, ये भानजे है ओर 
ये बहनोई है। ये सब-के-सन अपनी-अपनी सी, पतर 
जर बान्धवेकि साथ यहाँ उपस्थित दिखायी देते हे । 


` आपने दान-मानादिके द्वारा इन सबका यथावत्‌ सत्कार 


~ ना अ) न 5 ष्‌ = > 1 ^ गा 9# मी 1 ~, 


किया है। केवर मेरे पति भगवान्‌ इाङ्कर ही इस 
यज्ञमण्डपमें नहीं पधारे हँ; उनके बिना यह सारा 
आयोजन मुञ्चे सूना-सा ही जान पड़ता है । मेँ समङ्ती 
हू आपने मेरे पतिको निमन्तित नहीं किया है; निश्चय ही 
आप उन्हें भूक गये है । इसका क्या कारण हे ? मुङ्ख 
सब बातें बताइये । 

पुलस्त्यजी कहते है प्रजापति दक्षने सतीके 
वचन सुने। सती उन्हें प्राणेसि भी बढ़कर प्रिय थीं 
उन्होने पतिके स्ेहमे डनी हई परम सौभाग्यवती पतित्रता 
सतीको गोदे बिठा छिया ओर गम्भीर होकर कहा-- 
"बेटी ! सुनो; जिस कारणये आज मेने तुम्हारे पतिको 
निमन्नित नहीं किया है, वह सब टीक-टीक बताता हू । 
वे अपने ङारीरमे राख रपेटे रहते हे । त्रिरु ओर दण्ड 
खयि नग-धडग सदा रमडानभूमिमें ही विचरा करते हे । 
व्याघ्रचर्म पहनते ओर हाथीका चमड़ा ओढते दें । 
कधेपर नरमुण्डोकी माला ओर हाथमे खट्वाङ्ग यही 
उनके आभूषण है । वे नागराज वासुकिको यज्ञोपवीतके 
रूपमे धारण किये रहते हैँ ओर इसी रूपम वे सदा इस 
पृथ्वीपर श्रमण करते है । इसके सिवा ओर भी बहुत-से 
घूणित कारय तुम्हारे पतिदेवता करते रहते हँ 1 यह सब 
मेरे छ्य बडी र्ञ्नाकी बात है । भता, इन देवताओंके 
निकट वे उस अभद्र वेषमें कैसे बैठ सकते हे । जेसा 
उनका वस्र है, उसे पहनकर वे इस यज्ञमण्डपमें आने 
योम्य नहीं हे । बेटी ! इन्हीं दोर्षके कारण तथा 
लोक-र्नाके भयसे मेने उन्हँ नहीं बुलाया । जब यज्ञ 
समाप्त हो जायगा, तब मेँ तुम्हारे पतिको ठे आऊगा ओर 
त्रिरोकीमें सबसे बठ्‌-चढकर उनकी पूजा करूगा; साथ 
ही तुम्हारा भी यथावत्‌ सत्कार करूगा । अतः इसके 
ख्ियि तुम्हे खेद या क्रोध नहीं करना चाहिये 

भीष्म ! प्रजापति दश्षके एेसा कहनेपर सतीको 
बड़ा रोक हुआ, उनकी ओंखिं क्रोधसे लार हो गयीं । . 
वे पिताकी निन्दा करती हई बोली “तात! भगवान्‌ 
ाङ्कर ही सम्पूर्णं जगतके स्वाभी है, वे दी सबसे श्रेष्ठ 
माने गये है । समस्त देवताओंको जो ये उत्तमोत्तम स्थानं ` 
~ 











९६ 
| ४.१.१4... 41.1.14... 9... 9.2.४2... 
। हए 4 माति । भगवान्‌ शिवमें जितने गुण है, उनका पूर्णतया 
वर्णन करनेमें ब्रह्माजीकी जिह्वा भी समर्थ नहीं है । वे ही 
सबके धाता (धारण -करनेवाके) ओर विधाता 
(नियामक) हे । वे ही दिराओकि पाूक है । भगवान्‌ 
रद्रके प्रसादसे ही इनद्रको स्वर्गका आधिपत्य प्राप्त हुआ 
हे । यदि रुद्रमे देवत्व है, यदि वे सर्वत्र व्यापक ओर 
कल्याणस्वरूप है, तो इस सत्यके प्रभावसे शाङ्करजी 
आपके यज्ञका विध्वंस कर डाल ।' | 
इतना कहकर सती योगस्थ हो गयीं- उन्होने 
ध्यान रूगाया ओर अपने ही डारीरसे प्रकट हुई अभिके 
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क । उनमें विनायक-सम्बन्धी ग्रह 
--सब थे। यज्ञमण्डपे पहचकर 
देवताओंको परास्त किया ओर उन्हे भगाकर र: 
तहंस-नहस कर डालर । यज्ञ नष्ट हो जानेसे दक्षका सारा 
उत्साह जाता रहा । वे उद्योगदयून्य होकर देवाधिदेव 
पिनाकधारी भगवान्‌ शिवके पास डरते-डरते गये ओर 
इस प्रकार बोकते-- देव ! मँ आपके प्रभावको नही 
जानता था; आप देवताओकि प्रभु ओर ईश्वर है । इस 
जगत्के अधीश्वर भी आप दही है; आपने सम्पूर्ण 
देवताओंको जीत छ्िया । महेश्वर ! अब मुञ्ञपर कृपा 
कीजिये ओर अपने सब गर्णोको लटाइये 

दक्ष प्रजापतिने भगवान्‌ राङ्करकी ₹ारणमे जाकर 
जब इस प्रकार उनकी स्तुति ओर आराधना की, तब 
भगवानने कहा-- “प्रजापते ! मैने तु्हं यज्ञका पृरा-पूरा 
फल दे दिया । तुम अपनी सम्पूर्णं कामनाओंकी सिद्धिके 
ल्य यज्ञका उत्तम फल्‌ पराप्त करोगे ।' भगवानके एेसा 
कहनेपर दक्षे उन्हें प्रणाम किया ओर सब गणेकि देखते- 
देखते वे अपने निवास-स्थानको चले गये । उस समय 
भगवान्‌ शिव अपनी पलीके वियोगसे गङ्गाद्वारे ही 
जाकर रहने रगे । 'हाय ! मेरी प्रिया कहां चटी गयी । 
इस प्रकार कहते हए वे सदा सतीके चिन्तनमें लगे रहते 
थे । तदनन्तर एक दिन देवर्षि नारद महादेवजीके समीप 
आये ओर इस प्रकार बोके-- देवेश्वर ! आपकी पली 
सती देवी, जो `आपको प्राणोकि समान प्रिय थी, 
देहत्यागके पश्चात्‌ इस समय हिमवानकी कन्या होक 
भक इई है । मनाके गर्भसे उनका आविर्भाव हुआ ह । 
वे लोकके ताच्विक अर्थको जाननेवाली थीं । उन्होने इस 
समय दूसरा शरीर धारण किया हे । 

नारदजीकी नात सुनकर महादेवजीने ध्यानर ` ष 


छे चुकी है । इससे उन्न 
देखा किं सती अवतार न व 


हिवजीने पनः उनके साथ विवाह 


ूरवकाकमे जिस कार दशका यज्ञ नट हुजा च! = 


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- जायाय 


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सृष्टिखण्ड ] 


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#* देवता, दानव, गन्धर्व, नाग ओर राक्षसोकी उत्यत्तिका वर्णन * 


11141111 


१९७ 





देवता, दानव, गन्धर्व, नाग ओर राक्षसोंकी उत्पत्तिका वर्णन ` ` ` 


भीष्पजीने कहा- गुरुदेव ! देवताओं, दानवो, 
गन्धर्वो, नागों ओर राक्सोंकी उत्पत्तिका आप विस्तारके 
साथ वर्णन कीजिये । 
पुलस्त्यजी बोले-- कुरुनन्दन ! कहते हँ पहकेके 
प्रजा-वर्गकी सृष्टि संकल्पसे, दर्हानसे तथा स्पर्श करनेसे 
होती थी; किन्तु प्रचेताओके पुत्र दक्ष प्रजापतिके बाद्‌ 
मैथुनसे प्रजाकी उत्पत्ति होने रुगी । दक्षने आदिमे जिस 
प्रकार प्रजाकी सृष्टि की, उसका वर्णन सुनो । जब वे 
[पहकेके नियमानुसार सङ्कल्प आदिसे] देवता, ऋषि 
ओर ना्गोकी सृष्टि करने रगे किन्तु प्रजाकी वृद्धि नहीं 
हुई, तब उन्होने मैथुनके द्वारा अपनी पली वीरिणीके 
गर्भसे साठ कन्याओंको जन्म दिया । उन्मेसे उन्होनि दसं 
धर्मको, तेरह करडयपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार 
अरिष्टनेमिको, दो भुगुपुत्रको, दो बुद्धिमान्‌ कृराश्चको 
तथा दो महर्षिं अङ्गिराको व्याह दीं । वे सब देवताओंकी 
जननी हुई । उनके वदा-विस्तारका आरम्भसे ही वर्णन 
करता ह सुनो । अरुन्धती, वसु, जामी, ठ्वा, भानु, 
मरुत्वती, सङ्कल्पा, मुहूर्ता, साध्या ओर विश्वा-ये दस 
धर्मकी पलियां बतायी गयी हे । इनके पुत्रोके नाम सुनो । 
विश्चाके गर्भसे विश्वेदेव हुए । साध्याने साध्य नामक 
देवता्ओंको जन्म दिया । मरुत्वतीसे मरुत्वान्‌ नामकं 
देवताओंकी उत्पत्ति हई । वसुके पुत्र आठ वसु 
कहलाये। भानुसे भानु ओर मुहूर्तीसे सुहूर्तीभिमानी 
देवता उत्पन्न हृए। ठबासे घोष, जामीसे नागवीथी 
नामकी कन्या तथा अरुन्धतीके गर्भसे पृथ्वीपर होनेवाठे 
समस्त राणी उत्पन्न हए । सङ्कल्पासे सङ्कल्पोंका जन्म 
हुआ । अब वसुकी सृष्टिका वर्णन सुनो । जो देवगण 
अत्यन्त ्रकाङामान ओर सम्पूर्णं दिशाओमिं व्यापक हे 


वे वसु कहलाते है; उनके नाम सुनो । आप, धव, सोम, ` 
धर, अनिल, अन, प्रत्यूष ओर प्रभास--ये आढ वसु 


ह । .आप' के चार पुत्र है शान्त, वैतण्ड, साम्ब ओर 
मुनिवभ्रु । ये स यज्ञरक्षाके अधिकारी हे । धुतके पुत्र 
कारू ओर सोमके पुत्र वचां हुए । धरके दो पुत्र हए-- 
विण ओर हव्यवाह । अनिरके पुत्र प्राण, रमण ओर 





-दिदहिर थे। अनल्के कई पुत्र हए, जो प्रायः अभ्रिके 


समान गुणवारे थे। अनिपुत्र कुमारका जन्म सरकडमिं 
हआ । उनके राख, उपाख ओर नैगमेय-- ये तीन पुत्र 
हए । ` कृत्तिकाओंकी सन्तान होनेके कारण कुमारको 
कार्तिकेय भी कहते है । प्रत्युषके पुत्र देवर नामके मुनि 
हए । प्रभाससे प्रजापति विश्वकर्माका जन्म हुआ, जो 
रिल्पकलके ज्ञाता हैँ । वे महल, घर, उद्यान, प्रतिमा, 
आभूषण, तालख्रब, उपवन ओर कूप आदिका निर्माण 
करनेवाठे हैँ । देवताओंकि कारीगर वे ही हे । 
अजैकपाद्‌, अहिर्बुध्य,. विरूपाश्च, रैवत, हर, 
बहुरूप, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी ओर 
अपराजित- ये ग्यारह रुद्रःकहे गये है; ये गणेके स्वामी 
है । इनके मानस सङ्कल्पसे उत्यन्न चौरासी करोड़ पुत्र हे, 
जो रुद्रगण कहलाते है । वे श्रेष्ठ त्रि धारण किये रहते 
है । उन सबको अविनाडी मानाः गया ह । जो गणेश्र 
सम्पूर्ण दिाओमिं रहकर सकी रक्षा करते हँ, वे सब 
सुरभिके गर्भसे उत्पन्न उन्हीके पुत्र-पोत्रादि हे । अब मँ 
कर्यपजीकी ल्िर्योसे उत्पन्न पुत्न-पोत्रंका वर्णन करूंगा । 
अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता 
ताम्रा, क्रोधवडा, इरा, कद्रूः. खसा ओर मुनि- ये 
कड्यपजीकी पलियोकि नाम है । इनके पुत्रका वर्णन 
सुनो । चाक्षुष मन्वन्तरमें जो तुषित नामसे प्रसिद्ध देवता 
थे, वे ही वैवसत मन्वन्तरं बारह आदित्य हुए 1 उनके 
नाम है- इन्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरूण, अर्यमां 
विवस्वान्‌, सविता, पूषा, ` अंशुमान्‌ ओर विष्णु । ये 
सहसो किरणोसे सुरोभित बारह आदित्य मने गये हे । ` 
इन श्रेष्ठ पत्रोको देवी अदितिने मरीचिनन्दन कर्यपके 
अरासे उत्पन्न किया था । कुडा नामक ऋषिसे जो पुत्र 
हए, उन्हें देव-प्रहरण कहते है । ये देवगण म्रत्येक 
मन्वन्तर ओर भत्येक कल्पमें उत्पन्न एवे विरीन होते 
रहते हे । = 
भीष्म ! हमारे सुननेमे आया है कि दितिनि 
हिरण्यकरिपु ओर हिरण्याश्च । हिरण्यकरिपुसे चार र्व करिपुसे चार पुत्र 










९८ * अच॑यस्व हषीकेरो यदीच्छसि परं यदम्‌ » 


॥.४...8.4. 9.8.94... ४. 1.१.21... ॥ संक्षिप्त 
~ ` दय्स्‌ म प्म कत पद्यपुराण 
४.४... 
> + 











उत्पन्न हए-प्रहमाद, 
म्रहादके द त्र इए - 4 | ५. 
ओर चौथा विरोचन । विरोचनको बक्ति नामक पुत्रक सम्पूर्णं प्राणियोके चयि ` ˆ भसत 
प्राति ` हुड । बल्कि सो पु उनमें य अवध्य थे। परन्तु वीरवर 
५ पुन्न हए । उनमें बाण जेठा था¦ अर्जुने संम्राम-भूमिमें उन्हें भी बर्पूर्वक त 
गुणोमें भी वह सबसे बढ़ा-चटा था । नाणके एक हजार ॒ताम्राने कद्यपजीके वीर्यसे स मार ङ्त | 
तथा वह सन प्रकारके अख चलानेकी कलमे जिनके नाम हे य, 
भी पूरा प्रवीण था। त्रिरुरूधारी लथारी भगवान्‌ नि --रुकी, इयेनी, भासी, सुगृधी, गधिका 
शलधारी भ ५ राङ्कर उसकी ओर रुचि । डुकीने क ओर उलू नामवाङे पश्षियोको 
तपस्यासे सन्तुष्ट होकर उसके नगरमे निवास करते थे। उत्पन्न किया । दयेनीने उ्यने जाजों 
बाणासुरको “महाकारुकी पदवी ० 
सु ^ ह 4 तथा साक्षात्‌ कुरर नामक पक्ि्योंको जन्म दिया । गृधीसे गध्र ओर 
नाकपाणि भगवान्‌ शिवको समानता प्राप्त हुई--वह सुगृध्रीसे कबरूतर उत्पन्न हए तथा रुचिने हंस, सारस 
महादेवजीका सहचर हुआ । हिरण्याक्षके उलूक, कारण्ड एवं व नामके पक्षियोको जन्म दिया । यह 
शकुनि, भूतसन्तापन ओर महाभीम--ये चार पुत्र थे। ताम्राके वंडाका वर्णन हुआ । अब विनताकी सन्तानका 
इनसे सत्ताईंस करोड़ पुत्र-पोत्रोका विस्तार हुआ । वे सभी वर्णन सुनो । पक्षियोमिं श्रेष्ठ गरुड ओर अरूण विनताके 
महाबली, अनेकै रूपधारी तथा अत्यन्त तेजस्वी थे। पुत्र हैँ तथा उनके एक सौदामनी नामकी कन्या भी है, 
दनुने करथपजीसे सौ पुत्र पराप् किये । वे सभी वरदान जो यह आकारामे चमकती दिखायी देती है । अरुणके 
पाकर उन्मत्त थे। उनमें सबसे ज्येष्ठ ओर अधिक दो पुत्र हृए-सम्पाति ओर जयायु । सम्पातिके पुतरोका 
बरुवान्‌ विप्रचित्ति था । दनुके रोष पुत्रके नाम खर्भानु नाम बभ्रु ओर रीघ्रग है । इनमे रीघ्रग विख्यात है । 
ओर वृषपर्वा आदि थे। खर्भानुसे सुप्रभा ओर पुखोमा जटायुके भी दो पुत्र हुए- कर्णिकार ओर इातगामी । वे 
। नामक दानवसे इाची नामकी कन्या हुई । मयके तीन दोनों ही प्रसिद्ध॒ थे। इन पक्षियोके असंख्य पुत्र 
। न्यां हई- उपदानवी, मन्दोदरी ओर कुहू । वृषपर्वाके पौत्र हुए । : 
। दो कन्या थी- सुन्दरी सार्मिष्ठा ओर चन्द्रा । वैश्वानरके सुरसाके गर्भसे एक हजार सर्पोकी उत्पत्ति हुईं तथा 
श्री दो पत्रय थी पुल्ेमा ओर कारुका । ये दोनों ही उत्तम त्रतका पान करनेवाली कदू हजार मस्तकवाछे 
। जडी रक्तिलाछिनी तथा अधिक सन्तानोंकी जननी हुई । एक सहस्र नागोको पुत्रके रूपमे प्राप्त किया । १ 
इन दोनखे साठ हजार दानर्वोकी उत्यत्ति हुई । पुरोमाके छब्बीस नाग प्रधान एव विख्यात है--रोष, वासुके, 
। पुत्र पौलोम ओर कारुकाके कारुखञ्ञ (या कारुकेय) कर्कोटक, राङ्ख, एेरावत, कम्बल, धनञ्जन, महानीर 
~ = हरू ये ४ ॥ ब्रह्याजीसे वरदान पाकर ये मनुष्योकि छखियि पद्य, अश्चतर, तक्षक, एलापत्र महापद्य, ) 
^ अवध्य हो गये थे ओर हिरण्यपुरम निवास करते थे; बलरहक, उङ्खपाल, महार्घ, त, सुभा व 
ल ~ अर्जुनक हाथसे मारे गये ।* शङ्खरोमा, नहुष, रमण, पाणिनि, कपिल, मुख हः 
क सिंहिकाके क. पतञ्जक्मुख पुत्र-पोत्रोकी संख्याका 
` विग्रचित्तिने सिंहिकाके गर्भसे एक भयङ्कर तरको पतलिमुल। इन सनक ४, नाग पूर्वकाले रजा 
जन्म दिया, उ (राह) के नामसे प्रसिद्ध था। नहीं है । इनमेसे अधिकारा ना >धवरानि 
दापकी बहिन. सिंहिकाके कुल जनमेजयके यज्ञ-मण्डपमें जला दिये गये । उत्यतन 
= ५ छ नल, वातापि, इल्वख, अपने ही नामके क्रोधवरासंज्ञक रक्षससमूहकी र 
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सुष्टिखण्ड ] 


क्रोधवरा भीमसेनके हाथसे मारे गये। सुरभिने 
कर्यपजीके अरासे सुद्रगण, गाय, भस तथा सुन्दरी 
सियोंको जन्म दिया। मुनिसे मुनियंका समुदाय तथा 
अप्सरा रकट हई । अरिष्टान बहुत-से किन्नर ओर 
गन्धर्वोको जन्म दिया । इरासे तृण, वृक्ष, तार्ण ओर 
जाड्या --इन सबकी उत्पत्ति हुई । खसाने करोड 


„ म्रुद्र्णोकी उत्पत्ति तथा चौदह मन्वन्तरोका वर्णन * 


षि ठ 1 1.4.4...4.1.4 44.4.14... 4.1.4.4.4.4. 4.2.41... १,१,६.६.१.४.६.२.४.8.: 4.१.१4. ..4. 4. 4.4.4.4.4.4 १,,२.१..६.६.4.2.1 न 41.1.48. 94 ‡ 


९९ 


राक्षसो ओर यरक्षोको जन्म दिया। भीष्म । ये सैकड़ों 
ओर हजार कोटियं कडयपजीकी सन्तार्नाकी हैँ । यह 
स्वारोचिष मन्वन्तरकी सृष्टि बतायी गयी है । सबसे 
पीछे दितिने कडयपजीसे उनचास मरुद्गर्णोको उत्पन्न 
किया, जो सन-के-सब धर्मके ज्ञाता ओर देवताओकि 
प्रिय हेँ। 


मरुदूणोकी उत्यत्ति, भिन्न-भिन्न समुदायके राजाओं तथा चौदह मन्वन्तरोका वर्णन 


भीष्मजीने पृषछा--त्रह्मन्‌ ! दितिके पुत्र 
मरुदर्णोकी उत्पत्ति किस प्रकार हहं ? वे देवताओकि प्रिय 
कैसे हो गये ? देवता. तो दैत्योकि इत हैँ, फिर उनके 
साथ मरुद्र्णोकी मैत्री कयोकर सम्भव हई ? 
पुलस्त्यजीने कहा-- भीष्म ! पह देवासुर 
संमामे भगवान्‌ श्रीविष्णु ओर देवताओकि द्वारा अपने 
पुत्र-पौत्रोके मारे जानेपर दितिको बड़ा इोक हआ वे 
आर्तं होकर परम उत्तम भूरोकमे आयीं ओर सरस्वतीके 
तटपर पुष्कर नामके शुभ एवे महान्‌ तीर्थम रहकर 
सूर्यदेवकी आराधना करने लगीं । उन्होने बडी उग्र 
तपस्या की । दैत्य-माता दिति ऋषि्योके नियर्मोका पान 
करतीं ओर फल खाकर रहती थी । वे कृच्छर-चाद्धायण 
आदि कठोर त्रतेकि पालनद्वारा तपस्या करने र्गी । जरा 
जर होकसे व्याकु होकर उन्होने सो वर्षसि कुछ 
अधिक कारुतक तप किया । उसके बाद वसिष्ठ आदि 
महर्षियोसे पूछा-- मुनिवरो ! क्या कोई एेसा भी त्रत हे, 
जो मेरे पुत्रदोकको नष्ट करनेवाला तथा इहलोक ओर 
परलोके भी सौभाम्यरूप फल प्रदान करनेवाला हो 
यदि हो तो, बताइये ।' वसिष्ठ आदि महर्षियोनि ज्येष्ठकी 
पूर्णिमाका व्रत बताया तथा दितिने भी उस व्रतक़ा 
साङ्गोपाङ्ग , वर्णन सुनकर उसका यथावत्‌ अलुशान 
किया । उस त्रतके माहाव्यसे प्रभावित होकर करयपजी 
बडी प्रसन्नताके साथ दितिके आश्रमपर आये । दितिका 
इारीर तपस्यासे कठोर हो गया था । किन्तु करयपजीने 
उन्हें पुनः रूप ओर ावण्यसे युक्तं कर दिया ओर उनसे 
वर मौगनेका अनुरोध किया । तब दितिने वर मांगते हुए 


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 कहा--"भगवन्‌ ! मैं इन्द्रका बध करलनेके सिय एक पसे 


पुत्रकी याचना करती द जो समृद्धिरारी, अत्यन्त 
तेजस्वी तथा समस्त देवताओंका संहार करनेवाल हो ।' 
करुयपने कहा--“शभे ! मेँ तुम्हं इन्द्रका घातक 
एवै बलिष्ठ पुत्र प्रदान करूगा । तत्पश्चात्‌ कड्यपने 
दितिके उदे गर्भ स्थापित किया ओर कहा-- देवि ! 
तुम्हे सौ वर्षोतक इसी तपोवनमें रहकर इस गर्भकी 
रक्षाके छियि यल करना चाहिये । गर्भिणीको सन्ध्याके 
समय -भोजन नहीं करना चाहिये तथा वृक्षकी जङ्के 
पास न तो कभी जाना चाहिये ओर न ठहरना ही 
चाहिये । वह जकूके भीतर न घुसे, सूने घरं न रवे 
क्रे । ोबीपर खडी न हो । कभी मनमें उद्वेग न खये । 
सूने घरमे बैठकर नख अथवा राखसे भूमिपर रेखा न 
खींच, न तो सदा अरूसाकर पड़ी रहे ओर न अधिक 
परिश्रम ही करे, भूसी, कोयले, राख, हड़ी ओर खपड़पर 


न बैठे । लोगेसि कलह करना छोड़ दे, अगडाई न ठे, 


बार खोलकर खडी न हो ओर कभी भी अपवित्र न 
रहे । उत्तस्की ओर अथवा नीचे. सिर करके कभी न 
सोये । नंगी होकर, उद्रेगमें पड़कर ओर बिना पैर धोये 
भी हायन कसना मना है 1 अमङ्गलखयुक्त वचन महसे न 
निकाठे, अधिक हैसी-मजाक भी न करे । गुरुजनेकि 
साथ सदा आदरका बतीव करे, माङ्गकिक कार्येमिं रुगी 
रहे, सर्वौषधिरयोसे युक्त जके द्वारा खान करे । अपनी 
रक्षाका प्रबन्ध रखे। गुरुजरनोकी सेवा करे ओर वाणीसे 







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न णष्याथयकावव ` अन्तान हो गये । तदनन्तर, पतिकी बातें सुनकर 
दिति विधिपूर्वक उनका पालन करने लगीं । इससे 
-इन्द्रको बड़ा भय हुआ । वे देवलोक छोड़कर दितिके 
पास आये ओर उनकी सेवाकी इच्छसे वहां रहने लगे । 
इन्द्रका भाव विपरीत था, वे दितिका छिद्र दृट्‌ रहे थे। 
बाहरसे तो उनका मुख प्रसन्न था, किन्तु भीतरसे वे 
भयके मारे विक्‌ थे। वे ऊपरसे एेसा भाव जताते थे, 
मानो दितिके कार्य ओर अभिप्रायको जानते ही न दों । 
परन्तु वास्तवमें अपना काम बनाना चाहते थे । तदनन्तर 
जन सौ वर्षकी समामे तीन ही दिन बाकी रह गये, तब 
दितिको बड़ी मरसन्नता हुई । वे अपनेको कृतार्थ मानने 
लगीं तथा उनका हदय विस्मयविमुग्ध रहने रगा । उस 
दिन वे पैर धोना भूरू गयीं ओर नार खो हए ही सो 
गयीं । इतना ही नहीं, निद्राके भारसे दबी होनेके कारण 
दिनम उनका सिर कभी नीचेकी ओर हो गया । यह 
अवसर पाकर ङाचीपति इन्द्र दितिके गर्भम प्रवेदा कर 
गये ओर अपने वजके द्वारा उन्होनि उस गर्भस्थ बारुकके 
सात टुकडे कर डारे । तब वे सातों टुकड़े सूर्यके समान 
| तेजस्वी सात कुमारोके रूपमे परिणत हो गये ओर रोने 
। ।  ख्गे। उस समय दानवरात्रु इ्द्रने उन्हे रोनेसे मना किया 
। । तथा पुनः उनमेसे एक-एकके सात-सात टुकड़े कर 
दिये। इस प्रकार उनचास कुमारोकि रूपमे होकर वे 
जोर-जोरसे रोने लगे। तब इन्द्रने"मा रुदध्वम्‌' (मत 
रोओ). एेसा कहकर उन्हें बारम्बार रोनेसे रोका ओर 
। 1 भ वसे पुनः जीवित हो गये है । इस पुण्यके योगसे ही 
| ४ 5 ~ जीवन ४ ठेसा जानकर वे डस निश्चयपर 
फठ्‌ हे । निश्चय ही इस 



























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* अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि घरं पदम्‌ = 


ध 1 1 णः 


गर्भके . नामसे प्रसिद्ध देवता थे। मरीचि आदि 
माने जते 


¡ सकस पञ्च 


एसा विचार कर इन्द्रे दितिसे कल. , 
` पराच क्षमा करो, मैने शाल स 
दष्कम किया हे । इस प्रकार बारम्बार कहकर = 
दितिको प्रसन्न किया ओर मरुदूर्णोको व 
बना दिया। तत्पश्चात्‌ देवराजने पुतरोसहित दितिको 
विमानपर बिठाया ओर उनको साथ लेकर वे सवगको 
चङे गये । मरुदरण यज्ञ-भागके अधिकारी हुए 
असुरोसे मेरु नहीं किया वः 

, इसख्ि वे देवतावि 

प्रिय हुए । 

भीव्मजीने कहा--त्रह्मन्‌ ! आपने आदिसमं 
ओर भरतिसर्गका विस्दारके साथ वर्णन किया । अव 
जिनके जो स्वामी हो, उनका वर्णन कीजिये । 

पुलस्त्यजी बोरे--राजन्‌ ! जन पृथु इस पुथ्वीके 
सम्पूरणं राज्यपर अभिषिक्त होकर सबके राजा हुए, उस 
समय ब्रह्माजीने चन्द्रमाको अन्न, ब्राह्मण, त्रत ओर 
तपस्याका अधिपति बनाया । हिरण्यगर्भको नक्षत्र, तरे. 
पक्षी, वृक्ष, ्आाड़ी ओर रता आदिका स्वामी बनाया । 
वरुणको जलूका, कुबेरको धनका, विष्णुको आदि््योका 
ओर अभ्रिको वसुओंका अधिपति बनाया । दक्षको 
प्रजापतिर्योका, इन्द्रको देवताओंका, ्रहादको दैत्यों ओर 
टानर्वोका, यमराजको पितरोका, दुरपाणि भगवान्‌ 
शङ्करको पिशाच, राक्षस, पञ, भूत, यक्ष ओर 
वेतालराजोंका, हिमालयको पर्वतोका, समुद्रको 
नदि्ोका, चित्ररथको गन्धर्व, विद्याधर ओर किननरोका, 
भयङ्कर पराक्रमी वासुकिको नागोका, तश्षकको सर्पोका, 
गजराज एेरावतको दिग्गजका, गरुड़को पकषिरयोका, 
उचचैःश्रवाको षोद्धोका, सिंहको मृगोका, सोडको गौजका 
तथा दक्ष (पाकड़) को सम्पूर्ण वनस्यतिर्योका अः 
बनाया । इस प्रकार पूर्वकाले ब्रहमाजीने इन सभी 
अधिपति्योको भिन्न-भिन्न वर्गके राजपदपर अभिषिक्त 


किया था। 
कौरवनन्दन ! पहके स्वायम्भुव व स 


े। आभ्रीघध, अम्रिबाहु, विभु, ८ 









1 । ॥ ध, 4 ॥ 
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+ व: १ ध ण्न 
किक ३ त टु ~ 2 0: 
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७ | > रः = अ 0, [रं ि कनि ~ भक क 1 
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र न ^ ५ (कष च न ५११ । $ ~~ = ~ क धक, = + कृ ^ ट "न (व) +, 
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सृष्टिखण्ड ] 


„ मरुदूणोकी उत्यत्ति तथा चौदह मन्वन्तरोका वर्णन * २९ 


1 -१.4.९.९.१.५.१.४. ५.०५ 


वसु--ये दस स्वायम्भुव मनुके पुत्र हुए, जिन्न अपने 
वंदाका विस्तार किया । ये प्रतिसर्गकी सृष्टि करके परम- 
पदको पराप्त हुए । यह स्वायम्भुव मन्वन्तरका वर्णन हुआ । 
इसके बाद स्वारोचिष मन्वन्तर आया । स्वारोचिष मनुके 
चार पुत्र हृए, जो देवताओकि समान तेजस्वी थे । उनके 
नाम है नभ, नभस्य, म्रसृति ओर भावन । इन्मेसे 
भावन अपनी कीर्तिका विस्तार करनेवाला था । दत्तत्रेय, 
अत्रि, च्यवन, स्तम्ब, प्राण, करयप तथा बृहस्पति-- ये 
सात सपर्षि हए । उस समय तुषित नामके देवता थे । 
हवीनदर, सुकृत, मूर्ति, आप ओर ज्योतीरथ--ये वसिष्ठके 
पाच पुत्र ही स्वारोचिष मन्वन्तरे प्रजापति थे! यह 
द्वितीय मन्वन्तरका वर्णन हआ । इसके बाद ओत्तम 
मन्वन्तरका वर्णन करूगा। तीसरे मनुका नाम था 
अौत्तमि । उन्हेनि दस पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम 
है--ईष, ऊर्ज, तनूज, दाचि, शुक्र, मधु, माधव, नभस्य, 
नभ तथा सह । इनमें सह सबसे छोटा था । ये सब-के- 
सब उदार ओर यदासी थे । उस समय भानुसंज्ञक देवता 
जर ऊर्ज नामके सप्तर्षि थे। कौकिभिष्डि, कुतुण्ड, 
दाल्भ्य, राङ्क, प्रवाहित, मित ओर सम्मित--ये सात 
योगवर्धन ऋषि थे। चौथा मन्वन्तर तामसके नामसे 
प्रसिद्ध है । उसमे कवि, पृथु, अभ्र, अकपि, कपि, जन्य 
तथा धामा--ये सात मनि ही सप्तर्षि थे। साध्यगण 


` देवता थे। अकल्मष, तपोधन्वा, तपोमूल, तपोधन, 


तपोरहि, तपस्य, सुतपस्य, परन्तप, तपोभागी ओर 
तपोयोगी- ये दस तामस मनुके पुत्र थे। जो धमं ओर 
सदाचारे तत्पर तथा अपने वंडाका विस्तार करनेवाले 
ये । अब पाँचवें श्वत मन्वन्तसका वृत्तान्त श्रवण करो । 
देवनाह, सुबाहु, पर्जन्य, सोमप, मुनि, हिरण्यरोमा ओर 
सप्ताश्च- ये सात रैवत मन्वन्तरके सप्तषिं माने गये हे । 
भूतरजा तथा प्रकृति नामवाठे देवता थे तथा वरुण, 
तत्तद, चितिमान्‌, हव्यप, कवि, मुक्त, निरुत्सुकः, स्व, 
विमोह ओर प्रकारक ये दस रैवत मनुके पत्र हुए, जो 


मायाम्‌ [` कनके 
=== + = 








धर्म, पराक्रम ओर बरसे सम्पन्न थे । इसके बाद चाक्षुष 
मन्वन्तरे भगु, सुधामा, विरज, विष्णु, नारद विवस्वान्‌ 
ञओर अभिमानी--ये सात सपर्षि हुए । उस समय केख 
नामसे प्रसिद्ध देवता थे । इनके सिवा ऋभु, पृथग्भूतः 
वारिमूर ओर दिवौका नामके देवता भी थे । इस अकार 
चाक्षुष मन्वन्तरं देवता्ओकी पाँच योनि्यां थीं । चक्ष 
मनुके दस पुत्र हुए, जो रुरु आदि नामसे प्रसिद्ध थे। 
अब सातवे मन्वन्तरका वर्णन करूंगा, जिसे 

वैवसत मन्वन्तर कहते है । इस समय [वैवस्वत 
मन्वन्तर ही चर्‌ रहा है, इसमे] अत्रि, वसिष्ठ, करयप, 
गौतम, योगी भरद्वाज, विश्वामित्र ओर जमदभ्रि- ये 
सात ऋषि ही सपर्षि है । ये धर्मकी व्यवस्था करके 
परमपदको प्राप्त होते है । अब भविष्यमें होनेवाले 
सावर्ण्य मन्वन्तरका वर्णन किया जाता है । उस समय 
अश्चल्यामा, ऋष्यशृङ्ग, कौरिक्य, गारूव, डातानन्द, 
काङ्यप तथा परदराम-ये सपर्षि होगे । धृति, 
वरीयान्‌, यवसु, सुवर्ण, धृष्टि, चरिष्णु, आद्य, सुमति, 
वसु तथा पराक्रमी शक्र ये भविष्ये होनेवाठे सावर्णिं 
मनुके पुत्र बताये गये हँ । इसके सिवा रौच्य आदि 
दूसरे-दूसरे मनुअओकि भी नाम आति ह । प्रजापति रुचिके 
पुत्रका नाम रौच्य होगा । इसी प्रकार भूतिके पुत्र भोत्य 
नामके मनु कहलायेगे । तदनन्तर मेरुसावर्णिं नामक 
मनुका अधिकार होगा । वे ब्रह्माके पुत्र माने गये है । 
मेरु-सावर्णिके बाद क्रमराः ऋभु, वीतधामा ओर 
विघ्रवसेन नामक मनु होगे । राजन्‌ ! इस प्रकार मेने तुह 
भूत ओर भविष्य मनुओंका परिचय दिया हे । इन चौदह 
मनुओंका अधिकार कुर मिलाकर एक हजार चतुर्युग- 
तक रहता है। अपने-अपने मन्वन्तरमे इस सम्पूर्ण 
चराचर जगत्को उत्पन्न कर्के कल्पका संहार होनेपर ये 
ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते है 1 ये मनु प्रति एक सहस 
चतुर्युगीके बाद नष्ट होते रहते है तथा ब्रह्मा आदि 
विष्णुका सायुज्य प्राप करते ह। स 








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२ 


* अर्चयस्व हषीकेडं यदीच्छसि परं पदम्‌ * 


। संक्षिप्त | 
[~~ 
पृथुके चरित्र तथा सूर्यवंकङाका वर्णन ह 


भीष्पजीने पृषछा-- ब्रह्मन्‌ । सुना जाता है, 
पूर्वकारमें बहुत-से राजा इस पृथ्वीका उपभोग कर चुके 
हे । पृथ्वीके सम्बन्धसे ही राजाओंको पार्थिव `या 
पृथ्वीपति कहते हे । परन्तु इस भूमिकी जो "पृथ्वी" संज्ञा 
है, वह किसके सम्बन्धसे हुई॑है 2 भूमिको यह 
पारिभाषिक संज्ञा किसलये दी गयी अथवा उसका “गौ 
नाम भी क्यों पड़ा, यह मुञ्ञे बताइये । 
पुलस्त्यजीने कहा-- स्वायम्भुव मनुके वंदामें एक 
अङ्गं नामके प्रजापति थे। उन्होनि मुत्युकी कन्या 
सुनीथाके साथ विवाह किया था । सुनीथाका मुख बड़ा 
कुरूप था। उससे वेन नामक पुत्र हआ, जो सदा 
अधर्ममें ही रगा रहता था । वह लरोगोकी बुराई करता 
ओर परायी श्ियोको हड़प लेता था। एक दिन 
महर्षियेनि उसकी भलाई ओंर जगत्के उपकारके खयि 
उसे बहुत कुछ समज्ञाया-लुञ्ाया; परन्तु उसका 
अन्तःकरण अशुद्ध होनेके कारण उसने उनकी बात नहीं 
| मानी, प्रजाको अभयदान नहीं दिया । पब ऋषियोनि राप 
| देकर उसे मार डाला । फिर अराजकताके भयसे पीडित 
। होकर पापरहित ब्राह्य्णोने वेनके इारीरका बरपूर्वक 
41 मन्थनं किया। मन्थन करनेपर उसके इारीरसे पहले 
¢ । म्लेच्छ जातियां उत्पन्न हृरद, जिनका रङ्ग काले अञ्जनके 
1 समान था। तत्पश्चात्‌ उसके दाहिने हाथसे एक दिव्य 
` तेजोमय इरीरधारी धर्मात्मा पुरुषका प्रादुर्भाव हआ; जो 
धनुष , बाण ओर गदा धारण किये हुए थे तथा रलमय 
कवच एवं अङ्गदादि आभूषणोसे विभूषित थे । वे पृथुके 
। | ` नामसे प्रसिद्ध हुए । उनके रूपमे साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु 
/ | ही अवतीर्ण ह्‌ े। त्रामणोनि उन्हे राज्यपर अभिषिक्त 


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है ?" पृथुने कहा--“सुव्ते ! सम्पूर्ण 
। सम्पूर्ण 
ल्य जो अभीष्ट वस्तु है, उसे कोन गे 
श्वीन ६ | केरे | 

पृ बहत अच्छा कहकर स्वीकृति दे दी 
राजाने धः 

स्वायम्भुव मनुको बड़ा बनाकर अपने 
पृथ्वीका दूध दुहा । वही दूध अन्न हआ, भि 
प्रजा जीवन धारण करती है । तत्पश्चात्‌ ऋषये 
भूमिरूपिणी गोका . दोहन किया । उस समय चन्द्रमा 
बड़ा ने थे । दुहनेवाके थे वनस्पति, दुग्धका पत्र ध॒ 
वेद ओर तपस्या ही दूध थी। फिर देवताओनि 
वसुधाको दुहा । उस समय मित्र देवता दोग्धा हए इ 
बड़ा बने तथा ओज ओर बर ही दूधके रूपमे प्रक 
हुआ । देवताओंका दोहनपात्र सुवर्णका था ओ 
पितरोका चाँदीका । पितरोंकी ओरसे अन्तकने दुहक 


काम किया, यमराज बड़ा बने ओर स्वधा ही दूध 


रूपमे प्राप्त हुई । नागेन ततूबीको पात्र बनाया ओ 
तक्षकको बड़ा । धृतराष्ट नामक नागने दोग्धा बनका 
विषरूपी दुग्धका दोहन किया । असुरोनि रोहेके बरतने 
इस पृथ्वीसे मायारूप दूध दुहा । उस समय प्रहादकुमा 
विरोचन बछूडा बने थे ओर त्िमूर्धानि दुहनेका कम्‌ 
किया था। यक्ष अन्तर्धान होनेकी विद्या प्राप्र क 
चाहते थे; इसक्िये उन्होनि कुबेरको बड़ा बनाकर क 
बर्तनमे उस अन्तर्धान-विद्याको ही वसुधासे दुष्क 
रूपमे दुहा । गन्धर्वो ओर अप्सराओनि चित्ररथकी बड | 
बनाकर कमलके पत्तमे पृथ्वीसे सुगन्धोका दोहन क्वि ' ` 
उनकी ओरसे अथर्ववेदके पारगामी विद्वान्‌ सुरुचिने ४ | 
दुहनेका कार्य किया था । इस प्रकार दूसरे | | 
अपनी-अपनी रुचिके अनुसार पृथ्वीसे आयु, धन ` ` 
सुखका दोहन किया । पृथुके रासन-कालमे क 
मनुष्य.न दख था न रोगी, न निर्धन था न पा 

न कोई उपद्रव था न पीडा । सब सदा प्रसन 


| 
किसीको दुःख या रोक नहीं था। महाबल ५९ 


हटा दिया ओर पृथ्वीको ५ 


राज्ये गोव बसाने या किले बनव ९ 









सृष्टिखण्ड ] 


आवरयकता नहीं थी । किसीको राख-धारण करनैका 
भी कोई प्रयोजन नहीं था। मनुष्योको विनाशा एवं 
वैषम्यका दुःख नही देखना पड़ता था। अर्थरासमे 
किसीका आदर नहीं था। सब लोग धर्मम ही संलग्न 
रहते थे । इस भ्रकार मैने तुमसे पुथ्वीके दोहन -पात्रोका 
वर्णन किया तथा जैसा-जैसा दूध दुहा गया था, वह भी 
बता दिया । राजा पृथु बडे विज्ञ थे; जिनकी जैसी रुचि 
थी, उसीके अनुसार उन्होनि सबको दूध प्रदान किया । 
यह प्रसङ्ग यज्ञ ओर श्राद्ध सभी अवसररोपर सुनानेके 
योग्य है, इसे मैने तुम्हं सुना दिया । यह भूमि धमीत्मा 
पुथुकी कन्या मानी गयी; इसीसे विद्वान्‌ पुरुष "पृथ्वी 
कहकर इसकी स्तुति करते हे । 
भीष्मजीने कहा-- ब्रह्मन्‌ ! आप तत्के ज्ञाता 
हे, अब क्रमाः सूर्यवेदा ओर चनद्रवेराका पूरा-पुरा एतं 
यथार्थ वर्णन कीजिये । | 
` पुलस्त्यजीने कहा-- राजन्‌ ' पूर्वकाले 
करयपजीसे अदितिके गर्भसे विवस्वान्‌ नामक पुत्र हए । 
विवस्वान्‌के तीन खियाँ थी-- संज्ञ, राजञ ओर प्रभा । 
राज्ञीनि श्वत नामक पुत्र उतपन्न किया । प्रभासे प्रभातकी 
उत्पत्ति हुई । संज्ञा विश्वकमौकी पुत्री थी । उसने वैवस्वत 
मनुको जन्म दिया । कुछ कार पश्चात्‌ संज्ञाके गर्भसे यम्‌ 
ओर यमुना नामक दो जुड़ी सन्तान पैदा हुई । तदनन्तर 
वह विवस्वान्‌ (सूर्य) के तेजोमय स्वरूपको न सह 
` सकी, अतः उसने अपने उारीरसे अपने ही समान 
रूपवाटी एक नारीको प्रकट किया । उसका नाम छाय 
हुआ । छाया सामने खड़ी होकर बोी--देवि ! मेर 
लिये व्या आज्ञा है ?' संज्ञाने कहा-- “छाया ! तुम मेर 
सखवामीकी सेवा करो, साथ ही मेरे चोका भी माताकी 
भति सेहपूर्वक पालन करना । "तथास्तु कहकर छाया 
भगवान्‌ सूर्यके पास गयी । वह उनसे अपनी कामना पूण 
करना चाहती थी । सूर्यने भी यह समञ्जकर कि यह उत्तम 
ज्रतका पालन केवाली संज्ञा ही हे, बड़े आदरके साथ 
उसकी कामना की । छायाने सूर्यसे सावर्ण मनुको उत्पन्न 
किया । उनका वर्णं भी वैवस्वत मनुके समान होनेके 
कारण उनका नाम सावर्ण मनु पड़ गया। ततशात्‌ 


+ पृथुके चरित्र तथा सूर्यवेहाका वर्णन * 


~~ 


२२२ 


भगवान्‌ भास्करे छायाके गर्भसे क्रमरः दानैथर 
नामक पुत्र तथा तपती ओर विष्टि नामकी कन्या्ओंको 
जन्म दिया। 

एक समय महायरास्ती यमराज वैराग्यके कारण 
पुष्कर तीर्थम गये ओर वहां फलः केन एवं वायुका 
आहार करते हुए. कठोर तपस्या करने रुगे । उन्हेनि सो 
वर्घोतक तपस्याके द्वार ब्रह्माजीकी आराधना की । उनके 
तपके प्रभावसे देवेश्वर ब्रह्माजी सन्तुष्ट हो गये; तब 
यमराजने उनसे लछोकपारूका पद, अक्षय पितुलोकका 
राज्य तथा धर्मीधर्ममय जगत्क्री देख-रेखका अधिकारः 
मोगा । इस प्रकार उन्हें ब्रह्माजीसे लोकपारू-पदवी प्राप्त 
हर्द । साथ ही उन्हे पितृरोकका राज्य ओर धर्माधर्मके 
निर्णयका अधिकार भी मिरु गया । 

छायाके पुत्र इानैश्चर भी तपके प्रभावसे मर्होकी 
समानताको प्राप्त हए । यमुना ओर तपती--ये दोन 
सूर्य-कन्या्षै नदी हो गयीं । विष्टिका स्वरूप ब भ्यैकर 
था; वह कालरूपसे स्थित हं । वैवस्वत मुके दस 
महाबली पुत्र हुए, उन समे "इ" ज्येष्ठ थे । रोष पुत्रके 
नाम इस प्रकार रै--इश््वाकु, कुशनाभ, रिष्ट, धृष्टः 
नरिष्यन्त, करूष, महाबली रा्यीति, पृषध्र तथा नाभाग । 
ये सभी दिव्य मनुष्य थे। राजा मनु अपने च्चेष्ठ ओर 
धर्मात्मा पुत्र “इरः को राज्यपर अभिषिक्त करके खये 
पुष्करके तपोवनमें तपस्या कसनेके सख्यि चङे गये । 
तदनन्तर उनकी तपस्याको सफल कसनेके छिय वरदाता 
ब्रह्माजी आये ओर बोरे "मनो ! तुम्हारा कल्याण हो, 
तुम अपनी इच्छके अनुसार वर मगो ।' 

मनुने कहा-- स्वामिन्‌ ! आपकी कृपासे पृथ्वीके 
सम्पूर्ण राजा धर्मपरायणः, सथर्यराटी तथा मेरे अधीन 
हं । "तथास्तु कहकर देवेश्वर ब्रह्माजी वहीं अन्तधीन हो 
गये । तदनन्तर, मनु अपनी राजधानीमे आकर पूतैवत्‌ 
रहने रगे । इसके नाद राजा इर अर्थसिद्धिके खयि इस 
वहकि राजाओंको अपने वामे करते थे। एक दिन 



















४१ दाङ्करके ` महान्‌ ॥ / 
भे ॥ ३ 4: >^ ४ 4 ६५ <." न" त 
१ म. 


॑ रे * अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ [ संक्षि पद्यपुराण 
| ४144... 
ङरवण'के नामसे प्रसिद्ध एणा 
ॐ था। उसमें देवाधिदेव नाना प्रकारके स्तोरोसे पार्वती ओर 
चनद्रा्धरोखर भगवान्‌ शिव पार्वतीजीके साथ क्रीडा किया। तब वे दोनों प्रकट होकर बोले रन 
द | 


। करते हैँ । पूर्वकालमे महादेवजीने उमाके साथ 
| शरवण'के भीतर म्रतिज्ञपूर्वक यह बात कही थी कि 
। शुक्ष नामधारी जो कोई भी जीव हमारे वनये आ 
। ` जायेगा, वह इस दस योजनके घेरे पैर रखते ही खरीरूप 
` हो जायगा ।' राजा इर इस प्रतिज्ञाको नहीं जानते थे 
| इसीकि्यि “ररवणःमं चरे गये ।. वहाँ पह॑चनेपर वे 
, सहसा सी हो गये तथा उनका घोड़ा भी उसी समय 
' घोड़ी जन गया । राजाके जो-जो पुरुषोचित्र अङ्गं थे, वे 
सभी खीके आकारमें परिणत हो गये । इससे उन्हें बड़ा 
आर्य हआ । अब वे “इत्तर' नामकी खरी थे । 

`. इतर उस वनम घूमती हुई सोचने रूगी, मेरे 
| माता-पिता ओर भ्राता कौन हैँ ?' वह इसी उधेड़-ब॒नमें 
। पड़ी थी, इतनेमें ही चनद्रमाके पुत्र लुधने उसे देखा । 
। .  [इलाकी दष्ट भी बुधके ऊपर पड़ी ।] सुन्दरी इकाका 
। मन बुधके रूपपर मोहित हो गया; उधर बुध भी उसे 
। देखकर कामपीडित हो गये ओर उसकी प्रा्िके खयि 
। यल करने रगे । उस समय बुध ब्रह्मचारीके वेषमें थे । 
| वे वनके बाहर पेड़के ञ्ुरमुटमें छिपकर इलाको बुलाने 
। ` र्गे-- सुन्दरी ! यह सांञ्चका समय, विहारकी वेका है 
/ जो बीती जा रही है; आओ, मेरे घरको टीप-पोतकर 
पूरसि सजा दो ।' इला बोखी-- “तपोधन । मेँ यह सब 
मेरे स्वामी कौन है तथा मेरे कुलका परिचय वया है ?' 
बुधन कहा-- सुन्दरी! तुम इल हो, म तु 
० मे मेरा ु न हआ 0 ¡ है। मेरे पिता ब्राह्मणोके राजा 













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श्रु | + ^ = | ४ 8. चकि. 9. १ ख (पि तं | 4 ^ ॐ 3 ॥ 4 क कि 8 ऋण + (कि 4 अ ` श्े 9.८ द. त ति 
। ॥ 9. ॥ 8. ८ ^-#- ~ र ॥॥ 1 + {> न ५१ प > ष क प ॐ ८ प त । क ~ 
~ १ ~: ॥ ट ~ भ 3 नो ति ५ ~क 2 ५ 
ग [ †- 3 + ह 








मेरी यह प्रतिज्ञा तो ट नहीं सकती 

एकं उपाय हो सकता है । इक्ष्वाकु न 
~ फल हम दोनंको अर्पण कर दे । ठेसा करस 
वीरवर इर "किम्पुरुष" हो जार्येगे, इसमे तनिक भी 
सन्देहकी बात नहीं हे । 

बहुत अच्छा, प्रभो "यह कहकर मनुकुमार लैर 

गये । फिर इक्ष्वाकुने अश्वमेध यज्ञ किया । इससे इला 
किम्पुरुष' हो गयी । वे एक महीने पुरुष ओर एक महीने 
सके रूपमे रहने रगे । बुधके भवनम [खरीरूपसे] 
रहते समय इलने गर्भं धारण किया था। उस गर्भे 
उन्होने अनेक गुणोंसे युक्त पुत्रको जन्म दिया । उस 
पुत्रको उत्पन्न करके बुध स्र्गटोकको चले गये । वह 
प्रदेहा इलके नामपर “इरावृतवर्ष' के नामसे प्रसिद्ध 
हुआ । एेर चन््रमाके वंडाज तथा चन्दरवेडाका विस्तार 
करनेवारे राजा हए । इस प्रकार इत -कुमार पुरूरवा 
चन्द्रवङाकी तथा राजा इक्ष्वाकु सूर्यवंराकी वृद्धि 
करनेवाले बताये गये हैँ । “इलः किम्पुरुष-अवस्थामें 
“सुद्युप्र' भी कहलाते थे। तदनन्तर सुद्युश्नसे तीन पुत्र 
ओर हए, जो किसीसे परास्त होनेवारे नहीं थे । उनके 
नाम उत्कल, गय तथा हरिताश्च थे। हरिताश्च बड़े 
पराक्रमी थे । उत्कल्की राजधानी उत्कल (उड़ीसा) हइ 
ओर गयकी राजधानी गया मानी गयी हे । इसी प्रकार 
हरिताश्चको कुरु प्रदेशके साथ-ही-साथ दक्षिण दिशाका 
राज्य॒दिया गया। सुद्युन्न अपने पुत्र 8 
प्रतिष्ठानपुर (चैठन) के राज्यपर अभिषिक्त कके 
दिव्य वर्षके फलका उपभोग कनके किये इलरवृतवरषम 
चरे गये । 
[सु्य्रक नाद्‌] इष्वा हौ मतके सबसे बर ५१ 
थे। उन्हे मध्यदेराका राज्य परा हुआ । इ्वाकुके ं 
त्रम प्रह श्रेष्ठ थे । व मेस्के उत्तरीय प्देदमं राजा हं ` 


देदोकि राजा बताये गये हे । 


ही। उनके सिवा एक सौ चौदह पुत्र ओर हए जो मेर्कै 


इषवाकुके च्य | 








सृष्टिखण्ड ] 


सुयोधन था । सुयोधनका पुत्र पृथु ओर पुथुका विशावसु 
हआ । उसका पुत्र आद्र तथा आद्रैका पुत्र युवनाश्व 
हआ । युवनाश्चका पुत्र महापराक्रमी ₹ावस्त हुआ, 
जिसने अङ्गदेशामे रावस्ती नामकी पुरी बसायी । 
डावस्तसे बृहदश्च ओर बृहदश्चसे कुवखाश्चका जन्म 
हुआ । कुवलाश्च धुन्धु नामक दैत्यका विनाशा करके 
धुन्धुमारके नामसे विख्यात हए । उनके तीन पुत्र 
हए--दुढाश्च, दण्ड तथा कपिल । धुन्धुमारके पुत्रे 
प्रतापी कपिलाश्च अधिक प्रसिद्ध थे 1 दुढाश्चका प्रमोद 
जर भ्रमोदका पुत्र हर्यश्च। हर्यश्चसे निकुम्भ ओर 
निकुम्भसे संहताश्चका जन्म हुआ । संहताश्वके दो पुत्र 
हए-अकृताश्च तथा रणा । रणाश्चके पुत्र युवनाध 
ओर युवनाश्चके मान्धाता थे। मान्धाताके तीन पुत्र 
हए-पुरुकुत्स, धर्मसेतु तथा मुचुकुन्द । इनमे 
मुचुकुन्दकी ख्याति विशेष थी । वे इन्रके मित्र ओर 
प्रतापी राजा थे । पुरुकुत्सका पुत्र सम्भूत था, जिसका 
विवाह न्मदाके साथ हआ था। सम्भूतसे सम्भूति ओर 
सम्भूतिसे त्रिधन्वाका जन्म॒ हुआ । त्रिधन्वाका पुत्र 
त्रधारूण नामसे विख्यात हआ । उसके पुत्रका नाम 
सत्यव्रत था । उससे सत्यरथका जन्म हुआ । सत्यरथके 
पत्र हरिद्र थे । हरिशचनद्रसे रोहित हुआ । रोहितसे वृक 
ओर ` वृकसे बाहुकी उत्पत्ति हुईं । बाहुके पुत्र परम 
धर्मात्मा राजा सगर हए । सगरकी दो खियां थी- परभा 
अर भानुमती । इन दोनेनि पुत्रकी इच्छसे ओर्व नामक 
अभ्रिकी आराधना की । इससे सन्तुष्ट होकर ओर्वने उन 
दोनको इच्छानुसार वरदान देते हुए. कहा-- एकं रानी 
साठ हजार पुत्र पा सकती है ओर दूसरीको एक ही पत्र 
मिखेगा, जो वंडाकी रक्षा करनेवाला होगा [इन दो 
वरमसे जिसको जो पसंद आवे, वह उसे ठे के] !' 
प्रभाने बहुत-से पत्रोको लेना स्वीकार किया तथा 
भानुमतीकों एक ही पुत्र--असमजसकी प्राति हुई । 
तदनन्तर प्रभे, जो यदुकुरूकी कन्या थी, साठ हजार 





* पृथुके, चरित्र तथा सूर्यवंशका वर्णन * 


मन १,*.१.५.५.१..४.4. ६.2.064 11.4.४4 .4.4.4.4 4.4.44... ..4.4.1.1 (.५५..4.4.1.4.9. 09.49 1 1.4.94... 4.8.441 .1.८.4.4.4.4.4.1. 4.4.941 (0.8.20. ४.1. 1.४4... 4.4 


प्रधान १, [१4 
४ # ~ ` 
४. व 
राजाओंका वर्णन किया गया । । 4 
धः ४ । । + क नी ~~ 0) ह क {4 4 
ग + "3, 
क 4 १६ 


ककम परमा 


२५५ 


पुत्रको उत्पन्न किया, जो अश्चकी खोजके सख्यि पुथ्वीको 
खोदते समय भगवान्‌ विष्णुके अवतार महाल 

कोपसे दग्ध हो गये। असमंजसका पुत्र अंडामानके 
नामसे विख्यात हआ । उसका पुत्र दिरीप था । दिलीपसे 
भगीरथका जन्म हआ, जिन्न तपस्या करके भागीरथी 
गङ्खाको इस पृथ्वीपर उतारा था । भगीरथके पुत्रका नाम 
नाभाग हुआ । नाभागके अम्बरीष ओर अम्बरीषके पुत्र 
सिन्धुद्रीप हए । सिन्धुद्रीपसे अयुताय ओर अयुतायुसे 
ऋतुपर्णका जन्म हुआ । ऋतुपर्णसे कल्माषपादः ओर 
कल्माषपादसे . सर्वकर्माकी उत्पत्ति हुई । सर्वकर्माका 
आरण्य ओर आरण्यका पुत्र निघ्र हुआ । निघ्रके दो उत्तम 
पुत्र हृए--अनुमित्र ओर रघु । अनुमित्र रात्रओंका नारा 
कसनेके चयि नमे चला गया । रघुसे दिलीप ओर 
दिलीपसे अज हए। अजसे दीर्थबाहु ओर दीर्घनासे 





 प्रजापाककी उत्पत्ति हई । प्रजापारुसे दरारथका जन्म 


हआ । उनके चार पुत्र हृए। वे सब-के-सब भगवान्‌ 
नारायणके स्वरूप थे । उनमें ाम सबसे बड़े थ, जिन्ेनि 
राबणको मारा ओर रघुवेराका विस्तार किया तथा 
भुगुवेदियोमे श्रेष्ठ वाल्मीकिने समायणके रूपमे जिनके 
चस्रिका चित्रण किया । रामके दो पुत्र हुए कुरा ओर 
रुव । ये दोनों ही इक््वाकु-वंदाका विस्तार करनेवारे थे । 
कुकासे अतिथि ओर अतिथिसे निषधका जन्म हुआ । 
निषधसे नल, नकरूसे नभा, नभासे पुण्डरीक ओर 
प॒ण्डरीकसे क्षेमधन्वाकी उत्पत्ति हुई । क्षेमघन्वाका पत्र 
देवानीक हआ । वह वीर ओर अतापी था। उसका पत्र 
अहीनगु हआ । अहीनगुसे सहस्नाश्चका जन्म ॒हञा । 
सहसराधसे चनद्रावलोक, चन्द्रावरोकसे तारापीड 
तारापीडसे चन्द्रगिरि, ` चन्गिर्सि चन्द्र॒ तथा चनद्रसे 
श्रुतायु हए, जो महाभारतयुद्धं मारे गये 1 न नामके 
दो राजा प्रसिद्ध है--एक तो वीरसेनके पुत्र थे ओर 
दूसरे निषधके । इस प्रकार इश्चवाकुवेशके प्रधान बान 





58 
५ * अच्नयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ „ स । 


हि । + ~ १ क ए त ` 


क त 77) 


= ~~ + ` रै न ~ दनक ४ ~ ^ ऋः ए रे पणि कि) 
र म॑ 4 र 


क-म 


= 


[था जानकि ~~ तथा आद्धके विभिन्न अङ्गका वर्णन 


भ्ीष्पजीने व्छहा- भगवन्‌ | 


अब मै पितरोके 






०4 ० #५ 
(~ > 5 9 त~ विख्यात 
[१ > 


उत्तम वंडाका वर्णन सुनना चाहता हूँ । 

५ पुत्कस्त्यजी बोले राजन्‌ ! बड़ हर्षकी बात है, 
तुम्हें आरम्भसे ही पितरोके वंङका वर्णन सुनाता ह 
सुनो । स्वर्गे पितरेक सात गण हैँ । उनमें तीन तो 
मूर्तिरहित हँ ओर चार मूर्तिमान्‌। ये सब-के-सब 
अमिततेजस्वी हे । इनमें जो मूर्तिरहित पितृगण है, वे 
वैराज ्रजापतिकी सन्तान हैँ; अतः वैराज नामसे मसिद्ध 
हे । देवगण उनका यजन करते हैँ । अब पितरोकी 
ल्क -सृष्टिका वर्णन करता हू, श्रवण करो । सोमपथ 
नामसे प्रसिद्ध कुछ रोक हें, जहाँ करयपके पुत्र पितृगण 
निवास करते हँ । देवतारेग सदा उनका सम्मान किया 
करते हैँ । अभिघ्रात्त नामसे म्रसिद्ध यज्वा पितुगण उन्हीं 
लोकम निवास करते हे । स्वर्गमें विभ्राज नामके जो 
दूसरे तेजस्वी खोक हैँ, उनमें बर्हिषदसंज्ञक पितुगण 


, निवास करते हैँ । वहाँ मोरोसे जुते हए हजारों विमान हैँ 


तथा संकल्पमय वृक्ष भी हँ, जो संकल्पके अनुसार फल 


प्रदान करनेवाठे हँ। जो लोग इस खोकमे अपने 


पितरेकि च्व्यि श्राद्ध करते है, वे उन विभ्राज नामके 


लोकेमिं जाकर समद्धिशाखी भवनोमें आनन्द भोगते हं 
। तथा वहाँ मेरे सैकड पुत्र विद्यमान रहते हँ, जो तपस्या 
। ओर योगबलसे सम्पन्न, महात्मा, महान्‌ सौभाग्यराली 






भरक्तोको अभयदान देनेवाठे है । मार्तण्डमण्डल 


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माता, भाइ, पिता, सास, मित्र, सम्बन्धो तथा ओंका 
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का वर्णन करता हे | ब्रह्मरोकके 
~र सुमानस नामके लोक स्थित है, जहो सोमप नामसे 
भसिद्ध सनातन पितरोका निवास है। वे सन-के-सव 
धर्ममय स्वरूप धारण करनेवाके तथा ब्रह्माजीसे भ रेष्ठ 
ह । स्वधासे उनकी उत्पत्ति हुई है । वे योगी है. अतः 
ब्रह्मभावको प्राप होकर सृष्टि आदि करके सब इस समय 
मानसरोवरमे स्थित हैँ । इन पितरोकी कन्या न्दा 
नामकी नदी है, जो अपने जरसे समस्त प्राणिरयोको 
पवित्र करती हुईं पश्चिम समुद्रे जा मिती है । उन 
सोमप नामवाङे पितररोसे ही सम्पूर्ण प्रजासृष्टिका विस्तार 
हुआ है, एेसा जानकर मनुष्य सदा धर्मभावसे उनका 
श्राद्ध करते हँ । उन्हीके प्रसादसे योगका विस्तार 
होता है । 
आदि सृष्टिक समय इस प्रकार पितरोका श्राद्ध 
प्रचक्ित हआ । श्राद्धमे उन सबके लिये चांदीके पात्र 
अथवा चोँदीसे युक्त पात्रका उपयोग होना चाहिये । 
“स्वधा ₹राब्दके उच्चारणपूर्वक पितरोकि उदेरयसे किया 
हआ श्राद्ध-दान पितरोको सर्वदा सन्तुष्ट करता है। 
विद्वान्‌ पुरुषोको चाहिये कि वे अग्िहोत्री एं सोमपायी 
ब्राह्मणोके द्वारा अभ्िमें हवन कराकर पितरोको तृप्र करं 
अभिके अभावमें ब्राह्मणके हाथमे अथवा जलमे या 
दिवजीके स्थानके समीप पितरोकि निमित्त दान करे; य 
ही पितरोके लिये निर्मल स्थान हे । पितृकार्ये -दषिण 
दिडा उत्तम मानी गयी है । यज्ञोपवीतको अपस! 
अर्थात्‌ दाहिने कंधेपर करके किया हुआ तर्पण, तिकृदान 
तथा “स्वधा' के उच्चारणपूर्वक किया हुमा श्रा 
सदा पितरको तृष करते है । कुरा, उडद, साटी धान, 
(८५ गायका धी, साव" 
चावल, गायका दूध, मधु, 
अगहनीका चावल, जौ, तीनाका चावल, मग, गन्ना 


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सफेद फूरू-ये सब वस्तु पितरोको सदा ९ 





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सृष्टिखण्ड ] 


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बिल्व, मदार, धतूरा, पारिभद्राट, रूषक, भेड-बकरीका 
दूध, कोदो, दारवरट, कैथ, महुआ ओर अरूसी- ये 
सन निषिद्ध है! अपनी उन्नति चाहनेवाठे पुरुषको 
श्राद्धमे इन वस्तुओंका उपयोग कभी नहीं कएना चाहिये । 
जो भक्तिभावसे पितरोको प्रसन्न करता हे, उसे पितर भी 
सन्तुष्ट करते है । वे पुष्टि, आरोग्य, सन्तान एवे स्वर्ग 
प्रदान कसते है । पितुकार्य देवकार्यसे भी बढ़कर है; अतः 
देवताओंको तृप्र करनेसे पहर पितरोको ही सन्तुष्ट कसना 
र्ठ माना गया है । कारण, पितृगण रीघ्र ही प्रसन्न हो 
जतं है, सदा प्रिय वचन बोरते है, भक्तौपर प्रम रखते 
हे ओर उन्हे सुख देते हे । पितर पवेकि देवता ह अर्थात्‌ 
प्रत्येक पर्वपर पितरका पूजन करना उचित हे। 
हविष्पानसंज्ञक पितरोके अधिपति सूर्यदेव ही श्राद्धके 
देवता माने गये हैँ । | 

आीष्मजीने कहा-- त्रहवेत्ताओमि शष्ट 
पुरस्त्यजी ! आपके महसे यह सार विषयं सुनकर मेरी 
इसमे बड़ी भक्ति हो गयी है; अतः अब मुज श्राड्का 
समय, उसकी विधि तथा श्राद्धका स्वरू बताइये । 
श्राद्धमे कैसे ब्राह्य्णोको भोजन कराना चाहिये ? तथा 
किनको छोडना चाहिये ? श्राद्धमे दिया हुमा न 
चितरके पास कैसे परहैचता है 2 किस विधिसे श्राद्ध 
करना उचित है ? ओर वह किंस तरह उन पितरोको तृप्र 
करता हे? 

पुलस्त्यजी बोले-- राजन्‌ ! अन ओर जलसे 
अथवा दूध एवं फल-मूठ आदिसे पितरोको सन्तुष्ट 
करते हए प्रतिदिन श्राद्ध करना चाहिये । श्राद्ध तीन 
प्रकारका होता है- नित्य, नैमित्तिक ओर काम्य । पहठे 
नित्य श्रद्धका वर्णन करता हू । उसमे अर्ध्यं ओर 
आवाहनकी क्रिया नहीं होती । उसे अदैव समञ्चना 
सीमन न विश्वदेवको भाग नहीं दिया जाता । 


+ पितरों तथा श्राद्धके विभिन्न अङ्गका वर्णन * 


२७ 


पर्वके दिन जो श्राद्ध किया जाता है, उसे पार्वण कहते 
हे । पार्वण-श्राद्धमे जो ब्राह्मण निमन्वित कसेयोम्य है. 
उनका वर्णन करता ह; श्रवण कवे नो पञ्चाभ्रिका 
सेवन करनेवाला, खातकः, त्रिसौपर्णः, वेदके व्याकरण 
आदि छह अङ्गका ज्ञाता, श्रोत्रिय (वेदज्ञ)" श्रोत्रियका 
पुत्र, वेदके विधिवावर्योका विरोषज्ञ, सर्वज्ञ (सब 
विषर्योका ज्ञाता), वेदका साध्यायी, मन्त्र जपनैवाला, 
ज्ञानवान्‌, त्रिणाचिकेत , त्रिमधु२, अन्य शास्रेमिं भी 
परिनिष्ठित, पुरार्णोका विद्वान्‌ स्वाध्यायशीलः, 
ब्ाह्मणभक्त, पिताकी सेवा करनेवाला, सूर्यदेवताका 
भक्त, वैष्णव, ब्रह्मवेत्ता, योगराखका साता" शान्त, 
आत्मनज्ञ, अत्यन्त रीरुवान्‌ तथा हिवभक्तिपरायण हो, 
ेसा ब्राह्मण श्राद्धमे निमत्रण पानेका अधिकारी है 1 एेसे 
ब्राह्मणको यलपूर्वक श्राद्धमे भोजन कराना चाहिये । 
अब जो रोग श्राद्धमे वर्जनीय है, उनका वर्णन सुनो । 
पतित, पतितका पुत्र, नपुसकं, चुगकखोर ओर अत्यन्त 
रेगी- ये सब श्राद्धके समय धर्मज्ञ पुरुषोद्धाा त्याग दने 
योग्यं है । श्रद्धके पहके दिन अथवा श्राद्धके ही दिन 
विनयदील ब्राहम्ोको निमन्त्रित करे । निमन्त्रण दिय हुए 
ब्राह्मणेकि दारीरमें पितरेंका आवेशा हो जाता हे। वे 
वायुरूपसे उनके भीतर प्रवेरा करते हैँ ओर ब्राह्यणेकि 
बैठनेपर स्वयं भी उनके साथ बेटे रहते है । 

किसी रेसे स्थानको, जो दक्षिण दिशाकी ओर 
नीचा हो, गोबस्से रीपकर वहां श्राद्ध आरम्भ करे 
थवा गोदालामे या जक्के समीप श्राद्ध करे । 
आहिताभ् पुरुष पितरोके छियि चरु (स्तीर) बनाये ओर 
यह कहकर कि इससे पितरशेका श्राद्ध करूगा, वहं सन 
दक्षिण दिशामे रख दे। तदनन्तर उसमे घृत ओर मधु 
आदि मिलकर अपने सामनेकी ओर तीन निवीपस्थान 
(पिण्डदानकी वेदिँ) बनाये । उनकी लम्बाई एक निता 








९, श्रह्मेतु माम्‌ इत्यादि तीन अतुवाकीका नियमपूर्वकं अध्ययन करनेवाला त्रिसौपर्णं कहलाता हे । 


२ दवितीय कठके अन्तर्गत अर्य वान यः पवत इत्यादि तीन अलुवाकोको त्रिणाचिकेत कहते ह । उसका स्वाध्याय अर्थता 


` अनुष्ठान कलवाल पुरुष भी त्रिणाचिकेत कहकाता है। 


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३. “मधु वातां ऋतायते' इत्यादि तीनों ऋचा्ओंका पाठ ओर अः सकी नमु कहत ६ ॥ ^ वः 
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२८ 


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ओर त चार अङ्गुरुको होनी चाहिये । साथ ही 
सैरकी तीन. दवीं (कल्क) बनवावे, जो चिकनी हों 
तथा जिनमें चांदीका संसर्ग हो । उनकी लम्बाई एक-एक 
शला ` ओर आकार हाथके समान सुन्दर होना उचित 
हे। जलपात्र, कोस्यपात्र,. प्रोक्षण, समिधा, कुरा, 
तिकपात्र, उत्तम वसन, गन्ध, धूप, चन्दन-- ये सबं 
वस्तुं धीरे-धीरे दक्षिण दिङामें रखे । उस समय जनैउ 
दाहिने कंधेपर होना चाहिये । इस प्रकार सब सामान 
एकत्रित करके घरक पूर्वं गोबरसे छिपी हई पुथ्वीपर 
गोमूत्रसे मण्डल बनावे ओर अक्षत तथा फूरसहित जल 
केकर तथा जनेऊको क्रमराः बाय एवं दाहिने कंधेपर 
छोड़कर ब्राह्मणोके पैर धोये तथा बारम्बार उन्हे प्रणाम 
करे। तदनन्तर, विधिपूर्वक आचमन कराकर उन्हें 
बिदाये हए दर्भयुक्त आसनोंपर विठावे ओर उनसे 
. मन््रोच्चारण करावे । सामर्थ्यडाटी पुरुष भी देवकार्य 
(वैश्वदेव श्राद्ध) में दो ओर पितृकार्ये तीन ब्राह्यणोंको 
ही भोजन कराये अथवा दोनों श्राद्धमे एक-एक 
ब्राह्मणको ही जिमाये । विद्वान्‌ पुरुषको श्राद्धमे अधिक 
विस्तार नहीं करना चाहिये । पहले विश्वेदेव-सम्बन्धी 
ओर फिर पितु-सम्बन्धी विद्वान्‌ ब्राह्य्णोकी अर्घ्य आदिसे 
विधिवत्‌ पूजा करे तथा उनकी आज्ञा ठेकर अभिमें 
यथाविधि हवन करे । विदान्‌ पुरुष गृह्यसूत्रे बतायी हुई 
 विधिके अनुसार घृतयुक्तं चरुका अग्रि ओर सोमकी 
/ वृते उदरयसे समयपर हवन करे । इस मक 
/ देवताओंकी तृपति कर्के वह श्राद्धकर्ता शर्ट ब्राह्मण 
॥ साक्षात्‌ अका स्वरूप माना जाता है। देवताके 
























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* अर्चयस्व हषीकेदां यदीच्छसि परं पदम्‌ + 


८.४... 1.4... 1.1. 1.2.1.1.1.1217 . 8.1 
४.४... १ ४.१.४.१.१.२..2.1.2.1.13 4 ४.2.44... 1 1 ८... 13 
.४.४.२.॥. २५ 


आ न्क 8 
॥\ 
५ ३ 
| 
४ 
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.४..२.६.. 1 ५ .६.४.2.4.2.1. 1.2 ।.४.4.6.; 


कई पिण्ड बनावे ओर एक-एक हि ह 
रेकर तिक ओर => प ण्डक दाहिने हाथमे 


र जलरूके सा 
चाहिये । संकल्पके समय अ स 
नायं हाथकी सहायतासे दायें हाथमे ढाल न र: 
ध ना चाहिये । 
श्राद्धकार्मे पूर्णं॒प्रयलके साथ अपने मन ओर 
इन्दरयोको कालूमे रखे ओर मात्सर्यका त्याग कर दे। 
[पिण्डदानकी विधि इस प्रकार है-] पिण्ड देनेके 
लिये बनायी हुई वेदियोपर यलनपूर्वक रेखा बनावे । इसके 
बाद अवनेजन-पात्रम जर लेकर उसे रेखाङ्कित वेदीपर 
गिरावे। [यह अवनेजन अर्थात्‌ स्थान-रोधनकी क्रिया 
हे ।] फिर दक्षिणाभिमुख होकर वेदीपर कुदा बिछछावे 
ओर एक-एक करके सब पिण्डोंको क्रमाः उन कुरोपर 
रखे । उस समय [पिता-पितामह आदिमेसे जिस-जिसके 
उद्ेरयसे पिण्ड दिया जाता हो, उस-उस] पितरके 
नाम-गोत्र आदिका उच्चारण करते हुए संकल्प पटना 
चाहिये । पिण्डदानके पश्चात्‌ अपने दायें हाथको 
पिण्डाधारभूत कुंडोंपर पोना चाहिये । यह 
ठेपभागभोजी पितरोंका भाग है। उस समय एेसे ही 
मन््रका जप अर्थात्‌ 'लेपभागभुजः पितरस्तृष्यन्तु 
इत्यादि वाक्योका उच्चारण करना उचित है । इसके बाद्‌ 
पुनः प्रत्यवनेजन करे अर्थात्‌ अवनेजनपात्रम जर्‌ केकर 
उससे प्रत्येक पिण्डको नहत्वे । फिर जलयुक्त पिण्डोको 
नमस्कार करके श्राद्धकल्पोक्त वेदमन्त्रोके द्वारा पिष्डोपर 


-पितरोका आवाहन करे ओर चन्दन, धूप आदि पूजन 


सामग्रियोकि द्वारा उनकी पूजा करे। तत्पश्चात्‌ 
आहवनीयादि अब्ियोके प्रतिनिधिभूत एक-एक 
ब्राह्मणको जकके साथ एक-एक दर्वी प्रदान करे । फिर 
विद्धान्‌ पुरुष पितरोकि उदेङ्यसे पिण्डकि ऊपर कुरा रखे 
तथा पितरेका विसर्जन करे। तदनन्तर, क्रमरा सभी 
पिष्डोमिसे थोड़ा-थोड़ा अंडा निकारुकर सबको एकत 
करे ओर ब्राह्मणको यलपूर्वक पहले वही भोजन न 


क्कि उन पिण्डका अदा ्राह्मणलोग हौ भोजन 








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सृष्टिखण्ड ] 


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है । इसीख््यि अमावास्याके दिन कयि हुए पार्वण 
श्रद्धको 'अन्वाहार्य' कहा गया है । पहले अपने हाथमे 
पवित्रीसहित तिर ओर जरु केकर पिण्डोके आगे छोड 
दे ओर कहे- “एषां स्वधा अस्तुः (ये पिण्ड सवधा- 
स्वरूप हो जार्यै) । इसके बाद परम पवित्र ओर उत्तम 
अन्न परोसकर उसकी प्ररोसा करते हुए उन ब्राह्मणोको 
भोजन करावे । उस समय भगवान्‌ श्रीनारायणका स्मरण 
करता रहे ओर क्रोधी स्वभावको सर्वथा त्याग दे। 
ब्राह्यणोको त्च जानकर विकिरान्न दान करे; यह सब 
वणेकि लिये उचित है । विकिरान्न-दानकी विधि यह हे । 
तिलसंहित अन्न ओर जल केकर उसे कुशाके ऊपर 
पृथ्वीपर रख दे । जब ब्राह्मण आचमन कर ठतो पुनः 
चिष्टोपर ज गिरावे । पूर, अक्षत, जर छोड़ना ओर 
सखधावाचन आदि सारा कार्य पिण्डके ऊपर करे ।' पह 
देवश्राद्धकी समाप्ति करके फिर पितृश्ाद्धकी समपि करे, 
अन्यथा श्राद्धका नाडा हो जाता है। इसके नाद 
नतमस्तक होकर ब्राह्यर्णोकी प्रदक्षिणा करके उनका 
विसर्जन करे । 
यह आहिताग्नि पुरुषेकि खयि अन्वाहार्य पार्वणं 
श्राद्ध बतलाया गया । अमावास्याके पर्वपर किये जानेके 
कारण यह पार्वण कहलाता है । यही नैमित्तिक श्राद्ध हे 1 
शरा्धके पिण्ड गाय या बकरीको खिला दे अथवा 
ब्राह्मणको दे दे अथवा अग्रि या जलमें छोड दे। यह 
भी न हो तो खेतमें बिखेर दे अथवा जरूकी धारमे बहा 
दे। [सन्तानकी इच्छा रखनेवाली] पली विनीत भावसे 
आकर मध्यम अथीत्‌ पितामहके पिण्डक ग्रहण करे 
ओर उसे खा जाय । उस समय आधत्त पितरो गर्भम 
इत्यादि म्रका उच्चारण करना चाहिये । श्राद्ध ओर 
पिण्डदान आदिकी स्थिति तभीतक रहती है, जबतक 
जाह्मणोका विसर्जन नहीं हो जाता । इनके विसर्जनके 
पञ्चात्‌ पितृकार्यं समाक्च हो जाता है । उसके नाद 
बलिवैश्वदेव करना चाहिये । तदनन्तर अपने बन्धु- 
बान्धवेकि साथ पितरोद्वारा सेवित प्रसादस्वरूप अन्न 
भजन करे । श्रद्ध कलेवारे यजमान तथा श्रद्धभोजी 
, ब्राह्मण दोनोको उचित है कि वे दुबारा भोजन न कर 


„. पितरों तथा आ्रद्धके विभिन्न अङ्गका वर्णन + २९ 


राह न चङे, मैथुन न क साथ ही. उस दिन स्वाध्या * 
कलह ओर दिनमे ₹ायन--इन सबको सर्वथा त्याग दे। 
इस विधिसे किया हुआ श्राद्ध ध्म, अर्थ.ओर काम-- 
तीनकी सिद्धि करनेवाला होता हे । कन्या, कुम्न ओर 
वृष रारिपर सूर्यके रहते कृष्णपक्षमें प्रतिदिन श्राद्ध कलना 
चाहिये । जह -जहां सपिण्डीकरणरूप श्राद्ध करना हो, 
वहाँ अग्निहोत्र कसनेवारे पुरुषको सदा इसी विधिसे 
करना चहिये । = 

अन मैं ब्रह्माजीके बताये हुए साधारण श्रा्क 
वर्णन करगा, जो भोग ओर मोक्षरूप फर त्रदान 
कसेवाला है। उत्तरायण ओर दक्षिणायनके प्रारम्भके 
दिन, विषुव नामक योग (तुला ओर मेषकी संक्रान्ति) 
ने [जब कि दिन ओर रात बाबर होते 1, भ्रव्यक 
अमावास्याको, ्रतिसंक्ान्तिके दिन, अष्टका (पौष, 
माघ फाल्गुन तथा आश्विन मासके कृष्णपश्षकी अष्टमी 
तिथि) मे, पूर्णिमाको, आद्र, मघा ओर रोहिणी--इन 
नक्षत्रम, आद्धके योग्य उत्तम पदार्थ ओर सुपात्र 
ब्राह्मणके प्राप्त होनेपर, व्यतीपात, विष्टि ओर वैधृति 
योगके दिन, वैदाखकी तुतीयाको, कार्तिककी नवमीको, 
माघकी पूर्णिमा तथा भाद्रपदकी ्रयोदी तिथिकी भी 
श्राद्धका अनुष्ठान करना चाहिये 1 उपर्युक्तं तिथियों 
युगादि कहती है । ये पितरोका उपकार करनेवाटी दै । 
इसी प्रकार मन्वन्तरादि तिथिर्योमिं भी विदान्‌. पुरुष 
्राद्धका अनुष्ठान करे । आश्विन शुषा नवमी, कार्तिक ` 
हहा द्राद्री, चैत्र तथा भाद्रपदकी - राङ्खा तृतीया, 
फाल्गुनकी अमावास्या, पौषकी राङ्खा एकादरी, आपाद 
शषा दामी, माघ रुषा सप्तमी, श्रावण कृष्णा अष्टमी, 
आषाद्‌, का्िक, फाल्गुन ओर च्येष्ठकी पूरणिमा--इन 
तिथिर्योको मन्वन्तरादि कहते है । ये दिये हए दानकी 
अक्षय कर देनेवाली है । विज्ञ पुरुषको चाहिये कि 
अवसरपर ओर महाकय (आश्विन कृष्णपक्ष) मे तीथ 
मन्दिर, गोराल, द्वीप, उद्यान तथा घर आदिमे छ्षि-पुते 





एकान्त स्थानमें श्राद्ध करे! . . 






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उनको पूजा करे। [विशेदेवोके दो आसन होते हैः 
एकपर पिता-पितामहादिसम्बन्धी विश्ेदेवोंका आवाहन 
होता है ओर दूसरेषर मातामहादिसम्बन्धी विशचदेवोंका । ] 
उनके छियि दो अर्घ्य-पात्र (सिकोरे या दोन) जौ ओर 
जक आदिसे भर दे ओर उन्हें कुडाकी पवित्रीपर रखे । 
"ङशान्नोदेवीरभीष्टये' इत्यादि मन्त्रसे जल तथा 


"यवोऽसि-" इत्यादिके द्वारा जके दोनोंको उन पात्रोमें 
छोड़ना चाहिये । फिर गन्धपुष्प आदिसे पूजा करके वहां 
/ . विशदेवोकी स्थापना करे ओर "विश्वे देवास" --इत्यादि फिर इस प्रकार कठे-- “पितृन्‌ आवाहयिष्यामि' 

। दो मन्त्रोसे विशदे्वोका आवाहन करके उनके ऊपर जौ “पितरोका आवाहन करूगा ।' तब निमन्त्रणमें आये च 
| छोडे। जो छोड़ते समय इस प्रकार कहे- “जौ तुम ब्राह्मण तथास्तु कहकर श्राद्धकर्ताको आवाहनके लिये 


| 
॥ 
॥ 
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| 
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सन अन्नोके राजा हो । तुम्हारे देवता वरुण है -वरुणसे 
ही तुम्हारी उत्पत्ति हुई हे; तुम्हारे अंदर मधुका मेर है । 
तुम सम्पूर्ण पापको दूर करनेवाले, पवित्र एवं मुनियोद्रारा 
प्रहसित अन्न हो # फिर अर्ध्यपात्रको चन्दन ओर 
फूलेसे सजाकर “या दिव्या आपः-इस मन्त्रको पटृते 
हए विश्वदेवोको अर्ध्यं दे । इसके बाद उनकी पूजा करके 
गन्ध आदि निवेदन कर पितुयज्ञ (पितृश्राद्ध) आरम्भ 
करे । पहके पिता आदिके छ्य कुङडाके तीन आसनोकी 
कल्पना करके फिर तीन अर्व्यपात्रोका पूजन करे- उन्हें 


पुष्य आदिसे सजावे। भत्येक अर्घ्यपात्रको कुडाकी 


'पवित्रीसे युक्त करके “डान्नोदेवीरभीष्टये--" इस मन्त्रसे 


| _ सनम जक छोड़ । फिर "तिलोऽसि स्रोमदेवत्यो--' इस 
॥ मन््रसे तिरु छोडकर [बिना मन्त्रके ही] चन्दन ओर 
॥ पुष्य अदि :भी छोडे। अर््यपात्र पीपर आदिकी 
। खकड़ीका, पततेका या चांदीका बनवावे अथवा समुद्रसे 











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| पिण्डोपर 
चादीका ही पात्र उत्तम माना न | । चोरी 
नान्‌ श्रीशङ्करके नत्रसे प्रकट हुई है, इसि 
पितरोको अधिक प्रिय है। | १ 
इस प्रकार उपर्युक्त वस्तुओेंसे 
उसके अर्घ्यपात्र बनाकर उन्हे ऊपर कव 
तिरु ओर गन्ध-पुष्प आदिसे सुसञ्नित करे; तत्प 
या दिव्या आपः" इस मन्त्रको पठ़कर पिताके नाम ओर 
गोत्र आदिका उच्चारण करके अपने हाथमे कुडा ङे .ले। 


आज्ञा प्रदान करं । इस प्रकार ब्राह्यणोकी अनुमति केकर 
'उङान्तस्त्वा निधीमहि--' “आयन्तुनः पितरः-' इन 
दो ऋचाओंका पाठ करते हुए वह पितरोका आवाहन 
करे। तदनन्तर, "या दिव्या आपः- इस मन्रसे 
पितरोको अर्घ्यं देकर प्रत्येकके खयि गन्ध-पुष्प आदि 
पूजोपचार एवे वख चावे तथा पुथक्‌-पुथक्‌ संकल्प 
पटठकर उन्हं समर्पित करे। [अर््यदानकी प्रक्रिया इस 
ग्रकार है--] पहले अनुखोमक्रमसे अर्थात्‌ पिताके 
उद्यसे दिये हए अर््यपात्रका जल पितामहके 
अर्घ्यपात्रमे डा ओर फिर पितामहके अर्ध्यपात्रका सारा 
जल प्रपितामहके अर््यपात्रमे डाल दे, फिर 
विलोमक्रमसे अर्थात्‌ प्रपितामहके अर््यपात्रक 
पितामहके अर्घ्यपात्रमे रखे ओर उन दोनों पात्रको 
उठाकर पिताके. अर्ध्यपात्रमे स्खे। इस प्रकार तीनो 
अर्घ्यपात्रोको एक-दूसरेके ऊपर करके पिताके आसनके 
उत्तरभागे “पितृभ्यः स्थानमसि' एेसा कहकर उन 
दुलका दे--उरुटकर रख दे। रेखा करके अन 
परोसनेका कार्य करे। ` 

परोसनेके समय भी पहके अग्निकार्य करना 
अर्थात्‌ थोड़ा-सा अन्न निकाकर “अभ्रये श 
स्वाहा" ओर “सोमाय पितृमते स्वाहा --ई दो 


चाहिये 


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सुष्टिखण्ड ] 


* पितरों तथा श्राद्धके विभिन्न अङ्गका वर्णन *# 


2९ 


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अभि ओर सोम देवताके स्यि अभिमें दो नार आहति 
डाले । इसके बाद दोनों हार्थोसे अन्न निकाककर परोसे । 
परोसते समय “उदहान्तस्त्वा निधीमहि--' इत्यादि 
मन्रका उच्चारण करता रहे । उत्तम, गुणकारी राक आदिः 
तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदा्थेकि साथ दही, दुघ, 
गौका घृत ओर राक्र आदिसे युक्त अन्न पितरोके लिय 
तृधिकारक होता है। मधु मिलाकर तैयार किया हुआ 
कोई भी पदार्थं तथा गायका दूध ओर घी मिकायी हई 
खीर आदि पितरोके छ्ियि दी जाय तो वह अक्षय होती 
डे एेसा आदि देवता पितरोनि स्वयं अपने ही मुखसे 
कहा है, इस प्रकार अन्न परोसकर पितुसम्बन्धी 
ऋचाओंका पाठ सुनावे । इसके सिवा सभी तरहके 
पुराण; ब्रह्म, विष्णु, सूर्य ओर रुद्र-सम्बन्धी भोति- 
भतिके स्तोत्र; इन्द्र, रुद्र॒ ओर सोमदेवताके सूक्त; 
पावमानी ऋचार्ै; बृहद्रथन्तरः ज्येष्ठसामका गौरवगानः 
जान्तिकाध्याय, मधुव्राह्यण, मण्डलब्राह्मण तथा ओर भी 
जो कुछ ब्राह्मणको तथा अपनेको प्रिय ठगे वह सब 
सुनाना चाहिये । महाभारतका भी पाठ करना चाहिये; 
क्योकि वह पितरंको अत्यन्त प्रिय ह । ब्राह्मणोके भोजन 
कर लेनेपर जो अन्न ओर जल आदि रोष रहे, उसे उनके 
गे जमीनपर बिखेर दे । यह उन जीर्वाका भाग है, जो 
संस्कार आदिसे हीन होनेके कारण अधम गतिको प्रप्र 
हए ह । 
्रहय्णोको तृप्र जानकर उन्हं हाथ-रमुह धोनेके लिय 
जल अदान करर । इसके बाद गायके गोबर ओर गोमूत्रसे 
छिपी हई भूमिपर दक्षिणाग्र कुरा बिछाकर उनके ऊपर 
यपूर्वक पितुयज्ञकी भति विधिवत्‌ पिण्डदान करे । 
पिण्डदानके पह पितरोके नाम-गोत्रका उच्चारण करके 
उन्हं अवनेजनके स्यि ज देना चाहिये 1 फिर पिण्ड 
देनैके बाद पिण्डपर प्रत्यवनेजनका जरु गिराकर उन 


` पुष्प आदि चढाना चाहिये। सव्यापसव्यका विचार 


करके अ्त्येक कार्यका सम्पादन कसना उचित हे 1 पिताके 
श्रद्धकी भोति माताका श्रा भी हाथमे कुडा ठेकर 
विधिवत्‌ सम्पन्न करे । दीप जलवे; पुष्प आदिसे पूजा 


ठरे । ब्राह्मणेकि आचमन कर लेनेषर स्वयं भी आचमन 


करके एक-एक बार सबको जरू दे । फिर फूट ओर 
अक्षत देकर तिकसहित अक्ष्योदक दान करे। फिर 
नाम ओर गोत्रका उच्चारण करते हुए दाक्तिके अनुसार 
दक्षिणा दे। गौ, भूमि, सोना, वन ओर अच्छे-अच्छे 
बिदछौने दे। कृपणता छोड़कर पितर्यँकी प्रसन्नताका 
सम्पादन करते हए जो-जो वस्तु ब्राह्य्णोको, अपनेको 
तथा पिताको भी भ्रिय हो, वही-वही वस्तु दान करे । 
तत्पश्चात्‌ स्धावाचन करके विश्चेदेर्वोको जल अर्पण करे 
जर बाह्मणोसे आदीवीद ठे । विद्वान्‌ पुरुष पूर्वाभिमुखं 
होकर कहे-“अधोराः पितरः सन्तु (मेरे पितर शान्त 
एवं मङ्गलमय हो) ।' यजमानके एेखा कहनेपर ब्राह्यण- 
लोग "तथा सन्तु (तुम्हारे पितर पसे ही हौ). - प्सा 
कहकर अनुमोदन कर । फिर श्राद्धकती कहे-- “गोत्रे नो 
वर्धताम्‌" (हमारा गोत्र बद) । यह सुनकर ब्राह्य्णोको 
"तथास्तु (रसा ही हो) इस भ्रकार उत्तर देना चाहिये 1 
फिर यजमान कहे-“दातारो सेऽभिवर्धन्ताम' “वेदाः 
सन्ततिरेव च-एताः सत्या आरिषः सन्तु (मेरे दाता 
बहे, साथ ही मेरे कुरे वेदोके अध्ययन ओर सुयोम्य 
सन्तानकी वृद्धि हो--ये सरे आरीर्वाद सत्य हो) ' । 
यह सुनकर ब्राह्मण करं - सन्तु सत्या आदिषः (ये 
आज्ञीवीद सत्य हो) ' । इसके बाद भक्तिपूर्तैक पिण्टोको 
उठाकर सधे ओर स्वस्तिवाचन करे । फिर भाई बन्धु 
अर सख्ी-पुत्रके साथ प्रदक्षिणा करके आठ पग चे 1 
तदनन्तर लौटकर प्रणाम करे । इस प्रकार श्राद्धकी विधि 
पूरी करके मन्त्रवेत्ता पुरुष अभि भ्रज्वर्त करसनेके पश्चात्‌ 
लल्छिवैश्वदेव तथा नैत्यक बक अर्पण करे। तदनन्तर 
भृत्य, पुत्र, बन्धव तथा अतिथियेकि साथ बैठकर वही 
अन्न भोजन करे, जो पितेको अर्षण किया गया हो । 
जिसका यज्ञोपवीत नहीं हआ हे, पसा पुरुष भी इस 
श्राद्धको अ्येक पर्वपर कर सकता दे । इसे साधारण 
[या नैमित्तिक] श्राद्ध - कहते  है। यह सम्भू 
कामनाओंको पूर्णं करनेवारा है 1 रजन्‌ \ सीरत या 
विधिसे श्राद्ध -कर सकता है; अन्तर इतना ही हे कि वह 


















। डे र श अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि 

| + 1 

| पर पदम्‌ * 

॥ न | 

+ ४.४... ` ॥.१.2.2.. ` 

31.44.44... 8.4.42... 1.1. क कच 

| क 4.2.11 (ककर 


तीसरा अर्थात्‌ काम्य श्राद्ध आभ्युदयिक है इसे 
वृद्धिश्राद्ध , भी कहते हैँ । उत्सव ओर आनन्दके 


1 ऋ न चि ‡ 


| अवसरपर, संस्कारके समय, यज्ञम तथा विवाह आदि 
| माङ्गलिक कायमिं यह श्राद्ध किया जाता है । इसमें पह 
। माताओंकी अर्थात्‌ माता, पितामही ओर प्रपितामहीकी 
॑ पूजा होती हे । इनके नाद पितरो- पिता, पितामह ओर 
।  अपितामहका पूजन किया जाता है। अन्तमे मातामह 
| आदिकी पूजा होती है । अन्य श्राद्धकी भाँति इसमे भी 
| विशदेवोकी पूजा आवङयक है । दक्षिणावर्तक क्रमसे 


ऋ 2. 


पूजोषचार चढाना चाहिये । आभ्युदयिक श्राद्धमे दही 
अक्षत, फल ओर जरसे ही पुर्वाभिमुख होकर पितरोको 


[क क त) क [व यि त व, म म 
केन वयि [व (शि ति 
नः क ~ ॐ । 
। 





पुलस्त्यजी कहते ह राजन्‌ ! अब मैं एकोद्दिष्ट 
श्राद्धका वर्णन करूगा, जिसे पुर्वकारूमे ब्रह्याजीने 
। लतलाया था। साथ ही यह भी बताऊगा कि पिताके 
॥ + मरनेपर पुत्रको किस प्रकार अरोचका पालन करना 
। चाहिये । ब्राह्मणों मरणारौच दस दिनतक रखनेकी 
। आज्ञा है, क्षत्रियोमिं नारह दिन, वैरयोमं पेद्रह दिन तथा 
॥ द्रम एक महीनेका विधान है । यह अडोच सपिण्ड 
॥ (सात पीदीतक) के प्रत्येक मनुष्यपर खरग होता ह । 
¢ यदि किसी बार्ककी मृत्यु चूडाकरणके पहले हो जाय 
॥ तो उसका अरोच एक रातका कहा गया है । उसके बाद 
















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४ ^ {# च 
+ शि. २ + न क १ #) वि १) 
1, ‡ \* > १५ ॥ [क ् १ ४ १८२ 
ह नः १.५ > ~ च ध 
¦ ` उपनयनके 2 9. द. अरीच रहता त 
~ र ॥ 1 | 
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क, „५ > 9, द (१ । अ ह्‌ | | 
"१११ चि (र) ४ [# ^ 
ष्‌ ५ > ^, ८1 
५५ 


॥ 2 (+ 1 १३ च. 
| | न्दू ~ = त + र १८ ~ 4. 
(4. (+ 1-41-१2 । 
3. श = 1 "2. भरी 
नं न, + ५ 3 ५ न क \ 2 ॐ “ 
¶ ह्च + * 
६ ~: गौचमे भी सब वणेकि यही व्यवस्था हे। 
५ ॥ ५ शन्न 
भ 9 ६ ।\ ग त (य 
4 (क नन "२ प, ८५ ( <५.-य ए न, १ "०५ 
0 | ; ~ अ ५ ~ (वदो ~+ १» 4५ 
~ द ९ ५ १ 4२ सञ्चयनके = 5 - 
~ १ त 2> ~ क, बे 
~ > भ 
र (- न ध । : [= । 4 | 0 ) पुरुषके सारीरका रतग 
= रं चः २ क = | १. 9 च (- > ° क ध र #॥ 
दः । १74 च " "क 4२९ | >. 
ऋ + 1 क ‡ -4 प । । म क = ॥ 
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या जाता हे, तबतक वह घरपर ही रहता 










बाद दही प्रेतको 


पिण्डदान दिया जाता है । सम्पन्नम्‌! का उच्चारण 
अर्घ्य क ओर पिण्डदान देना चाहिये। इसमे 
बराह्मणोको अर्घ्य दान दे तथा सुगर (सपलीक) 


ब्राह्यर्णोकी ही वतन ओर सुवर्णं आदिके दरार पूजा क | 


तिका काम जौसे लेना चाहिये तथा सारा कार्य 


करना चाहिये । श्रेष्ठ ब्राह्मणोकि द्वारा सब प्रकारके ` 
मर्गरपाठ करावे । इस प्रकार दद्र भी कर सकता है। ` 


यह वृद्धिश्राद्ध सबके छ्य सामान्य हे। 


पित्रे नमः' इत्यादि नमस्कार-मन््रके दवारा ह दान आदि ` 


कार्य करे । भगवानका कथन है कि दुद्रके खयि दान ही 
प्रधान है; वर्योकि दानसे उसकी समस्त कामना पर्णं हो 
जाती हेँ। 


=== + == 
एकोदिष्ट आदि ्रद्धोंकी विधि तथा श्राद्धोपयोगी तीर्था वर्णन 


जाद ग्यारहवें दिनि, जब कि सूतक निवृत्त हो जाता है 


अपने गोत्रके ग्यारह ब्राह्यणोको ही बुखाकर भोजन ¦ 


कराना चाहिये । अरोचकी समाधिके दूसरे दिन एकोदष्ट 
श्राद्ध करे । इसमें न तो आवाहन होता है न अग्मोकरण 
(अिमें हवन) । विश्वेदेवोका पूजन आदि भी नही 
होता । एक ही पवित्री, एक ही अर्ध ओर एक ही पिण्ड 
देनेका विधान है। अर्धं ओर पिण्ड आदि देते समय 


प्रेतका नाम लेकर *तवोपतिष्ठताम', (तुम्हं प्राप्त हो), 


ठेसा कहना चाहिये । तत्पश्चात्‌ तिरु ओर जक छोड्ना 
चाहिये । अपने किये हुए दानका जल ब्राह्मणके हाथमे 
देना चाहिये तथा विसर्जनके समय “अभिरम्यताम्‌ 
कहना चाहिये । दोष कार्य अन्य श्रा्धोकी ही भाति 
जानना चाहिये । उस दिन विधिपूर्वक राय्यादान्‌, फर 

वखरसमन्वित काञ्चनपुरुषकी पूजा तथा द्रिज-दम्पतिका 


पूजन भीं करना आवहयक हे । 
एकाददाह श्राद्धमे कभी भोजन नहीं करा 


करा 
चाहिये । यदि भोजन कर ठे तो चाद््रायण त्रत 
उचित है । सुयोग्य पुत्रको पिताकी भक्तिसे प्रेरित होक 








केके ` 


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। म ल्ियि ~ & आाकारार्मे ; क्ररना चाहिये 
ये कामे सदा ही एकोदिष्ट श्राद्ध ५ 
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सुष्टिखण्ड 1 


साथ तिरु ओर जरसे भर हुआ घडा दान कसा 
चाहिये । [इसीको कुम्भदान कहते हँ ।] तदनन्तर, वर्ष 
पुरा होनेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध होना चाहिये । 
सपिण्डीकरणके बाद प्रेत [प्रेतत्वसे मुक्तं होकर] 
पार्वणश्राद्धका अधिकारी होता हे तथा गृहस्थके वृद्धि- 
सम्बन्धी कारयेमि आभ्युदयिक श्राद्धका भागी होता हे । 
सपिण्डीकरण श्राद्ध देवश्राद्धपूर्वक करना चाहिये अ्थीत्‌ 
उसमे पहर विशेदेवोकी, फिर पितरोकी पूजा होती हे । 
सपिषण्डीकरणमे जब पितरोका आवाहन करे तो प्रेतका 
आसन उनसे अलग स्खे। फिर चन्दन, जर ओर 
तिकसे युक्त चार अर््यपात्र॒ बनावे तथा प्रेतके 
। अर््यपात्रका जल तीन भागोमें विभक्त करके पितरोके 
अर््य-पात्रमि डाठे। इसी प्रकार पिण्डदान करनेवाला 
पुरुष चार पिण्ड बनाकर “ये समानाः -इत्यादि दो 
मन्त्रके द्वारा ग्रेतके पिण्डको तीन भागो विभक्त करे 
[ओर एक-एक भागको पितरोके तीन पिष्डमं मिला 
दे] । इसी विधिसे पहके अर्घ्यको ओर फिर पिरण्टोको 
सङ्कल्पपूर्वक समर्पित करे । तदनन्तर, वहं चतुर्थं व्यक्ति 
अर्थात्‌ प्रेत पितरकी श्रेणीमे सम्मिकित हो जाता है ओर 
अभ्निखात्त आदि पितरोके बीचमें बैठकर उत्तम अमृतका 
उपभोग करता है । इसछ्यि सपिण्डीकरण श्राद्धके नाद 
उस (प्रेत) को पृथक्‌ कुछ नहीं दिया जाता । पितरोमे 
ही उसका भाग भी देना चाहिये तथा उन्हीकि पिण्डोमि 
स्थित होकर वह अपना भाग ग्रहण करता है । तबसे 
लेकर जब-जब संक्रान्ति ओर ग्रहण आदि पर्व आवे 
तब-तब तीन पिण्डका ही श्राद्ध कसना चाहिये । केवर 
म॒त्यु-तिथिको केवल उसीके खयि एकोरिष्ट श्राद्ध करना 
उचित है। पिताके क्षयाहके दिन जो एकषष्ट नही 
करता, वह सदाके स्यि पिताका हत्यारा ओर भाईका 
विनाहा करनेवाला माना गया है । क्षयाह-तिथिको 
[एकोच्ष्टि न करके] पार्वणश्राद्ध कवार मनुष्य 
नरकगामी होता है। मृत व्यक्तिको जिस प्रकार 
्रतयोनिसे छुटकारा मिके ओर उसे स्वगादि उततम 


९. कथे अंके दवाय श्राद्ध । 


* एकोदिष्ट आदि श्राद्धोकी विधि तथा ्रद्धोपयोगी तीर्थोका वर्णन * 


ऋ 


2२ 


लोकोकी भाप्षि हो, इसके छियि विधिपूर्वक आमश्राद्धः 
करना चाहिये । कचे अन्नसे ही अग्नोकरणकी क्रिया करे 
ञौर उसीसे पिण्ड भी दे । पह या तीसरे महीनेमं भी 
जब मृत व्यक्तिका पिता आदि तीन पुरुषोकि साथ 
सपिण्डीकरण हो जाता है, तन प्रेतत्वके बन्धनसे उसकी 
मुक्ति हो जाती दै । मुक्तं होनेपर उससे केकर तीन 
पीदीतकके पितर सपिण्ड कराते हँ तथा चौथा 
सपिण्डकी श्रेणीसे निकलूकर केपभागी हो जाता है । 
कुरामें हाथ पोछनेसे जो अरा प्राप्त होता है, वही उसके 
उपभोगे आता है । पिता, पितामह ओर प्रपितामह-- ये 
तीन पिण्डभागी होते है; ओर इनसे ऊपर चतुर्थ व्यक्ति 
अर्थात्‌ वद्धभपितामहसे ठेकर तीन पीढीतकके पूर्तज 
ऊेपभागभोजी माने जाते है । [छः तो ये हुए,1 इनमें 
सातवाँ है खयं पिण्ड देनेवाला पुरुष । ये ही सात पुरुष 
सपिण्ड कहलाते हँ । 

भीष्मजीने पूछा-- ब्रह्मन्‌ ! हव्य ओर कलव्यका 
दान मर्ष्योको किस प्रकार कएना चाहिये पितृलोके 
उन्हे कौन ग्रहण करते है ? यदि इस मर्त्यलोकमे ब्राह्मण 
द्धक अन्नको खा जाते है अथवा अग्निम उसका हवन 
कर दिया जाता है तो शुभ ओर अशुभ योनिर्योमिं पड़ हुए 
तरेत उस अन्नको कैसे खाते हँ--उन्हं वह किस प्रकारः 
मिरु पाता है? 

पुलसत्यजी बोले- राजन्‌! पिता वसुके, 
पितामह रुद्रके तथा प्रपितामह आदित्यके खरूप 
है रेसी वेदकी श्रुति है । पितरोके नाम ओर गोत्र ही 
उनके पास हव्य ओर कव्य पर्हैचानेवाे हें । मनकी 
क्ति तथा हदयकी भक्तिसे श्राद्धका सार-भाग पितरको 
प्राप्त होता है । अभिघ्रात्त आदि दिव्य पितर पिता-पितामह 
आदिके अधिपति है वे ही उनके पास श्राद्धका अन्न 
प्हचानेकी व्यवस्था कसते है । पितरोमसे जो ोग करीं 















गोत्र तथा देरा आदि तो होते ही 


उनका ज्ञान होता है ओर वे 


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| दिया हुआ सब सामान म्राणियोके पासं पहुंचकर उन्हे धाममें 
जाता हे । कोकामुख 
तृप्त करता हे । यदि रुभ कमेकि योगसे पिता ओर माता तीर्थं हे । यह इनद्रलोकका मी | न 4 सक भधान 
।  दिव्ययोनिको प्रास हुए हों तो श्राद्धमे दिया हुआ अन्न पितृतीर्थका दर्शनं होता है। वहं हो भी बहयाजीके ` 
| अमृत होकर उस अवस्थामे भी उन्हे प्राप्त होता हे । वही पुष्करारण्यमें विराजमान हे । जय ह्याजी 
| अत्यन्त 


॥  दैत्ययोनिमें भोगरूपसे, प्युयोनिमें तृणरूपसे, सर्पयोनिमे उत्तम एवं मोक्षरूप फल श्दान करनेवाला ह 
वायुरूपसे तथा यक्षयोनिमें पानरूपसे उपस्थित होता है । नामके महान्‌ पुण्यमय तीर्थं सब पापका नाग कृते 

| इसी प्रकार यदि माता-पिता मनुष्य-योनिमें हों तो उन्हे वहाँ आदिपुरुष नरसिंहस्वरूप भगवान्‌ जनार्दन र . 

| अन्नपान आदि अनेक रूपमे श्राद्धान्की प्राप्ति होती है। स्थित है । इक्षुमती नामक तीरथ पितरोको सदा भ्रियहै। | 

यह श्राद्ध कर्म पुष्प कहा गया है, इसका फल है ब्रह्यकी गङ्खा ओर यमुनाके सङ्गम (प्रयाग) मे भी पितर सवि 

। गरा । राजन्‌ ! श्राद्धसे ्रसन्न हए पितर आयु, पुत्र, धन, सन्तुष्ट रहते है । कुरुक्षेत्र अत्यन्त पुण्यमय तीर्थ है। 

॥ विद्या, राज्य, लोकिक सुख, स्वर्गं तथा मोश्च भी प्रदान वहका पितु-तीर्थ सम्पूर्णं अभीष्ट फलको देनेवाल है। ¦ 

| करते हे । राजन्‌ ! नीरकण्ठ नामसे विख्यात तीर्थं भी ¦ 

` भीष्मजीने पृछा- ब्रह्मन्‌ ! श्राद्धकर्ता पुरुष यपितरोका तीर्थ है । इसी प्रकार परम पवित्र भद्रसर तीर्थ, ५ 

. दिनके किस भागमें श्राद्धका अनुष्ठान करे तथा किन॒मानसरोवर, मन्दाकिनी, अच्छोदा, विपाशा (व्यास ` 

॥  तीथमिं किया हआ श्राद्ध अधिक फल देनेवाखा नदी), पुण्यसछछिला सरस्वती, सर्वमित्रपद, महाफल- 

. होता है? दायक वैद्यनाथ, अत्यन्त पावन क्षिप्रा नदी, काकिद्चर 

। 'पुलस्त्यजी बोले-राजन्‌ ! पुष्कर नामका तीर्थं गिरि, तीथेद्धिद, हरोद्धेद, गर्भभेद, महाख्य, भद्रधर, 

; सब तीथेमिं श्रेष्ठतम माना गया है । वहाँ किया हुआ विष्णुपद्‌, नर्मदाद्रार तथा गयातीर्थ--ये सब पितृतीर्थं 

| दान, होम, [श्राद्ध] ओर जप निश्चय ही अक्षय फर दै । महर्षियोका कथन है कि इन तीर्थेमिं पिण्डदान 

अदान करनेवाला होता है। वह तीर्थं पितरों ओर करनेसे समान फलकी प्राप्ति होती है । ये स्मरण कए , 

च ` ऋषिर्योको सदा ही परम प्रिय है । इसके सिवा नन्दा, मात्रसे लोगोके सरे पाप हर ठेते है; फिर जो इनमें 

ह ` दत क्ति | तथा मायापुरी (हरिद्वार) भी पुष्करके ही समान पिण्डदान करते है, उनकी तो नात ही क्या हे । ओङ्कारः 

॥ १ उत्तम तीर्थं हे। मित्रपद ओर केदार-तीर्थं भी श्रेष्ठ हैँ । - तीर्थ, कावेरी नदी, कपिलाका जल, चण्डवेगा नदीमे 

॥ गङ्गासागर नामक ती्थको परम शुभदायक ओर मिली हुई नदियोकि सङ्गम तथा अमरकण्टक---य सब 

` ्तीर्थमय जतलाया जाता हे । ब्ह्मसर तीर्थं ओर शातद्र॒पितृतीर्थ हँ । अमरकण्टकमें किये हुए लान आदि पुण्य 

¦ सः तर्ज) नदीका जल भी दाथ है । नैमिषारण्य नामक कार्यं कुरक्ेत्रकी अपिक्षा दसगुना उत्तम फर + 

( तर्यतो सन तीका फल देनेवाला दै । वहो गोमतीमे हे । विख्यात तीर्थ एवं उतम सोमे्एतीन = 
नाल सनन लोत्‌ अकर हुम ै। ममभरण्यमे वित्र ओर समू भयको हतेन । 
मौर देवाधिदेव दाकर करने, दान देने तथा होम, स्वाध्याय, जप आर 

महादेवजीकी कसनेसे अन्य तीर्थोकी अपेक्षा कोटिगुना अधिक फट 

धर्मचक्रकी होताहै। ५ 

ज स तीथा जरः किसी त्राणे उतम भवनमे देवाधि = 













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सुष्टिखण्ड ] 


इसीलिये वह स्थान परम पुण्यमय तीर्थं बन गया । 
चर्मण्वती नदी, शुकतापी, पयोष्णी, . पयोष्णी-सङ्गम, 
महौषधी, चारणा, नागतीर्थपरवर्तिनी, पुण्यसङ्िला 
महावेणा नदी, महारा तीर्थ, गोमती, वरुणा, 
अभितीर्थ, भैरवतीर्थ, भृगुतीर्थ, गोरीतीर्थ, वैनायकतीर्थ, 
वख््रश्चरतीर्थ, पापहरतीर्थ, पावनसक्िला वेत्रवती 
(बेतवा) नदी, महारुद्रतीर्थ, महालिङ्गतीर्थ, दशार्णा, 
महानदी, ₹रातरुद्रा, राताह्वा, पितुपदपुर, अङ्गारवाहिका 
नदी, दोण (सोन) ओर घर्धर (घाघरा) नामवाङे दो 
नद, परमपावन कालिका नदी ओर शुभदायिनी पितरा 
नदी- ये समस्त पितृतीर्थं स्नान ओर दानके.ल्यि उत्तम 
माने गये है । इन तीर्थेमिं जो पिण्ड आदि दिया जाता है, 
वह अनन्त फल देनेवाल माना गया ह । रातवटा नदी, 
ज्वाला, डउारद्री नदी, श्रीकृष्णतीर्थ--द्वारकापुरी, 
उदक्सरस्वती, मारूवती नदी, गिरिकर्णिका, दक्षिण 
समुद्रके तटपर विद्यमान भूतपापती्, गोकर्णतीथ, 
गजकर्णतीर्थ, परम उत्तम चक्रनदी, श्रीदौर, राकतीर्थ, 
नारसिंहतीर्थ, महेन्द्र पर्वत॒ तथा पावनसङकिला 
महानदी- इन सब तीर्थेमिं किया हुआ श्राद्ध भी सदा 
अक्षय फल प्रदान करनेवाला माना गया है। ये 
दर्रनमात्रसे पण्य उत्पन्न करनेवाठे तथा तत्का समस्त 
पार्पोको हर लेनेवाङे हें । 

पुण्यमयी तुङ्गभद्रा, चक्ररथी, भीमेश्वरतीथ, 
कृष्णवेणा, कावेरी, अञ्जना, पावनसलिला गोदावरी, 
उत्तम त्रिसन्ध्यातीर्थं ओर समस्त ती्थेसि नमस्कृत 


त्यम्बकतीर्थ, जहोँ “भीम' नामसे प्रसिद्ध भगवान्‌ रङ्कः 


` स्वय विराजमान दै, अत्यन्त उत्तम है । इन समे दिया 


हुआ दान कोटिगुना अधिक फल देनेवाला हे । इनके 
स्मरण करनेमात्रसे पापेकि सैकड टुकड़े हो जाते है । 


` परम पावन श्रीपर्णी नदी, अत्यन्त उत्तम व्यास-तीर्थ, 


मल्यनदी, राका, रिवधारा, विख्यात भवतीर्थ, सनातन 
पुण्यतीर्थ, पुण्यमय रामेश्चरतीर्थ, वेणायु, अमरपुर, 


प्रसिद्ध सङ्गलतीर्थ, आमदरौतीर्थ, अलम्बुषतीर्थ, 
` वसत्रातिशचरतीर्थ, गोकामुखतीर्थ, गोवर्धन, हरिन 
` पुरन्दर, पृथूदक, सहखाक्ष हिरण्याक्ष, कदली नदी, 


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* एकोदिष्ट आदि श्राद्धोककी विधि तथा आद्धोपयोगी तीर्थोका वर्णन * ३५ 


व 1 क्क 1.1.1.1.1.4.1.4.11 1221... 4.4.24. 1 क 1, तः 


नामधेयतीर्थ, सौमित्रिसङ्गमतीर्थ, इन्द्रनीर, महानाद तथा 
त्रियमेकक- ये भी श्राद्धके खये अत्यन्त उत्तम माने 
गये है; इनमे सम्पूर्णं देवता्ओंका निवास बताया जाताः 
है । इन सबमें दिया हआ दान कौटिगुना अधिक फट 
देनेवाला होता है। पावन नदी बाहुदा, शुभकारी, 
सिद्धवर, पाडापततीर्थ, पर्यटिका नदी--इन सवम 
किया हुआ श्राद्ध भी सौ करोड़ गुना फल देता हे । इसी 
प्रकार पञ्चतीर्थं ओर गोदावरी नदी भी पवित्र तीर्थ हँ । 
गोदावरी दक्षिण-वाहिनी नदी है । उसके तटपर हजारो 
दिवकिद्ग॒रै। वहीं जामदगन्यतीर्थ ओर उत्तम 
मोदायतनती्थं है, जहां गोदावरी नदी भ्रतीकके भयसे 
सदा भरवाहित होती रहती हैँ । इसके सिवा हव्य-कव्य 
नामका तीर्थं भी है । वहाँ किये हए श्राद्ध, होम ओर दान 
सौ करोड गुना अधिक फर देनेवारे होते है, 
सहस्तकिङ्ग ओर राघवेश्वर नामक तीर्थका माहाल्य भी 





` रेखा ही है । वहाँ किया हु श्राद्ध अनन्तगुना फर देता 


हे । चालमरामतीर्थ, प्रसिद्ध दोणपात (सोनपत) तीर्थ, 
वैश्चानरादायतीर्थ, सारस्वततीर्थ, स्वामितीर्थ, मरूदरा 
नदी, पण्यसकिला कौरिकी, चन्द्रका, विदर्भा, वेगा, 
प्राङ्मुखा, कावेरी, उत्तरङ्गा ओर जालन्धर गिरि इन 
तीरथेमिं किया हुआ श्राद्ध अक्षय हो जाता है। 


` लेोहदण्डतीरथ, चित्रकूट, सभी स्थानेमिं गङ्गानदीके दिव्य 


एवं कल्याणमय तट, कुब्जाभ्रक, उवैरी-पुरिन्‌, 
संसारमोचन ओर ऋणमोचनतीर्थ-इनमें किया हुआ 
श्रद्ध अनन्त -हो जाता है । अडहासतीर्थ, गोतमेश्वरतीर्थ, 
वसिष्ठतीर्थ, भारततीर्थ-ब्रह्यावर्त, कुरावर्त, हंसतीथ, 
परसिद्ध पिण्डासकतीर्थ, राङ्खोद्धारतीर्थ, भाण्डेश्चरतीर्थ, 
निल्वकतीर्थ, नीरूपर्वत, सब तीर्थोका राजाधिराज 
बदरीतीर्थ, वसुधारातीर्थ, रामतीर्थ, जयन्ती, विजय तथां 
शहृतीर्थ--इनमे पिण्डदान करनेवाके पुरुष परम पदको 
पराप्त होते हे । | य 

मातृगृहतीरथ, करवीरपुर तथा सन तीर्थोका खामी 
सप्तगोदावरी नामकं तीर्थ भी अत्यन्त पावन हँ ] जिन्हे 





34: 
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4८. - 5: 








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नामको पुरी तथा राजगृह नामक वन पावन तीर्थ हे। 
वहीं च्यवन मुनिका आश्रम, पुनःपुना (पुनपुन) नदी 
ओर विषयाराधन-तीर्थ-- ये सभी पुण्यमय स्थान है । 
राजेन्द्र ! खोगोमें यह किंवदन्ती प्रचलित है कि एक 
| . समय सब मनुष्य यही कहते हुए तीर्थो ओर मन्दिरमे 
। आये थे कि "क्या हमारे कुलम कोई एेसा पुत्र उत्पन्न 
' होगा, जो गयाकी यात्रा करेगा ? जो वहाँ जायगा, वह 
॥ सात पीढीतकके पूर्वजोंको ओर सात पीदीतककी 
+ होनेवाटी सन्तानोको तार देगा।' मातामह आदिके 
। सम्बन्धे भी यह सनातन श्रुति चिरकालसे प्रसिद्ध है; वे 
कहते ह “क्या हमारे वराम एक भी एेसा पुत्र होगा, 
जो अपने पितरोकी हडर्योको ठे जाकर गङ्खामें डाले, 
खात-आठ तिस भी जल्प्रञ्जल्ि दे तथा पुष्करारण्य, 
नैमिषारण्य ओर धर्मारण्यमें पर्हैवकर भक्तिपूर्वक श्राद्ध 
ए पिण्डदान करे ?' गया क्ेत्रके भीतर जो धर्मपृष्ठ, 
 ब्रह्मसर तथा गयाडीर्षवट नामक ती्थेमिं पितरोको ` 
पिण्डदान किया जाता है, वह अक्षय होता है । जो घरपर 
श्राद्ध करके गया-तीर्थकीं यात्रा करता है, वह मार्गमे पैर 
रखते ही नरकमें पड़े हए पितरोको तुरंत स्वर्गमें पर्हैचा 
देता दै । उसके कुलम कोई प्रेत नहीं होता । गयामे 
 पिष्डदानके प्रभावसे ्रेतत्वसे छटकारा मिरु जाता हे । 
 [गयामे] एक मुनि थे, जो अपने दोनों हार्थोकि 
अग्रभागमें भरा हआ ताघ्रपात्र ठेकर आर्मोकी जडमे 
। पानी देते थ; इससे आमोंकी सिंचाई भी होती थी ओर 
/ उनके पितर भी तृप्त होते थे । इस प्रकार एक ही क्रिया 
॥ दो भ्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली हुई । गयामे पिण्डदानं 
(  जढ़कर दूसरा कोई दानं नहीं ै; वयोकि वहां एक ही 
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अन्नदानको श्रेष्ठ बत्रते है" ओर कोहं 


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यह तीर्थोका संग्रह मैने संक्षेपमे बतलाया (@ 
सतारसे तो इसे वृहस्पतिजी भी नही कह स 
मनुष्यकं तो बात ही क्या है । सत्य तीर्थ है, द्यं त 
दै, ओर इन्धियोका निग्रह भी तीर्थं है । मनोनिमहको भो 
तीथ कहा गया है । सबेरे तीन मुहूर्तं (छः घड़ी, व 
परातःकारु रहता है । उसके बाद तीन मुहूर्ततकका समय 
सर्गव कहलाता है । तत्पश्चात्‌ तीन मुदूर्ततक मध्या 
होता हे । उसके नाद्‌ उतने ही समयतक अपराह्न रहता 
हे । फिर तीन मुहूर्ततक सायाह्न होता है । सायाहृ-कालये 
श्राद्ध नहीं करना चाहिये; व्योकि वह राक्षसी वेला है 
अतः सभी कममकि छिये निन्दित है । दिनके पंद्रह मुहू 
जतलाये गये हे । उनमें आटठवां मुहूर्त, जो दोपहरके बाद्‌ 
पड़ता हे, "कुतप' कहलाता है । उस समयसे धीरि-धीरि 
सूर्यका ताप मन्द पड़ता जाता हे। वह अनन्त फल 
देनेवाला का है । उसीमें श्राद्धका आरम्भ उत्तम माना 
जाता है। खड्गपात्र, कुतप, नेपारृदेडीय कम्बल, 
सुवर्ण, कुडा, तिर तथा आटवाँ दौहित्र (पुत्रीका 
पत्र) - ये कुत्सित अर्थात्‌ पापको सन्ताप देनेवाढे हैँ 
इसख्प्यि इन आोको "कुतप' कहते हे । कुतप मुहूरतके 
बाद चार मुहूर्ततकं अर्थात्‌ कुर पांच मुहूतं स्वधा-वाचन 
(श्राद्ध) के छ्ियि उत्तम काल है । कुरा ओर काठे तिल 
भगवान्‌ श्रीविष्णुके रारीरसे उत्पन्न हए है । मनीषी 
पुरुषोनि श्राद्धका लक्षण ओर कार इसी मकार बताया 
हे । तीर्थवासि्योको तीर्थके जलमें भ्वेशा करके पितरोके 
लिये तिक ओर जलकी अञ्जलि देनी चाहिये । एक 
हाथमे कुडा ठेकर घरमे श्राद्ध करना चाहिये । यह 
तीर्थ-श्राद्धका विवरण पुण्यदायक, पवित्र, थ 
बढ़ानेवाा तथा समस्त पापका निवारण करनेवाला ॥ । 
इसे स्वयं॑ब्रह्माजीने अपने श्रीमुखसे का 
तीर्थनिवासियोको श्राद्धके समय इस अध्यायका पाः 


करना चाहिये । यह सन पारपोकी रान्तिका साधन ओर 


` दरिदरताका नाडाक हे । 








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सुषटिखण्ड ] 


* चनद्रमाकी उत्पत्ति तथा यटुवेदा एवं सहस्रार्जुनके अ्रभावका वर्णन * 
11111 ण | 
ध 3.5. 


३७ 





चन्द्रमाकी उत्पत्ति तथा यदुवेहा एवं सहस््रार्जुनके प्रभावका वर्णन 


भीष्पमजीने पृछा- समस्त रास्नोके ज्ञाता 
पुलस्त्यजी ! चन्दरवेदाकी उत्पत्ति कैसे हई ? उस 
वदाम कौन-कौन-से राजा अपनी कौर्तिका विस्तार 
करनेवारे हुए ? 
पुलस्त्यजीने कहा-राजन्‌! पूर्वकाले 
ब्रह्माजीने महर्षिं अत्रिको सृष्टिके छ्ियि आज्ञा दी । तब 
उन्होनि सृष्टिकी राक्ति प्राप्त करनेके छ्ि्यि अनुत्तर 
नामका तप किया । वे अपने मन ओर इन्द्रियोके संयममें 
तत्पर होकर परमानन्दमय ब्रह्मका चिन्तन करने ठगे | 
एक दिन महर्षिके नेत्रोसे कुछ जलकी बद टपकने ठगी, 
जो अपने प्रकारासे सम्पूर्ण चराचर जगत्कतो प्रकाशित 
कर रही थीं। दिराओं [की अधिष्ठात्री देविर्यों] ने 
खीरूपमें आकर पुत्र पानेकी इच्छासे उस जकको ग्रहण 
कर छ्िया। उनके उदस्मे वह जक गर्भरूपसे स्थित 
हुआ । दरा उसे धारण कलमे असमर्थ हो गरयीः अतः 
उन्होनि उस गर्भको त्याग दिया । तब बरह्माजीने उनके 
छोड़ हुए गर्भको एकत्रित करके उसे एक तरुण पुरुषके 
रूपमे भरकर किया, जो सब प्रकारके आयुर्धोको धारण 
करनेवाला था । फिर वे उस तरुण पुरुषको देवशक्ति- 
सम्पन्न सहसत नामक रथपर बिठाकर अपने रोके ले 
गये। तन ब्रहर्षियोनि कहा--“ये हमारे स्वामी हं 
तदनन्तर ऋषि, देवता, गन्धर्व ओर अप्सरा उनकी स्तुति 
करने लगीं । उस समय उनका तेज बहुत बढ़ गया । उस 
तेजके विस्तारसे इस पृथ्वीपर दिव्य ओषधियां उत्पन्न 
हुई । इसीसे चन्द्रमा ओषधि्योके स्वामी हुए तथा द्विजेमिं 
भी उनकी गणना हई । वे राष्पक्षमें दृते ओर 
कृष्णपक्षमे सदा क्षीण होते रहते दै । कुछ कारके नाद 
प्रचेताओकि पुत्र प्रजापति दक्षने अपनी सत्ताईस कन्यार्ण 
जो रूप ओर लावण्यसे यक्त तथा अत्यन्त तेजस्ििनी थी, 
चन्द्रमाको पलीरूपमे अर्षण की । तत्पश्चात्‌ चन्द्रमाने 
केवल श्रीविष्णके ध्यानम तत्पर होकर चिरकातक 
बडी भारी तपस्या की । इससे प्रसन्न होकर परमाला 


` „जस ब दूस कों तम न हो, वह रोको तपस्य ह अतु तपे नान करट न 


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शरीनारायणदेवने उनसे वर मंगनेको कहा । तब चनदरमाने 
यह वर मांँगा- भैं इनद्रलोकमें राजसुय यज्ञ करूगा । 
उसमे आपके साथ ही सम्पूर्णं देवता मेरे मन्दिरं प्रत्यक्ष 
प्रकट होकर यज्ञभाग ग्रहण कर । शुरधारी भगवान्‌ 
श्रीराङ्कर मेरे यज्ञकी रक्षा करे ।' “तथास्तु कहकर 
भगवान्‌ श्रीविष्णुने सख्यं ही राजसूय यज्ञका समारोह 
किया । उसमे अत्रि होता, भगु अध्वर्युं ओर ब्रह्माजी 
उदराता हए । साक्षात्‌ भगवान्‌ श्रीहरि ब्रह्मा बनकर यज्ञके 
द्रष्टा हए तथा सम्पूर्णं देवताओनि सदस्यका काम 
संभाला । यज्ञ पूर्णं होनेपर चन्द्रमाको दुभ एेधर्य 
मिला ओर वे अपनी तपस्याके प्रभावंसे सातो रोककि 
स्वामी हुए । | 

चन्द्रमासे बुधकी उत्पत्ति हई । ब्रहयर्षियोके साथ 
ब्रह्माजीने बुधको भूमण्डरूके राज्यपर अभिषिक्त करके 


, उन्हे म्रहोकी समानता प्रदान .की 1 लुधने इलाके गर्भसे 


एक धर्मात्मा पुत्र उत्न्न किया, जिसने सौसे भी अधिक 
अश्वमेघ यज्ञोका अनुष्ठान किया । वह पुरूरवाके नामसे 
विख्यात हुआ । सम्पूर्णं जगत्के रोगेनि उसके सामने 
मस्तक ज्लकाया । पुरूरवाने हिमारुयके रमणीय शिखरपर 
ब्रह्माजीकी आराधना करके ोकेधरका पद्‌ प्राप्त किया । 
वे साते द्रीपेके स्वामी हए । केरी आदि दैत्योनि उनकी 
दासता स्वीकार की । उर्वी नामकी अप्सरा उनके रूपपर 
मोहित होकर उनकी पली हो गयी । राजा पुरूरवा सम्पूर्ण 
लोकेकि हितैषी राजा थे; उन्होनि सातं द्वीप, वन, पवत 
अर काननें सहित समस्त भूमण्डरूका धर्मपूर्वक पार्न 
किया । उर्वहीने पुरूरवाके वीर्यसे आठ पुत्रको जनम 
दिया। उनके नाम ये है--आयु, दृढायु, वरयायु. 
धनायु, वृत्तिमान्‌, वसु, दिविजात ओर सुबाहु ये खभी 
दिव्य बर ओर पराक्रमसे सम्पन्न थे। इनमेंसे आयुके . 
पाँच पुत्र हृए-- नहुष, वृद्धश, रजि, दम्भ ओर 
विपाप्मा । ये पवो वीर महारथी थे 1 रजिके सौ पत्र हए, 
जो राजेयके नामसे विख्यात थे। राजन्‌ 








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३८ 


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„न कावा पापके सम्पर्कसे रहित भगवान्‌ श्रीनारायणकी 
आराधना की । इससे सन्तुष्ट होकर श्रीविष्णुने उन्हें 
वरदान दिया, जिससे रजिने देवता, असुर ओर 
मनुर्ष्योको जीत छलिया । | 

अब मैं नहुषके पुत्रका परिचय देता हूँ । उनके 
सात पुत्र हुए ओर वे सन-के-सब धर्मात्मा थे । उनके 
नाम ये है यति, ययाति, संयाति, उद्धव, पर, वियति 
ओर विद्यसाति। ये सातं अपने व॑ंडाका या बढ़ानेवाठे 
थे। उने यति कुमारावस्थामें ही वानप्रस्थ योगी हो 
, गये । ययाति राज्यका पालन करने गे । उन्होनि एकमात्र 
। धर्मकी ही इारण ठे रखी थी । दानवराज वृषपर्वा 
^ . कन्या शर्मिष्ठा तथा रदूक्राचार्यकी . पुत्री सती 
देवयानी- ये दोनों उनकी पलियां थीं । ययातिके पंच 
| पुत्र थे। देवयानीने यदु ओर तुर्वसु नामके दो पुत्रको 
( जन्म दिया तथा डार्मिष्ठाने द्रुह्य, अनु ओर पूरु नामक 
तीन पुत्र उत्पन्न किये। उनमें यदु ओर पूरु-- ये दोनों 
॥ अपने वंडाका विस्तार करनेवारे हए । यदुसे यादरवोँकी 


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| उत्पत्ति हई, जिनमे पृथ्वीका भार उतारने ओर पाण्डवोका 


( हित करनेके छियि भगवान्‌ बरूराम ओरं श्रीकृष्ण प्रकट 
ध हए हँ । युके पांच पुत्र'हए+ जो देवकुमारोके समान थे । 
उनके नाम थ--सहस्नजित्‌ क्रोष्टु, नीर, -अञ्जिक ओर 
। रघु । इनमे सहस्रजित्‌ ज्येष्ठ थे । उनके पुत्र राजा रातजित्‌ 
हुए ए । इातजितके हैहय, हय ओर उत्तारुहय--ये तीन 
॥ नामसे विख्यात हुआ 1. धर्मनेत्रके कुम्भि, कुम्भके संहत 
ओर संहतके महिष्मान्‌ नामक पुत्र हुआ । महिष्मानसे 
। वह कारुका यजा ा। भद्रसेन पत्र रज द्र 



























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६. 


अर्जुने पहके तो 
। दूसरे वके द्वारा 


चार वरदान दिये। राजाओमिं श्रेष्ठ 
अपने छ्य एक. हजार भुजा माँभी 
उन्होने यह प्रार्थना की कि “मेरे राज्यमे लोगको 

अधमकी बात सोचते हए भी मुञ्ञसे भय हो ओर वे 

अध्मके मार्गसे हट जार्यै ।' तीसरा वरदान इस प्रकार 

था-- भैं युद्धे पृथ्वीको जीतकर धर्मपूर्वक बलका 

संग्रह करू ।' चौथे वरके रूपमे उन्होनि यह माँगा विं 

संग्राममे ठ्डते-रड़ते मै अपनी अपेक्षा श्रेष्ठ वीरे 

हाथसे मारा जाऊँ / राजा अर्जुने सातो द्वीप ओर नगरोसे 
युक्तं तथा सातां समुद्रोसे धिरी हुई इस सारी पुथ्वीको 
श्ात्रधर्मके अनुसार जीत किया था। उस बुद्धिमान्‌ 
नरेडाके इच्छा करते ही हजार भुजार्णं प्रकट हो जाती थीं। 
महाबाहु अजुंनके सभी यज्ञोमें पर्याप्त दक्षिणा बाँटी जाती 
थी । सबमें सुवर्णमय यूप (स्तम्भ) ओर सोनेकी ही 
वेदियोँ बनायी जाती थीं। उन यज्ञोमें सम्पूर्णं देवता 
सज-धजकर विमानो पर बैठकर प्रत्यक्ष दर्रान देते थे। 
महाराज कार्तवीर्यने पचासी हजार वर्षोतक एकत्र राज्य 
किया । वे चक्रवर्तीं राजा थे । योगी होनेके कारण अर्जुन 
समय-समयपर मेघके रूपमे प्रकट हो वृष्टिके द्वारा 
म्रजाको सुख प्हैचाते थे । प्रत्यञ्चाके आघातसे उनकी 
भुजाओंकी त्वचा कठोर हो गयी थी । जब वे अपनी 
हजारों भुजाओकि साथ संग्राममे खड़े होते थे, उस समय 


` सहस्रं किरणसि सुरोभित शरत्कालीन सूर्ये समान 


तेजस्वी जान पडते थे । परम कान्तिमान्‌ महाराज अर्जुन 

माहिष्मतीपुरीमें निवास करते थे ओर वर्षीकालमे 

समुद्रका वेग भी रोक देते थे । उनकी हजारों भुजाओकिं 

आलोडनसे समुद्र क्षुब्ध हो उठता था ओर उस समय 

पाताङ्वासी महान्‌ असुर टटुक-छिपकर निशष्ट 

` जाते थे। 1 
करके 


एकर समयकी बात हे, वे अ 
अभिमानी रावणकी सेनासहित मूर्त ` 





[ संक्षि पद्मपुराण । 


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सुषटिखण्ड ] 


म ४ ४ 


* यदुवंङाके अन्तर्गत - आदिके वंदा तथा शओ्रीकृष्णावतारका वर्णन * 


2 ऋत --+--- र 1 





2९ 


॥.4 ॥.1 
[.६.१.1. 1.८... 1.1. 4. 4.4. 4.४.24... 4.4 1 1 11144444 





कर ली । किन्तु विधाताका बर्‌ ओर पराक्रम अद्भुत है, 
जिसके ग्रभावसे भृगुनन्दन परदुरामजीने राजा 
कार्तवीर्यकी हजारो भुजाओंको सोनेके तालवनकी भांति 
संग्राममे काट डाला । कार्तवीर्य अर्जुनके सौ पुत्र थे; 
किन्तु उनमें पांच महारथी, अखरविद्यामें निपुण, बकवान्‌, 
शर, धर्मात्मा ओर महान्‌ व्रतका पालन करनेवाङे थे। 
उनके नाम थे--शुरसेन, रुर, धृष्ट, कृष्ण॒ ओर 


जयध्वज । जयध्वजका पुत्र महाबली तारजं हआ । 
तालजङ्कके सौ पुत्र हृए, जिनकी तारुजङ्खके नामसे ही 
प्रसिद्धि हुई । उन हैहयर्वंरीय राजाओकि पाच कुठ 
हृए- वीतिहोत्र, भोज, अवन्ति, तुण्डकेर ओर विक्रान्त । 
ये सब-के-सन ताक्जङ्ख ही कहलाये । वीतिहोत्रका पुत्र 
अनन्त हआ, जो बड़ा पराक्रमी था । उसके दुर्जय नामक 
पत्र हआ, जो ₹इात्रुओंका संहार करनेवाला था । 





यदुवंशाके अन्तर्गत क्रोष्टु आदिके वडा तथा श्रीकृष्णावतारका वर्णन 


पुलस्त्यजी कहते हेँ-राजेन्द्र ! अब यदुपुत्र 
क्रोष्टके वराका, जिसमें श्रेष्ठ पुरुषोने जन्म छया था, 
वर्णन सुनो । क्रोष्टके ही कुलम वृष्णिवंहावत॑ंस भगवान्‌ 
श्रीकृष्णका अवतार हआ हे । क्रोष्टुक पुत्र महामना 
वृजिनीवान्‌ हुए । उनके पुत्रका नाम खाति था । खातिसे 
कुराङ्कका जन्म हुआ । कुराङ्कसे चित्ररथ उत्पन्न हुए, जो 
इाराविन्दु नामसे विख्यात चक्रवती राजा हए । 
इाराविन्दुके दस हजार पुत्र हुए । वे बुद्धिमान्‌, सुन्दर, 
प्रचुर वैभवशाली ओर तेजस्वी थे । उनमें भी सौ प्रधान 
थे । उन सौ पुत्रेमि भी, जिनके नामके साथ "पृथु" शाब्द 
जडा था, वे महान्‌ बरूवान्‌ थे। उनके पुरे नाम इस 
प्रकार रै पृथुश्रवा, पृथुयशा, पृथुतेजा, पृथूद्ध, 
पृथुकीतिं ओर पृथुमति । पुराणोके ज्ञाता पुरुष उन सनमे 
पृथुश्रवाको श्रेष्ठ बतलते हँ । पृथुश्रवासे उशना नामकं 
पुत्र.हुआ, जो रातरुओंको सन्ताप देनेवाला था । उरानाका 
पत्र हिनेयु हआ, जो सञ्जनेमिं शरेष्ठ था । दिनेयुका पुत्र 
रुवमकवच नामसे प्रसिद्ध हआ, वह रात्ुसेनाका विनाशा 
करनेवाला था । राजा रुक्मकवचने एक नार अश्वमेध 
यज्ञका आयोजन किया ओर उसमें दक्षिणाके रूपमे यह 
सारी पृथ्वी ब्राह्मणको दे दी । उसके रुवमेषु, पृथुरुक्म, 
ज्यामघ, परिघ ओर हरिये पांच पुत्र उत्पन्न हए जो 
महान्‌ बरूवान्‌ ओर पराक्रमी थे । उन्मेसे ओर 
हरिको उनके पिताने विदेह देशके राज्यपर्‌ स्था 
` किया । रुकमेषु राजा हज ओर पृथुरुक्म उसके अधीन 
होकर रहने रगा । उन 


ग च + [न # ण 

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दोनेनि मिरुकर अपने भाईं॑विदरभकुमारी गर्भसे जन्तुका 
4, ॥ 1 ५ क % ~+ = 359 ॥ क 
॥ षे > क ( + ४ ++ कैक ४१ र ‰ ~ ह: ` (क्न ॥ 
= - >.# ज ५ क गन 8 ` ५१६ दसस चाप ॥ पुरुटसु "द भे. ४  ॥ ५ 
4 दिया । ४ ऋ क्षवान्‌ । > जन्तुका ॑। १ *+ चनी | # ५ ९ था । जन्तुकी 
॥ भ काठ क त ति ज्यामघ = ् त + ५ १ + ५. - + । ‰ ि ५ = 
श ज्यामघको ॥ 8 प घरसे ५ ॥ १० त < कैकः + ०.4 
# नर + ४ ~ ॥ + ~ ५ ॥ 4 क ध 
। ६. ध - ध ति ९ = > क ११ ३ १ # = 4 
ग, - ~ ~ १ 4 ~ र ५? # ५।५ 
~  । ॥ ऋ ष्क "3 ४ ॥ 


पर्वतपर जाकर जंगली फल -मूसे जीवन-निर्वाह करते 
हए वहाँ रहने रूगे। ज्यामघकी सी रव्या बड़ी 
सती-साध्वी स्री थी । उससे विदुरभं नामक पुत्र हआ । 
विदर्भसे तीन पुत्र हृए- क्रथ, कैरिक ओर रोमपाद । 
राजकुमार क्रथ ओर कैरिक बड़े विद्वान्‌ थे तथा 
लोमपाद परम धर्मात्मा थे। तत्पश्चात्‌ राजा विदर्भने ओर 
भी अनेकों पुत्र उत्पन्न किये, जोयुद्ध-कर्ममें कुरार तथा 
शरवीर थे। लोमपादका पुत्र बभ्रु ओर बभ्रुका पुक्र हेति 
हुआ। कैरिकके चिदि नामक पुत्र हुआ, जिससे चैद्य 
राजाओंकी उत्पत्ति बतलायी 'जाती हे । 

विदर्भका जो क्रथ नामक पुत्र था, उससे कुन्तिका 
जन्म हुआ, कुन्तिसे धृष्ट ओर धृष्टसे पृष्टकी उत्पतति हुई । 
पृष्ट प्रतापी राजा था । उसके पुत्रका नाम निति था 1 वहं 
परम धर्मात्मा ओर रात्रवीरोका नारक था। निर्वृतिके ` 
दाडार्ह नामक पुत्र हआ, जिसका दूसरा नाम विदूरथ 
था। दारार्हका पुत्र भीम ओर भीमका जीमूत हुआ 
जीमूतके पुत्रका नाम विकर था। विकर्से भीमर्थ 
न्रामक पुत्रकी उत्पत्ति हुईं । -भीमरथका पुत्र नवरथः, 
नवरथका दढस्थ ओर दुढरथका पुत्र राकुनि हआ। 
इाकुनिसे करम्भ ओर करम्भसे देवरातका जन्म हुआ । 
देवरातके पुत्र महायडास्ती राजा देवक्षत्र हुए । देवक्षत्रका ` 
नाम मधु था। मधुसे कुरुवराका जन्म हुआ । कुरुवरके 


उससे कहि > 
> ए छ १ 









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व्रा जन्य हा । 

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| र हलीकेहां पद्मपुराण 
| । 9 * अर्चयस्व हषीकेदौ यदीच्छसि परं पदम्‌ * [ सं | 
| | (~ न र | 
| .४.४.१.१.2.; 4 4.1..1.1..1१कक | 

| | ४४ 

| वेत्रकी था । उसके गर्भसे सक्वगुणसम्पन्न सात्वतकी भोजवेरा आहुकतक आकर समाप्त हो गया । 

|| उत्पत्ति हुड । जो सात्वतवंराकी कीर्तिका विस्तार आहुकने अपनी बहिन आहुकीका व्याह अवेन्तौ 

॥ करनेवारे थे। सत्वगुणसम्पन्न सात्वतसे उनकी रानी देरामें किया था । आहुककी एक पुत्री भी थी, जिसने 

॥ ६ 


कौसल्याने भजिन, भजमान, दिव्य राजा देवावृध, पुत्र उत्पन्न किये । 3 
अन्धक, महाभोज ओर वृष्णि नामके पुत्रोको उत्पन्न वे दोनों व प 
किया । इनसे चार वं्ोंका विस्तार हुआ । उनका वर्णन हुए, जो देवताअओकि समान ओर 0 

सुनो । भजमानकी पली गर्भसे ककः 
सु सृञ्जयकुमारी सुञ्जयीके गर्भसे नाम है देववान्‌, उपदेव, सुदेव ओर देवरक्षक । खनके 
।, भाज नामकं पुत्रक उत्पत्ति हुईं । भाजसे भाजकोका जन्म॒ सात बहिन थी, जिनका व्याह देवकने वसुदेवजीके साथ 
| हुआ । भाजकी दो खियां थीं । उन दोनोनि बहुत-से पुत्र॒ कर दिया । उन सातोकि नाम इस प्रकार है- देवकी ` 
,  उत्यन्न किये। उनके नाम हैँ--विनय, करुण ओर श्रुतदेवा, यज्लोदा, श्रुतिश्रवा, श्रीदेवा, उपदेवा ओर 
वृष्णि । इनमें वृष्णि रात्तुके नग्योपर विजय पानेवाङे थे। सुरूपा । उग्रसेनके नो पुत्र हुए । उनमें कंस सबसे बडा 
( भाज ओर उनके पुत्र--सभी भाजक नामसे प्रसिद्ध हुए; था । होषके नाम इस प्रकार हैँ-- न्यग्रोध, सुनामा, कड 
/ . वरयोकिं भजमानसे इनकी उत्पत्ति हुईं थी । रङ्कु, सुभू, राष्टपाल, बद्धमुष्टि ओर सुमुष्टिक । उनके ¦ 
॥/ देवावृधसे बभ्रु नामक पुत्रका जन्म हुआ, जो सभी पाँच बहिन थी--कंसा, कंसवती, सुरभी, राष्ट्पली ` 
| उत्तम गुणोसे सम्पन्न था। पुराणोके ज्ञाता विद्धान्‌ पुरुष ओर कङ्का । ये सन-की-सब बड़ी सुन्दरी थी। इस । 
॥ + महात्मा देवावृधके गुणोका बखान करते. हुए इस वंराके प्रकार सन्तानोंसहित उग्रसेनतक कुकुरः वंराका वर्णन 
॥ विषयमे इस प्रकार अप्रना उदार प्रकट करते है-- किया गया । 
देवावृध देवताओकि समान हँ ओर बभ्रु समस्त [भोजके दूस पत्र] भजमानके विदूरथ हुआ, वह 


\॥ ` मनुष्योमिं श्रेष्ठ हे । देवावृध ओर बभ्रके उपदेङासे छिहत्तर॒रथिर्योमें प्रधान था । उसके दो पुत्र हृए-राजाधिदेव | 
॥ हजार मनुष्य मोश्को प्राप्त हो चुके हे ।' बश्रुसे भोजका ओर युर । राजाधिदेवके भी दो पुत्र हृए--शोणाश् यैर ` 
। | जन्म हआ, जो यज्ञ, दान ञौर तपस्या धीर, शधेतवाहन । वे दोनों वीर पुरुषोके सम्माननीय उर 


त्रिय-धर्मका पालन कसनेवाठे थे । शोणाश्चके पाच पुर 
हृष्‌ । वे सभी रुरवीर ओर युद्धकम्म कुराल थे । उनके 
नाम इस प्रकार है--शामी, गदचर्मा, निमूर्त, चक्रजित्‌ 
ओर इचि । दामीके पुत्र प्रतिक्षत्र, ्तिक्षत्रके भोज ओर 
भोजके हदिक हए । हदिकके दस पुत्र हए. जो भयानक 
पराक्रम दिखानेवाले थे । उनमें कृतवमौ सबसे बड़ा था । 
उससे छोयोके नाम डातधन्वा, देवाह, सुभान, भीषण, 


महाब, अजात, विजात कारक 


 ब्राह्मणभक्त, उत्तम त्रतोंका दुढ़तापूर्वक पालन करनेवाठे 
रूपवान्‌ तथा महातेजस्वी थे । इारकान्तकी कन्या 
मृतकावती भोजकी पलरी हई । उसने भोजसे कुकुर 








> > = #॥ ५.५ 4 क च २४ 
क १ # १ कन १) 5 


ढे भ) ८ ४ ५९५ ॥ 
वि + 1 क 












9 कपोतरोमा 4 कपोतरोमाके 5; नैमित्त 
4. सुतर र 
क ह रः तके पुत्र = नरि रे हुए । नरि ल्रडे बिद्रान्‌ थे | उनका दूसरा 
0 य ८ दुन्दुभि 3 हि उनसे 
र ह | ४ मवा „७ ५ ५ % 1 ज _ 4 । ५ नु 4 1 ` े ५ > लतदलाया जाता अ वह पुरुष्‌ था । 
ए: ~. जर {4 | अभिजितसे ३ १. र देवार्हका कम्बलनर्हिष ह विद्वान्‌ 
भिजित्‌ 3 र अभिजितूसे पुनर्वसु नामक पुत्र उन न असमोजा। अजातके 
थ उसके दो पुत्र इए--समौजा ओर 
१ +; 4 चे दो ` शि 
“ हआ । रु लज, ० ^ 1४९1 ५ सन्ताने हई एक पुत्र हुए । 
3 स पुत्रसे भी समौजा नामके दो पुत्र उत्पन्न. हए । उनके 
सयवा दीः तेजहीन, यज्ञ न॒ तीन पुत्र हुए, जो परम धार्मिक ओर परक्रमी ° ' ` 
नार अपवित्र ओर नाम है--सुदृ, सुरंश ओर अनमत 
व ] वृष्णिके वदाम 
ही नहीं । यह [सात्वतके कनिष्ठ पुत्र 





सृष्टिखण्ड ] 


* यदुरवंशके अन्तर्गत क्रोष्ठ॒ आदिके वंदा तथा श्रीकृष्णावतारका वर्णन * 


न त म त = = क कका जाः (--------- १. 





2. 


11111111 





नामके प्रसिद्ध राजा हो गये है, वे अपने पिताके कनिष्ठ 
पत्र थे । उनसे रिनि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । अनमित्रसे 
वृष्णिवीर युधाजित्का भी जन्म हुआ । उनके सिवा दो 
वीर पुत्र ओर हुए, जो ऋषभ ओर क्षत्रके नामसे विख्यात 
हए । उनमेसे ऋषभने कारिराजकी पुत्रीको पलनीके रूपमे 
ग्रहण किया । उससे जयन्तकी उत्पत्ति हई । जयन्ते 
जयन्ती नामकी सुन्दरी भार्याके साथ विवाह किया। 
उसके गर्भसे एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सदा यज्ञ 
करनेवाला, अत्यन्त धैर्यवान्‌, राखज्ञ ओर अतिथियोका 
प्रेमी था । उसका नाम अक्रूर था अक्रूर यज्ञकी दीक्षा 
ग्रहण करनेवाठे ओर बहुत-सी दक्षिणा देनेवाङे थे। 
उन्होने रलकुमारी दौव्याके साथ विवाह किया ओर उसके 
गर्भसे ग्यारह महाबटी पुत्रोको उत्पन्न किया । अक्रूरे 
पुनः शूरसेना नामकी पलीके गर्भसे देववान्‌ ओर उपदेव 
नामक दो ओर पुत्रोंको जन्म दिया । इसी प्रकार उन्होने 
अश्विनी नामकी पल्नीसे भी कई पुत्र उत्पन्न किये । 

[ विदूरथकी पलरी] रेक्ष्वाकीने मीढुष नामक पुत्रको 
जन्म दिया। उनका दूसरा नाम यूर भी था। रुरनै 
भोजाके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न किये। उनमें 
आनकटुन्दुभि नामसे प्रसिद्ध महाबाहु वसुदेव ज्येष्ठ थे । 
उनके सिवा दोष पुत्रके नाम इस प्रकार हँ देवभाग, 
देवश्रवा, अनाधृष्टि, कुनि, नन्दि, सकृद्यराः, इयाम, 
समीद ओर इंसस्यु । शरसे पांच सुन्दरी कन्या्णं भी 
उत्पन्न हुई, जिनके नाम हैँ--श्रुतिकीर्ति, पृथा, श्रुतदेवी 
श्रुतश्रवा ओर राजाधिदेवी । ये पाचों वीर पुत्ोकी जननी 
थीं । श्रुतदेवीका विवाह वृद्ध नामक राजाके साथ हुआ । 
उसने कारूष नामक पुत्र उत्पन्न किया । श्रुतिकी्तिनि 
केकयनरेशके अरासे सन्तर्दनको जनम दिया । श्रुतश्रवा 
चेदिराजकी पत्री थी । उसके गर्भसे सुनीथ (रिरापार) 
का जन्म हुआ। राजाधिदेवीके गर्भसे घ्मकी भायौ 
अभिमर्दिताने . जन्म ग्रहण किया । शरवे राजा 
कुन्तिभोजके साथ मैत्री थी, अत उन्होनि अपनी कन्या 


न= 


कृष्णस्य जन्मा्युदय यः कीतयति नित्यराः। ५. 1 मत श 





पुथाको उन्हं गोद दे दिया । इस प्रकार वसुदेवकी बहिन 
पृथा कुन्तिभोजकी कन्या होनेके कारण कुन्तीके नामसे 
प्रसिद्ध हई । कुन्तिभोजने महाराज पाण्डुके साथ कुन्तीका 
विवाह किया । कुन्तीसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए--युधिष्ठिर, 
भीमसेन ओर अर्जुन । अर्जन इनरके समान पराक्रमी हे । 
वे देवताओकि कार्य सिद्ध करनेवाठे, सम्पूर्ण दानवेकि 
नाहाक तथा इन्द्रके स्यि भी अवध्य हँ । उन्ेनि 
दानर्वोका संहार किया है । पाण्डुकी दूसरी रानी माद्रवती 
(माद्री) के गर्भसे दो पुत्रोकी उत्पत्ति सुनी गयी है, जो 
नक्र ओर सहदेव नामसे प्रसिद्ध हे । वे दोनों रूपवान्‌. 
ओर सतत्वगुणी है । वसुदेवजीकी दूसरी पलनी रोहिणीने, 
जो पुरुवदाकी कन्या है, ज्येष्ठ पुत्रके रूपमे बरूरामको 
उत्यन्न किया । तत्पश्चात्‌ उनके गर्भसे रणप्रेमी सारण, 
दुर्धर, दमन ओर लम्बी ठोदीवाले पिण्डारक उत्यन्न हुए । 
वसुदेवजीकी पली जो देवकी देवी हँ, उनके गर्भसे पहले 
तो महाबाहु प्रजापतिके अंराभूत वारक उत्पन्न हए । 
फिर [कंसके द्वारा उनके मारे जानेपर] श्रीकृष्णका 
अवतार हआ । विजय, रोचमान, वर्धमान ओर 
देवक-ये सभी महात्मा उपदेवीके गर्भ॑से उत्पन्न हए 
है । श्रुतदेवीने महाभाग गवेषणको जन्म॒ दिया, जो 
संग्राममे पराजित होनेवाठे नही थे 
[अब श्रीकृष्णके -प्रादुभावकी कथा कदी जाती 
है ।] जो श्रीकृष्णके जन्म ओर वृद्धिकी कथाका प्रतिदिन 
पाठ या श्रवण करता है, वह सब पापोँसे मुक्त हो जाता 
।* पूर्वकारमे जो प्रजाओंके स्वामी थे, वे ही महादेव 
श्रकृष्णलीलाके किय इस समय मनुष्येमं अवतीर्णं हुए 
उसीके प्रभावसे वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे ` 
भगवानका प्रादुर्भाव हुआ । उस समय उनके नेत्र 
कमलके समान डोभा पा रहे थे । उनके चार भुजार्णे थीं। 
उनका दिव्य रूप मनुष्योका मन भोहनेवाख था। 
श्रीवत्ससे चिहवित एवं शाङ्ग चक्र आदि कक्षणेसि युक्त ८ 









२ 










| लोके “रभो ! इस रूपको छिपा टीजिये । मे केससे 
॥\ डरा हआ हू, इसीखि्यि एेसा कहता हू । उसने मेरे छ 
¶ पुत्रको, जो देखनेमें बहुत ही सुन्दर थे, मार डाटा हे । 
` वसुदेवजीकी बात सुनकर भगवानने अपने दिव्यरूपको 
( छिपा क्या । फिर भगवान्‌की आज्ञा केकर वसुदेवजी 
॥ नं नन्दके घर के गये ओर नन्दगोपको देकर बोले-- 
“ज्ञाय इस नारूककी रक्षा करै; वर्ोकि इससे सम्पूर्ण 
 यादवोका कल्याण होगा । देवकीका यह नारक जनत 
`  कंसका वध नहीं करेगा, तबतक इस पृथ्वीपर भार 
~ जद़नेवाके अमङ्गलमय उपद्रव होते रंगे । भूतल्पर 
॥ ` । नालुक सादात्‌ भगवान्‌ है। ये भगवान्‌ कौरव- 
1 . ९ 4 ५ किं युद्धम सम्पूर्ण क्षत्रियोके एकत्रित होनेप्र 
के सारथिका काम करेगे ओर पृथ्वीको क्षत्रियटीन 
$ ध र क सके उसका उपधोग एवे पालन करेगे ओर अन्तम 
: ~; टु्व्ाको : पर्हैचारयेगे। ` 


त यटवराक्रो देवलकः 


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4 4. क ` 
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= मीणा नकि +७ ^ ८9 \ 
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>» अचयस्व हषीकेरा यदीच्छसि परं पद्म्‌ » 


१... 1.1.44... 1... 1.1.44. 4... 
~ 0. 
.२.२.४.२.२..१.२.२ २.1. 
ॐ 


भगवान्‌के ५ दिव्य विग्रहको देखकर वसुदेवजी पालन-पोषण किया, उन 






8 काम्याने साम्नसे तरस्वी नामक पुत्र 


“| 
दोनों स्ि्योका 
पुलस्त्यजी बोले--राजन्‌ ! म्‌: ` 
करडयप हँ ओर उनकी प्रिया देवकी अदिति कही | 
हे । कङ्यप ब्रह्माजीके अंरा है ओर अदिति च 
इसी प्रकार द्रोण नामक वसु ही नन्दगोपके नामे 
विख्यात हुए हैँ तथा उनकी पली धरा योदा हेँ। देवी ` 
देवकीने पूर्वजन्ममें अजन्मा परमेश्वरसे जो कामना क 
थी, उसकी वह कामना महानाह्‌ श्रीकृष्णे पूर्ण कर दी। 
यज्ञानुष्ठान बंद हो गया था, धर्मका उच्छेद हो रहा था. ` 
ेसी अवस्थामें धर्मकी स्थापना ओर पापी असुरोका ` 
संहार करनेके लिये भगवान्‌ श्रीविष्णु वृष्णि-कुल्मे ' 
प्रकट हुए हँ । रुविमणी, सत्यभामा, नम्रजित्की पुत्री ¦ 
सत्या, सुमित्रा, रौव्या, गान्धार-राजकुमारी लक्ष्मणा, ` 
सुभीमा, मद्रराजकुमारी कौसल्या ओर विरजा आदि ` 
सोलह हजार देवियां श्रीकृष्णकी पलियां हँ । रुक्मिणीने 
दस पुत्र उत्पन्न किये; वे सभी युद्धकर्ममे कुराल हैँ । , 
उनके नाम इस प्रकार हैँ महाबली प्रद्यु, रणरुर ¦ 
चारुदेष्ण, सुचारु, चारुभद्र, सदश्च, हस्व, चारगुप 
चारुभद्र. चारुक ओर चारुहास । इनमें प्रप्र सबसे ब 
ओर चारुहास सबसे छोटे दै । रुक्मिणीने एक कन्याकी 
भी जन्म दिया, जिसका नाम चारुमती है । सत्यभामासे 
भानु, भीमरंथ, क्षण, रोहित, दीप्तिमान्‌, ताग्रबन्ध ओर 
जलन्धम- ये सात पुत्र उत्पन्न हुए। इन सातोकि ए 
छोरी बहिन भी है । जाम्बवतीके पुत्र साम्न इए, जो बे 
ही सुन्दर है । ये सौर-शाखरके प्रणेता तथा प्रतिमा एव 
मन्दिस्के निर्माता हैँ । मित्रविन्दाने सुमित्र चारमित 


मत्रविन्दको जन्म दिया । मित्रनाहु ओर ५९७ 


| 
सत्याके पत्र हैँ । इस प्रकार ्ीकृष्णके हजारो पत्र ह 
सत्यक पुत्र गर्भसे अनिरुद्ध 


परद्यु्नके विदर्भकुमारी रुक्मवतीके 
मकं परमं बुद्धिमान्‌ पुत्र उत्पन्न हं । 

संग्राममे उत्साहपूर्वक युद्ध 
अनिरुद्ध मृगकेतनका जन्म हुञओ । राजा 
प्रघ 


वीर एं महात्मा तीन 
॑ ( के ठकुगभग हे | वे खभी अत्यन्त 





सृष्टिखण्ड ] * पुष्कर तीर्थवती महिमा, वहाँ वास करनेके नियम तथा आश्रम-धर्मका निरूपण * ॥॥. 


म ४ क मनम मिन 4.४.44... 44.4.41... 12121211. 


महाबली है । उन सबकी देवताओंके अंरासे उत्पत्ति हई हए हैँ । महात्मा याद्वोके एक सौ एक कुक हैँ । भगवान्‌ 
हे । देवासुर-संग्राममें जो महाबली असुर मारे गये थे, वे श्रीकृष्ण ही उन सबके नेता ओर स्वामी हँ तथा सम्पूरणं 
इस मनुष्यलोकमें उत्पन्न होकर सबको कष्ट दे रहे थे; यादव भी भगवानकती आज्ञाके अधीन रहकर 
उन्ीका संहार करनेके लिय भगवान्‌ यदुकुले अवतीर्ण ऋद्धि-सिद्धिसे सम्पन्न हो रहे हैँ । 
वि 
पुष्कर तीर्थकी महिमा, वहाँ वास करनेवाके कोगोके ल्वियि नियम 
तथा आश्रम-धर्मव्ा निरूपण 

पुलस्त्यजी कहते हँ-राजन्‌ ! मेरु-गिरिके जगत्का निर्माण कसेवाङे परमेश्चरका ध्यान कर रहे थे। 
रिखरपर श्रीनिधान नामक एक नगर है, जो नाना ध्यान कसते-करते उनके मनम यह विचार उठा कि भै 
प्रकारके र्नोसे सुरोभित, अनेक आश्र्योका घर तथा किंस प्रकार यज्ञ करू ? भूतरूपर काँ ओर किस 
बहुतेरे वृक्षोसे हरा-भरा हे। भाोति-भाोंतिकी अद्धुत ॒स्थानपर मुञ्चे यज्ञ करना चाहिये ? कारी, प्रयाग, तुङ्गा 
धातुओंसे उसकी बडी विचित्र डोभा होती है। वह (तुङ्गभद्रा), नैमिषारण्य, पुष्कर, काञ्ची भद्रा, देविका, 
स्वच्छ स्फटिक मणिके समान निर्मर्‌ दिखायी देता है। कुरुक्षेत्र, सरस्वती ओर प्रभास आदि बहुत-से तीर्थं हँ । 
वहो ब्रह्माजीका वैराज नामक भवन हे, जहाँ देवताओंको भूमण्डलमे चारो ओर जितने पुण्य तीर्थ ओर क्षत्र है, उन 
सुख देनेवाी कान्तिमती नामकी सभा है। वह सबको मेरी आज्ञासे रुद्रने प्रकट किया है । जिससे मेरी 
मुनिसमुदायसे सेवित तथा ऋषि-महपिर्योसे भरी रहती उत्पत्ति हई है, भगवान्‌ श्रीविष्णुकी नाभिसे कट हए 
उस कमरूको ही वेदपाठी ऋषि पुष्कर तीर्थं कहते हें 
(पुष्कर तीर्थ उसीका व्यक्तरूप है) । इस प्रकार विचार 
करते-करते प्रजापति ब्रह्माके मनमें यह बात आयी कि 
अब भैं पृथ्वीपर चद । यह सोचकर वे अपनी उत्पत्तिके 
प्राचीन स्थानपर आये ओर वंके उत्तम वनमें प्रविष्ट 
हए, जो नाने प्रकारके वृक्षां ओर रुताओसि व्याप्त एवं 
भति-भातिके फूरसे सुशोभित था । वहां पर्हुचकरं 
उन्हनि क्ेत्रकी स्थापना की, जिसका यथार्थरूपसे वर्णन 
करता ह । चनद्रनदीके उत्तर प्राची सरस्वतीतक ओर 
नन्दन नामक स्थानसे पूर्वं॑क्रम्य या कल्प नामक 
स्थानतक जितनी भूमि है, वह सब पुष्कर तीर्थके नामसे . 
प्रसिद्ध है। इसमे रोककता ब्रह्माजीने यज्ञ॒ करनेके 
निमित्त वेदी बनायी । ब्रह्माजीने वहाँ तीन पुष्करोकी ` 
कल्पना की । प्रथम ज्येष्ठ पुष्कर तीर्थं समञ्लना चाहिये, ` 








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र अलस ह डे । दवा वसमय उ सम प वद च 
| ` __ * भोजौ भवान्‌ ष्ण जर ह र भ लसी तरिकालदशी ऋष दै, इसलिये उनके छथि भावी घटना 






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९ & 
| 4.  अर्चयखं दीस | 
| स्व हषीकेरो यदीच्छसि परं पदम्‌ + [ संधि 


(# ४ ४ ४ + 


| | क 
॥ उसके देवता साक्षात्‌ ब्रह्माजी हैँ । दूसरा मध्यम पुष्कर इस लोकें ब्रह्माजीका 

भक्त 
है, जिसके देवता विष्णु हैँ तथा तीसरा कनिष्ठ पुष्कर हे, कैसे रोग ब्रह्मभक्त माने गये . ५ भ | 














४.४... | ; 
त्र | 
४.३.२.१६ 
४. 


॥ जिसके देवता भगवान्‌ रुद्र हैँ । यह पुष्कर नामक वन पुलस्त्यजी बोले राजन 1 
।\1 आदि, मधान एवं गुह्य क्षेत्र हे । वेदमें भी इसका वर्णन कही गयी ॥ र कि 
|| आता है ( । इस तीर्थम भगवान्‌ ब्रह्मा सदा निवास करते सिवा भक्तिके तीन भेद ओर है- लोकिक म 

॥ हे । उन्होने भूमण्डल्के इस भागपर बड़ा अनुग्रह किया आध्यात्मिकं । ध्यान-धारणापूर्वक बुद्धिके द्वारा य 

। , हे । पृथ्वीपर विचरनेवाके सम्पूर्ण जीरवपर कृपा करके जो विचार किया जाता है, उसे मानस भक्ति कहते है 

.। च्य ही ब्रह्माजीने इस तीर्थको प्रकट किया है । यहोँकी यह ब्रह्माजीकी प्रसन्नता बढानेवाली है । मन 
।/  यज्ञवेदीको उन्होने सुवर्णं ओर हरसे मढ़ा दिया तथा ` वेदपाठ तथा आरण्यकोके जपसे होनेवारी भर ` 
नाना प्रकारके रलोंसे सुसञ्नित करके उसके फर्शको सब वाचिक कहती है । मन ओर इन्दरियोको रोकनेवाे ' 
11 भ्रकारसे सुशोभित एवे विचित्र जना दिया । तत्पश्चात्‌ त्रत, उपवास, नियम, कृच्छर, सान्तपन तथा चाद्धायण ` 
|| लोकपितामह भगवान्‌ ब्रह्माजी वहां आनन्दपूर्वक रहने आदि भिन्न-भित्न व्रतोंसे, ब्रह्मदृ चछर नामक उपवाससे एव॑ 
/ . खगे। साथ ही भगवान्‌ श्रीविष्णु, रुद्र, आटो वसु, दोनों अन्यान्य शुभ ॒नियमोके अनुष्टानसे जो भगवानकी ` 
अधिनीकृमार, मरुद्गण तथा स्वर्गवासी देवता भी आराधना की जाती है, उसको कायिक भक्ति कहते है। 
देवराज इन्द्रके साथ वहां आकर विहार करने रगे । यह यह द्विजाति्योकी त्रिविध भक्ति बतायी गयी । गायकेषी, 
¢. तीर्थं सम्पूर्ण लोकोपर अनुग्रह करनेवाल्् है । मैने इसकी दूध ओर दही, रल, दीप, कु, ज, चन्दन, माल, ¦ 
1 यथार्थं महिमाका तुमसे ` वर्णन किया है । जो ब्राह्मण विविध धातुओं तथा पदार्थ; काले अगरकी सुगयसे ¦ 
ध अञिहोत्र-परायण होकर संहिताके क्रमसे विधिपूर्वक युक्त एवं घी ओर गृगुलसे बने हुए धूप, आभूषण, 
॥ | मर्न्रोका उच्चारण करते हए इस तीर्थमें वेदोंका पाठ करते सुवर्ण ओर रल आदिसे निर्मित विचित्र-विचित्र हार 
{| है वे सन रोग जह्माजीके कृपापात्र होकर उर्हकि समीप नृत्य, वाद्य, संगीत, सब प्रकारके जंगली फल-मूलकि ` 
निवास करते है। ` उपहार तथा भक््य-भोज्य आदि नैवेद्य अर्षण कके 
` आष्मजीने यूछा--भगवन्‌ ! तीर्थनिवासी मनुष्य ब्रह्माजीके उेश्यसे जो पूजा करते स 
मनुष्योको पुष्कर वने किस विधिसे रहना चाहिये ? लौकिक भक्ति मानी गयी हे। व 
(| कया केवल युरषोको हौ वहो निवास करना चाहिये या॒सामवेदके मन््रोका जप ओर संहिता 1 
॥  लियोको भी? अथवा संभी वर्णो एवं आश्रमेकि रोग आदि कम यदि ब्रह्माजीके उदेडयसे 6 त 
। ~ 1 वह वैदिक भक्ति कहलाती हे । वेद- 
| पलस्यजी बोले- राजन्‌! सभी वरणो एवं॑पूर्वक हतिष्यकी आहूति देकर जो ४ | अमावास्य 

पुरुषों ओर िरयोको भी उस तीर्थमें निवास जाती है वह भी वैदिक भक्ति मानी ग है 
५ ओर ( नि ध । मन : अथवा ूर्णिमाको जे अिहोत्र किया जाता 2 

जो उत्तम दक्षिणा दी जाती है, तथा देवता दक 
पुरोडाइा ओर चरु अर्पण किये जाते है--ये 
भक्तिके अन्तर्गत है । इष्टि, धृति, व ओः 
तथा अग्नि, पृथ्वी, वायु, अ) सके 
0 ` स्के उरवो कि हृषित क "| 


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ऋ ® 0 र्म (सो खनी 2 यट | € 
च> ॥ ~ 92१ , ~ न 

1 # १. # ` 26 

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श्रमेकि ४ 
५ क क वं ॥ द द ५ चं = 
(य = ५ भ. चाहिये १ + 
० 3 ~ 2 
क ` ~> + ४ ९ 
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च १ 9, (ष गिन \ 
| ५ क 9" २. ॥ £। फ - । ` 
ह: ५ 5 श वु (9 ~ 4 ५ ^ व्क ् 
2 1 \ च 4 ५ 
"ऋ न ५4 ~ र 6 =, 





९४ # भै र 
॥ = [१ ५. त 4) ह 69 
4 नि नै # 8. ~ # जर ५ + 8 ॥ क मोहका 
६, र: र ध ऋ ई 4 व # ^ 3 ।, पि >" 
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सुष्टिखण्ड ] 


४.1 


* पुष्कर तीर्थकी महिमा, वहाँ वास करनेके नियम तथा आश्रम-धर्मका निरूपण » 


(४.4... 4.4. 
१ .४..4.4.4.1.4.4. 44.4.44... 9414 4 ~ 11111111. + 


४५ 





राजन्‌ ! ब्रह्माजीकी आध्यासिक भक्ति दो प्रकारकी 
मानी गयी है--एक संख्यज ओर दूसरी योगज । इन 
दोनंका भेद सुनो । प्रधान (मूर प्रकृति) आदि ्राकृत 
तत्व संख्याम चौबीस हँ । वे सब-के-सब जड एवं भोम्य 
है । उनका भोक्ता पुरुष पच्चीसवांँ तत्त्व है, वह चेतन है । 
इस प्रकार संख्यापूर्वक प्रकृति ओर पुरुषके तत्वको 
टीक-टीक जानना सौख्यज भक्ति हे। इसे सत्पुरुषोनि 
सोख्य-राख्के अनुसार आध्यात्मिक भक्ति माना है । 
अब ब्रह्माजीकी योगज भक्तिका वर्णन सुनो । प्रतिदिन 
प्राणायामपूर्वक ध्यान रगाये, इन्द्रियोका संयम करे ओर 
समस्त इन्दरियोको विषयोंकी ओरसे खींचकर हृदयम 
धारण करके प्रजानाथ ब्रह्माजीका इस प्रकार ध्यान करे । 
हृदयके भीतर कमल है, उसकी कर्णिकापर ब्रह्माजी 
विराजमान हैँ । वे रक्त वस्र धारण किये हुए है, उनके 
नत्र सुन्दर हे । सब ओर उनके मुख प्रकारित हो रहे हैँ । 
ब्रह्मसूत्र (यज्ञोपवीत) कमरके ऊपरतक रुटका हुआ हे, 
उनके दारीरका वर्णं लार है, चार भुजार्ण रोभा पा रही 
है तथा हाथमे वरद ओर अभयकी मुद्रार्णे हँ । इस 
प्रकारके ध्यानकी स्थिरता योगजन्य मानस सिद्धि है; यही 
ब्रह्माजीके प्रति होनेवाटी पराभक्ति मानी गयी हे । जो 
भगवान्‌ ब्रह्माजीमें एेसी भक्ति रखता हे, वह ब्रह्मभक्त 
कहलाता हे । 
राजन्‌ ! अब पुष्कर क्षे्रम निवास करनेवाठे 
पुरुषोके पालन करेयोग्य आचारका वर्णन सुनो । 
ूर्वकालमे जब विष्णु आदि देवताओंका वहो समागम 
हआ था, उस समय सबकी उपस्थितिमे ब्रहमाजीने स्य 
ही कषेत्रनिवासियोकि कर्तव्यको विस्तारके साथ बतलाया 
था । पुष्कर कषेत्रे निवास करनेवालोको उचित हे कि वे 
ममता ओर अहंकासको पास न आन दे । आसक्ति ओर 
` संग्रहकी वृत्तिका परित्याग करें । बन्धु-बान्धवोकि रति भी 
उनके मनमें आसक्ति नहीं रहनी चाहिये । वे ठेठे, पत्थर 


` ओर सुवर्णको समान समञ्चं । प्रतिदिन नाना प्रकारके 


(४5 द | * यथा महोदधेस्तुल्यो न चान्योऽस्ति जलाशयः । तथा वे पष्करस्यापि समं तीथ न 


क. र, 


हभ कर्म करते हुए सम्पूर्ण प्राणिर्योको अभय-दान दे । 
नित्य प्राणायाम ओर परमेश्वरका ध्यान करर । जपके द्वारा 
अपने अन्तःकरणको शुद्ध बनाये । यति-धर्मके 
कर्तव्योका पालन कर । सांख्ययोगकी विधिको जानें 
तथा सम्पूर्णं संरायोका उच्छेद करके ब्रह्मका बोध प्राप्त 
करें । कषत्रनिवासी ब्राह्मण इसी नियमसे रहकर वहाँ यज्ञ 
करते हें । 

अब पुष्कर वनम मृत्युको प्राप्न होनेवाठे ठोर्गोको 
जो फक्‌ मिता है, उसे सुनो । वे रोग अक्षय ब्रह्य- 
सायुज्यको प्राप्त होते है, जो दूसरेकि स्यि सर्वथा दुभ 
हे । उन्हें उस पदकी प्राप्ति होती है, जहो जानेपर पुनः 
म॒त्यु प्रदान करनेवाल् जन्म नहीं गहण करना पड़ता । वे 
पुनरावृत्तिके पथका परित्याग करके ब्रह्मसम्बन्धिनी परा 
विद्यामें स्थित हो जाते है । 

भीष्मजीने कहा- ब्रह्मन्‌ ! पुष्कर तीर्थमें निवास 
करनेवाटी सिया, म्लेच्छ, श्र, परु-पक्षी, मृग, गगे, 
जड, अंधे तथा बहर प्राणी, जो तपस्या ओर नियमसे दूर 
है, किस गतिको प्राप्त होते है-- यह जतानेकी कृपा करे । 

पुलस्त्यजी बोले-- भीष्म ! पुष्कर कषेत्रे 
मरनेवाछे म्छेच्छ, दद्र, खी, पु, पक्षी ओर मृग आदि 


. सभी प्राणी ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैँ । वे दिव्य रारीर 


धारण करके सूर्यके समान तेजस्वी विमार्नपर बैठकर 
ब्रह्मलोककी यात्रा करते हँ । तिर्यग्योनिमे पडे इए- 
पडु-पक्षी, कीडमकोडे, चीयि्या, थल्चर, जलचर, 
स्वेदज, अण्डज, उद्धिज्न ओर जरायुज आदि राणी यदि 
पुष्कर वनम प्राण-त्याग करते है तो सूर्यके समान 
कान्तिमान्‌ विमानोपर बैठकर ब्रह्मरोकमें जाते हैँ ! जैसे 
समुद्रके समान दूसरा कोई जलखाराय नहीं हे, वैसे ही ` 
पुष्करके समान दूसरा कोई तीर्थ नहीं है ।* अन मँ तुम्हे ` 
अन्य देवताओंका परिचय देता ह, जो इस पुष्कर कषत्रम 
सदा विद्यमान रहते हैँ । भगवान्‌ श्रीविष्णके साथ इन्द्रादि 
सम्पूर्णं देवता, गणेरा, कार्तिकेय, चन्द्रमा, सूर्यं ओर ` 







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स ` जगत्का हित कतके छथि कहे भगवन्‌ ! मुञ्च पठ्ाइये । प्रभो ! यह 
ब्रह्माजीके . निवास-स्थान पुष्कर श्षत्रमे सदा विद्यमान पूरा कर छिया है ओर इस कार्यको मै अभी य फेने 
रहते हँ । इस तीर्थम निवास करनेवाङे कोग सत्ययुग इस प्रकार पह कार्य करे ओर फिर किया ै । 
जारह वर्षोतक, जेतामें एक वर्षतक तथा द्वापरमे एक काम गुरुको बता दे । मैनि ब्रह्मचारीके नि साय ` 
मासतक तीर्थ-सेवन करसे जिस फल्को पाते थे, उसे विस्तारके साथ वर्णन किया हे; गुरुभक्त वि 
कलियुगे एक दिन-रातके तीर्थ-सेवनसे ही प्राप्त कर॒ सभी नियमोंका पालन करना चाहिये । इस प्रकार क | 
ठेते हँ ।* यह बात देवाधिदेव ब्रह्माजी पूर्वकालमे राक्तिके अनुसार गुरुक प्रसन्नताका सम्पादन करते ह 
मुञ्ञसे (पुरस्त्यजीसे) स्वयं ही कही थी । पुष्करसे शिष्यको कर्तव्यकर्म गे रहना उचित है । वहं ध | 
| बढ़कर इसं पृथ्वीपर दूसरा कोड क्षेत्र नहीं हैः इसत्ण्यि दो, तीन या चायो वेदोको अर्थसहित गुरुमुखसे अध्ययन ` 
५ पूरा भ्रयल करके मनुष्यको इस पुष्कर वनका सेवन करे । भिक्षाके अन्नसे जीविका चराये ओर धरतीप ` 
॥ | करना चाहिये । ब्रह्मचारी, ` गृहस्थ, वानप्रस्थ ओर रायन करे । वेदोक्त त्रतोका पालन करता रहे ओर ` 
संन्यासी- ये सब रोग अपने-अपने राख्रोक्त ` धर्मका गुरु-दक्षिणा देकर विधिपूर्वकं अपना समावर्तन-संस्कार ` 
पालन करते हए इस क्ेत्रमे परम गतिको प्राप्त करते हैँ । करे । फिर धर्मपूर्वक प्राप्त हुई स्रीके साथ गार्हपत्यदि ` 
धर्म॑ ओर अर्थक. तत्तवको जाननेवाके पुरुषको अभरिर्योकी स्थापना करके प्रतिदिन हवनादिके द्रा ` 
चाहिये कि वह अपनी, आयुके एक चौथाईं भागतक उनका पूजन करे । | 
दूसरी निन्दासे बचकरं ब्रह्मचर्यका पान करते हुए आयुका [प्रथम भाग ब्रह्मचर्याश्रमे बितानेके 
गुरु अथवा गुरुपुत्रकेःसमीप निवास करे तथा गुरुकी पश्चात्‌] दूसरा भाग गृहस्य आश्रमे रहकर व्यतीत 
सेवासे जो समय बचे, उसमे अध्ययन करे, श्रद्धा ओर करे । गृहस्थ ब्राह्मण यज्ञ करना, यज्ञ कराना, वेद पद्ना, ¦ 
नादापू गुरुका आश्रय ले । गुरुके घरमें रहते समय वेद पढ़ाना तथा दान देना ओर दान लेना-इन छः 
गुरुके सोनिके पश्चात्‌ खायनं करे ओर उनके उटनेसे पह कर्मोका अनुष्ठान करे। उससे भिन्न वानप्रस्थी ध 
उठ जाय । रिष्यके कसेयोग्य जो कुछ सेवा आदि कार्य . केवर यजन, अध्ययन ओर दान-इन तीन न 
हो, बह सब पूरा करके-ही रिष्यको गुरुके पास खड़ा अुष्टान करे तथा चतुर्थं आश्रमम ननेपि। 
` हाना चाहिये । वहः-सदाः शुरुका किङ्कर होकर सब संन्यासी जपयज्ञ ओर अध्ययन--ईइन न 
# अक्रारकी की सेवा करे ५;सबर कायेमिं कुरा हो । पवित्र, सम्बन्ध रखे । गहस्थके व्रतसे बद्कर क व 
[र गुणवान्‌ बने । गुरुको रिय कुगनेवाका तीर्थं नहीं बताया गया है । गृहस्थ ५ क: 
१ 9 इन्दयोको जीतकर कान्तभावसे गुरुकी ओर अपने खानेके छियि भोजन न बना 1 न 
। च ते। गु गुरुके भोजन करनेसे-पहके भोजन ओर जरूपान अतिधियोकि उदेर्यसे ह रसोई करे] । क र 
र 4 १ जलपान न. करे । गुरु खड हों तो स्यं भी न करे । दिनम कभी नीद न ठे 8. न 
> ना जनते सोयेःबिना कायन भी न करे । उत्तान पिके भागमें भी न सोये। ष प 
^ नि दत रके चरणो सपद कर । गुरके दाहिने (सूर्ोदय ल सर्ास्तके समन” ` मना चाहिये कि 
अगाम कग कोद माण जति आक भूल जव म 


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सृष्टिखण्ड ] > पुष्कर तीर्थकी महिमा, वहाँ वास करनेके नियम तथा आश्रम-धर्मका निरूपण 


४ 





यथावत्‌ सत्कार न हो । अतिथिको भोजन करानेसे देवता 
ओर पितर संतुष्ट होते हैँ; अतः गृहस्थ पुरुष सदा ही 
अतिथिर्योका सत्कार करे। जो वेद्‌-विद्या ओर व्रते 
निष्णात, श्रोत्रिय, वेदोके पारगामी, अपने कर्मसे जीविका 
चानेवाले, जितेन्द्रिय, क्रियावान्‌ ओर तपस्वी है, उन्दी 
श्रेष्ठ पुरुषोके सत्कारके लिये हव्य ओर कव्यका विधान 
किया गया हे । जो नश्वर पदा्थेकि प्रति आसक्त है 
अपने कर्मसे भ्रष्ट हो गया है, अग्निहोत्र छोड़ चुका है, 
गुरुकी ्यूटी निन्दा करता है ओर असत्यभाषणमें आग्रह 
रखता है, वह देवताओं ओर पितरोको अर्पण करनेयोम्य 
अन्नके पानेका अधिकारी नहीं है । गृहस्थकी सम्पत्ति 
सभी प्राणियोंका भाग होता है। जो भोजन नहीं बनाते, 
उन्हें भी गृहस्थ पुरुष अन्न दे। वह प्रतिदिन "विघस 
ओर “अमुत' भोजन करे । यज्ञसे (देवताओं ओर पितर 
आदिको अर्पण करनेसे) बचा हुआ अन्न हविष्यके 
समान एवे अमृत माना गया है । तथा जो कुुम्नके सभी 
मनुष्योकि भोजन कर लेनेके पश्चात्‌ उनसे बचा हुआ अन्न 
ग्रहण करता है; उसे 'विघसाडी' (“"विघस' अन्न भोजन 
करनेवाला) कहा गया हे । 

गृहस्थ पुरुषको केवर अपनी ही सख्रीसे अनुराग 
रखना चाहिये । वह मनको अपने वरामें रखे, किसीके 
गोमि दोष न देखे ओर अपनी सम्पूर्ण इन्द्ि्योको कानूमें 
रखे। ऋत्विक्‌, पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, 
डारणागत, वृद्ध, बारूक, रोगी, वैद्य, कुटुम्बी, सम्बन्धी, 
बन्धव, माता, पिता, दामाद, भाई, पुत्र, खी, बेटी तथा 
दास-दासियोकि साथ विवाद. नहीं करना चाहिये । जो 


इनसे विवाद नहीं करता, वह सब प्रकारके पापोसे मुक्त ` 


हो जाता है! जो अनुकूक बर्तीवके द्वारा इन्द अपने 
वामे कर छेता है, वह सम्पूर्णं लोकोपर विजय पा जाता 
है- इसमे तनिक भी सन्देह नही है। आचार्य 
ब्रह्मलोकका स्वामी है, पिता प्रजापति-रोकका प्रभु है, 


` अतिथि सम्पूर्ण लोरकौका ईर हे, ऋत्विक्‌ वेदक 


` लोकका अधिपति है। कु विधेदेवसम्बनधी लोकंकि भित गस 
ओर बान्धव दि्ाअकि तथा 48 2 वानप्रस्थकी 


अधिष्ठान ओर प्रभु होता है। दामाद अप्सरओकि 








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माता ओर मामा भूलोकके स्वामी है । वृद्ध, नारक ओर 
रोगी मनुष्य आकाङके प्रभु है । पुरोहित ऋषिरोकके 
ओर रारणागत साध्यरोकोकि अधिपति दँ । वैद्य 
अधिनीकुमारकि लोकका तथा भाई वसुखोकका स्वामी 
हे । पली वायुरोककी ईश्वरी तथा कन्या अप्सराओकि 
घरकी खामिनी है । बड़ा भाई पिताके समान होता हे । 
पलरी ओर पुत्र अपने ही खारीर हैँ । दासवर्गं परछाईके 
समान है तथा कन्या अत्यन्त दीन--दयाके योग्य मानी 
गयी है । इसि उपर्युक्त व्यक्ति कोई अपमानजनक 
बात भी कह द तो उसे चुपचाप सह ठेना चाहिये । कभी 
क्रोध या दुःख नहीं करना ` चाहिये । गृहस्थ-धर्मपरायण 
विद्वान्‌ पुरुषको एक ही साथ बहुत-से काम नही आरम्भ 
करने चाहिये । धर्मज्ञको उचित है कि वह किसी एक ही 
काममें गकर उसे पूरा करे । 

गृहस्थ ब्राह्यए़रकी तीन जीविकार्प है, उनमें उत्तरोत्तर 
ष्ठ एवं कल्याणकारक है ।- पहली है--कुम्भधान्य 
वृत्ति, जिसमें एक घडेसे अधिक धान्यका संग्रह न करके 
जीवन-निर्वाह किया जाता है दूसरी उञ्छरिख वत्ति हे, 
जिसमे खेती कट जानेपर ` खेतोमे गिरी हुईं अनाजकी 
बाले चुनकर लायी जाती है ओर उन्दीसे जीवन-निर्वाह 
किया जाता है। तीसरी कापोती वृत्ति है, जिसमे 
खकिहान ओर बाजारसे अन्नकेःबिखरे हुए दाने चुनकर 
लाये जाते है तथा उन्दीसेः जीविका चलायी जाती हे। 
जहां इन तीन वत्तियोसे जीविका चलानेवाङ़े पूजनीय 
ब्राह्मण निवास करते है, उस राष्टकी वृद्धि. होती है । जो 
ब्राह्मण गृहस्थकी इन तीन वृत्तिरयोसे जीवन-निर्वाह करता 
हे ओर मनमें कष्टका अनुभव नहीं करता, वह दस 





. पीदीतकके पूर्वजोको तथा आगे होनेवारी संतानोकी भी ` 






दस पीडियोंको पवित्र कर देता हे । स 
अब तीसरे आश्रम--वानप्रस्थका वर्णन करता ह! ` 
सुनो । गृहस्थ पुरुष जन यह देखं रे कि मेरे शरीरम ` 


पुत्रके भी पुत्र हो गया है, तब वह वनम चल जाय। ` 


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किर ह भकः क ऋः 
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क ३. ऋ 
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ड = ॐ => = 

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-* भेको = 59 = । ऋः 

न= क्क ~ = 
चै चकै = 
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(र = शद = 9 क / तं हि ~> 9 +> 
त अक $ ~“ (निन [क 


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क - र ~ स = 
वकि ॐ @ॐ> ऋ = = 


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क चके `, = । 
"को ककन क 


ॐ च 


थ क क क शः कि = 
को > ही 2५) कज. 5 + 
1.2 
म कोक 
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[वि क 2 
करोर जक = = कन्डक > = 






















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म 
= =+. 
" न" ५ ए 


खड रहते हँ ओर कोई-कोई एक स्थानपर एक आसनसे 


॥ दै दुसरे किसी साधनद्वारा फोडी हई वस्तु नहीं गहण 
क करते । कोई पत्थरसे कूटकंर खाते हैँ, कोड जोके आटेको 
॥। पानी उनारुकर उसीको शाष्छपक्ष या कृष्णपश्षमे एक 
॥। बार पी कते है। कुरो एेसे होते दै जो समयपर 
(| अपने-आप पराप हई वस्तुक ही भक्षण करते हे । कोई 
[| ५ ` मूर, कोई फलू ओर कोई पू खाकर ही नियमित 





८ „ क अर्चयस्व हषीकेरों यदीच्छसि परं पदम्‌ ऋ 


1.4.44... 4.1.44... 4.9.444... 9.4.45. २.1.27 चच [= ४... 4.1.441... 4.1.71... चच १.४. .६.२. २. प .॥.) 23 
.४.४.१.४.४.३.1 


न 
अगस्त्य, सपर्षि, मधुच्छन्दा, गवेषण अ 
भाष्डि, यवप्रोथ, कृतश्रम, अहोवीरय न 
मेधातिथि, बुध, मनोवाक, शिनीवाक क 
अकृतश्रम--ये धर्म-तत्त्वके यथार्थ ज्ञाता थे, 
धममके स्वरूपका साक्षात्कार हो गया था । इनके सिवा 
धर्मकी निपुणताका ज्ञान रखनेवाङे, उग्रतपस्वी ऋषियेरि 
जो यायावर नामसे प्रसिद्ध गण है वे सभी विषयोसे 
उपरत हो मायाके बन्धनको तोड़कर वनमें चे गये थे! 
मुमुक्षुको उचित है कि वह सर्वस्व दक्षिणा देकर. _ 
सबका त्याग करके सद्यस्करी (तत्का आत्मकल्याण 
करनेवाला) बने । आत्माका ही यजन करे, विषयोसे 
उपरत हो आत्मामें ही रमण करे तथा आत्मापर ही निर्भर 
करे। सब प्रकारके संग्रहका परित्याग करके भावनाके 
द्वारा गार्हपत्यादि अिययोकी आत्मामें स्थापना करे ओर 
उसमें तदनुरूप यज्ञोका सर्वदा अनुष्ठान करता रहे । 
चतुर्थं आश्रम सबसे श्रेष्ठ बताया गया हे। वह 
तीनों आश्रमोके ऊपर है । उसमें अनेक प्रकारके उत्तम , 
गुणोका निवास है। वही सबकी चरम सीमा--पम ¦ 
आधार है ।-ब्रह्मचर्य आदि तीन आश्रमे क्रमराः रहनेके 
दातो पश्चात्‌ काषाय-वसख्र धारण करके संन्यास ठे ले। 
सर्वस्व-त्यागरूप संन्यास सबसे उत्तम आश्रम ह। 
सन्यासीको चाहिये कि वह मोक्षकी सिद्धिके ण्वि 
अके ही धर्मका अनुष्ठान करे, किसीको साथ न रख । 
जो ज्ञानवान्‌ पुरुष अकेला विचरता है, वह सबका ला 
देता है; उसे स्वयं कोई हानि नहीं उठानी पडती । 
संन्यासी अभ्निहोत्रके लिये अभिका चयन = करे, अपे 
रहनेके किये कोई घर न बनाये, केवर भिक्ष क 


त्याग कर चुकते हँ, पवित्र स्थानमें निवास करते है जो. 
बुद्धि-बलसे सम्पन्न तथा सत्य, रोच ओर क्षमा आदि 
सदगुर्णोसे युक्त हँ, उन पुरुषोके कल्याणमय नियमोंका 
वर्णन सुनो । भरव्येक द्विजको अपनी आयुका तीसरा भाग 
वानप्रस्थ-आश्रममें रहकर व्यतीत करना चाहिये । 
वानप्रस्थ-आश्रममे भी वह उन्हीं अथियोंका सेवन करे, 
जिनका गृहस्थ-आश्रममें सेवन करता था । देवताओंका 
पूजन करे, नियमपू्वक रहे, नियमित भोजन करे, 
भगवान्‌ श्रीविष्णुमे भक्ति रखे तथा यज्ञके सम्पूर्ण 
अङ्खोका पालन करते हए प्रतिदिन अगप्िहोत्रका अनुष्ठान 
करे । धान ओर जो वही गहण करे, जो विना जोती हुई 
जमीनमे अपने-आप पैदा हआ हो । इसके सिवा नीवार 
(तीना) ओर विघस अन्नको भी वह पा सकता है । उसे 
अग्रिमे देवताओंके निमित्त हविष्य भी अर्पण करना 
चाहिये । वानप्रस्थी लोग वर्षकि समय खे मैदानमे 
आकादाके नीचे बैठते है, हेमन्त ऋतुमे जलका आश्रय 
ठेते है ओर ग्ष्ममें पञ्चाभि-सेवनरूप तपस्या करते हे । 
उनसे कई तो धरतीपर खोटते है, कोई पंजोके बल 





जीवनं व्यतीत कसते है । इस प्रकार वे न्यायपूर्वक 
` वैखानसो (वानपस्थियो क नियम दृत शय हौ गम मवे क ५. 
= र # + , द वे मनीषी पुरुष ऊपर बताये हुए तथा सग्रह 7 करे, मोन होकर शुद्धभावस ^ {1 
५0 ॥ धह ५ ^ दशा त्ते हे, ` नियमित भोजन ठरे । प्रतिदिन एक हीब 

ड । यह उपनिषदोद्ारा भोजन करने ओर पानी पीनिके चयि २ स 
 वानप्रस्य आश्रम प्रायः नारियरु आदिका पात्रविशेष) रल! ५ रहना 
निवास करना, मलिन वसन धारण करना ये 
हे! जिस पुरुषे ५८ 


सुषटिखण्ड 1 


1.141.444. 4.4.14... 4.4.441 4.4.414... 4.4.444 44 


* पुष्कर क्षत्रमें ब्रह्माजीका यज्ञ ओर सरस्वतीका माकस्य + 


१1111 4.4.4.4.4. 4.444.1१1. क 1.1.466 84.4.44 44 


द्‌ 





सबकी बाते समा जाती हँ जो सबकी सह ठेता है 

तथा जिसके पाससे कोई बात लौटकर पुनः वक्ताके पास 

नहीं जाती- जो कटु वचन कहनेवाठेको भी कटु उत्तर 

नदीं देता, वही संन्यासाश्रममे रहनेका अधिकारी हे। 

कभी किसीकी भी निन्दाको न तो करे ओर न सुने ही । 

विरोषतः ब्राह्यणोकी निन्दा तो किसी तरह न करे। 

ब्राह्यणका जो शुभकर्म हो, उसीकी सदा चर्च करनी 

चाहिये । जो उसके खयि निन्दाकी बात हो, उसके 

विषयमे मोन रहना चाहिये । यही आत्मशद्धिकी दवा है । 

जो जिस किसी भी वस्तुसे अपना इारीर ढक ठेता 

है, जो कुछ मिल जाय उसीको खाकर भूख मिटा लेता 
हे तथा जहाँ कहीं भी सो रहता है, उसे देवता ब्राह्मण 
(ब्रह्मवेत्ता) समञ्ते है । जो जन-समुदायको साँप 

समञ्जकर, सनेह-सम्बन्धको नरक जानकर तथा स्िर्योको 
मुर्दा समञ्चकर उन सबसे डरता रहता है; उसे देवताोग 
ब्राह्मण कहते हँ । जो मान या अपमान होनेपर स्वयं हर्ष 
अथवा क्रोधके वरीभूत नहीं होता, उसे देवतारोग 
ब्राह्मण मानते हे । जो जीवन ओर मरणका अभिनन्दन न 
करके सदा कारूकी ही प्रतीक्षा करता रहता हे, उसे 
देवता ब्राह्मण मानते हैँ । जिसका चित्त राग द्वेषादिके 
वङ्ीभूत नहीं होता, जो इन्द्रियोको वामे रखता हे तथा 
जिसकी बुद्धि भी दूषित नहीं होती, वह मनुष्य सब 
पापोंसे मुक्त हो जाता है । जो सम्पूरणं प्राणियोंसे निरभय 
है तथा समस्त प्राणी जिससे भय नहीं मानते, उस 
देहाभिमानसे मुक्त पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता । जसे 
हाथीके पदचिहृमे अन्य समस्त पादचारी जीवोके 
पदचिह् समा जाते है, तथा. जिस प्रकार सम्पूरणं ज्ञान 
चिन्तमे लीन हयो जते है, उसी प्रकार सारे धर्म ओर अर्थ 


अहिंसामें रीन रहते हँ । राजन्‌ 1 जो हिंसाका आश्रय 
केता है वह सदा ही मृतकके समान हे । ट 

इस प्रकार जो सबके प्रति समान भाव रखता हे, 
भलीभांति धैर्य धारण किये रहता है, इन्िर्योको अपने 
वरामं रखता है तथा सम्पूरणं भूतोको त्राण देता है, वह 
ज्ञानी पुरुष उत्तम गतिको प्राप्त होता है । जिसका 
अन्तःकरण उत्तम ज्ञानसे परितृप्र है तथा जिसमे ममताका 
सर्वथा अभाव है, उस मनीषी पुरुषकी मृत्यु नहीं होती; 
वह अमृतत्वको प्राप्त हो जाता हे । ज्ञानी मुनि सब 
प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर आकाराकी भाति 
स्थित होता है। जो सबमें विष्णुकी भावना करनेवाला 
ओर दान्त होता है, उसे ही देवताल्रेग ब्राह्मण मानते हे । 
जिसका जीवन धर्मके स्यि. . धर्म आत्मखन्तोषके च्िये 
तथा दिन-रात पुण्यके छियि हँ, उसे देवतारोग ब्राह्मण 
समञ्ञते है । जिसके मनम कोई कामना नहीं होती, जां 
कमेकि आरम्भका कोई संकल्प नहीं करता तथा नमस्कार 
ओर स्तुतिसे दूर रहता है, जिसने योगके द्वारा कर्मोको 


क्षीण कर दिया है, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते है । 


सम्पूरणं प्राणिर्योको अभयकी दुक्षिणा देना संसारम समस्त 
दानेसे बढकर है। जो किसीकी.निन्दाका पात्र नहीं है 
तथा जो स्वयं भी दूस्ोकी निन्द नहीं करता, वही ब्राह्मण 
परमात्माका साक्षात्कार कर पाता है । जिसके समस्त पाप 
नष्ट हो गये है, जो इहरोक ओर पररोकमे भी किसी 
वस्तुको पानेकी इच्छा नहीं करता, जिसका मोह दूर हो 
गया है, जो मिड़ीके ठेले ओर, सुवर्णको समान दष्टिसे 
देखता है, जिसने रोषको त्याग दिया है, जो निन्दास्तुति 
ओर प्रिय-अप्रियसे रहित होकर सदा उदासीनकी भाति 
विचरता रहता है, वही वास्तवमे संन्यासी हे । 


क 4 फ त 
य्न) क्‌ 


पुष्कर कषत्रम ब्रह्माजीका यज्ञ जर सरस्वतीका घ्राव्छस्य 


मीष्मजीने कहा- ब्रह्मन्‌ ! आपके मुखसे यह 
सब प्रसङ्ग मैने सुना; अब पुष्कर कषेत्रे जो ब्रह्माजीका 
यज्ञ हुआ था, उसका वृत्तान्त सुनाइये । वयोकि इसका 
श्रवण करनेसे मेरे हरीर [ओर मन] की शुद्धि होगी । 





कचः # ऋ र 
¢` 
न 
१ क 


पुष्कर क्षत्रमे जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय जो-जो 
नाते हुई उन्हें बतलाता हुः सुनो । पितामहका यज्ञ आदि 
कृतयुगमें मरारम्भ हुआ था । उस समय मरीचि, अङ्गिर, ` 
मै, पुलह, क्रतु ओर प्रजापति दकषने ब्रह्माजीके पास ` 






च ~+ पास ष्ण ~ । 

ब्रह्माजी | उनके चरणेपिं अ ~ 

¬ ज्ुकाया | न ० = (| ५) नि निः २.४, 
पुलस्यजीने । भगवान्‌ जाकर उनके चैरणेमिं मस्तक ज्ुकाया। धाता, अर्यमा, ` 
कलहा -राजन्‌ ! भगवान्‌ ब्रह्माजी जाकर उनके चरणाम मस्तक ज्ुकाया । धाता, अर्यमा, 

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९५० * अ्च॑यस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम्‌ + 


ए 1 न नरुण्‌, अङ, भग, इन्द्र, विवस्वान्‌, पूषा, त्वष्टा 


॥ 


६...२.५.२.। 
स म 4.4.41१ पो 
सै मै मै म + ५ 
जिनका विग्रह है; उन 
; भगवान्‌की हम रारण ठेते 8 | 


ओर पर्जन्य--आदि बारहो आदित्य भी वहाँ उपस्थित 
हो अपने जाज्वल्यमान तेजसे म्रकारित हो रहे थे । इन 
देवेश्रोने भी पितामहको प्रणाम किया । मृगव्याध, ङार्व, 
महायरास्वी निरति, अजैकपाद, अहिर्बु्य, पिनाकी, 
अपराजित, विशेश्चर भव, कपदी, स्थाणु ओर भगवान्‌ 
भग ये ग्यारह रुद्र भी उस यज्ञे उपस्थित थे । दोनों 
अश्विनीकुमार, आठों वसु, महाबली मरुद्गण, विश्वेदेव 
ओर साध्य नामक देवता ब्रह्माजीके सम्मुख हाथ 
जोड़कर खडे थे। रोषजीके वंडाज वासुकि आदि बडे- 
जड़ नाग भी विद्यमान थे । तार्य अरिष्टनेमि, महाबली 
गरुड़, वारुणि तथा आरुणि- ये सभी विनताकुमार वहां 
पधारे थे। लोकपारक भगवान्‌ श्रीनारायणने वहाँ स्वयं 
पदार्पण किया ओर समस्त महर्षियोके साथ लोकगुरु 
जह्माजीसे कहा जगत्पते ! तुम्हारे ही द्वारा इस सम्पूर्ण 
संसारका विस्तार हुआ हे, तुम्हीनि इसकी सृष्टि की है; 
इसङ्यि तुम सम्पूर्ण लोकके ईश्वर हो । यहाँ हमटोगोके 


 करनेयोग्य जो तुम्हारा महान्‌ कार्य हो, उसे करनेकी हमें 


आज्ञा दो ।' देवर्षियोके साथ भगवान्‌ श्रीविष्णुने एेसा 


कहकर देवेश्वर ब्रह्माजीको नमस्कार किया । 

. . बह्माजी वहां स्थित होकर सम्पूर्ण दिदाओंको 
. अपने तेजसे कारित कर रहे थे तथा भगवान्‌ श्रीविष्णु 
 ( भी श्रीवत्स-चिहृसे सुडोभित एवं सुन्दर सुवर्णमय 
 ।  यज्ञोपवीतसे देदीप्यमान हो रहे थे । उनका एक-एक रोम 


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गस्व अणिमा आदि आठ भगवान्‌ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे । आकार त 
ल्‌ तेज, जल, पृथ्वी, रान्द, स्प, रूप, ह. ] 









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भगवान्‌ सम्पूर्णं भूतोकी उत्पत्ति ओर भे 
जो ऋषियों ओर लोकोके खष्टा तथा व : ६ 
जिन्होने देवताओंका पिय ओर समस्त जगतका थां | 
करनेके छ्यि चिरकारसे पितरोको कव्य भ 
देवताओंको उत्तम हविष्य अर्पण करनेका नियम | ॑ 
किया है, उन देवश्रेष्ठ परमेश्चरको हम ` 
करते हेँ। = 
तदनन्तर वृद्ध एवं बुद्धिमान्‌ देवता 

श्रीब्रह्याजी यज्ञहारूमें लोकपारुक = 
साथ बैठकर डोभा पाने कगे । वह यज्ञमण्डप धन आरि 
सामग्रियों ओर ऋत्विजोंसे भरा था। परम प्रभावरालौ ` 
भगवान्‌ श्रीविष्णु धनुष हाथमे लेकर सन ओरसे उस 
रक्षा कर रहे थे। दैत्य ओर दानवोके सरदार तथ 
राक्षसोकि समुदाय भी वहाँ उपस्थित थे। यज्ञ-विच ` 
वेद-विद्या तथा पद ओर क्रमका ज्ञान रखनेवाे 
महर्षियोके वेद-घोषसे सारी सभा गंज उदी । यज्ञ 
स्तुति-कर्मके जानकार, रिक्षाके ज्ञाता, इा्दोकी व्युलति ` 
एवं अर्थका ज्ञान रखनेवाठे ओर मीमांसाके युक्तियुक्त 
वावर्योको समञ्जनेवाले विद्ानोकि उच्चारण किये हृए इद ` 
सबको सुनायी देने रगे । इतिहास ओर पुराणकि ज्ञात, ` 
नाना प्रकारके विज्ञानको जानते हुए भी मौन रहनेवाटे, १ 
संयमी तथा उत्तम व्रतोंका पालन करेवा विद्वन ' 
वहाँ उपरिथित होकर जप ओर होममें लगे हए । 
मुख्य-मुख्य ब्रा्मणोंको देखा । देवता ओर असुरके एर । 
लोक -पितामह ब्रह्माजी उस यज्ञभूमिं विराजमान थ। + 
सुर ओर असुर दोनों ही उनकी सेवामें खड़े १.३ 
प्रजापतिगण--दक्ष, वसिष्ठ, पुरृह, मरीचि,” . 
भृगु, अत्रि, गौतम तथा नारद--ये सब लोग 



















ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, भव 
^ 2 ४. रिक्षा | आयुर्वेद, ~ „ धः १५ 


ॐ 
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सुष्टिखण्ड ] 


* पुष्कर क्षेत्रे ब्रह्माजीका यज्ञ ओर सरस्वतीका भ्राक्य *# 





५९ 


होकर ओङ्कारयुक्त महात्मा ब्रह्माजीकी उपासना करते थे। 
नय, क्रतु, संकल्प, प्राण तथा अर्थ, धर्म, काम, हर्ष, 
शुक्र, बृहस्पति, संवर्त, बुध, रानैश्चर, राहु, समस्त ग्रह, 
मरुद्गण, विश्वकर्मा, पितृगण, सूर्य तथा चन्द्रमा भी 
ब्रह्ाजीकी सेवामें उपस्थित थे । दुर्गम कष्टसे तारनेवाली 
गायत्री, समस्त वेद-शाख्न, यम-नियम, सम्पूर्णं अक्षर, 
लक्षण, भाष्य तथा सब राख देह धारण करके वहां 
विद्यमान थे । क्षण, क्व, मुहूर्त, दिन, रत्रि, पश्च, मास 
ओर सम्पूर्ण ऋतुर्प अर्थात्‌ इनके देवता महात्मा 
ब्रह्माजीकी उपासना करते थे । 

इनके सिवा अन्यान्य श्रेष्ठ देवियो-ही, कीर्ति, 
द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, नीति, विद्या, मति, श्रुति, 
स्मृति, कान्ति, शान्ति, पुष्टि, क्रिया, नाच-गानमें कुडार 
समस्त दिव्य अप्सरा तथा सम्पूर्ण देव-माताएं भी 
ब्रह्माजीकी सेवामें उपरियत थीं । विप्रचित्ति, शिबि, 
शङ्क, केतुमान्‌, प्रहाद, बलि, कुम्भ, संहाद्‌, अनुहादः, 
वृषपर्वा, नमुचि, शम्बर, इन्दरतापन, वातापि, केरी, राहु 
ओर वुत्र-ये तथा ओर भी बहुत-से दानव, जिन्हे 
अपने बलपर गर्व था, ब्रह्माजीकी उपासना करते हुए इस 
प्रकार बोट । 

दानवोने कहा- भगवन्‌! आपने ही 
हमलोर्गोकी सृष्टि की है, हमे तीनों रोकोका राज्य दिया 
हे तथा देवताओसि अधिक बरूवान्‌ बनाया है 
पितामह ! आपके इस यज्ञम हमलोग कौन-सा कार्य 
करं 2 हम स्वयं ही कर्तव्यका निर्णय करनमे समर्थ 
अदितिके गर्भसे पैदा हए इन बेचारे देवताओंसे क्या 
काम होगा; ये तो सदा हमरिद्रारा मारे जाते ओर 
अपमानित होते रहते दै । फिर भी आप तो हम सबके 

पितामह दै; अतः देवता्ओंको भी साथ ठेकर्‌ यज्ञ 

पूर्णं कीजिये । यज्ञ समाप्च होनेपर राज्यलक्ष्मीके विषयमे 
, हमारा देवताओकि साथ फिर विरोध होगा; इसमे तनिक 


भी सन्देह नहीं है, किन्तु इस समय हम चुपचाप इस, 


` यज्ञको देखेंगे--देवताओंकि साथ युद्ध नहीं केडगे । 


पुलस्त्यजी कहते है -दानवोके ये गर्वयुक्तं बचन 





शाङ्करजीसे कहा । 
भगवान्‌ श्रीविष्णु बोके- प्रभो ! पितामहके 


यज्ञम अधान-रधान दानव आये है ।ब्रह्माजीने इनकी भी 


इस यज्ञम आमन्नित किया है । ये सन लेग इसमे विघ्न 
डालनेका प्रयल कर रहे हैँ । परन्तु जबतक यज्ञ समाप्त 
न हो जाय तबतक हमलोर्गोको क्षमा करना चाहिये । इस 
यज्ञके समाप हो जानेपर देवताओंको दानवेकि साथ युद्ध 
करना होगा। उस समय आपको एेसा यल करना 
चाहिये, जिससे पुथ्वीपरसे दानवोका नामो-निडान मि 
जाय । आपको मेरे साथ रहकर इन्द्रकीं विजयके खयि 
प्रयललन करना उचित है । इन दान्वोंका धन छेकर 
राहगीरोँ, ब्राह्मणों तथा दुःखी मनुष्येमिं बांट दे । 

भगवान्‌ श्रीविष्णुकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीनि 
कहा-- "भगवन्‌ ! आपकी बात सुनकर ये दानव कुपित 
हो सकते है; किन्तु इस समय इन्हं क्रोध दिलाना आपको 
भी अभीष्ट न होगा । अतः रुद्र एवं अन्य देवताओके 
साथ आपको क्षमा करना चाहिये । सत्ययुगके अन्तमं 
जब यह यज्ञ समाप्त हो जायगा, उस समय मेँ 
आपलोगोंको तथा इन दानवोंको विदा कर दुगा; उसी 
समय आप सब रोग सन्धि या विग्रह, जो उचित हो, 
कीजियेगा ' 

पुलस्त्यजी कहते हैँ तदनन्तर भगवान्‌ 
ब्रह्माजीने पुनः उन दान्वोसे कहा-- तुम्हें देवताओकि 
साथ किसी प्रकार विरोध नहीं करना चाहिये । इस समय 
तुम सब रोग परस्पर मित्रभावसे रहकर मेरा कार्य 
सम्पन्न करो ।' . 

दानवोने कहा-- पितामह ! आपके परव्येक 
अदेशका हमलोग पालन करेगे । देवता हमारे छोटे भाई 





दानर्वोकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीको बडा सन्तोष 
हुआ । थोड़ी ही देर बाद उनके यज्ञका वृत्तान्त ता सुनकर 








सुनकर इन्दरसहित महायरास्वी भगवान्‌. ध श्रीविष्णुने स सबको 


 संन्पन्पुः ३-- 
= अ 








` ~€ 


५२ 


भ्व नि, 
(= 5 ` कनक च क 


= क = 
णी == [विक 7) 
 । 


ओर पुष्कर क्षेत्रे उन्हे निवासस्थान देकर ~ 0 
आपल््रेग आरामसे यहीं रहे ।' तत्पश्चात्‌ जटा ओर 
मृगचमं धारण करनेवाले वे समस्त. महर्षि ब्रह्माजीकी 
यज्ञ-सभाको सुरभित करने कगे । उनमें कुछ महात्मा 
वालखिल्य थे तथा कुर लोग संप्रख्यान (एक समयक 
किये ही अन्न महण करनेवारे अथवा तत्त्वका विचार 
करनेवारे) थे। वे नाना प्रकारके नियमोमें संलग्र तथा 
वेदीपर डयन करनेवाले थे। उन सभी तपस्वियोनि 
पष्करके जके ज्यों ही अपना मुह देखा, उसी क्षण वे 
अत्यन्त रूपवान्‌ हो गये । फिर एक दूसररेकी ओर 
देखकर सोचने रगे "यह कैसी बात है ? इस तीर्थमे 
मुहका प्रतिबिम्ब देखनेसे सनका सुन्दर रूप हो गया }' 
ेसा विचार कर तपस्ियोनि उसका नाम मुखदर्रान 
तीर्थ रख दिया । तत्पश्चात्‌ वे नहाकर अपने-अपने 
नियमोमें रुग गये । उनके गुरणोकी कहीं उपमा नहीं थी । 
नरश्रेष्ठ ! वे सभी वनवासी मुनि वहो रहकर अत्यन्त 
¦ शोभा पाने गे । उन्होने अमिहोत्र करके नाना प्रकारकी 
। / - क्रेया सम्पन्न कीं । तपस्यासे उनके पाप भस्म हो चुके 
थे। वे सोचने कगे कि "यह सरोवर सबसे श्रेष्ठ है ।' एेसा 
` विचार करके उन द्विजाति्योने उस सरोवरका श्रेष्ठ 
` पुष्कर' नाम स्खा। . ` 
| तदनन्तर ब्राह्मणोंको दानके रूपमे नाना प्रकारके 
# पात्र देनेके पश्चात्‌ वे सभी द्विज वहोँ प्राची सरस्वतीका 
{| ड सरस्तीके तटपर बहुत-से द्विज निवास करते थे । 
तीं | सभी प्राणिर्योको मनोरम जान पड़ता था । अनेकों 














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सत्रभा, काञ्चना, प्राची, नन्दा ५ 
प्रसिद्ध पांच धाराओये म गामे 
वर्तमान ब्रह्माजीकी सभामे- उनके विस्तत द 
जब द्विजातिरयोका शुभागमन हो गया देवताते 
पुण्याहवाचन तथा नाना प्रकारके नियमोका । 
हूए जब यज्ञ-कार्यके सम्पादनमे कग गये ओर ६ 
जह्याजी यज्ञकी दीक्षा ठे चुके, उस समय 
भोगोकी समृद्धिसे युक्तं यज्ञके द्वारा भगवानूका यजन 
आरम्भ हआ यज्ञम द्विजातियोक 

हं । राजेनद्र ! उस यज्ञम द्विजातियोके पास 
उनकी मनचाही वस्त अपने-आप उपस्थित हो जाती 
थीं । धर्म ओर अर्थके साधनमें प्रवीण पुरुष भी स्मरण 
करते ही वहाँ आ जाते थे। देव, गन्धर्व गान करने लगे। 
अप्सरा नाचने कगीं । दिव्य बाजे बज उठे । उस्‌ यज्ञकी 
समृद्धिसे देवता भी सन्तुष्ट हो गये। मनुष्योको तो 
वहोंका वैभव देखकर बड़ा ही विस्मय हुआ । पुष्कर 
तीर्थम जन इस प्रकार ब्रह्माजीका यज्ञ होने रगा, उस 
समय ऋषि्योने सन्तुष्ट होकर सरस्वतीका सुप्रभा नामसे 
आवाहन किया । पितामहका सम्मान करती हुई 
वेगराक्िनी सरस्वती नदीको उपस्थित देखकर मुनियोंको 
लड़ी प्रसन्नता हुई । इस प्रकार नदियोमे श्रेष्ठ सरस्वती 
ब्रह्माजीकी सेवा तथा मनीषी मुनियोकी प्रसन्नताके छियि 
ही पुष्कर तीर्थमें प्रकट हुई थी । जो मनुष्य सरस्वतीके 
उत्तर-तटपर अपने डरीरका परित्याग करता है तथा प्राची 
सरस्तीके तटपर जप करता है, वह पुनः जन्म-मृत्युको 
नहीं प्राप्त होता । सरस्वतीके जलम डुबकी रूगानेवाठेको 
अश्वमेध यज्ञका पूरा-पूरा फू मिरूता है। जो वहां 
नियम ओर उपवासके द्वारा अपने इारीरको सुखाता है 
केवर जरू या वायु पीकर अथवा पत्ते चबाकर तपस्या 
करता है, वेदीपर सोता है तथा यम ओर नियर्मोका 


पृथक्‌-पृथक्‌ पालन करता है, वह रुद्ध हो ब्रह्माजीके 


परम पदको प्राप्त होता है। जिन्होने सरस्वती तीर्थम 


डाब्द तिरूभर भी सुवर्णका दान किया है, उनका वह दान 
एते मेरुपर्वतके 


5 दानके समान फक देनेवाल हन्य 





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सृष्टिखण्ड ] 


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पीढियेकि साथ स्वर्गलोकमें जार्येगे । वह तीर्थ पितरोको 
बहुत ही प्रिय है, वहां एक ही पिण्ड देनेसे उन्हे पूरण तृप्ति 
हो जाती है] वे पुष्करतीर्थके द्वारा उद्धार पाकर 
ब्रह्मलोकमे पधारते हें । उन्हें फिर अन्न--भोगोकी इच्छा 
नहीं होती, वे मोक्षमार्गमें चङे जाते है । अब मै सरस्वती 
नदी जिस प्रकार पूर्ववाहिनी हुई, वह प्रसङ्ग बतलाता 
रहः सुनो । | 

पहरेकी बात है, एक बार इन्द्र॒ आदि समस्त 
देवताओंकी ओरसे भगवान्‌ श्रीविष्णुने सरस्वतीसे 
कहा-- "देवि ! तुम पञश्चिम-समुद्रके तटपर जाओ ओर 
इस बडवानलको ठे जाकर समुद्रम डारु दो। एेसा 
करनेसे समस्त देवताओंका भय दूर हो जायगा । तुम 
माताकी भांति देवताओंको अभय-दान दो 1 सबको 
उत्पन्न करनेवाठे भगवान्‌ श्रीविष्णुकी ओरसे यह आदेडा 
मिलनेपर देवी सरस्वतीने कहा--*भगवन्‌ ! मेँ स्वाधीन 
नहीं हः आप इस कार्यके ल्य मेरे पिता ब्रह्माजीसे 
अनुरोध कीजिये । पिताजीकी आज्ञाके बिना मे एक पग 
भी कहीं नहीं जा सकती ।' सरस्वतीका अभिप्राय 
जानकर देवताओनि ब्रह्माजीसे कहा-- पितामह । 


; आपकी कुमारी कन्या सरस्वती बड़ी साध्वी हे--उसमें 
किसी अरकारका दोष नदीं देखा गया है; अतः उसे 


छोड़कर दूसरा कोई नहीं हे, जो बडवानलको ठे 
जा सके । 

पुलस्त्यजी कहते है -देवताओंकी नात सुनकर 
ब्रह्माजीने सरसख्तीको बुलाया ओर उसे गोदमें ठेकर 
उसका मस्तक सघा । फिर बडे सेहके साथ कहा - 
"बेटी ! तुम मेरी ओर इन समस्त देवता्ओंकी रक्षा करो । 
देवताअकि प्रभावसे तुम्हं इस कार्यके करनेपर बड़ा 


सम्मान प्राप्त होगा। इस बडवानलको ठे जाकर खार 
, पानीके समुद्रम डारु दो ” पिताके वियोगके कारण 


नाल्िकाके जेत्रेमि ओंसू छल्छला आये । उसने 


ब्रह्माजीको रणाम करके कहा-- "अच्छा, जाती दू । 


उस समय सम्पूर्ण देवताओं तथा उसके पिताने भी 
कहा-- “भय न करो 1' इससे वह भय छोड़कर प्रसन्न 


 चिततसे जानकी तैयार हुई । उसकी यात्राके समय राद्ख 


* पुष्कर क्षित्रमे ब्रह्माजीक्ा यज्ञ ओर सरस्वतीका भ्राकख्य * ` | 


निव 1 








ओर नगार्ोकी ध्वनि तथा मङ्गरूघोष होने गा, जिसकी 
आवाजसे सारा जगत्‌ मंज उठा । सरस्वती अपने तेजसे 
सर्वत्र प्रकाडा फैलाती हुई ची । उस समय गङ्गाजी 
उसके पीछे हो लीं । तब सरस्वतीने कहा-- सखी ! तुम 
कहां आती हो ? यै फिर तुमसे मिर्टूगी ।' सरस्वतीके 
सा कहनेपर गङ्गाने मधुर वाणीम कहा- “शुभे ! अब 
तो तुम जब पूर्वदिदामें आओगी तभी मुञ्चे देख 
सकोगी । देवताओंसहित तुम्हार दर्शन तभी मेरे खयि 
सुरूभ होः सकेगा ।' यह सुनकर सरस्वतीने कहा-- 
इाचिस्मिते ! तब तुम भी उत्तराभिमुखी होकर ोकका 
परित्याग कर देना" गङ्गा बोलीं--सखी ! मे 
उत्तराभिमुखी होनेपर अधिक पवित्र मानी जाऊंगी ओर 
तुम ॒पूर्वाभिमुखी होनेपर। उत्तरवाहिनी गङ्गा ओर 
पूर्ववाहिनी सरस्वतीम जो मनुष्य श्राद्ध ओर दान करगे 
वे तीनों ऋणेसि मुक्त होकर मोक्षमार्गका आश्रय 
ठेगे- इसमे कोई अन्यथा विचार करनेकी आवङयकता 
नहीं हे । | 
इसपर वह सरस्वती नदीरूपमें परिणत हो गयी । 
देवताओंके देखते-देखते एक पाकरके वृक्षकी जड्से 
प्रकट हुई । वह वृक्ष भगवान्‌ विष्णुका स्वरूप हे । 
सम्पूर्णं देवताओंनि उसकी वन्दना की हे । उसकी अनेको 
ङाखा्प सब ओर फैली हदं हं । वह दूसरे ब्रह्माजीकी 
भति डोभा पाता है । यद्यपि उस वुक्षमें एक भी फ 
नहीं है, तो भी वह डाकि्योपर बैठे हए रुक आदि 
पक्षियेके कारण फूलये रूदा-सा जान पडता हे । 
सरस्वतीने उस पाकरके समीप स्थित होकर देवाधिदेव 
विष्णुसे कहा-- “भगवन्‌! समुञज्ञे बडवाभ्ि समर्पित 
कीजिये; मै आपकी आज्ञाका पालन करूगी ।' उसके 
सा कहनेपर भगवान्‌ श्रीविष्णु बोके-"श॒भे ! तहं 
इस बडवानरुको पञ्चिम-समुद्रकी ओर छे जते समय 
जलनेका कोई भय नहीं होगा । 












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सौप दिया। उसने उख घडको स अपने र 8 


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॥ | कुण्डी हवन किया था, उन सबको जटसे आ्ावित 
| करके प्रकट हई । इस प्रकार पुष्कर क्षत्रमे परम पवित्र 
सरस्वती नदीका प्रादुर्भाव हआ । जगत्को जीवनदान 
देनेवाटी वायुने भी उसका जल लेकर वहांके सब 
ती्थमिं डर्‌ दिया। उस पुण्यक्ेत्रमे पहुंचकर 
पुण्यसकिला सरस्वती मनुष्योके पा्पोका नाद्घा करनेके 
लिये स्थित हो गयी । जो पुण्यात्मा मनुष्य पुष्कर तीर्थमें 
विद्यमान सरस्वतीका दर्शन करते है, वे नारकी जीवोकी 
॥ ^  अधोगतिका अनुभव नहीं करते। जो मनुष्य उसमे 
/  भक्ति-भावके साथ सान करते है, वे जह्यलके 
^ पर्हुचकर ब्रह्माजीके साथ आनन्दका अनुभव करते हैं| 
ध जो मनुष्य ज्येष्ठ पुष्करमे स्नान करके पितरोका तर्पण 
करता हे, वह उन सबका नरकसे उद्धार कर देता है तथा 
स्तयं उसका भी चित्त शद्ध हो जाता है । ब्रह्माजीके केत्रमे 
पुण्यसकिला सरस्वतीको पाकर मनुष्य दूसरे किस 
तीर्थकी कामना करे--उससे बढ़कर दूसरा तीर्थ है ही 
कोन 2 सम्पूर्णं तीथेनिं लान करनेसे जो फल प्राप्त होता 
है, वह सब-का-सन ज्येष्ठ पुष्करे एक नार बकी 
/\  ठगानेसे मिरु जाता है । अधिक कव्या कहा जाय-- 
(| जिसने पुष्कर क्षेत्रका निवास, च्येष्ठ कुण्डका जल तथा 
( उस तीर्थमे मृत्यु-ये तीन बातें पराप्त कर लीं, उसने 
परमगति पा ्ी। जो मनुष्य उत्तम काल, उत्तम क्षत्र 
(|| तथा उत्त तीर्थे खान ओर होम करके ब्राह्मणको दान 
॥ इता है, वह अक्षय सुखका भागी होता है । कार्तिक ओर 
४ पक्षमे तथा चन्द्रमा ओर सूर्यके ग्रहणके 
। समय सान केयोग्य कुुजाङ्गरुदेशमें जितने क्षेत्र ओर 
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(मि ॥ न. च + #. 
५, थात्‌ 





* अर्चयस्व हषीकेदां यदीच्छसि परं पदम्‌ * 


ह -------------- 
४. 2.1 १.४.४४. ६.४... २.१५ ४.4..द.4. 1.1.11 
४.४. 94.4.44... 1.1 
वहं महानदी पुष्करे पर्हुची ओर जह्याजीने जिन-जिन रहकर ष्ठ फलका उपभोग करता है । इसख््यि 8 
ये 


उचित है कि वह पूरा भरयल करके र 
परप्तिके छियि--वहांकी यात्रा करनेके ४ # 
विचार स्थिर करे । मति स्मृति, प्रज्ञा, मेधा त 
युभ वाणी-- ये छः सरस्वतीके पर्याय बतल्ये ् 
जो पुष्करके वनमे, जहाँ आची सरस्वती हे, जाकर = 
जलका दजन भर कर लेते है, उन्हे भी अश्वमेध यज्ञका 

फल मिक्ता है तथा जो उसके भीतर गोता ध 
स्नान करता हे, वह तो ब्रह्माजीका अनुचर होता है। जे 


मनुष्य वहां विधिपूर्वक श्राद्ध करते है वे पितरोको 


डःखलदायी नरकसे निकारकर स्वर्गमे पचा देते है । जे 
सरस्वतीमें स्नान करके पितरोको कुडा ओर तिलसे युक्त 
जक दान करते है, उनके पितर हर्षित हो नाचने लगते 
हँ । यह पुष्कर तीर्थ सन ती्थेसि श्रेष्ठ माना गय है 
क्योकि यह आदि तीर्थ है । इसीखिये इस पृथ्वीपर्‌ यह 
समस्त तीथमिं विख्यात है । यह मानो धर्म ओर मोक्षकी 
क्रीडास्थरी हे, निधि है । सरखतीसे युक्त होनेके कारण 
इसकी महिमा ओर भी बढ़ गयी है । जो लोग पुष्कर 
तीर्थम सरस्वती नदीका जल पीते है वे ब्रह्मा ओर 
महादेवजीके द्वारा प्रडोसित अक्षय लोकोको प्रप्र होते 
हे । धर्मके तत्वको जाननेवाठे मुनिरयोने जहाँ -जहं 
सरस्वतीदेवीका सेवन किया है, उन सभी स्थानम वे , 
परम पवित्ररूपसे स्थित हैः किन्तु पुष्करमें वे अन्य । 
स्थल्की अपेक्षा विरोष पवित्र मानी गयी है । पुण्यमयी ` 
सरस्वती नदी संसारम सुलभ है; किन्तु कुरुक्षेत्र, 
प्रभासक्षेत्र ओर पुष्करकषेत्रमे तो वह बड़े भाग्यसे 
म्ाप् होती है। अतः वहाँ इसका दर्दान दुर्भ नताया 
गया है। सरस्वती तीर्थं इस भूतलूके समस्त तीर्थम 
्रेष्। होनेके साथ ही घर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष--ईन 
चारों पुरुषार्थोका साधक है । अतः मनुष्यको चाहिये कि 


वह ज्येष्ठ, मध्यम तथा कनिष्ठ--तीनों पुष्करेमे 


यलपूर्वक खान करके उनकी प्रदक्षिणा करे । तत्पाप । 
दिनं पितामहो बरन क! च 









सुषठिखण्ड ] 


* सरस्वतीके नन्दा नाम पड्नेका इतिहास ओर उसका माहात्म्य # 


५५५५ 


3444441... 11111111... 44 14.44.444... 4.444.444 णः ० 21.1.14.1.4.4.4.5.4.: 


तथा विलोमक्रमसे अर्थात्‌ कनिष्ठ, मध्यम ओर ज्येष्ठ 
पुष्करमें स्नान करना चाहिये । इसी प्रकार वह उक्त 
तीनों पुष्करोमेसे किसी एकमे या समे नित्य स्नान 
करता रहे । 

पुष्कर क्षेत्रमे तीन सुन्दर रिखर ओर तीन ही खरोत 
है । वे सब-के-सब पुष्कर नामसे ही प्रसिद्ध हैँ । उन्हें 
ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर ओर कनिष्ठ पुष्कर कहते है । 
जो मन ओर इद्िर्योको वराम करके सरस्वतीमें सान 
करता ओर ब्राह्मणको एक उत्तम गो दान देता है, वह 
रासीय आज्ञाके पालनसे शुद्धचित्त होकर अक्षय 
लोकोको पाता है । अधिक क्या कँ जो रात्रिके समय 
भी स्नान करके वहाँ याचकको धन देता है, वह अनन्त 


, सुखका भागी होता है । पुष्करमें तिरू-दानकी मुनिरोग 


अधिक प्ररंसा करते हैँ तथा कुष्णपक्षकी चतुर्दशीकी 
वहाँ सदा ही स्नान करनेका विधान हे । 

भीष्मजी ! पुष्कर वनमें पर्हैचकर सरस्वती नदीके 
प्रकट होनेकी बात बतायी गयी । अब वह पुनः अदुङ्य 
होकर वहसे पश्चिम दिराकी ओर चरी । पुष्करसे थोड़ी 
ही दूर जानेपर एक खजुरका वन मिला, जो फर ओर 
फुल्रंसे सुशोभित था; सभी ऋतुओंके पुष्प उस 
वनस्थलीकी डोभा बढा रहे थे, वह स्थान मुनिरयोकि भी 
मनको मोहनेवाला था। वहोँ पर्हवकर नदियेमिं श्रेष्ठ 
सरस्वतीदेवी पुनः प्रकट हई । वहो वे नन्दा" के नामसे 
तीनों लोकमि प्रसिद्ध हुई । 


------- क 4 ----- 
सरस्वतीके नन्दा नाम पड्नेका इतिहास ओर उसका माहात्म्य 


सूतजी कहते है--यह सुनकर देवव्रत भीष्मने 
पुस्त्यजीसे पृछा--““ब्रह्मन्‌ ! सरिताओंमें श्रेष्ठ नन्दा 
कोई दूसरी नदी तो नहीं है 2 मेरे मनमें इस बातको 
ठेकर बड़ा कौतूहरु हो रहा है कि सरस्वतीका नाम 
“नन्दा' कैसे पड़ गया । जिस प्रकार ओर जिस कारणसे 
वह “नन्दा नामसे प्रसिद्ध हुई, उसे बतानेकी . कृपा 
कीजिये ।'' भीष्मके इस प्रकार पृञनेपर पुरुस्त्यजीने 
सरस्वतीका "नन्दा नाम क्यों पड़ा, इसका प्राचीन 
इतिहास सुनाना आरम्भ किया । वे बोरे--भीष्म ! 
पहठेकी बात है, पृथ्वीपर प्रभञ्जन नामसे प्रसिद्ध एक 
महाबली राजा हो गये है । एक दिन वे उस वनम मूर्गोका 
शिकार खेर रहे थे । उन्होने देखा, एकं ज्ञाड़ीके भीतर 
मृगी खड़ी है । वह राजाके ठीक सामने पडती थी । 
प्रभञ्जनने अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चलकर मुगीको बींध 
डालर । आहत हरिणीने चकित होकर चारों ओर दृष्टिपात 


किया । फिर हाथमे धनुष-बाण धारण किये राजाको 


खड़ा देख वह बोटी--“ओ मूढ़ ! यह तूने क्या 
किया ? तुम्हारा यह कर्मं पापपूर्ण है । भै यहां नीचे मुह 


` किये खड़ी थी ओर निर्भय होकर अपने बच्चेको दूध 
पिला रही थी । इसी अवस्थां तूने इस वनके भीतर मुञ्च 
निरपराध हरिणीको अपने वञ्रके समान बाणकां निडाना 


घोर ओर भयानक थी 1 वह उस वनम कारूके वहीभूत 





बनाया है । तेरी बुद्धि बड़ी खोटी है, इसि तु कचा 
मोस खानेवाठे पडाकी योनिमें पड़ेगा । इस कण्टकाकीर्णं . 
वनमें तू व्याघ्र हो जा।' 

मृगीका यह शाप सुनकर सामने खड़े हए राजाकी 
सम्पूर्णं इन्द्रियां व्याकुरू हो उठीं। वे हाथ जोड़कर 
बोठे-"कल्याणी ! गै नहीं जानता था कि तु लच्चेको 
दूध पिला रही है, अनजानमें मेने तेर वधं किया हे 1 
अतः मुञ्चपर प्रसन्न हो ! मेँ व्याघ्रयोनिको त्यागकर पुनः 
मनुष्य-शरीरको कब प्राप्त करूगा ? अपने इस रापके 
उद्धारकी अवधि तो बता दो ।' राजाके एेखा कहनेपर 
मृगी बोली-- "राजन्‌ ! आजसे सौ वर्ष बीतनेप्र यहाँ 
नन्दा नामकी एक गौ आयेगी ! उसके साथ तुम्हारा 
वार्तालाप होनेपर इस रापका अन्त हो-जायगा 1 

पुलस्त्यजी कहते है मृगीके कथनानुसार राजा 
प्रभञ्जन व्याघ्र हो गये 1 उस व्याघ्रकी आकृति बड़ी ही 





हुए मृगो, अन्य चौपायों तथा मनुष्योको भी मार-मारकर ` 

खाने ओर रहने रुगा। वह अपनी निन्दा कसते हए 
कहता था, हाय ! अब मै सुनः कन मनुष्य-कारीर धारण ` 
करूगा ? अबसे नीच योनिम डारुनेवाखा एेसा नि ४ क । 
कर्म--महान्‌ पाप नहीं करूंगा । अब इस योनिम मेः 4 













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दवारा पुण्य नहीं हो. सकता । एकमात्र हिसा ही मेरी मेरा गास नियत किया है, क्योकि ह: 


तू सयं यहं आ 


जीवन-वृ्ति हे, इसके द्वारा तो सदा दुःख ही प्राप्त होता है । 
किस प्रकार मृगीकी कही हई बात सत्य हो सकती है ?' 

, जब व्याघ्रको उस वनमें रहते सौ वर्ष हो गये, त 
एक दिन वहो गोओंका एक बहुत बड़ा ड्ुड उपस्थित 
हुआ । वहां घास ओर जूकी विरोष सुविधा थी, वही 
गोओकि आनेमें कारण हुई । आते ही गौओकि विश्रामके 
खयि बाड रगा दी गयी । ग्वालोके रहनेके स्थि भी 
साधारण घर ओर, स्थानकी व्यवस्था की गयी । 
गोचरभूमि तो वहां थी ही । सबका पड़ाव पड़ गया । 
वनके पासका स्थान गोओंके रंभानेकी भारी आवाजसे 
गूजने कगा। . मतवारे गोप चारों ओरसे उस 
गो-समुदायकी रक्षा करते थे । 

गोओकि ञ्ंडमें एक बहुत ही हष्ट-पुष्ट तथा सन्तुष्ट 
रहनेवाली गाय थी, उसका नाम था नन्दा । वही उस 
जडम प्रधान थी तथा सबके आगे निर्भय होकर चला 
करती थी । एक दिन वह अपने ञ्युडसे बिद्ड गयी ओर 
चरते-चरते पूर्वोक्तं व्याघ्रके सामने जा पर्हची । व्याघ्र उसे 














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उपस्थित हुई है ॥ व्याघ्रका यह रोगे खड कर देवाछ 
निष्ठुरः वचन सुनकर उस गायको चन्द्रमाके सं 
कान्तिवाक़े अपने सुन्दर बछड़ेकी याद आने श 


उलकरा गल भर आया-- वह गद्गद स्वरसे पुत्रके छि 
हृद्धार करने ठगी । उस गौको अत्यन्त दुखी हक | 


क्रन्दन करते देख व्याघ्र बोला- अरी गाय ! संसासम 
सब लोग अपने कर्मोका ही फल भोगते है । तू स्वय मे 
पास आ पर्हुची है, इससे जान पडता है तेरी मृत्यु आज 


ही नियत हे । फिर व्यर्थं रोक वयों करती है > अच्छ ` 


यह तो बता-- तू रोयी किसख्वयि ?' 

व्याघ्रका प्रभ्र सुनकर नन्दाने कहा-- “व्याघ्र । 
तुम्हं नमस्कार है, मेरा सारा अपराध क्षमा करो । मै 
जानती हं तुम्हारे पास आये हुए प्राणीकी रक्षा असम्भव 


है; अतः मैँ अपने जीवनके छियि शोक नहीं करती । मूल , 
तो मेरी एक-न-एक दिन होगी ही [फिर उसके छि ` 


क्या चिन्ता] । किन्तु मृगराज ! अभी नयी अवस्थामें मेन 
एक बछ्डेको जन्म दिया है । पहली बियानका बच्चा 
होनेके कारण वह मुञ्चे बहुत ही प्रिय है । मेरा बच्चा अभी 


दूध पीकर ही जीवन चखाता है । घासको तो वह सूघता 
भी नहीं । इस समय वह गोष्ठमे बधा है ओर भूखसे , 


पीडित होकर मेरी राह देख रहा है । उसीके छ्य मुष > 


लारम्बार रोक हो रहा है । मेरे न रहनेपर मेरा च्चा कैसे 


जीवन धारण करेगा ? मैं पत्र-सेहके वडीभूत हो रही ह 


ओर उसे दूध पिलाना चाहती हू । [मुञ्चे थोड़ी देके 
चयि (जाने दो।] बछूडेको पितलाकर प्यारसे उसका 
मस्तक चार्दैगी ओर उसे हिताहितकी जानकारीके लि 
कुछ उपदेशा कर्गी; फिर अपनी सखि्योकी देखे 
उसे सौपकर तुम्हारे पास तछौट आऊँगी । उसके बाद तुम 
इच्छानुसार मुञ्चे खा जाना । 

नन्दाकी बात सुनकर व्याने कहा-- अर , 
ते पत्रसे क्या काम है ?' नन्दा बोटी- मृगे ` , 
पहके-पहरू बड़ा व्यायी हूं [अतः उसके रति मे 
बड़ी ममता है, मुञ्चे जाने दो] । सखिर्योको, नन्दे जचेकी 
रक्षा करनेवाले ग्वाल ओर गोपिर्योको तथा 





. 


स 99 9 म 9 9 


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सुष्टिखण्ड ] * सरस्वतीके नन्दा नाम पडुनेका इतिहास ओर उसका माहात्म्य * ५. 


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अपनी जन्मदायिनी माताको देखकर उन सबसे विदा मस्तक चाटो तथा माता, भाई, सखी, स्वजन एवे बन्धु- 
लेकर आ जाऊगी-- मेँ रापथयूर्वैक यह बात कहती ह| बान्धर्वोका दर्दान करके सत्यको आगे र्खलकर ङीघ् ही 
यदि तुम्हें विश्वास हो, तो मुञ्ञे छोड दो । यदि मेँ पुनः यहां लौट आओ । 
लौटकर न आऊँ तो मुञ्ञे वही पाप रुगे, जो ब्राह्मण तथा  पुलस्त्यजी कहते है-- वह पुत्रवत्सला धेनु बड़ी 
माता-पिताका वध करनेसे होता है । व्याधो, म्छेच्छों सत्यवादिनी थी । पूर्वोक्त प्रकारसे डापथ करके जब वहं 
ओर जहर देनेवाल्को जो पाप.रूगता है, वही मुञ्ञे भी व्याघ्रकी आज्ञा के चुकी, तब गोष्ठकी ओर चटी । उसके 
रगे । जो गोरालामें विघ्र डाूते है, सोते हए प्राणीको मुखपर आंसुओंकी धारा बह रही थी । वह अत्यन्त दीन 
मारते हैँ तथा जो एक बार अपनी कन्याका दान करके भावसे कप रही थी । उसके हदयमें बड़ा दुःख था । वह 
फिर उसे दूसरेको देना चाहते है, उन्हे जो पाप रगता है, रोकके समुद्रम डूबकर बारम्बार ईकराती थी । नदीके 
वही मुञ्ञे भी रगे। जो अयोग्य बैलगसे भारी बोञ्ञ॒ किनारे गोषठपर पर्हैवकर उसने सुना, नडा पुकार रहा हे । 
उठवाता है, उसको रगनेवारा पाप मुञ्चे भी रुगे। जो आवाज कानमे पड़ते ही वह उसकी ओर दौडी ओर 
कथा होते समय विघ्न डारता है ओर जिसके घरपर निकट पर्हुचकर नेतरोसे आंसू बहाने गी । माताको निकट 
आया हुआ मित्र निरादा रौट जाता है, उसको जो पाप पाकर बछडेने राङ्कित होकर पूछा-- मों ! [आज क्या 
गता है, वही म॒ञ्ञे भी कगे, यदि गैं पुनः लौटकर न॒ [इ 
आऊँ । इन भयंकर पातकोकि भयसे मै अवदय आऊंगी  [ ` >“: ~ = . ~" 
नन्दाकी ये इापर्थ सुनकर व्याघ्रको उसपर विश्वास 
हो गया । वह बोला--““गाय ! तुम्हारी इन रापथोंसे 
मुञ्ञे विश्वास हो गया है । पर कुछ रोग तुमसे यह भी 
करेगे कि स्ीके साथ हास-परिहासमे, विवाहे, गोको 
संकटसे बचानेमे तथा प्राण-संकट उपस्थित होनेपर जो 
साप की जाती है, उसकी उपेश्नासे पाप नहीं रुगता 
किन्तु तुम इन बातोपर विश्वास न करना । इस संसारम 
कितने ही एेसे नास्तिक दै, जो मूर्खं होते हुए भी अपनेको 
पण्डित समञ्चते है; वे तुम्हारी बुद्धिको क्षणभसमें श्रमे 
डाक देगे । जिनके चित्तपर अज्ञानका परदा पड़ा रहता है, 
वे क्षुद्र मनुष्य कुतर्वपूर्णं॒युक्तियों ओर दुष्टान्तोसे 
दूसरोको मोहे डार देते है । इसख्यि तुम्हारी बुद्धिम 
यह बात नहीं आनी चाहिये किं मैने रापर्थोद्रारा व्याघ्रको 
ठग छया । तुमने ही सुज्ञ धर्मका सारा मार्ग दिखाया है; हो गया है ?1 मेँ तुमह प्रसन्न नहीं देखता, तुम्हारे हदये 
अतः इस समय तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करो!" शान्ति नहीं दिखायी देती 1 तुम्हारी द्ष्टिमें भी व्यग्रता है 
नन्दा बोली--साधो ! तुम्हारा कथन ठीक है, आज तुम अत्यन्त डरी हुईं दीख पड़ती हो । | 
तुम्हे कौन ठग सकता है । जो दूसरोको ठगना चाहताहै, नन्दा बोली--जेटा ! स्तनपान के, यह 
वह तो अपने-आपको ही ठगता हे । हमलगोकी अन्तिम भेट हे; अबसे तुम्हं माताका दर्दान ` 
व्याघ्रने कहा--गाय ! अब तुम जाओ। दुभ हो जायगा 1 आज एक दिन मेरा दूध पीकर ठ त कल ` 
ुत्रवतसके ! अपे पुत्रको देखो, दू पिलाओ, उसका सबसे किसका पयोगे ? वत्स ! मुहे अभी लट जना 











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है, मँ शापथ करके यहोआयी हूँ । भूखसे पीडित बाघको 
सुज्ञ अपना जीवन अर्पण करना है । 
५, बछड़ा बोल्ा-- मां ! तुम जहाँ जाना चाहती हो. 
वहां म भी चर्टूगा । तुम्हारे साथ मेरा भी मर जाना ही 
अच्छा हे । तुम न रहोगी तो मै अकेठे भी तो मर ही 
जाऊंगा, [फिर साथ ही वयो न मरः ?] यदि बाघ तुम्हारे 
साथ मुञ्चे भी मार डारेगा तो निश्चय ही मुञ्जको वह उत्तम 
गति मिकेगी, जो मातुभक्त पुत्रोको मिला करती है । अतः 
मै तुम्हारे साथ अवरय चर्टगा । मातासे बिङ्कडे हए 
बारूकके जीवनका क्या प्रयोजन है ? केव दूध पीकर 
रहनेवाङे बच्चोके लिय माताके समान दूसरा कोई बन्धु 
नहीं है । माताके समान रक्षक, माताके समान आश्रय, 
माताकेः समान सेह, माताके समान सुख तथा माताके 
समान देवता इहरोक ओर परलोकमें भी नहीं है । यह 
।  ब्रह्माजीका स्थापित किया हुआ परम धर्म है । जो पुत्र 
॥ इसका पार्न करते है, उन्हं उत्तम गति प्राप होती है ।# 
नन्दाने कहा- बेटा ! मेरी ही मुत्यु नियत है, तुम 
वहां न आना । दूसरेकी मूत्युके साथ अन्य जीवोंकी मृत्यु 
नहीं होती [जिसकी मृत्यु नियत है, उसीकी होती है] । 
तुम्हारे छिये माताका यह उत्तम एवं अन्तिम सन्दे हैः 
मेरे वचरनोका पारन करते हुए यहीं रहो, यही मेरी सबसे 
` जड़ी शुश्रूषा है । जर्के समीप अथवा वनम विचरते हए 
कभी प्रमाद न करना; ्रमादसे समस्त प्राणी नष्ट हो जाते 
है । खोभवा कभी एेसी घासको चरनेके छि न जाना, 











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 † समुद्रमटवीं दुर्ग ` ६ । लोभादव म 
११ ^ 4 4 ॥ि। (र = (3 हि , ५ # ५ क र +^ न | न 9 + ५५ , ध ४ 
मा क्षीयते जगत्‌ तस्माल्टलोभ न कुर्वीत न प्रमादं न विश्वसेत्‌ त्‌ ॥ 
पयलतः श्वापदेभ्यश्च म्लेच्छचोरादिसङ्कटे ॥ 


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त यै ५ त ~ च ॥ 
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जो किसी दुर्गम स्थानमे उगी हो; क्योकि 
ओर परलोके भी सबका विना हो 
मोहित होकर लोग समुद्रम, घोर वनम 

स्थानेमें धि नमे त्‌ 
स्थानम भी प्रवेहा कर जाते है । लोभके रिः ४ 
पुरूष भी भयकर पाप कर बैठता हे । लोभ, 
हर एकके प्रति विश्वास कर लेना- इन तीन 


जाता हे । लभर 


जगतक्ता नारा होता हे; अतः इन तीनां दोषोका परित्याग 


करना चाहिये । बेटा ! सम्पूर्ण शिकारी जीवसे तथा 


म्टेच्छ ओर चोर आदिके द्वारा संकट प्राप्त हनेपर सद्‌ 
प्रयलपूर्ंक अपने इारीरकी रक्षा करनी चाहिये। 
पापयोनिवाठे पडु-पक्षी अपने साथ एक स्थानपर निवास ` 


करते हों, तो भी उनके विपरीत चित्तका सहसा पता नही 


ठगता। नखवाले जीर्वोका, नदियोंका, संगवे ` 
परुओंका, राख धारण करनेवाल्रंका, ख्िर्योका तथा ` 
ूर्तोका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये । जिसपर पहले ` 
कभी विश्वास नहीं किया गया हो, एेसे पुरुषपर तो विश्वास ` 
करे ही नहीं, जिसपर विश्वास जम गया हो, उसपर भी ` 
अत्यन्त विश्वास न करे, क्योकि [अविश्वसनीयपर] ` 
विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह विश्वास 


( संक्षिप पम | 


१,३.१.१.१..१... 4.4.11. 1. १.4.11. 1.1.122 4 
५.४. ६.४... 4... कच 
.४.4.2.1.4.1.1.1.2 9 क 
क 


ोभसे इहलेड 


षा 


चमाद्‌ तथा ` 


करनेवाङेका समूरू नादा कर डारता है । ओरोकी तो ` 


बात ही क्या है, अपने इारीरका भी विश्वास नहीं कला 
चाहिये । भीरुस्वभाववाले बालकका भी विश्वास न कट + 


1 
वयोकि बालक डराने-धमकानेपर प्रमादवह गुप्त बात भ ` 


दूसररोको बता सकते हैँ ।† सर्वत्र ओर सदा सघत हए 





(१८ । ३५३-५४) 


विज्ञायन्ते न पुत्रक ॥ 














नि 
~ = नक > ० 


१) च्य म भि मो 


0 3 
1" 
प 


सृष्टिखण्ड ] * सरस्वतीके नन्दा नाम पड़नेका इतिहास ओर उसका माहात्म्य * ५९ 


11.11.111. 11.4.41 44441... 11.4.41 11.44.434 44444 णण 71.7.44... 4.4. 444 





ही चलना चाहिये; क्योकि गन्धसे ही ग्ण भली-लुरी 
वस्तुकी परख कर पाती हे । भयंकर वनमें कभी अकेला 
न रहे । सदा धर्मका ही चिन्तन करे । मेरी मृत्युसे तुम्हं 
घबराना नहीं चाहिये; क्योकि एक-न-एक दिन सबकी 
म॒त्यु निश्चित है । जैसे कोई पथिक छायाका आश्रय 
छेकर बैठ जाता है ओर विश्राम करके फिर वहाँसे चल 
देता है, उसी प्रकार प्राणियोंका समागम होता है ।# 
बेटा ! तुम होक छोड़कर मेरे वचनोका पालन करो । 
पुलस्त्यजी कहते है यह कहकर नन्दा पुत्रका 
मस्तक सुघकर उसे चाटने गी ओर अत्यन्त रोकके 
व्ीभूत हो डबडबायी हुईं ओंखोसे बारम्बार म्बी सस 
लेने लगी । तदनन्तर बारम्बार पुत्रको निहारकर वह 
अपनी माता, सखियों तथा गोपि्योके पास जाकर 
नोली-- "माताजी ! मैं अपने ञुडके आगे चरती हुई 
चली जा रही थी । इतनेमें ही एक व्याघ्र मेरे पास आ 
परहचा । मैने अनेकों सौगंधं खाकर उसे रट आनेका 
विश्वास दिलाया है; तब उसने मुञ्चे छोड़ा हे । मँ बेटेको 
देखने तथा आपलोगेसि मिलनेके खयि. चटी आयी थी; 
अब फिर वहीं जा रही हू मां! मने अपने दुष्ट 
स्वभावके कारण तुम्हारा जो-जो अपराध किया हो, वह 
सब क्षमा करना । अन अपने इस नातीको कड़का करके 
मानना । [सखिर्योकी ओर मुडकर] प्यारी सखियो ! 
मैने जानकर या अनजानमे यदि तुमसे कोई अभ्रिय नात 
कह दी हो अथवा ओर कोई अपराध किया हो तो उसके 
चयि तुम सब मुञ्चे क्षमा कसना । तुम सब सम्पूर्ण 
सदुणोसे युक्त हो । तुममे सब कु देनेकी राक्ति हे । मेरे 
बालकपर सदा क्षमाभाव रखना । मेरा बच्चा दीन, अनाथ 
ओर व्याकुक है; इसकी रक्षा करना । मे तुम्ही कोगोको 
इसे सोप रही हः अपने पुत्रकी ही भति इसका भी पोषण 
करना । अच्छा, अन क्षमा माँगती हू । म सत्यको अपना 


# यथा हि पथिकः कश्चिच्छायामाश्रित्य तिष्ठति । विश्रम्य 


† उक्त्वानृतं भवेद्‌ यत्र प्राणिनौ प्राणरक्षणम्‌ । अनृतं तत्र स्य स्यात्‌ सत्यमप्यनृतं भवेत्‌॥ ` 





चुकी ह अतः व्याघ्रके पास जाऊंगी । सखिर्योको मेरे 
छ्य चिन्ता नहीं कस्नी चाहिये ।' 7 < 

नन्दाकी बात सुनकर उसकी माता-ओर सखिर्योको 
जड़ा दुःख हुआ। वे अत्यन्त. आश्चर्यं ओर विषादं 
पड़कर बोटीं-- "अहो 1 यह बडे आश्चर्यकी बात हेकि 
व्याघ्रके कहनेसे सत्यवादिनी नन्दा पुनः उस भयङ्कर 
स्थानमें प्रवेङा करना चाहती ह । रापथ ओर सत्यक 
आश्रयसे रत्रको धोखा दे अपने ऊपर आये हए महान्‌ 
भयका यलपूर्वक नारा करना चाहिये । जिस उपायसे 
आत्मरक्षा हो सके, वदी कर्तव्य है 1 नन्दे ! तुम्हे वहां 
नही जाना चाहिये। अपने नन्हे-से हिरुको त्यागकर 
सत्यके लोभसे जो तू वहाँ जा रही है, यह तुम्हारे द्वारा 
अधर्म हो रहा है । इस विषयमे धर्मवादी ऋषिर्न पहले 
एक वचन कहा था, वह इस प्रकार हे । प्राणसंकट 
उपस्थित होनेपर रापथोके दवारा आत्मरश्ता करम पाप 
नहीं रुगता । जहाँ असत्य बोलनेसे प्राणिर्योकी प्राणरक्षा 
होती हो, वहाँ वह असत्य भी सत्य है ओर सत्य भी 
असत्य है 1" † | 

नन्दा बोली-बहिनो ! दूसरोके प्राण बचानेके 
स्यि मै भी असत्य कह सकती हू। किन्तु अपने 
छ्ियि--अपने जीवनकी रक्षाके लिय मेँ किसी तरह ञ्ूठ 
नहीं बोर सकती । जीव अकेठे ही गर्भम आता हे, 
अकेठे दही मरता है, अकेले दी उसका पालन-पोषण 
होता है तथा अकेले ही बह सुख-दुःख भोगता है; अतः 
मै सदा सत्य ही बोर्टूगी 1 सत्यपर ही संसार टिका हुआ 
हे, धर्मकी स्थिति भी सत्यमे ही हे । सत्यके कारण ही ` 


समुद्र अपनी मर्यादाका उल्ल्चन नहीं करता । राजा बक 
भगवान्‌ विष्णुको पृथ्वी देकर स्वयं पातालम चे गये 
ओर छसे बोधे जनेपर भी सत्यपर ही टे रहे। 
गिस्सिज विन्ध्य अपने सो शिखरोके साथ जढते-जदते 
च॒ पुनर्गच्छे्द्वद्ूतसमागमः ॥ ० 


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६० * अर्चयस्व हषीकेदां यदीच्छसि परं पदम्‌ * 


॥..4..8..4..2..4.8.4. 4. 9.4. 4. 4.4.444... 9.4.44. 1.1.211 14 क [त ` ` ` ~~ ॥..4.4.4.4...4.4.4.4. 4.4... 4.4.44... 2.2. 2.1.17 क 9 .२.५.२.२.८.६.1.21777 च क पुर 
१ ४१३६५ 
+ बहुत ऊचे हो गये थे [यहांतक कि उन्होनि सूर्यका मार्ग परम सत्यका आश्रय केकर अपने प्राणोका भी 


भी रोक छ्िया.था], किन्तु सत्यमे बैध जानेके कारण ही 
वे [महिं अगस्त्यके साथ किये गये] अपने नियमको 
नहीं तोडते। स्वर्ग, मोक्ष तथा धर्म- सब सत्यमे ही 
प्रतिष्ठित हँ; जो अपने वचनका लोप करता है, उसने 


| मानो सनका रेप कर दिया । सत्य अगाध जलसे भरा 


हुआ तीर्थ हे, जो उस शुद्ध सत्यमय तीर्थमें स्नान करता 
है, वह सब पापोंसे मुक्तं होकर परम गतिको प्राप्न होता 
है । एक हजार अश्वमेध यज्ञ ओर सत्यभाषण- ये दोनों 
यदि तराजुपर रखे जायं तो एक हजार अश्वमेध यज्ञोसे 
सत्यका ही पर्डा भारी रहेगा । सत्य ही उत्तम तप है, 
सत्य ही उत्कृष्ट राखज्ञान है । सत्यभाषणमें किसी 


कारका डा नहीं है । सत्य ही साधुपुरुषोंकी परखके 


खयि कसौटी है। वही सत्पुरुषोकी वंडा-परम्परागत 


सम्पत्ति हे । सम्पूर्णं आश्रयोमे सत्यका ही आश्रय श्रेष्ठ 


माना गया है। वह अत्यन्त कठिन होनेपर भी उसका 
पार्न करना अपने हाथमे है । सत्य सम्पूर्णं जगत्‌के 


खयि आभूषणरूप है। जिस सत्यका उच्चारण करके 





म्ङेच्छ भी स्वर्गमें पर्हैच जाता है, उसका परित्याग केसे 





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सखियां बोलीं नन्दे ! तुम सम्पूर्णं देवताओं 


| भ 
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= ष ४: | #  - " य । | तै = 4 दैत्यकि = ~ करनेयोग्य हो तुम 
41 ` -आर्‌ दत्यकं द्वारा नमस्कार क य क्योकि तु 
ति 4. 1 * १. ५२.०५६ ~ ५५ > > ^¢. क 

#. =, 3 व -----_______`_{_{_ ह 4 {९ 

ु } ‡ [१ 
स ^ न, प 

भ व संदिकष्यते 2. वदाम्यहम्‌ हम्‌ 
^ कः उदिक्ष्यते गर्भे मरणे भरणे तथा । भुङ्क्ते चैकः सुखं दुःखमतः सत्यं वदाम्यहम्‌ ॥ 
४१. चश न 1" ~^ ० नभ ^ ॥ 

न १.० क. + न ॐ = (= (न लोका ०. सत्यवाक्येन मर्यादं विलङ्घ्यति 
(य ० ^ सव्ये प्रतिष्ठिता लोका धर्मः सत्ये प्रतिष्ठितः । उदधिः सत्यवा म न ॥ 
= र 40 ~ ८ 4: "~<. 

व वलिः तिष्ठति 
. विष्णवे पृथिवीं द्वा बलिः. पातारूमास्थितः । छद्यनापि बकिर्बद्धः सत्यवाक्येन ॥ 
2 दि नातिवर्तते 
` . म्रवर्धमानः चैटेन्दरः र डातृद्गः समुच्छ्रितः । सत्येन संस्थितो विन्ध्यः प्रलन्धं नातिव ॥ 
धर्मः सर्वे वाचि प्रतिष्ठिताः । यस्ता लोपयते वाचमरोषं तेन लोपितम्‌ ॥ 
५ कः ॥ 





ब्रत च. परम च्शाद्‌ासनल।+म 


.चच जगतः 


1९५ ५८ < "€ 


"क 


संक्षिप्त 


रही हो, जिनका त्याग बड़ा ही कठिन हे | 
इस विषयमे हमलोग क्या कह सकती ११ 
धर्मका बीड़ा उठा रही हो। इसं सत्यके 
त्रिभुवनमें कोई भी वस्तु दुकभ नहीं है । इस 
त्यागसे हमलोग यही समञ्ती हैँ कि तुम्हारा अपने पु 
साथ वियोग नहीं होगा। जिस नारीका चि 
कल्याणमारगमे रगा हुआ है, उसपर कभी आपति 
नहीं आतीं । 


पुलस्त्यजी कहते हँ तदनन्तर ॒गोपियेत 


मिकुकर तथा समस्त गो-समुदायकी परिक्रमा के 


वकि देवताओं ओर वृक्षोंसे विदा ठे नन्दा वहसे च 


पड़ी । उसने पृथ्वी, वरुण, अग्रि, वायु, चन्द्रमा, दसं 


दिक्पाल, वनके वृक्ष, आकाडाके नक्षत्र तथा ग्रह- ज्ञ 
सबको बारम्बार प्रणाम करके कहा-- "इस वनमें जे . 
सिद्ध ओर वनदेवता निवास करते हँ, वे वनमें चसे हूए ¦ 
मेरे पुत्रकी रक्षा कर ।' इस प्रकार पुत्रके सहव ` 


बहुत-सी बातें कहकर नन्दा वहो प्रस्थित हुईं ओर उष । 
स्थानपर पर्हैची, जहो वह तीखी दाद ओर भयङ्क 
आकृतिवाल मांसभक्षी बाघ मह बाये बैठा था। उसके . 


पर्हैचनेके साथ ही उसका बडा भी अपनी पृछ ऊपर 


उठाये अत्यन्त वेगसे दोडता हुआ वहां आ गया ओर . 









सृष्टिखण्ड ] * सरस्वतीके नन्दा नाम पडुनेका इतिहास ओर उसका माहात्य * ६९ 


111 1111111 11 | 
कक ककव. 1.1.1.1.4.4.4.4. 44.11.111 11.1.11... 4.44... 442... 34 1.14. 4.4..4.4.4.: 1 1.1.4.4.4.4.4.4.4.1 





अपनी माता ओर व्याघ्र दोनेकि आगे खडा हो गया। आजसे तुम मेरी बहिन हई ओर यह तुम्हारा न मेरा 
पुत्रको आया देख तथा सामने खड़े हुए मृत्युरूप बाघपर भानजा हो गया । शभे ! तुमने अपने आचरणसे मुड्ख 
0 गत छ महान्‌ पापीको यह उपदेश दिया है किं सत्यपर ही 
= र सम्पूरणं कोक प्रतिष्ठित है । सत्यके ही आधारपर धर्म 


क ~ 
् 5 
न. 
~ गूर न्न 
<~ 4 


0 रः ४] रिका हुआ है। कल्याणी ! तृण ओर कूता्ओसहित 


९2 


भूमिके वे भ्रदेदा धन्य हैँ, जहाँ तुम निवास करती हो । 
जो तुम्हारा दूध पीते दै, वे धन्य हे, कृतार्थं हं उन्होनि 
ही पुण्य किया है ओर उन्हनि ही जन्मका फर पाया हे । 
देवताओनि मेरे सामने यह आदर्दी रखा है; गोओमिं एसा 
सत्य है, यह देखकर अब मुञ्चे अपने जीवनसे अरुचि 
हो गयी । अब मै वह कर्म करूंगा, जिसके द्वारा पापसे 


































न | ( ॥ ¦ ५ (य छुटकारा पा जाऊँ । अबतक मने हजारो जीर्वोको मारा 
. ९. > = १ ८ (1 ५ ड 
भ द 4८.) ओर खाया है । मै महान्‌ पापी, दुराचारी, निर्दयी ओर 
9 न ५ न्स) 2 (रज्ये ९. <\ ॐ » 
। (क~ ||| ५ #४ (1 (>+ ॥ | हत्यारा ह । पता नही, एेसा दारुण कर्म करके मुजञे किन 
त ल > ५/4 |/ / | = रोकोमिं जाना पड़ेगा । बहिन ! इस समय मु अपने 





ं (1 11५61 


1. + ॥ 1 पापोंसे शद्ध होनेके छ््यि जैसी तपस्या करनी चाहिये, - : 
----------------~ उसे संक्षेपमें बताओ; वरयोकि अब विस्तारपूर्वक सुननेका 
दृष्ट डाुकर उस गौनि कहा-“मृगराज ! मेँ सत्यधमका समय नहीं हे \ 
पालन करती हुई तुम्हारे पास आ गयी हूः अन मेर मोससे गाय बोली-भाईं बाघ! विद्वान्‌ पुरुष 
तुम इच्छानुसार अपनी तृप्ति करो।' सत्ययुगमें तपकी प्रहोसा करते है ओर त्रेतामें ज्ञान तथा 
व्याघ्र बोत्ा--गाय ! तुम बड़ी सत्यवादिनी उसके सहायक कर्मकी । द्वापरमें यज्ञोको ही उत्तम 
निकली । कल्याणी ! तुम्हारा स्वागत हे । सत्यका आश्रय जतलते है किन्तु कलियुगमें एकमात्र दान ही श्रेष्ठ मानां 
› लेनैवाङे प्राणियोंका कभी कोई अमङ्गर नहीं होता। गया है । सम्पूर्णं दानेमिं एक ही दान सर्वोत्तम हे । वह 
तुमने लौरनेके लिय जो पहले सत्यपूवैक रापथ की थी, है- सम्पूर्णं भूतोको अभय-दान । इससे बढ्कर दूसरा 
उसे सुनकर मुञ्चे बड़ा कौतूहक हुआ था किं यहं जाकर कोई दान नहीं है। जो समस्त चराचर भ्राणियोको 
फिर कैसे लैटेगी । तुम्हारे सत्यकी परीक्षाके ल्य ही मैने अभय-दान देता है, वह सब प्रकारके भयसे मुक्त होकर 
५ पुनः तुम्हं भेज दिया था । अन्यथा मेरे पास आकर तुम पर्रह्मको प्राप्त होता हे । अहिसाके समान न कोई दान 
 जीती-जागती कैसे लौट सकती थी । मेरा वह कौतूहरं है, न कड तपस्या । जैसे हाथीके पदचिहमे अन्य सभी 
पूरा हआ । मेँ तुम्हारे भीतर सत्य खोज रहा था, वह मुज्ञ प्रणियेके पदचिह्न समा जाते हे, उसी भरकार अहिसाके 
मिल गया । इस सत्यके प्रभावसे मनि तुम्हें छोड़ द्या; द्रा सभी धर्म प्राप्त हो जाते है ।* योग एक पेखा वृक्ष 


~ ~ ~~ ८ 
कः "कक क ~क + 








। # तपः कृते ्ररंसन्ति त्रेताया ज्ञानकर्म च । द्वापरे यज्ञमेवाहर्दानमेक कलो युगे ॥ . ड“ 
ध सर्वेषामेव दानानामिदमेवैकमुत्तमम्‌। अभय सर्वभूतानौ नास्ति दानमतः परम्‌ ॥ 
| चराचराणां भूतानामभयं यः प्रयच्छति । स सर्वभयसंत्यक्तः . पर ब्रह्माधिगच्छति ॥ 
र नास्यहिसासमं दानं नास््यहिसासम तपः । च ^ हस्तिपदे हान्यतदं सर्वं॑भ्रकीयते।॥ ` =. 
सरवै धर्मास्तथा व्याघ्र भतीयन्त ह्यहिंसया । 8 ^ 
 # + ~ ॐ कि ५.५ 0 "च 1 





ऋ ॥ 
च| 


.४.2,1.2.1.2.273 0 1 


भाः ७ पो नि षीय जमाना 4 [रः 
४४४४४४४ 


है, जिसकी छाया तीनों तापोका विना 
> स च्छया ना हे टै ९९९९4 | 
५ क डा करनेवाली हे । पुलस्त्यजी कहते है नन्दाका नाम 
धम आर ज्ञान उस वृक्षके फू हैँ । स्वर्ग तथा मोश्च॒ही राजा प्रभञ्जन रापसे मुक्त हो गये । उन्होनि ॥\ 
उसके फक हँ । जो आध्यात्मिक, आधिदैविक ओर ओर रूपसे सम्पन्न राजाका दारीर क 
धभोतिक सः तीनां प्रकारके | खोंसे है ०९ रा नाप्त कर्‌ छिया इष | 
आधिभातिक--इन तीनों प्रकारके दुःखोंसे सन्तप्त है, वे समय सत्यभाषण करनेवाली स 
० ध यास्विनी 
इस यागवृक्षकः। छायाका आश्रय्‌ ठेते हँ । वहाँ जानेसे करनेके छ्य साक्षात धर्म चा = 
उन है स्तात्‌ धम वहां आये आर इस 
उन्हें उत्तम उान्ति प्राप्त होती है, जिससे फिर कभी बोखे- "नन्दे ! मै धर्म हं तम्र 
व नही । ६९ तुम्हारा सत्य वाणीसे आट 
दुःखाके द्वारा वे बाधित नहीं होते । यही परम कल्याणका होकर यहाँ आया हू । तुम मुञ्ञसे कोई शरेष्ठ वर मोग 
हे ठ क्षेपसे है तहे * * परा त्ते 
साधन हे, जिसे मैने सं बताया ह । तुह ये सभी धर्मके एेसा कहनेपर नन्दाने यह वर मँगा- भ | 
| तें ज्ञात हे, केवर मुञ्चसे पृ रहे हो । . आपको कृपासे मं पत्रसहित उत्तम पदको प्रा हो त | 
}. ूर्वकालमे ॐ 
॥ व्याघ्रे कहा- मेँ एकं राजा था; यह स्थान मुनियोको धर्मप्रदान करनेवाला शुभ तीर्थ स 
किन्तु एक मृगीके शापसे मुञ्चे बाघका ङारीर धारण करना जाय । देवेश्वर ! यह सरस्वती नदी आजसे मेरे ही नामस 
पड़ा । तवसे निरन्तर आणियाका वध करते रहनके कारण प्रसिद्ध हो--इसका नाम "नन्दा' पड़ जाय । आपने ब्‌ ` 
' (1 | मुञ्चे सारी बाते भूर गयी थीं । इस समय तुम्हरे सम्पर्क देनेको कहा, इसल्यि मैने यही वर मागा हे । | 
| ओर उपदेशसे फिर उनका स्मरण हो आया हे तुम भी [पुत्रसहित] देवी नन्दा तत्काल ही सत्यवादियेम ` 
^ अपने इस सत्यक प्रभावसे उत्तम गतिको प्राप्त होगी । अब उत्तम लरोकमे चली गयी । राजा श्र भञ्जनने भी अपे 
' [(& मेँ तुमसे एक प्रश्न ओर पूछता हू । मेरे सौभाग्यसे तुमने पूर्वोपार्जित राज्यको पा छिया । नन्दा सरखतीके तसे ' 
आकर्‌ मुज्ञे धर्मका स्वरूप बताया, जो सत्पुरुषोके मार्गमे खर्गको गयी थी, [तथा उसने धर्मराजसे इस आदायका 
| | प्रतिष्ठित है । कल्याणी ! तुम्हारा नाम क्या है 2 वरदान भी माँगा था।] इसस्थ्यि विद्ानने वहं ` 
||; नन्दा बोखी-- मेरे यूथके स्वामीका नाम ^नन्द' है; “सरस्वती'का नाम नन्दा रख दिया । जो मनुष्य वहाँ अते 
उन्होने ही मेरा नाम "नन्दा" रख दिया हे । समय सरस्वतीके नामका उन्चारणमात्र कर ठेता हे, वह , 
~ इ जीवनभर सुख पाता है ओर मृत्युके पश्चात्‌ देवता होत 
है । सान ओर जरूपान करनेसे सरस्वती नदी मनुष्योके ५ 
ल्यि स्वर्गकी सीढ़ी जन जाती है। अष्टमीके दिन जी 
रोग एकागचित्त होकर. सरस्वतीमे सान करते है, > । 
` मत्युके बाद स्वर्गमें पर्हचकर सुख भोगते हुए आनन्दं । 
होते है । सरस्वती नदी सदा ही ख्ियोको सौभाग्य प्रव 
करनेवाली है । त॒तीयाको यदि उसका सेवन त 
तो वह विदोष सौभाग्यदायिनी होती है । उस दिन 
दर्हानसे भी मनुष्यको पाप-रारिसे छुटकारा मिल 
है। जो पुरुष उसके जलूका स्पर्ं कसते है क 
| सनी समहन चाहिय । वं चादौ दान करसे 
न्न प < ||| |||\९.| पावन ओर पुण्यसछिला है, यही नन्दा नामसे अर्स ९ + । ह = 





न 14.1.11 


| || ६२ * अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ + 











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सृष्टिखण्ड 1 


+ पुष्करका माहात्म्य, अगस्त्याश्रम तथा महर्षिं अगस्त्यके प्रभावका वर्णान * ६ 


[४.1 11111 111 11111111 11111 ११1111.1.1.1.1.4.4.4.0. 4.4... 4.4.4..4.4.4.4. 4.4.11... 111 4.4... 4.4.42... १1111111. 1. 1.1. 1.4.8.4..8. 8.21 ह 7 1.1... 4.4.9.1 [1 1.1... 4.4.2.3.1 


धारण करती है । वहसे कुछ ही दूर आगे जाकर यह सिद्ध पुरुषेद्वा भरीभांति सेवित हे । नन्दा तीर्थम स्नान 
पुनः पश्चिम दिश्ाकी ओर मुड़ गयी है। वहांसे करके यदि मनुष्य सुवर्णं ओर पृथ्वी आदिका दान करे 
सरस्वतीकी धारा प्रकट देखी जाती है 1 उसके तर्योपर॒तो वह महान्‌ अभ्युदयकारी तथा .अक्षय फट नताः 
अत्यन्त मनोहर तीर्थ ओर देवमन्दिर है, जो मुनिर्यो ओर करनेवाला होता हे । 
| 9 
पुष्करका माहात्म्य, अगस्त्याश्रम तथा महर्षिं अगस्त्यके प्रभावका वर्णन 





भीष्पमजीने कहा-त्रह्यन्‌ 1 अब आप मुञ्चे यह 
जतानेकी कृपा करं कि वेदवेत्ता ब्राह्मण तीनां पुष्करोकी 
यात्रा किस प्रकार करते हें तथा उसके करनेसे मनुरष्योको 
क्या फल मिता हे ? 
पुतस्त्यजीने कहा- राजन्‌ ! अब एकाग्रचित्त 
होकर तीर्थ-सेवनके महान्‌ फलका श्रवण करो । जिसके 
हाथ, पैर ओर मन संयममें रहते हं तथा जो विद्वान्‌. 
तपस्वी ओर कीर्तिमान्‌ होता हे, वही तीर्थ-सेवनका फल 
प्राप करता है । जो प्रतिग्रहसे दूर रहता है--किसीका 
दिया हआ दान नहीं केता, प्रारब्धवरा जो कुछ प्राप्त हो 
जाय-उसीसे सन्तुष्ट रहता है तथा जिसका अहङ्कार दूर 
हो गया है, से मनुष्यको ही तीर्थ-सेवनका पूरा फल 
मिलता हे । राजेनद्र ! जो सभावतः क्रोधहीन, सत्यवादी, 
दुढतापूर्वकं उत्तम त्रतका पाठन करनेवाला तथा सम्पूर्ण 
प्राणिरवोमिं आत्मभाव रखनेवाल्ा है, उसे तीर्थ-सेवनका 
फल ्राप्र होता है ।* यह ऋषियेोका परम गोपनीय 
सिद्धान्त हे । 
राजेनद्र ! पुष्कर तीर्थं करोड़ ऋषिर्योसे भर हे 
उसकी लम्बाई ढाई योजन (दस कोस) ओर चौडाई 
आधा योजन (दो कोस) है । यही उस तीर्थका परमाण 
हे । वहाँ जानेमात्रसे मनुष्यको राजसूय ओर अश्वमेध 
यज्ञका फल प्राप्त होता है, जहो अत्यन्त पलित सरस्वती 
नदीनि ज्येष्ठ पुष्करमे अवेदा किया है, वहो चैत्र शङ्का 
चतुर्दीको ब्रह्य दि देवताओं, ऋषियों, सिद्धं ओर 






, चारणोका आगमन होता है, अतः उक्त तिथिको 


देवताओं ओर पितरोके पूजनमें प्रवृत्त हो मनुष्यको वहां 
खान करना चाहिये । इससे वह अभय पदको प्राप्त होता 
हे ओर अपने कुरुका भी उद्धार करता द 1 वहो 
देवताओं ओर पितरका तर्षण करके मनुष्य विष्णुखाकमे 
प्रतिष्ठित होता है । ज्येष्ठ पुष्करमे खान करसे उसका 
स्वरूप चन्द्रमाके समान निर्म हो जाता हे तथा वह 
ब्रह्मलोक एवं उत्तम गतिको प्राप्त होता हं । मनुष्य 
लोकम देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह पुष्कर नामसे प्रसिद्ध 
तीर्थ त्रिभुवनमें विख्यात है । यह बड़े-लड पातकोंका 
नादा करनेवाला हे। पृष्करमे तीनों सन्ध्याओकि 
समय- प्रातःकाल, मध्याह एवं सा्यकाठमें दस हजार 
करोड़ (एक खर) तीर्थ उपस्थित रहते हँ तथा 
आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुदरण, गन्धर्व ओर 
अप्सराओंका भी प्रतिदिन आगमन होता हे । वहां तपस्या 
करके कितने ही देवता, दैत्य तथा ब्रह्यर्षि दिव्य योगसे 
सम्पन्न एवं महान्‌ पुण्यशाली हो गये । जो मनसे भी 
पुष्कर तीर्थके सेवनकी इच्छा करता है, उस मनस्वीके ` 
सरे पाप नष्ट हो जाते है । महाराज ! उस तीर्थम देवता 
ओर दानवेकि रा सम्मानित भगवान्‌ ब्रह्माजी सदा ही 
प्रसन्नतापूर्वक निवास कसते है । वहां देवताओं ओर 
ऋषियेनि महान्‌ पुण्यसे युक्त होकर इच्छानुसार सिद्धियां 
पराप्त की है । जो मनुष्य देवताओं ओर पितरोके पूजने = 
तत्पर हो वहं स्नान करता है, उसके पुण्यको ` न 















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आचमन करनैका फल प्राप्त होता है । स्री हो या पुरुष 


ऋ (८ 
^ ५ 
ङ| 


दर | * अर्चयस्व हषीकेडो यदीच्छसि परं पदम्‌ * ॥ 


[ संक्षिप्त 


[` । ण. 
पुरुष अश्वमेध यज्ञकी अपेक्षा दसगुना अधिक बतत्ते निवास करता है, उन दोनोका फल एक-सा हीत ष्क 


ह । पुष्करारण्यमें जाकर जो एक ब्राह्मणको भी भोजन 
कृराता हे, उसके .उस अन्नसे एक करोड़ ब्राह्मणोंको पूर्ण 
तुपिपूर्वक भोजनं करानेका फल होता है तथा उस 
पुण्यकर्मके प्रभावसे वह इहर्ोक ओर परल्रेकमें भी 
आनन्द मनाता हे । [अन्न न हो तो] शाक, मूर अथवा 
फल जिससे वह स्वयं जीवन-निर्वाह करता हो, 
वही--दोष-दुष्टिका परित्याग करके श्रद्धापूर्वक 
ब्राह्मणको अर्पण करे। उसीके दानसे मनुष्य अश्चमेध 


-यज्ञका फट प्राप्त करता. हे । ब्राह्यण, क्षत्रिय, वैरय 


अथवा शद्र-सभी इस तीर्थम स्नान-दानादि पुण्यके 
अधिक्तारी हे । ब्रह्याजीका पुष्कर नामक सरोवर परम 
पवित्र तीर्थ हे । वह वानप्रस्थो, सिद्धो तथा मुनिर्योँको 


, भी पुण्य प्रदान करनेवाला हे । परम पावन सरस्वती नदी 


पुष्करसे ही महाखागरकी ओर गयी है । वहाँ महायोगी 
आदिदेव मधुसूदन सदा निवास करते हेँ। 
आदिवराहके नामसे प्रसिद्ध हैँ तथा सम्पूर्णं देवता उनकी 
पूजा करते रहते है । विरोषतः कार्तिककी पूर्णिमाको जो 
पुष्कर तीर्थकी यात्रा करता है, वह अक्षय फरूका भागी 
होता है-एेसा मेने सुना है। 

कुरुनन्दन । जो साय॑कारु ओर सबेरे हाथ जोड़कर 
तीनो पुष्करोका स्मरण करता है, उसे समस्त ती्थेमिं 














पुष्करमें निवास दुर्कभ है, पुष्करमे तपस्याका ह ` 
मिलना कठिन हे । पुष्करमे दान देनेका सौभाग्य ५ 
मुरिकलसे प्राप्त होता है तथा वहोकी यात्रा सुग 
दुभ ह ।* वेदवेत्ता ब्राह्मण ज्येष्ठ पुष्करमे 
करनेसे मोक्षका भागी होता है ओर श्रद्धसे वह पितरे 
तार देता हे । जो ब्राह्मण वहाँ जाकर नाममात्रके ल्थि भं 
सन्ध्योपासन करता है, उसे बारह वर्षोतक 
करनेका फर प्राप्न हो जाता है । पूर्वकाले जहाज 
स्वयं ही यह बात कही थी । जो अकेले भी कभी पुष्कः 
तीर्थमें चला जाय, उसको चाहिये कि ्ारीमें पुष्करका 
जर लेकर क्रमाः सन्ध्या-वन्दन कर ले; एेसा कसे ॥ 
भी उसे बारह वर्षोतक निरन्तर सन्ध्योपासन केका ` 
फल प्राप्त हो जाता है । जो पलीको पास बिठाकर दक्षिण | 
दिराकी ओर मह करके गायत्री मन्त्रका जप करते हए | । 
वहां तर्पण करता है, उसके उस तर्पणद्रारा बारह वर्षोतक । 
पितरोको पूर्णं तृप्ति बनी रहती है । फिर पिण्डदानपूर्वक । 
श्राद्ध करनेसे अक्षय फलकी प्राप्ति होती है । इसील्ि । 
विद्वान्‌ पुरुष यह सोचकर स्रीके साथ विवाह करते हैकि , 
हम तीर्थम जाकर श्रद्धापूर्वक पिण्डदान करेगे । जो एेसा | 
करते है, उनके पुत्र, धन, धान्य ओर सन्तानका कभ , 
उच्छेद नहीं होता--यह निःसन्दिग्ध बात हे। 
राजन्‌ ! अब मेँ तुमसे इस तीर्थके आश्रमा 
वर्णन करता ह एकाग्रचित्त होकर सुनो । मह 
अगस्त्यने इस तीर्थम अपना आश्रम बनाया ह 
देवताओके आश्रमकी समानता करता है । पर्वकाले 
यहो सपर्षियोंका भी आश्रम था । ब्रहर्षियों ओर मजी 
भी यहाँ आश्रम बनाया था । यज्ञ-पर्वतके किनारे य 
नागोकी रमणीय पुरी भी है। महाराज ! मे महामन 


उअयिहोत्र अगस्त्यलीके प्रभावका संक्षेपसे वर्णन करता & 


यः. > । ५ । £ 3 ४ 
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पहटेकी नात है--सत्ययुगमे कालके" 


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कायिका 


"सृष्टिखण्ड ] पुष्करका 
सृष्टिखण्ड । * पुन्करका माहात्म्य, अगस्त्याश्रम तथा महषिं अगस्त्यके प्रभावका वर्णन * ६५ 


नु 14.4.11... 4.4.94... .4.4 4.6.11. 1.7 १ 711 11 (4 च 
यन = न गिं कके वि 


॥..4...9.1.1.1.1 प क च "27711211 11111144 
नामसे प्रसिद्ध दानव रहते थे। उनका स्वभाव अत्यन्त पुलस्त्यजी कहते है ब्रह्माजीके एेसा कहनेपर 
कठोर था तथा वे युद्धके छ्य सदा उन्मत्त रहते थे । एक 


समस्त देवता उनकी आज्ञा ठे इनद्रको आगे करके 

समय वे सभी दानव नाना प्रकारके अख-दाख्रंसे दधीचिके आश्रमपर गये । वह सरस्वती नदीके उस पार 
सुसञ्नित हो वुत्रासुरको नीचे करके इन्र आदि बना हुआ था । नाना प्रकारके वृक्ष ओर कतार्‌ उसे चेर 
देवताओंपर चारों ओरसे चढ़ आये । तब देवतारोग हए थीं । वह पर्चकर देवताओनि सूर्यके समान तेजस्वी 
इनद्रको आगे करके ब्रह्माजीके पास गये । उन हाथ महर्षि दधीचिका दर्शन किया ओर उनके चरणेमिं प्रणाम 
जोड़कर खडे देख बऋ्याजीने कहा--'"देवताओ ! करके ब्रह्याजीके कथनानुसार वरदान मोगा। तब 
तुमलोग जो कार्यं करना चाहते हो, वह सब मुञ्चे मालूम दधीचिने अत्यन्त प्रसन्न होकर देवताओंको प्रणाम कर्के 
हे । मै एेसा उपाय बताऊगा, जिससे तुम वुत्रासुरका वध॒ यह कार्य-साधक वचन कहा-“अहो ! आज इन्र 
कर सकोगे । दधीचि नामके एक महर्षि हैँ, उनकी बुद्धि आदि सम्पूर्णं देवता यहाँ किसल्व्यि पधार है 2 मेँ देखता 
लड़ी ही उदार हे । तुम सब रोग एक साथ जाकर उनसे ह आप सब लोर्गोकी कान्ति फीकी पड़ गयी हे, 
वर मांगो । वे धर्मात्मा हँ, अतः प्रसन्नचित्त होकर तुम्हारी आपरोग पीडित जान पडते है । जिस कारणसे आपके 
मोग पूरी करेगे । तुम उनसे यही कहना कि “आप हदयको कष्ट पर्हच रहा है, उसे रान्तिपूर्वक बताइये 
त्रिभुवनका हित करनैके खये अपनी हड्कियां हमे प्रदान देवता बोले- महर्षे ! यदि आपकी हडर्योका 
करें ।' निश्चय ही वे अपना डारीर त्यागकर्‌ तुम्हे हडयां शसन बनाया जाय तो उससे देवता्ओंका दुःख दूर हो 
अर्पण कर देगे । उनकी हडयोंसे तुमरोग अत्यन्त भ्य॑कर सकता हे । 
एवं सुदुढ़ वज्र तैयार करो, जो दिव्य-राक्तिसे सम्पन्न उत्तम दधीचिने कहा-देवताओ ! जिससे आप- 
अख होगा । उससे बिजलीके समान गडगड़ाहट पैदा कोगोका हित होगा, वह कार्य मै अवङय करूगा । 
होगी ओर वह महान्‌-से-महान्‌ शत्रुका विनाडा करेवा आज आपलोगेकि छ्यि मे अपने इस ङरीरका भी त्याग 
होगा । उसी वच्रसे इन्द्र वृत्रासुरका वध करेगे ॥' करता ह| 

एेसा कहकर मनुष्योमे श्रेष्ट महर्षिं दधीचिने सहसा 
अपने प्रा्णोका परित्याग कर दिया। तब सम्पूर्ण 
देवताओंनि आवङ्यकताके अनुसार उनके उारीरसे 
हङ्यां निकाल लीं । इससे उन्हं बड़ी प्रसन्नता हुईं ओर 
वे विजय पानेके खयि विश्चकर्माके पास जाकर 
बोले--“आप इन हडयोसे वञ्चका निर्माण कीजिये |` 
देवताओकि वचन सुनकर विश्चक्मान बड़ हर्षके साथ 
प्रयलपूर्वक उग्र शक्ति-सम्पन्न वज्राखरका निर्माण किया 
ओर इन्द्रे कहा--'देवेश्वरं ! यह. वज्र सब अख- | 
शासोमे श्रेष्ठ हे, आप इसके द्वारा देवताओंके भयेकर ` 
दात्र वुत्रासुरको भस्म कीजिये । उनके एसा कहनेपर 
इन््रको बड़ी प्रस्ता हुईं ओर उन्हनि शुद्ध भावस उर उस ` 
` वज्रको महण किया 
तदनन्तर इनदर देवताओंसे सुरक्षित हो, व =: हाथमे ` 



























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नामके विङारूकाय दानव हाथोमे डासन उठाये चारों 
आओरसे उसकी रक्षा कर रहे थे । फिर तो दानवोके साथ 
देवताओंका भयंकर युद्ध प्रारम्भ हआ । दो घड़ीतक तो 
/ , देसी मार-काट हई, जो सम्पूर्णं रोकको महान्‌ भयमें 
' / ^  डाल्नेवाली थी । वीरोकी भुजाओंसे चरायी हुई तलवार 
जब रात्रके रारीरपर पड़ती थीं, तब बडे जोरका टाब्द 

/ होता था। आकाडासे पुथ्वीपर गिरते हए मस्तक ताड़के 
^ । फलके समान जान पड़ते थे । उनसे वहांकी सारी भूमि 
पटी हहं दिखायी देती थी । उस समय सोनेके कवच 
पहने हए कारुकेय दानव दावानरसे जरते हए वृक्षोकि 
समान प्रतीत होते थे। वे हाथमे परिघ लेकर 
देवताओंपर टूट पडे । उन्होने एक साथ मिरूकर बडे 
वेगसे धावा किया था। यद्यपि देवता भी एक साथ 
संगठित होकर ही युद्ध कर रहेथे, तो भीवे उन 
दानवेकिं वेगको न सह सके । उनके पैर उखड गये, वे 
भयभीत होकर भाग खंडे हए । देवताओंको डरकर 
भागते ओर वृत्रासुरको प्रबल होते देख हजार ओंखोंवाठे 
इन्द्रको बड़ी घबराहट हई । इनद्रकी एेसी अवस्था देख 
सनातन भगवान्‌ श्रीविष्णुने उनके भीतर अपने तेजका 
4 सञ्चार करके उनके बको बढ़ाया । इन्द्रको श्रीविष्णुके 
(| तेजसे परिपूर्णं देख देवताओं तथा निर्मर अन्तःकरण- 
{` वाले ब्रहर्षियेनि भी उनमें अपने-अपने तेजका सञ्चार 
। महाभाग महर्षियोकि तेजसे वृद्धिको प्राप्त होकर इन्द्र 
दव ज टन््को को ` ` < इन्द्रको सरू जान वुत्रासुरने बडे जोरसे 
सिंहनाद वि या । उसकी विकट गर्जनासे पृथ्वी, दरार 
 . अन्तरिक्ष, दयुलेक ओर आकाडामें सभी कोप उठे । वह 


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ऊपर छोड इ निरुत्साह हो गया । स्वाध्याय बद्‌ हो गया । य 





[ सक्षिप्न 


| वा , प्मुर ^ ५ 
४४४ ४४४ । | 
पृथ्वी ओर आकाङको घेरकर खड़ा था। कारूकेय रोष दैत्योको मारने रगे । देवताओंकी मार | 


महान्‌ असुर भयसे पीड़ित हो वायुके समान  ॥ 
नागकरर अगाध समुद्रमे जा छ्पि । वहां एकत्रित होक 
सब-के-सब तीनों लोकोँका नाडा करनेके ख्ियि 

सलाह करने ठगे । उनमें जो विचारक थे उन्हेन 
प्रकारके उपाय बतलाये- -तरह-तरहकी युक्तिं ` 
सुज्ञायीं । अन्ततोगत्वा यह निश्चय हुआ कि "तपस्ये हौ 
सम्पूर्णं लोक टिके हुए है, इसल्ियि उसीका 

खयि शीघ्रता की जाय । पुथ्वीपर जो कोई भी तपसी 


धर्मज्ञ ओर विद्वान्‌ हो, उनका तुरेत वध कर दिया जाय 


उनके नष्ट हो जानेपर सम्पूर्णं जगत्का स्वयं ही नाङञ 
हो जायगा । 
उन सबकी बुद्धि. मारी गयी थी; इसख्िये उपर्युक्त 


प्रकारसे संसारके विनाराका निश्चय करके वे बहुत परसत्र । 


हए । समुद्ररूप दुर्गका आश्रय ठेकर उन्होने त्रिभुवनका 


विनाडा आरम्भ किया । वे रातमें कुपित होकर निकले ॑ 


ओर पवित्र आश्रमो तथा मन्दिरमे जो भी मुनि मित्ते, 
उन्हँ पकड़कर खा जाते थे । उन दुरात्माओंने वसिष्ठके 
आश्रममें जाकर आठ हजार आठ ब्राह्यणोका भक्षण कर 
छया तथा उस वनमें ओर भी जितने तपस्वी थे, उन्हं 
मोतके घाट उतार दिया । महर्षिं च्यवनके पक्त 
आश्रमपर, जहां बहत-से द्विज निवास करते थे, जाक 
उन्होनि फल-मूकका आहार करनेवाठे सौ मुनि्योको 
अपना मास बना छ्िया । इस प्रकार रातमें वे मुनिर्योका 
संहार करते ओर दिनम समुद्रके भीतर घुस जाते । 
भरद्वाजके आश्रमपर जाकर उन दानवेन वायु ओर जल 
पीकर संयम-नियमके साथ रहनेवाठे बीस ब्रह्मचारि्योकी 
हत्या कर डाली । इस तरह बहुत दिर्नोतक उन्न 
मुनिर्योका भक्षण जारी रखा, किन्तु मनु्योकौ € 
हत्या्योका पता नहीं चला । उस समय 
भयसे पीडित होकर सारा जगत्‌ [धर्म-कर्मकी ८ 


उत्सव समाप्त § प्त हो गये । मनुष्योकी संख्या दिनेदिन नवा तीण 








६६ * अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ + | >. 





नि 
2: महान्‌ असुर 
तव क = ~, ` ॥ ५, * 
¢ ॥ { ॥ 4 
चै [9 पै) ६. १, ^* च + पि. क) 
$` 2२.५५.५४५ { 3 9 ॥ 1 म 
+ हि ॥ च होने र र ठगी कि फ भयभीत ' >. ~ 
ति > के ° ~ त - 
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५ गणी ५ ु च ययि ५, 
^ "..3 ॥/) + १ च, १, । ॐ + छ च> ५ 4 
,५< > 4 १ ॥ 4 धि, 3 1 ति ~ 3 मे च ए ॥ ५ 
= # 4 < धि, + ^ 3 क ` ॥ 
२ ॥ म ^+ ^ > 2 ति 0 ध 
ि < (कनि । कति । क भ) श) च दौडने जक है -94 ॥ लगे + र ॥ 
^ ५४. = 1 न > ॐ ग्द कों द्विजं ` च्व 
+ ४: = 4 = - '- ् 2 प 
धि [५ फ कः # छि । 4 
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सृष्टिखण्ड ] 


दूसरोनि ्र्नोकी रारण ठी, कितने भयसे व्याकुल 
होकर श्राण त्याग दिये । इस प्रकार यज्ञ ओर उत्सर्वेसे 
रहित होकर जब सारा जगत्‌ नष्ट होने रगा, त इनदर 
सहित सम्पूर्ण देवता व्यथित होकर भगवान्‌ श्रीनारयणकी 
हारणमें गये ओर इस प्रकार स्तुति करने रगे । 
देवता बोले-प्रभो ! आप ही हमारे जन्मदाता 
र रश्चक है। आप ही संसारका भरण-पोषण कसने- 
वाञे है । चर ओर अचर- सम्पूर्णं जगत्की सृष्ट 
आपसे ही हई है । कमलनयन ! पूर्वकारमे यह भूमि 
नष्ट होकर रसातलमे चटी गयी थी । उस समय आपने 
ही वराहरूप धारण करके संसारके हितके छिय इसका 
समुद्रसे उद्धार किया था। पुरुषोत्तम ! आदिदैत्य 
हिरण्यकरिपु बड़ा पराक्रमी था, तो भी आपने 
नरसिंहरूप धारण करके उसका वध कर डाला । इस 
प्रकार आपके बहुत-से एेसे [अलोकिक] कर्म हे 
जिनकी गणना नहीं हो सकती । मधुसूदन ! हमलोग 
भयभीत हो रहे है, अन आप ही हमारी गति ह; इसल्यि 
देवदेवेध्र ! हम आपसे रोककी रक्षाके ख्य प्रार्थना 
करते है । सम्पूर्ण लोकोकी, देवता्ओंकी तथा इन्द्रकी 
महान्‌ भयसे रक्षा कीजिये । आपकी ही कृपासे 
[ अण्डज, सखेद्ज, जरायुज एवं उद्िजज-] चार 
भागेन वैटी हई सम्पूर्ण परजा जीवन धारण करती हे। 
आपकी ही दयासे मनुष्य खस्थ होगे ओर देवताओं 
हव्य-कर्व्योसे तृप्ति होगी । इस प्रकार देव-मनुष्यादि 
सम्पूरणं रोक एक-दूसरेके आश्रित है । आपके ही 
अनुग्रहसे इन सबका उद्वेग शान्त हो सकता हे तथा 
आपके द्वारा ही इनकी पूर्णतया रक्षा होनी सम्भव हे। 
भगवन्‌ ! संसारके ऊपर बड़ भारी भय आ पर्चा ह । 
पता नहीं, कौन रात्रिम जा-जाकर ब्रह्य्णोका वध कर 
डालता दै । ब्राह्मणोका क्षय हो जनेपर समूल पृथ्वीका 
नाहा हो जायगा । अतः महाबाहो ! जगत्पते \ आप सी 
कृपा कर, जिससे आपके द्वाय सुरक्षित होकर ईन 
लोकोका विनाडा न हो । 


भगवान्‌ श्रीविष्णु बोले देवताओ । मु 


+ पुष्करका माहात्म्य, अगस्त्याश्रम तथा महिं अगस्त्यके ्रभावका वर्णन * ६७ 
व र 2.4.82... 2.1 
वि 11 


प्रा ककत = क कत जाता क = 
| = ¡` इ 





बताता ह निश्चिन्त होकर सुनो । कारुकेय नामसे 
विख्यात जो दानवोका समुदाय है, वह बड़ा ही निष्ठुर 
है । उन दानवेनि ही परस्पर मिरूकर सम्पूर्ण जगत्को 
कष्ट परहैचाना आरम्भ किया है। वे इन्द्रके इरा 
वृत्रासुरको मारा गया देख अपनी जान बचनेके छ््यि 
समुद्रम घुस गये थे! नाना प्रकारके ग्राहोसे भरे हए 
भयङ्कर समुद्रम रहकर वे जगत्का विनाश कके 
लिय रामे मनियोको खा जाते हैँ । जबतक वे समुद्रके 
भीतर छिपे रहेंगे, तबतक्र उनका नाडा होना असम्भव 
है, इसखियि अब तुमलोग समुद्रको सुखानेका कोड 
उपाय सोचो । 

पुलस्त्यजी कहते है--भगवान्‌ श्रीविष्णुके ये 
वचन सुनकर देवता ब्रह्माजीके पास आकर वहसि महर्षि 
अगस्त्यके आश्रमपर गये। वहाँ पर्हैचकर उन्हनि 
मित्रावरुणके पुत्र परम तेजस्वी महात्मा अगस्त्य ऋषिको 
देखा । अनेको महर्षिं उनकी सेवामें रुगे थे 1 उनम 
प्रमादका छेदा भी नही था। वे तपस्याकी राशि जान | 
पडते थे । ऋषिरोग उनके अटोकिक कर्मोकी चर्चा 
करते हुए उनकी स्तुति कर रहे थे। 

देवता बोकते--महषं  पूर्वकारूमे जब राजा 
नहुषके द्रा रोकोको कष्ट पर्हुच रहा था, उस समय 
आपने संसारके हितके लिये उन्हें इनद्र-पदसे शष्ट किया 
ओर इस प्रकार रोकका कां दूर करके आप जगतक 
आश्रयदाता हए । जिस समय पर्वतेमिं श्रेष्ठ विख्याचर 
सूर्यके ऊपर क्रोध करके बदढकर बहत ऊंचा हो गया था; 
उस समय आपने ही उसे नतमस्तक किया; तनसे 
आजतक आपकी आज्ञाका पालन करता हुञा वह पर्वत 
बढ़ता नहीं । जब सारा जगत्‌ अन्धकारसे आच्छदित था, 
ओर भ्रजा मृल्यसे पीडित होने रगी, उस समय आपको ' 
ह अपना रक्षक समञ्चकर प्रजा आपकी शरणमे आयी < 
अौर उसे आपके द्वारा परम आनन्द एवे रान्तिकी धि 








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हई । जब-जब्‌ हमलोर्गोपर भयका. आक्रमण हुआ, ६ 





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| ६८ * अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ + , | | 
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| | भीष्मजीने पूछा-- महामुने ! क्या कारण था जाइये । आपके एेसा केषर वमल 
॥ | जिससे विन्ध्य पर्वत सहसा क्रोधसे मूर्च्छित हो बटुक कारकेय नामक दानरवोको उनके सगे स 
| = | सगे- 
| बहुत ऊचा हो गया था ? मार गे ।' महर्षिने कहा- "बहुत जनो 
॥|॥ पुलस्त्यजीने कहा-- सूर्य प्रतिदिन. उदय ओर सैं आपलोगोंकी इच्छा पूर्ण करगा ^ दषे 
| अस्तके समय सुवर्णमय महापर्वत गिरिराज मेरुकी देवताओं ओर तपःसिद्ध मुनियोके \ 
५) पर्क्रिमा किया करते हें । एक दिन सूर्यको देखकर समुद्रके पास गये । उनके इस अद्भुत २. 
विच््याचलने उनसे कहा-- "भास्कर ! जिस प्रकार आप॒ इच्छसे हुते मनुष्य, नाग, गन्धर्व, यक्ष ओर रो 
भरतिदिन मेरुपर्वतकी परिक्रमा किया करते है, उसी प्रकार उन महात्माके पीकछे-पीछे गये | महरि जा | 
1 मेरी भी कीजिये ।' यह सुनकर सूर्यने गिरिराज विन्ध्यसे तटपर जा पर्हुचे । समुद्र भीषण गर्जना कर र ष । 
॥  “ कहा-- रौर ! मँ अपनी इच्छसे मेरुकी परिक्रमा नहीं अपनी उत्ताल तर्गौसे नृत्य करता हुआ-सा जान 1 
करता; जिन्होने इस संसारकी सृष्टि की है, उन विधाताने था । महर्षिं अगस्त्यके साथ सम्पूर्णं देवता, गन 
॥;.। ही मेरे छ्य यह मार्ग नियत कर दिया है ।' उनके एेसा ओर महाभाग मुनि जन महासागरके किनारे परहैच गये | 
४ {\ कहनेपर वि्याचरको सहसरा क्रोध हो आया ओर वह॒ तन महर्षिने समुद्रको पी जानेकी इच्छासे उन सबको | 
| । |¢ ` सूर्य तथा चन्द्रमाका' माग रोकनेके छ्य बढ़कर बहत लक्ष्य करके कहा- देवगण ! सम्पूर्ण लोकोका हित । 
१५ ऊंचा हो गया । तब इन्द्रादि सम्पूर्ण देवताओने जाकर करनेके चयि इस समय मैं इस महासागरको पिये छेत ' 
8।।; जढ़ते हुए गिरिराज विन्ध्याचरूको रोका, किन्तु उसने ह अब आपलो्गोको जो कुछ करना हो, दीघ हं | 
॥ । । ` उनकी बात नहीं मानी । तब वे महर्षिं अगस्त्यके पास कीजिये ।' यों कहकर वे सबके देखते -देखते समुद्रको | 
| जाकर बोरे “मुनीश्वर ! रौलराज विन्ध्य क्रोधके | 
(|||  वडीभूत होकर सूर्य, चन्रमा तथा नक्षत्रोका मार्ग रोक 
|| रहा है; उसे कोड निवारण नहीं कर पाता ।' 
. . देवताओंकी बात. . सुनकर ब्रह्मर्षि अगस्त्यजी 
(| | `. विच्यके पास गये ओर आदरपूर्वकं बोले- 
(| (पर्वतश्रेष्ठ ! मेँ दक्षिण दिशम जानेके रयि तुमसे मार्ग 
।( चाहता हूः जबतक मेँ टकर न आऊँ, तबतक तुम 
({ नीचे रहकर ही मेरी .अतीक्षा करो।' [मुनिकी बात 
(| मानकर ति्याचलने वैसा ही किया ।] महर्षि अगस्य 
(1 दक्षिण दिशसे आजतक नहीं टट; इसीसे विन्ध्य पर्वत 
^ अन नहीं बढता । भीष्म ! तुम्हारे प्रश्रके अनुसार यह 


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सृष्टिखण्ड ] * सपर्षि-आश्रमके सङ्गमे | अलोभका वर्णन, अन्नदानादि धर्मो प्रदसा * 


६९ 


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जन्म देनेवाङे है । आपकी कृपासे देवताओंसहित सम्पूर्ण 
जगत्का कभी उच्छेद नही हो सकता ।' इस प्रकार सम्पूर्ण 
देवता उनका सम्मान कर रहे थ । प्रधान-प्रधान गन्धर्व 
हरवनाद करते थे ओर महर्षिके ऊपर दिव्य पुष्योकी वरषा 
हो रही थी । उन्होने समूचे महासागस्को जकशन्य कर 
दिया । जब समुद्रम एक बंद भी पानी न रहा, तब सम्पूर्ण 
देवता हर्षम भरकर हाथोमें दिव्य आयुध छियि दानवोंपर 
प्रहार करने रगे । महाबली देवताओंका वेग असुरोके 
` छियि असह्य हो गया । उनकी मार खाकर भी वे भीमकाय 
दानव दो घड़ीतक घमासान युद्ध करते रहे; किन्तु वे 
पवित्रात्मा मुनियोकी तपस्यासे दग्ध हो चुके थे, इसखि्यि 
पूर्णं क्ति रगाकर यल कसते रहनेपर भी देवताओंकि 
हाथसे मारे गये । जो मरनेसे बच रहे, वे पृथ्वी फाड़कर 
पातालमें घुस गये । दानवोको मारा गया देख देवताओनि 
नाना भरकारके वचनद्वारा मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यका स्तवन 
" किया तथा इस प्रकार कहा- 
देवता बोके- महाभाग ! आपकी कृपासे 
संसारके लोगोको बड़ा सुख मिल । कारुकेय दानव 


दीजिये । आपने जो जक पी छिया है, वह सब इसमे 
वापस छोड दीजिये । 
उनके एेसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी बोके-- 

"वह जल तो मैने पचा छया, अब समुद्रको भरनेके 
ख्य आपलोग कोई दूसरा उपाय सोचें ।' महर्षिको बात्‌ 
सुनकर देवताओंको विस्मय भी हुआ ओर विषाद्‌ भी 1 
वहौँ इकडे हए सब रोग एक दूसरेकी अनुमति ले 
मुनिवर अगस्त्यजीको प्रणाम करके जैसे आये थे, वैसे 
ही लौट गये। देवताोग समुद्रको भरनेके विषयमे 
परस्पर विचार करते हुए ब्रह्माजीके पास गये । वहां 
परहैवकर उन्होनि हाथ जोड़ ब्रह्माजीको प्रणाम किया ओर 


. समुद्रके पुनः भरनेका उपाय पूछा । तब लोकपितामह 


ब्रह्मने उनसे कहा-- देवताओं 1 तुम सब लोग 
इच्छानुसार अपने-अपने अभीष्ट स्थानक लौट जाओ, 
अब बहुत दिनके बाद समुद्र अपनी पूर्वावस्थाको प्राप 
होगा । महाराज भगीरथ अपने कुटुम्बी जनको तारके 
ख्यि गङ्गाजीको कारयेगे ओर -उर्न्हकि जलर्से पुनः 
समुद्रको भर देगे । न 


बड़े ही क्रूर ओर पराक्रमी थे, वे सन आपकी हाक्तिसे ेसा कहकर ब्रह्माजीने देवताओं ओर ऋषिरयोको 

मरे गये । लोकरक्षक महर्षे ! अब इस समुद्रको भर भेज दिया । 

सप्तषि-आश्रमके अ्सङ्गमे सपतर्षियोके अलरोभका वर्णन तथा ऋषि्योके मुखसे अन्नदान 
एवं दम आदि धर्मोको प्ररोसा | 


पुलस्त्यजी कहते है- राजन्‌ ! अब मँ तुम्हार 
छियि सर्षियेकि आश्रमका वर्णन करगा। अत्रि, 
वसिष्ठ, मै, पुलह, क्रतु, अङ्गिर, गौतम, सुमति, सुखः 
विश्वामित्र, स्थूलिरा, संवर्त, अर्दन, रेभ्य, बृहस्पति, 
च्यवन, क्यप, भृगु, दुर्वासा, जमदमि, मार्कण्डेय, 


चेष्टके साथ तपस्या की है,. जिसके फलस्वरूप उनमें 
इन््िय-जय, धैर्य, सत्य, क्षमा, सररूता, दया ओर दान 
आदि सदगुणोकी प्रतिष्ठा हई है । पूर्वकारूकी बात है, 
समाधिके द्वारा सनातन ब्रह्मरोकपर विजय प्राप्त करनेकी 
अभिलाषा रखनेवाले सपर्िगण, तीर्थस्थानोंका दन 





. गारुब, उदाना, भरद्वाज, यवक्रीत, स्थूला" मकयश्ष, कसते हए इस पृथ्वीपर विचर रहे थ । इसी बीचमें एक 























कण्ठ ' मेधातिथि नारद, पर्वत, स्गन्धी, तृणा, बार १ भारी सूखा पद, जिसके कारण भरसे पात्‌; ` 
(| न सौग, तन अकव, जम ६ सम्पूर्णं जगतके लोग नडे कष्टनं पड़ गये । उसी 
त | ऋषि- समय उन ऋषिर्योको भी कष्ट उठते देख तत्कालीनं 

परशुराम, अष्टक तथा कृष्णद्वैपायन ये सभ | व = 9 

महर्षिं अपने पुत्रो ओर रिष्योकि साथ पुष्करमे आकर < ` ˆ“ जो प्रजाकी देख-भाकके छिमि भ्रमण कर्‌ रहे थ, 
| सयक आश्रमम रह चुके दै तथा सने > = 1 
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कर अच्छे-अच्छे गोव, धान ओर जौ आदि अन्न 


घरत-दुग्धादि रस, तरह-तरहके रल, सुवर्णं तथा दूध 
देनेवाटी गोर्णँ ठे ठे। 


ऋषियोने कहा- राजन्‌ ! पतिग्रह बड़ी भयंकर 


वृत्ति है। वह ॒स्वादमे मधुके समान मधुर, किन्त 
परिणाममें विषके समान घातक -हे। इस बातको स्वयं 
जानते हए भी तुम क्यों हमें रोभमें डा रहे हो ?' दस 
कसाइयोके समान एक चक्री (कुम्हार या तेली), दस 
चक्रियोके समान एक इाराब बेचनेवाखा, दस दाराब 
बेचनेवाछके समान एक वेया ओर दस वेदयाअकि 
समान एक राजा होता है। जो प्रतिदिन दस हजार 
हत्यागृहोका सञ्चालन करता है, वह रोण्डिक है; राजा 
भी उसीके समान माना गया है । अतः राजाका प्रतिग्रह 
अत्यन्त भयङ्कर है । जो ब्राह्मण लभसे मोहित होकर 
गजाका प्रतिग्रह स्वीकार. करता है, वह तामिस्र आदि 
घोर नर्केमिं पकाया जाता है ।# ` अतः महाराज ! तुम 
अपने दानके साथ ही . यहांसे पधारो । तुम्हारा कल्याण 
हो । यह दान दूसरोको देना । 

यह कहकर वे सर्षिं वनमे चके गये । तदनन्तर 


॥ | ॥  रजाकी . आज्ञासे उसके मन्ियोनि गूकरके फरमे 
| सोना भरकर उन्हे पृथ्वरीप्र बिखेर दिया । सप्तर्षि अन्नके 
101 श लीनते हए वहां पर्हुचे तो उन फलको भी उन्होने 





भारी जानकर अत्रि कहा-ये फल 


< 4 व. 9  करनेयोम्य । | 

यहण करनेयोग्य नहीं हे ।. हमारी ज्ञानाक्तिपर मोहका 
स 1.1 

तः र सः 2 =| र्गः पडा पु हे हम्‌ मन्दबुद्धि नहीं हो गये हे | हम 


मङ्दा , हे, ज्ञानी है, अतः इस बातको भटीभांति 


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* अर्चयस्व हषीकेदौ यदीच्छसि परं पदम्‌ „ 


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` अपश्ञा तपस्याका सञ्चय ही श्रेष्ठ है। जो 





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ही कटु परिणामको उत्पन्न करता है; अत 


अनन्त पदको इच्छा रखता हो. उसे तो इसे 
लना चाहिये ।'† 


वसिष्ठजीने कहा-इस लोकम 


दपि गह 


तरकिक संग्रहोंका परित्याग कर देता है 


उपद्रवे हान्त हो जाते हैँ । संग्रह करनेवाला कोई 
मनुष्य एसा नहीं है, जो सुखी रह सके । 


8 ` 


जो सुखे ए | 


धनसञ्चयक्ष ` 
४ 


जेसे-जैसे प्रतिग्रहका त्याग करता है वेसे-ही-वैपे । 
सन्तोषके कारण उसके ब्रह्म-तेजकी वद्धि होती हे। एक ॑ 


ओर अकिञ्चनता ओर दूसरी ओर राज्यको 
रखकर तोल गया तो राज्यकी अपेक्षा अकिञ्चनताका ही 
पलड़ा भारी रहा; इसलिये जितात्मा पुरुषके छिये कु 
भी संग्रह न करना ही श्रेष्ठ है। 


6 त = चक कवडः 9 
व =-= 


करयपजी बोले--धन-सम्पत्ति मोहे । 
डालनेवाटी होती है । मोह नरकमें गिराता है; इसल्यि , 


कल्याण चाहनेवारे पुरुषको अनर्थके साधन अर्थका 


~ = = 1 


दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये । जिसको धर्मकेल्वि । 
धन-संग्रहकी इच्छा होती है, उसके छिये उस इच्छका ` 


त्याग ही श्रेष्ठ है; वकयोकि कीचड़को ठगाकर धोनेक 
अपेक्षा उसका स्पर्हा न करना ही उत्तम है । धनके द्वार 
जिस धर्मका साधन किया जाता है, वह क्षयरीठ माना 
गया है। दूसरेके खयि जो धनका परित्याग है, वही 
अक्षय धर्म है, वही मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है । 
भरद्वाजने कहा- जब मनुष्यका इारीर जीर्ण 
होता है तब उसके दांत ओर बार भी पक जाते है 
किन्तु धन ओर जीवनकी आद्या बृढ होनेपर भी जीर्ण 


नहीं होती- बह सदा नयी ही बनी रहती हे । जैसे दर्जी 


सूईसे वस्मे सूतका प्रवेशा करा देता है, उसी प्रका, 


ध्वजः । ददाध्वजसमा वेहया दरावेहयासमो . नृपः ॥ 
६ | तेन तुल्यस्ततो राजा घोरस्तस्य ्रतिग्रहः ॥ ` 


स पच्यते ॥ 


117 
1 (4 कै 4 १२ + 
4. 


„त 


किकित्‌ ककि कि कक र ऊ 


4 ॥ ~ ८ १ 9.“ * ` 

त त | ट (१९ | २३ त २ + ४. ¶ 
शी ० ॥ 1 ष्क ध 3 ४ # क्श १ | ॥ । ॥ { ~~ # 8 ि + ॐ" कंच ¢ 4 4 
प ~ > छ ते क्र ॥ि = "व ` ४ = अव क 

ए) च ‰ ह स । ह >: † €, ॐ श = ४ ि 








सृष्टिखण्ड ] =» सपतर्ि-आश्रमके असङ्गे अलोभका वर्णन, अन्नदानादि धर्मोकी भ्रदौसा * 


1111111 ००१ २...4.4.4.9.8. 2.4. ४१.1.41 ४ 1.1.44... 4.4.02. 4.4. 


पि 





तष्णारूपी सू॑से संसाररूपी सूतका विस्तार होता है । 
तुष्णाका कहीं ओर-छोर नहीं है, उसका पेट भरना 
कठिन होता है; वह सेकड़ं दोषोंको ढोये फिरती है; 
उसके द्वारा बहुत-से अधर्म होते है । अतः तृष्णाका 
परित्याग ही उचित हे । 

गौतम बोले--इन्द्रियोके लोभग्रस्त होनेसे सभी 
मनुष्य सङ्कटमे पड़ जाते है । जिसके चिक्तमे सन्तोष है, 
उसके स्यि सर्वत्र धन-सम्पत्ति भरी हुई है; जिसके पैर 
जतेमे है, उसके छ्य सारी पृथ्वी मानो चमड़से मढ़ है । 
सन्तोषरूपी अमृतसे तप्त एवं शान्त चित्तवाठे पुरु्षोको 
जो सुख प्राप्त है, वह धनके कोभसे इधर-उधर दौड्ने- 
वाले लोगोको कहोसे प्राप्र हो सकता हे । असन्तोष ही 
सबसे बढ़कर दुःख है ओर सन्तोष ही सबसे बड़ा सुख 
है; अतः सुख चाहनेवाठे पुरुषको सदा सन्तुष्ट रहना 
चाहिये ।* र 

विश्चामित्रने कहा-किसी कामनाकी पतिं 
चाहनेवाङे मनष्यकी यदि एक कामना पूरणं होती है, तो 
दूसरी नयी उत्पन्न होकर उसे पुनः नाणके समान बींधने 
लगती ह । भोगोकी इच्छा उपभोगके द्वारा कभी शान्त 
नहीं होती, प्रत्युत घी डालनेसे प्रज्वकिति होनेवाली 
अ्रिकी भांति वह अधिकाधिक बढती ही जाती हे। 
भगोकी अभिलाषा रखनेवाला पुरुष मोहवरा कभी सुख 
नहीं पाता । 

जमदभ्रि बोले-- जो प्रतिग्रह ठेनेकी हाक्ति रखते 
हुए भी उसे नहीं ग्रहण करता, = दानी पुरु्षोको 
मिलनेवाञे सनातन लोकोको प्रा होता है । जो ब्राह्मण 
राजासे धन छेता है, वह महरषयोद्रार शोक करनेके 
योग्य है; उस मूर्खको नरक-यातनाका ` नहीं दिखायी 
देता । अतिग्रह नेमे समर्थ होकर भी उस प्रवृ नही 
र सः वन न ---------- चाहिये, क्कि अतिग्रहसे ब्रहरणोका ब्रहतेज 










७९ 


11.1.44. 4.4.421 [. 4. ४.४.8..1 


^ रपण 





नष्ट हो जाता है । 

असुन्थतीने कहा-तुष्णाका आदि-अन्त नही हे, 
वह सदा कारीरके भीतर व्याप्तं रहती है । दुष्ट लुद्धिवाङे 
पुरुषोकि स्यि जिसका त्याग करना कठिन है, जो ारीरके 
जीर्णं होनिपर भी जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राणान्तकारी 
रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग करनेवाटेको ही 
सुख मिरुता हे । 

परुसख ब्ोले--धर्मपरायण विद्वान्‌ पुरुष जसा 
आचरण करते है, आत्पमकल्याणकी इच्छा रखनेवाठे 
विद्वान्‌ पुरुषको वैसा ही आचरण करना चाहिये । 

ठेसा कहकर द्ढ़तापूर्वक नियमोका पार्न 
करनेवाले वे सभी महर्षि उन सुवर्णयुक्त फर्छरको छोड़ 
अन्यत्र चङे गये । घूमते-घामते वे मध्य पुष्करमें गये, 
जहाँ अकस्मात्‌ आये हुए बानःसख नामक परित्राजकसे 
उनकी भेट हई । उसके साथ वे किसी वनमें गये । वहं 
उन्हें एक बहत बड़ा सरोवर दिखायी दिया, जिखका जक 
कमलसे आच्छादित था । वे सब-के-सब उस सरोवरके 
विनरि बैठ गये ओर कल्याणका चिन्तन कसे रगे । 
उस समय शुनःसखने शक्ुधासे पीडित उन समस्त 
मुनि्ोसे इस प्रकार कहा-“महर्षियो ! आप सन लोग 
बताये, भूखकी पीड़ा कैसी होती हे ?' 

ऋषियोने कहा-- शक्ति, खद्ध, गदा, चक्र, तोमर 
ओर बाणोसे पीडित किये जानेपर मनुष्यको जो वेदना 
होती है, वह भी भूखकी पीड़ाके सामने मात हो जाती 
है । दमा, खाँसी, क्षय, ज्वर ओर मिरगी आदि रोगेसे 
कष्ट पाते हए मनुष्यको भी भूखकी पीड़ा उन खनकी 


ऊपेक्षा अधिक जान पडती है । जिस प्रकार सूर्यकी ¦ 


किरणसे पृथ्वीका सारा जर सखीच छिया जाता-हे, उसी 
प्रकार पेटकी आगसे शारीरकी समस्त नाड्यां सूख जाती 


ह! शरुधासे पीडित मनुष्यको आंँखसे कुर सूय नही 
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भूखकी आग प्रज्वकित होनेपर मनुष्य भंगा, बहरा, जड 
पञ्च, भ्यकर तथा मर्यादाहीन हो जाता है । लोग क्षुधासे 
पीड़ित होनेपर पिता-माता, स्री, पुत्र, कन्या, भाई तथा 
स्वजनोका भी परित्याग कर देते है । भूखसे व्याकुल 
मनुष्य न पितरोकी भलीभांति पूजा कर सकता है न 
देवताओंकी, न गुरुजनोका सत्कार कर सकता है न 
ऋषियों तथा अभ्यागतोंर्का । 
इस प्रकार अन्न न मिटनेपर देहधारी प्राणियोमिं ये 
सभी दोष आ जाते हे । इसछ्ियि संसारमें अन्नसे बढ़कर 
न तो कोई पदार्थ हुआ है, न होगा । अन्न ही संसारका 
मूक हे । सन कुछ अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है । 
पितरः देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, किन्नर, मनुष्य ओर 
पिज्ञाच--सभी अन्नमय माने गये है; इसख्थियि अन्नदान 
करनेवालेको अक्षय तृप्ति ओर सनातन स्थिति ग्राप्त होती 
हे । तप, सत्य, जप, होम, ध्यान, योग, उत्तम गति, सर्म 
ओर सुखकी प्रा्ि- ये सब कुछ अन्नसे ही सुरुभ होते 
हे । चन्दन, अगर, धूप ओर इीतकाल्मे इधनका दान 


` अन्नदानके सोरृहवें हिस्सेके बरार भी नहीं हो सकता । 
अत्न ही श्राण, बरु ओरं तेज है । अन्न ही पराक्रम है 
अन्नसे ही तेजकी उत्पत्ति ओर वृद्धि होती है । जो मनुष्य 
 श्रद्धापूर्वक भूखेको अन्न देता हे, वह ब्रह्मस्वरूप होकर 





॥ {| जह्याजीके साथ आनन्द मनाता है । जो एकाग्रचित्त होकर 







। [| अमावास्याको श्राद्धमे अन्नदानका माहात्यमात्र सुनाता 
ह; उसके पितर आजीवन सन्तुष्टं रहते है । 
0. ५  इद्िय इद्रिय-संयम ओरं मनोनिग्रहसे युक्त ब्राह्मण सुखी 





धर्मके,भागी होते हैँ । दम, दान एवं यम- ये तीनों 


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पापर्राहत एवे तेजस्वी होता हे । 


सनातन धर्म हे। दम तेजको 

ओर त्तम हे । दमसे पुरुष 
जो कुछ नियम 
यज्ञेके फर है, उन 


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हप्र. आधक ह । दमत 


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+ अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ + 


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६.११ इ 

ष्ड्ता, उसका सारा अङ्गं जता ओर सूखता जाता है। इन्धियोका दमन नहीं किया, उसके वनमे ५५९ 
हने कथे | 
भलीभोति दष ` 


भ । तथा जिसने मन ओर इन्धियोका 
किया हे, उसको [घर छोड़कर] किसी आश्रममे 
क्या आवङ्यकता है । जितेन्द्रिय पुरुष जहाँ -जहां 
करता है, उसके छियि वही-वही स्थान वन एवं 
आश्रम हे। जो उत्तम डील ओौर आचरणमे 
जिसने अपनी इन्दरियोको कालू कर स 


प्रयोजन ? विषयासक्तं मनुष्योंसे 
हैँ तथा घरमें रहकर भी यदि 
छया जाय तो वह तपस्या ही है । जो सदा रुभ कर्मगे 
ही प्रवृत्त होता है, उस वीतराग पुरुषके स्यि घर ह 


क्या है 
सदा सरू भावसे रहता है, उसको गन 
वनमें भी दोष बन जतै । 
पाच इनदियोका निग्रह का । 


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#% . = 5, ॐ 





तपोवन है। केवल राब्द-रासख्न-व्याकरणके चिन्तने 
ठगे रहनेवाठेका मोक्ष नहीं होता तथां लोगोँका मन | | 


बहलानेमें ही जिसकी प्रवृत्ति है, उसको भी मुक्ति नह ` 
मिरूती । जो एकान्तम रहकर दुढृतापूर्वक नियमोका 


पाठ्न करता, इन्द्रियोकी आसक्तिको दूर हटाता, 
अध्यात्मतत्त्वके चिन्तनमेँ मन लगाता ओर सर्वदा 
अहिसा-त्रतका पालन करता है, उसीका मोक्ष निश्चित 


है । जितेन्द्रिय पुरुष सुखसे सोता ओर सुखसे जागता हे। 


वह सम्पूर्णं भूतोकि प्रति समान भाव रखता है । उसके 
मनमें हर्ष-शोक आदि विकार नहीं आते । छेड़ा हुआ 
सिंह, अत्यन्त रोषमे भरा हुआ सर्पं तथा सदा कुपित 
रहनेवाला रात्र भी वैसा अनिष्ट नहीं कर सकता, जसा 
संयमरहित चित्त कर डाठता हे । 

मांसभक्षी भ्राणि्यो तथा अजितेन्दिय मनुष्ये 
लोगोको सदा भय रहता है, अतः उनके निवारणके लिव 
ब्रह्माजीने दण्डका विधान किया.ह । दण्ड ही ्राणि्योकी 
रक्षा ओर भ्रजाका पालन करता है। वही 
पापसे रोकता है । दण्ड सबके लिये दुर्जय होता है । वह 


सन प्राणिर्योको भय पर्हैचानेवालर हे । दण्ड ही मनुष्याक 


शासक है, उसीपर धर्म टिका हुआ है । सम्पूर्ण आ 


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कक उः 2 कि अक क = 


पके बिना ओर समस्त भूतोमें दम 'ही उत्तम व्रत माना गव 





सृष्टिखण्ड ] * सपर्षि-आश्रमके प्रसङ्गमें सप्तषियोके अलोभका वर्णन, अन्नदानादि धर्मोकी भरोसा * 


9 


1.1.14. 4.4.441... 
ममननम मनम न ४ म --------- ४.4.44 11111111 11111111 11111411 44.44 444 ~ .- 


इन्दीको शान्त बुद्धिवाके संतं ओर ऋषियोनि दम कहा 
डे । धर्म, मोक्ष तथा स्वर्ग ये सभी दमके अधीन दै । 
` जो अपना अपमान होनेपर क्रोध नहीं करता ओर सम्मान 
 होनेपर हर्षसे पूर नहीं उठता, जिसकी दृष्टम दुःख ओर 
सुख समान ह, उस धीर पुरुषको प्रशान्त कहते हैँ । 
जिसका अपमान होता हे, वह साधु पुरुष तो सुखसे 
सोता ओर सुखसे जागता है तथा उसकी बुद्धि 
कल्याणमयी होती है । परन्तु अपमान करनेवाला मनुष्य 
स्वयं नष्ट हो जाता है । अपमानित पुरुषको चाहिये कि 
वह कभी अपमान करनेवालेकी बुराई न सोचे । अपने 
धर्मपर दुष्ट रखते हुए भी दूसरोके धर्मकी निन्दा 
न करे ।* 

जो इन्द्रियोका दमन करना नहीं जानते, वे व्यर्थ ही 
डाखोंका अध्ययन करते है; क्योकि मन ओर इन्धिरथोका 
संयम ही शाखरका मूर है, वही सनातन धर्म है । सम्पूर्ण 
त्रतोका आधार दम ही है । छहों अङ्गो सहित पढ़ हुए वेद्‌ 
भी दमसे हीन पुरुषको पवित्र नहीं कर सकते । जिसने 
इन्दरियोका दमन नहीं किया, उसके सांख्य, योग, उत्तम 
कुर, जन्म ओर तीर्थस्नान--सभी व्यर्थ हे । योगवेतता 
द्विजको चाहिये कि वह अपमानको अमूतके समान 
समञ्ञकर उससे प्रसन्नताका अनुभव करे ओर सम्मानकौ 
विषके तुल्य मानकर उससे घृणा करे । अपमानसे उसके 
` तपकी वृद्धि होती है ओर सम्मानसे क्षय । पूजा ओर 
सत्कार पानेवाला ब्राह्मण दुही हुई गायकी तरह खाटी हो 
जाता है । जैसे गौ घास ओर जक पीकर फिर पुष्ट हो 
जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मण जप ओर होमके द्वा पुतन 
ब्रहमतेजसे सम्पन्न हो जाता है। संसारम निन्दा 
करनेवाठेके समान दूसरा कोई मित्र नही है, वर्योकिं वह 
पाप लेकर अपना पुण्य दे जाता है ।† निन्दा कसे 


* अवमाने न कुष्येत सम्मान न 
सुखं ह्यवमतः देते सुसं चैव प्रबुध्यति । 


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चवेक््य परधर्म॑न दूष्येत्‌॥ "<< ` "` 
अवमानी तु न ॒ध्यायेत्तस्य पाप कदाचन । स्वधर्ममपि चानन ४ - 3 





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वाल्ंकी स्वयं निन्दा न करे । अपने मनको रोके । जो उस 
समय अपने चित्तको वराम कर केता है, वह मानो 
अमृतसे स्नान करता हे । वृक्षोकि नीचे रहना, साधारण 
वस्र पहनना, अके रहना, किसीकी अपेक्षा न रखना 
ओर ब्रह्मचर्यका पालन करना--ये सब परमगतिको 
्राप् करानेवाठे होते है । जिसने काम ओर क्रोधको जीत 
लिया, वह जंगलमे जाकर क्या करेगा 2 अभ्याससे 
शाख्रकी, सीसे कुरूकी, सत्यसे क्रोधका तथा मित्रके 
दवारा भ्राणोकी रक्षा -की जाती हे। जो पुरुष उत्पन्न हुए 
क्रोधको अपने मनसे रोक ठेता है, वह उस क्षमके द्वारा 
सबको जीत ठेता है । जो क्रोध ओर भयको जीतकर 
शान्त रहता दै, पृथ्वीपर उसके समान वीर ओर 
कौन है। यह ब्रह्माजीका बताया हुआ गृढ़ उपदेरा 
हे। प्यारे! हमने धर्मका हदय-सार तत्त तुम्हें 
बतलाया हे । | | 
यज्ञ करनेवारकि लोक दूसरे हँ, तपस्ियोके रोक 
दूसरे है तथा इन्द्रियसंयमः ओर मनोनिग्रह करनेवाठे 
लोगकि रोक दूसरे ही है 1. बरे सभी परम सम्मानित हे । 
क्षमा करनेवाठेपर एक ही - दोष लागू होता हे, दूसरा 
नही, वह यह कि क्षमाडीर पुरूषको रोग रक्तहीन 
मान बैठते है । किन्तु इसे दोष नहीं मानना चाहिये, 
वर्योकि बुद्धिमानोका बल क्षमा ही हे 1 जो रान्ति अथवा 
क्षमाको नहीं जानता, वह इष्ट. (यज्ञ आदि) ओर पूर्त 
(तालान आदि खुदवाना). दोनेके फरसि वञ्चित हो 
जाता है । क्रोधी मनुष्य जो. जप, होम ओर पूजन करतां 
है, वह सब पुटे हुए घडेसे जककी भांति नष्ट हो जाता 
है । जो पुरुष प्रातःकार” उठकर प्रतिदिन इस पुण्यमय 
दमाध्यायका पाठ करता है, वह धर्मकी नौकापर आरूढ ` 





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वह ब्रह्मरोकको प्राप्त होता है तथा वहसे कभी नहीं 
गिरता । 
धर्मका सार सुनो ओर सुनकर उसे धारण करो- 
जो बात अपनेको ्रतिकूरू जान पडे, उसे दूसरोके छि 
भी काममें न लाये। जो परायी खीको माताके समान 
पराये धनको मिडीके ढेठेके समान ओर सम्पूर्णं भूतोको 
अपने आत्माके समान जानता है, वही ज्ञानी है । जिसकी 
रसोई बक्िवैश्वदेवके छिये ओर जीवन परोपकारके स्थि 
हे, वही विद्वान्‌ है । जसे धातुओमें सुवर्णं उत्तम है वैसे 
ही परोपकार सबसे श्रेष्ठ धर्म है, वही सर्वस्व है । सम्पूर्ण 
भ्राणियोके हितका ध्यान रखनेवाला पुरुष अमृतत्व प्राप्न 
करता हे। 
पुलस्त्यजी कहते हें इस प्रकार ऋषिरयोने 
शुनःसखके सामने धर्मके सार-तत्तका प्रतिपादन करके 
उसके साथ वहसे दूसरे वनम प्रवेदा किया । वहाँ भी 
उन्हे एक बहुत विस्तृत जलाराय दिखायी दिया, जो पदा 
ओर उत्परसे आच्छदित था । उस सरोवरमें उतरकर 


उन्होने मृणारु उखाड़ ओर उन्हे ढेर के-ढेर किनारेपर 


रखकर जसे सम्पन्न होनेवारी पुण्यक्रिया--सन्ध्या- 
तर्पण आदि करने गे । तत्पश्चात्‌ जब वे जसे बाहर 
निके तो उन मृणातत्को न देखकर परस्पर इस प्रकार 








| _ ऋषि बोले--हम सन लोग क्ुधासे कट पा द 


दामे किस, पापी ओर क्रूरने मृणाल्रंको 


ख्या } # 2 
॥ चुरा | ॥ 7 क 
| ~ १11 1 ६० 
/ # च १५, >> + 
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॥ "न्स, "~. ~ = व । 
त द. १ गवि $ , ० च -्त ५ ४... ् - 
(वि त क = ध ११ 4 ॥ ) [ । # षि तरह म १ # नि कुछ १ 
॥ ‡ (५, ~ । ५ ष ऋ. < ~ ५ ९32. नि ६५ + 
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व. ष ५ ५ र ~+ | मृणारकी 
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क  । कि नि (| ८ ध च| 
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4 च रे ५ 
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. देनेका 
प्र ` टेचेका पाप | तह 
4 | # + ॥ 4 ॥ 
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> ॐ ५1 व कि =+ क त; 
नौ ॐ १ ॐ, „+ 
ई ध है , र सेवन 8. $ करने 
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ध ॥ + ५४ ॥ य = $ 
~+ च 7 "क, ५ 
अ ० छ त 1 =. अ 
८ (4 ब्र -21-1 = 
१ ६) | रि + 
|, कि = > || ९ | | 1 | | | त ^ 
1 प ि ^ च. न | 
१.६ " 
न्क ब~ "र १ 
> 4. ` 
ऋ ५ 


क 9 क 


* अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ # 


1 1 व वावााका > पाण | 
क~~ ता | 
सदा ही इस पुण्यप्रद दमाध्यायको दूसरोंको सुनाता हे चुराया हो, उसे ऋतुकारुके बिना ही र 


क" -& ऋषियोनि 
यजाक्रा + । ~न, ५५> - †, ग । ¢ ` 
=" ह, ५ #.४५्‌ ॥ ह] # ॥ < द्विजातिमात्रको 
रि ङ $ „^> 6 + ८ करी 4 
करो अभीष्ट ही है; अतः 

ध ४ चैत १ द्‌ -् १५ ९ क = र्‌ ६ | ॥ र ५ 

ह ब. ॥ > 1 ) टिक == ~> क १ वे 

क ब्रेचनेके 183. 4 ९ भ व सबके म॒णाकी गर, 

छ = ॥ ^ प 





[ सक्षिप्न 


सोने, एक दूसरेके यहाँ जाकर अतिरि 
एक च हो वहाँ निवास करने 
रूष्जातिको सीसे सम्बन्ध रखनेका पाप लगे 
कोगोको जिन रोकोमे जाना पड़ता है वहीं वह ५ 
भरद्वाज बोले-- जिसने मृणाल चुराये 6 
सबके प्रति क्रूर, धनके अभिमानी, सबसे ह 
वाले, चुगरुखोर ओर रस बेचनेवाठेकी गति प्राप्त के। 


गोतमने कहा-- जिसने मृणाल्ेकी चोरी कीहो | 
नह सदा रुद्रका अन्न खानेवाटे, परख्रीगामी ओर घरे | 
दूसरोको न देकर अकेठे मिष्टान्न भोजन करनेवाले 


समान पापका भागी हो। 


विश्वामित्र बोले जो मृणार चुरा ठे गया हो | 
वह सदा काम-परायण, दिनमें मैथुन करनेवाठे, निच 
पातकी, पराय निन्दा करनेवाले ओर परस्रीगामीकी गति । 


प्राप्त करे । 

जमद्िने कहा- जिसने मणालकी चोरी कौ 
हो, वह दुर्बुद्धि मनुष्य अपने माता-पिताका अपमान 
करनेके, अपनी कन्याके दिये हुए धनसे अपनी जीविका 
चानेके, सदा दूसरेकी रसोईमे भोजन करनेके, परख्रीसे 
सम्पर्क रखनेके ओर गोओंकी बिक्री करनेके पापका 
भागी हो । 

परारारजी बोले- जिसने मृणार्‌ चुराये ह, वह 
दूसरोका दास एवं जन्म-जन्म क्रोधी हो तथा सब 
प्रकारके धर्मकर्मेसि हीन हो । 

श्ुनःसखने कहा- जिसने मृणाल्की चोरी कौ 
हो, वह न्यायपूर्वक वेदाध्ययन करे, अतिथिर्ोमि ए 
स्खनेवाला गृहस्थ हो, सदा सत्य बोटे, विधिव 
अभरिहोत्र करे, प्रतिदिन यज्ञ॒ करे ओर 


ब्रह्मलोकको जाय । 
योने कहा--शुनःसख ! तुमने जो त 





ब्ाह्ण हक 


॥ - 


क कु ` अनि वा> वीर कक को 


[हि ॥ क ककय क कोको 





 तु्योको भस करनेवाला 


सृष्टिखण्ड | 


8 
४ 
४.4... १.२.41... 11 1.1. 1.4.544 


दिये थे । मुञ्चे आप इन्द्र समज । मुनिवरो ! आपने रोभके 
परित्यागसे अक्षय लोकोपर विजय पायी है । अतः इस 
विमानपर बैठिये, अब हमलोग खर्गलोकको चे । 

तब महर्षियोनि इन्द्रको पहचानकर उनसे इस 
प्रकार कहा । 

ऋषि बोले- देवराज ! जो मनुष्य यहोँ आकर 
मध्यम पुष्करे स्नान करे ओर तीन राततक यहाँ 


------ के. 4 --- 
नाना प्रकारके त्रत, स्नान ओर तर्पणकी विधि तथा अन्नादि पर्वतोके दानकी प्ररंसामें 
राजा धर्ममूर्तिकी कथा 


पुलस्त्यजी कहते हैँ--राजन्‌ ! ज्येष्ठ पुष्करमें गौ, कहलाता है। जो चैतके महीने दही, दूध, घी ओर 


मध्यम पुष्करमे भूमि ओर कनिष्ठ पुष्करमें सुवर्णं देना 
चाहिये । यही वहोँके ख्य दक्षिणा हे । प्रथम पुष्करके 
देवता श्रीब्रह्याजी, दूसरेके भगवान्‌ श्रीविष्णु तथा 
तीसरेके श्रीरुद्र हे। इस प्रकार तीनों देवता वहां 
पृथक्‌-पृथक्‌ स्थित हैँ । अब में सब त्रतेमिं उत्तम. 
महापातकनाडान नामक त्रतका वर्णन करता हू। यह 
भगवान्‌ इाङ्करका बताया हुआ व्रत हे । रत्रिको अन्न 
तैयार करके कुदटुम्बवाके ब्राह्मणको बुराये ओर उसे 
भोजन कराकर एक गौ, सुवर्णमय चक्रसे युक्त त्रिरुल 
तथा दो वसख्न--धोती ओर चर दान करे । जो मनुष्य 
इस प्रकार पुण्य करता है, वह शिवलोकम जाकर 
आनन्दका अनुभव करता हे । यही महापात्कनारान त्रत 
है । जो एक दिन एकभक्तव्रती रहकर एक ही अन्नका 
भोजन कर दूसरे दिन तिलमयी धेनु ओर वृषभका दान्‌ 
करता है, वह भगवान्‌ काङ्कर्के पदको प्रान होता हे । यह 
पाप ओर डोकोका नादा कलेवाल्म “द्रत है । जो 
एक वर्षतक एक दिनका अन्तर दे रात्रिम भोजन करता 
है तथा वर्ष पूरा होनेपर नीक कमर, सुवर्णमय कमठः 
ओर चीनीसे भरा हुआ पात्र एवं बैक दान करता है 
भगवान्‌ श्रीविष्णुके धामको प्रा होता हे । यह नीलत्रत 

` कहलाता है । जो मनुष्य आषादृसे कंकर चार महीन 
तेरी मालि छोड़ देता है ओर भोजनक साम 
करता है, वह भगवान्‌. श्रीहरिके धाममे जाता है | । 





साना भकारके त्रत, स्नान ओर तर्पणकी विधि तथा धर्ममर्तिकी कथा + 


चण्टा ब्राह्मणको दान करता हे, वह सारस्वतः 


७५५ 


उपवासपूर्वक निवास करे, उसे अक्षय फरक प्रापि 
होती है । वनवासी महर्षियोकि छ्य जो बारह वर्षोकी 
यज्ञदीक्षा बतायी गयी है, उसका पूरा-पूरा फर उस 
मनुष्यको भी मिरु जाता है । उसकी कभी दुर्गति नही 
होती । वह सदा अपने कुरूवारकि साथ आनन्दका 
अनुभव करता हे तथा ब्रह्यरोकमें जाकर ब्रह्माजीके एक 
दिनतक (कल्पभर) वहोँ निवास करता हे । 


गुडका त्याग करता ओर गौरीकी प्रसन्नताके उद्देरयसे 
ब्राह्मण-दम्पतीका पूजन करके उन्हें महीन वख ओर 
रससे भरे पात्र दान करता है, उसपर गोरीदेवी प्रसन्न 
होती है। यह “गौरीतव्रत' भवानीका लोक श्रदानं 
कसेवाल् है । जो आषाढ़ आदि चातुर्मास्यमे कोड भी 
फल नहीं खाता तथा चोमासा बीतनेपर घी ओर गुड़के 
साथ एक घडा एवे कार्तिककी पूर्णिमाको पुनः कुछ 
सुवर्ण ब्राह्मणको दान देता है, वह रुद्ररोकको प्राप्त होता 
है । यह "रिवत्रत' कहलातां हे । 
जो मनुष्य हेमन्त ओर रिरिपमें पुष्पका सेवन 
छोड़ देता है तथा अपनी राक्तिके अनुसार सोनेके तीन 
फू बनवाकर फाल्गुनकी पूर्णिमाको भगवान्‌ श्रीदिव ` 
ओर श्रीविष्णुकी प्रसन्नताके छि उनका दान करता है, ` 
वह परमपदको प्राप्त होता है । यह “सोम्यत्रत' कहलाता 
है। जो फाल्गुनसे आरम्भ करके प्रत्येकं मासकीं 
तृतीयाको नमक छोड़ देता है ओर वर्ष पूर्णं होनेषर 
भरवानीकी प्रसन्नताके सख्यि ब्राह्मण-दम्पतीका पूजन 
करके उन्हे शय्या ओर आवङ्यक सामभिर्योसहित गृह ` | 
दान करता है, बह एक कल्पतक गौरीरोकमें निवास ` 
करता है। इसे "सौभाग्यत्रत" कहते हैँ । जो द्विज एक ` 
वर्षतक मौनभावसे सन्ध्या करता है ओर वर्षके अन्तम ` । 

















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उसकी पूर्तिक निमित्त यौ. तथा सोनेका मृग दान करे, वह 


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७६ 








यह रूप ओर विद्या प्रदान करनेवाला "सारस्वत" नामक 
त्रत॒हे। अतिदिन गोबरका मण्डल बनाकर उसमें 
अक्ष्तोद्रारा कमर बनाये । उसके ऊपर भगवान्‌ श्रीरिव 
या श्रीविष्णुकी प्रतिमा रखकर उसे घीसे स्नान कराये 
फिर विधिवत्‌ पूजन करे । इस प्रकार जब एक वर्ष नीत 
जाय, तन साम-गान करनेवाले ब्राह्मणको शद्ध सोनेका 
बना हुआ आठ अंगुर्का कमर ओर तिरूकी धेनु दान 
करे । एेसा करनेवाला पुरुष शिवल्रेकमें प्रतिष्ठित हाता 
हे । यह “सामव्रत' कहा गया है | 
` नवमी तिथिको एकभुक्तं रहकर-- एक ही अन्नका 
भोजन करके कुमारी कन्याओंको भक्तिपूर्वक भोजन 
कराये तथा गो, सुवर्ण, सिला हआ अंगा, धोती, चर 
तथा सोनेका सिंहासन ब्राह्मणको दान करे; इससे वह 
रिवखोकको जाता हे । अरबों जन्मतक सुरूपवान्‌ होता 
हे । डातु उसे कभी परास्त नहीं कर पाते । यह मनुष्योको 
सुखं दनेवाल "वीरव्रत नामका व्रत हे । चैतसे आरम्भ 
कर चार मही्नोतक प्रतिदिनं लोर्गोको बिना माँग जल 
पिखये ओर इस व्रतकी संमापि होनेपर अन्न-वस्रसहित 
जखसे भरा हुआ माट, तिरूसे पूर्ण पात्र तथा सुवर्णं दान 
करे । एेसा करनेवाला पुरुष ब्रह्मरोकमें सम्मानित होता 


हे । यह उत्तम “आनन्दवरत' है। जो पुरुष मासका 


बिकर परित्याग करके त्रतका आचरण करे ओर 





















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णमाकं दिन ब्राह्मणका भाजन कराकर 
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* अर्चयस्व हषीकेरो यदीच्छसि परं पदम्‌ * । 


[ संक्षिप्त 


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२.4 ए ९९९, 1 
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त्रतके अन्तमं फर्ोका हार घी ओर घृति | 


ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकम 
स्सका नाम 'दीलत्रत' है। जो [नियतं 
प्रतिदिन सन्ध्याके समय दीप-दान करता हे तथा घौ । 
तेरुका सेवन नहीं करता, फिर त्रत समाप्त 
ब्राह्मणको दीपक, चक्र, शल, सोना ओर 
दान करता है, वह इस संसारमे तेजस्वी होता है 
अन्तमं रुद्रलोकको जाता है। यह दीपनिव्रत है। 
कातिकसे आरम्भ करके प्रत्येक मासकी त॒तीयाको 


धोती चेह | 


समय गोमन्तम पकायी हुई जौकी रप्सी खाकर रहता #। 
भीर वर्षं समाप्त होनेपर गोदान करता है, वह एक । 
कल्पतक गौरीलोके निवास करता है तथा उसके बद ` | 
इस रोकमें राजा होता है । इसका नाम 'रुद्रत्रत' है | यह 
सदा कल्याण करनेवातपर है । जो चार महीनोंतक चन्दन ` 
रूगाना छोड़ देता है तथा अन्तमे सीपी, चन्दन, अक्षत । 
ओर दो धेत वस्र--धोती ओर चदर ब्राह्मणको दान । 


करता है, वह वरुणलोके जाता है । यह "दुढत्रत 
कहलाता हे । 

सोनेका ब्रह्माण्ड बनाकर उसे तिरूकी ढेरीमें रखे 
तथा भैं अहद्काररूपी तिरूका दान करनेवाला हू एसी 
भावना करके धीसे अको तथा दक्षिणासे ब्राह्मणको 


त्च करे। फिर माला, वस्र तथा आभूषणेदरार 


ब्राह्मण-दम्पतीका पूजन करके विश्वातमाकी तृकिके 
उद्ेरयसे किसी शुभ दिनको अपनी हाक्तिके अनुसा? 
तीन तोकेसे अधिक सोना तथा तिकसहित ब्रह्मप्ड 
ब्राह्मणको दान करे । पेसा करनेवाला पुरुष प॒नर्जनमसे 
रहित ब्रह्मपदको प्राप्त होता है । इसका नाम (ब्रह 
है । यह मनुष्योको मोक्ष देनेवाला है। जो तीन द 


> केव दुध पीकर रहता है ओर अपनी शक्तिके अदु 
दि एक तोकेसे अधिक सोनेका कल्पवृक्ष बनवाक 
फिर एक सेर चावर्कै साथ ब्राह्यणको दान करता दै, वह भी 
र ब्रह्मपदको प्राप्त होता है । यह "कल्पवुक्षत्रत हे । | 
 महीनेतक > उपवास करके ब्राह्मणको सुन्दर गौ दान करा 


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; ` ब्राह्मणको गाय-बैक देता है, उसे सूर्यलोककी 








सुष्टिखण्ड 1 


* नाना भ्रकारके व्रत, खान ६ तर्पणकी विधि तथा धर्ममूर्तिकी कथा * 


४ 
०1.1.44... ४.4.484: 1111714 


पथ्वी बनवाकर दान करता हे ओर दिनिभर दूध पीकर 
रहता है, वह रुद्ररोकमें प्रतिष्ठित होता हे । यह धनप्रद 
नामक व्रत है । यह सात सौ कल्पोतक अपना फल देता 
रहता है । माघ अथवा चैतकी तृतीयाको गुड़की गौ 
बनाकर दान करे। इसका नाम 'गुडत्रत' हे । इसका 
अनुष्ठान करनेवाल्न पुरुष गोरीरोकमें सम्मान पाता है । 
अब परम आनन्द प्रदान करनेवाले महात्रतका 
वर्णन करता ह । जो पंद्रह दिन उपवास करके ब्राह्मणको 
दो कपिला गौरपँ दान करता है, वह देवता ओर असुरोसे 
पूजित हो ब्रह्मखोकमे जाता है तथा कल्पके अन्तम 
सबका सम्राट्‌ होता है । इसका नाम ्रभात्रत' भी है। 
जो एक वर्षतक केवर एक ही अन्नका भोजन करता है 
ओर भक्ष्य पदाथेकि साथ जका घडा दान करता है, 
वह कल्पपर्यन्त रिवलोकमें निवास करता हे। इसे 
'प्रा्तित्रत' कहते हैँ । जो प्रत्येक अष्टमीको रात्रिम एक 
बार भोजन करता है ओर वर्ष समाप्त होनेपर दूध 
देनेवाटी गौका दान करता है, वह इन्द्रलोके जाता हे । 
इसे “सुगतित्रत' कहते हैँ । जो वर्षा आदि चार ऋतुओमे 
ब्राह्मणको इधन देता है ओर अन्तमं घी तथा गोका दान 
करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता हे । यह सब पापोंका 
, नाडा करनेवाला 'वैश्वानस्रत' हे । 
ू जो एक वर्षतक प्रतिदिन खीर खाकर रहता है ओर 
त्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणको एक गाय ओर एक बेर 
दान करता है वह एक कल्पतक लक्ष्मीरोकमें निवास 
करता है। इसका नाम 'देवीव्रत' है। जो प्रत्येक 
सष्ठमीको एक बार रात्रिम भोजन करता है ओर वष 
समाप्त होनेपर दृध देनेवारी गौ दान कता हे, उसे 
सूर्यलोककी प्राप्ति होती हे । यहं  भानुत्रत है । जो ्रतयेक 
चतुर्थीको एक लार रात्रिम भोजन करता ओर वर्षके 
` अन्तमं सोनेका हाथी दान करता है, उसे हिवलोककीौ 
म्रा होती है। यह 'वैनायकत्रत' है । जो चोमासेभर 
। बेबे फलका परित्याग करके कार्तिक सोके 
फलका दान करता हे तथा. हवन ककः उसके अन्तमं 





श्रि हेती 


करके अपनी शक्तिके अनुसार गौ, वख ओर सुवर्णके 
दवारा ब्राह्मणोकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त होता 
हे । यह 'विष्णुत्रत' है । जो प्रत्येक चतुर्दहीको एक नार 
राते भोजन करता ओर वर्षकी समाप्ति होनेपर एक गाय 
ओर एक बैर दान करता है, उसे रुद्रलोककी प्रापि होती 
हे । इसे "्रूयम्बक-व्रत' कहते है । जो सात रात उपवास 
करके ब्राह्मणको घीसे भरा हुआ घड़ा दान करता है, वह 
ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है । इसका नाम “व्रतः हे । जो 
कारी जाकर दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह एक 
कल्पतक इन्द्रलोकमे निवास करता है । यहं “मित्रत्रत' 
है । जो एक वर्षतक ताम्बूलका सेवन छोड़कर अन्तर्मे 
गोदान करता है, वह वरुणलोकको जाता हे । इसका 
नाम "वारुणत्रत' है । जो चान्द्रायणत्रत करके सोनेका 
चन्द्रमा बनवाकर दान देता है, उसे चन्द्रलोककी प्राप्ति 
होती है । यह “चन्द्रत्रत' कहता हे । जो ज्येष्ठ मासमे 
पञ्चापि तपकर अन्तम अष्टमी या चतुरदलीको सोनेकी 
गोका दान करता है, वह स्वर्गको जाता हे । यह रुद्रवत्‌ 
कहलाता है। जो प्रत्येक त॒तीयाको शिवमन्दिरमं जाकर 
एक बार हाथ जोडता है ओर वर्ष पूर्ण होनेपर दूध 
देनेवाटी गौ दान करता है, उसे देवीरोककी प्राप्ति होती 
है । इसका नाम “भवानीत्रत' हे । 

जो माघभर गीला वस्र पहनता ओर सष्ठमीको 
गोदान करता है, वह कल्पपर्यन्त स्वर्गे निवास करके 
अन्तम इस पुथ्वीपर राजा . होता हे । इसे ^तापकंन्रत 

हे । जो तीन रात उपवास करके फाल्गुनकी 

ूर्णिमाको घरका दान करता है, उसे आदित्यलोककी 
प्राप्ति होती है। यह “धामव्रत' है । जो त्रत रहकर तीनों 

अमिं- प्रातः मध्याह्न एवं सायका 


भूषरणोदवार ब्रह्मण-दम्पतीकी पूजा करता हे, उसे मोक्ष. | 
मिलता है । यह “मोक्षत्रत हे । जो सङ्खपक्षको द्वितीयके! 4 
दिन ब्राह्मणको नमकसे भरा हआ पात्र, वखरसे ढका ` 






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हआ कौसेका र्तन तथा दक्षिणा देता है ओर ब्रत समा ` 





होनेपर गोदान करता हे, वह भगवान्‌ श्रीरि 


रजा ५ क. 


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७८ 











| दान करता है, वह वैधानरल्ेकमें जाता है। इसे 
।  “अभित्रत' कहते हँ । जो प्रत्येक दज्ामीको एक ही 
1॥ अन्नका भोजन ओर वर्ष समाप्त होनेपर दस गँ तथा 
। सोनेका दीप दान करता है, वह ब्रह्माण्डका स्वामी होता 
॥ । हे । इसका नाम "विश्वत्रत" है । यह बड़े-बड़े पातकोंका 
नाड करनेवाल् हं । जो खयं कन्यादान करता तथा 
। ^ दसरेकी कन्याओंका विवाह करा देता है, वह अपनी 
\ इक्रीस पीडियोंसहित ब्रह्मरोकमें जाता है । कन्या-दानसे 
। ` बढ्कर दूसरा कोड दान नहीं है । विरोषतः पुष्करमें ओर 

। वहाँ भी कार्तिकी पूर्णिमाको, जो कन्या-दान करेगे. 
उनका खर्गमे अक्षय वास होगा । जो मनुष्य जलम खड 
4 ^ होकर तिरुकी पीठीके बने हुए हाथीको रलनंसे विभूषित 


ऋ कः , ॥ ~ क १. 
~ ॥ ४) =, ) 
4 























करक ब्राह्मणको दान देते है, उन्हें .इन्द्रलोककी प्राप्ति 
होती हे । जो भक्तिपूर्वक इन उत्तम व्रतोंक्रा वर्णन पढ़ता 
ओर सुनता है, वह सौ. मन्वन्तरोतक गन्धर्वोका स्वामी 
होताहै। ~ 
खानके बिनान तो इारीर ही निर्मर होता है ओर 
न मनकी ही शुद्धि होती है, अतः मनकी शुद्धिके छि 
खनसे पहर स्नानका विधान हे । घरमे रखे. हुए अथवा 
। तुरत निकार हुए जसे स्नान करना चाहिये । [किसी 
। जखरराय या नदीका स्नान सुरुभ हो तो ओर उत्तम है ।] 
|| . मन्रवेत्ता विदान्‌ पुरुषको मूरमन्त्रके द्वारा तीर्थकी 
[ कल्पना कर छेनी चाहिये । “ॐ नमो नारायणाय' - 
(|! यह मूलमन्त्र बताया गया है । पहर हाथमे कुडा केकर 
। ` विधिपूर्वक आचमन करे तथा मन ओर इद्ियोको 
८ ¢ ५ चौकोर ४ शं अनाकर उसमे निभाङ्कित 
9 ् | ६५ | गङ्गाका आवाहन करे-गद्धे । तुम 








 किष्णृषादप्रसतास लष्णना विष्णुदेवता तत्‌ । 
०६१ च~ 1।= (&.  वायुरत्रवीत्‌ 
ते. ` ताम : दवषु न्ना । दक्षा पु 


[क 
[लख 


च ह 
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>~ [व ऋ > श 
"त ता. ॥ {+~ ॥ 
1 ^+ 4 - ।  व्व्ि, = | 

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द्ध र यं = = ष १ 
(1) 4 
क्क ५५ नि (क 1 ह 1 
1३ (9 (ॐ । + 2 :< ५1 4 + 
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* अर्चयस्व हषीकेदो यदीच्छसि परं पदम्‌ * 


६.४... ४.94. 4.4. 8.4.1 1 पवयानककि ` ॥.४..४.१..१.१..१.८.7; , ४.१. १.४.४.१.1 
५ * ५४ = व्यनृकसानकःः- 
५५.१११ 1 
४१, । 
एक ही अन्नका भोजन ओर वर्ष समाप्त होनेपर कमल्का तुम्हारे देवता , इसीखि्यि तुम्हे वैष्णवी ५ | 


 भम्यन्तरिश्षे च तानि ते सन्ति जाहवि ॥ ` 


+ " , = 5 > ~ द कदि ^ "| 2-‰“:*4 जाहती ~ चैव सान्ता सान्तिपरदायिनी 
वद्या  महोरेवो त्था ठखद [दनः चच जा चैव उान्ता ३ (५.4 
ब महादेली तथा लोकभसादिनी । क्षेमा च जाहवी चैन रन्ता रा 

८ र 





तुम जन्मरे लेकर मृत्युतक समस्त क ` | 
करो ! स्वर्ग, पृथ्वी ओौर अन्तरिक्षम कुल स | 
करोड़ तीर्थं है, यह वायु देवताका कथन है भ | 
जाह्नवी ! वे सभी तीर्थ तुम्हारे भीतर „ध 
देवलोके तुम्हारा नाम नन्दिनी ओर नलिनी रै ६ 
सिवा दक्षा, पृथ्वी, सुभगा, विश्चकाया शिवा 1 
विद्याधरी, महादेवी, लोक-प्रसादिनी, क्षेमा 

डान्ता ओर रान्तिप्रदायिनी आदि 


है ।* जहौँ खानके समय इन पवित्र नामका कीत 


होता ह. वहाँ त्रिपथगामिनी भगवती गङ्गा उपस्थित हे । 


जाती हेै। 


सात बार उपर्युक्त नामका जप करके समु ' 
आकारमें दोनों हार्थोको जोड़कर उनमें जल ठे। तीन्‌ ' 
चार, पाच या सात बार मस्तकपर डरे; फिर विधिपूर्वक । 


तुम्हारे अनेकों नापर ' 


मृत्तिकाको अभिमन्त्रित करके अपने अङ्गम लगवे। । 


अभिमन्त्रित करनेका मन्त्र इस प्रकार है-- 
अशक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे । 
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्‌ ॥ 
उद्धूतासि वराहेण . कृष्णेन रातवाहूना । 
नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुत्रते ॥ 


(२०। ९५५, १५०) 
वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्च ओर रथ चल कते । 


है । भगवान्‌ श्रीविष्णुने भी वामनरूपसे तुह एक पैसे 
नापा था। मृत्तिके ! मैने जो खुरे कर्म किये हो, मेर 
सन पापोंको तुम हर लो । देवि ! भगवान्‌ श्रीविष्णु 
सैकड़ों भुजाओंवाले वराहका रूप धारण करके तर 
जसे बाहर निकाला था। तुम सम्पूर्ण 
उत्पत्तिके, छ्य अरणीके समान हो । सुत्रते ! तुमं म 
नमस्कार है। 


नस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणान्तिकात्‌॥ 





|, 


` 4 
१५ 
! 


| 
| 


क तिकि को = ककः पिः ध 
क क क्छ = 











सृष्टिखण्ड । 


* नाना भ्रकारके व्रत, स्नान ओर ( विधि तथा धर्ममूर्तिकी कथा * 


७९ 


० 1.4.44... 4.4. 4.4.. ४.1; 
1; ++ 111 1 .4.4.4.4.1 1.7 ०.4 .1.६.4.4.4.: 
4.4.4.4.4.4.1.1.1.11711117 ८:44 12.1.44... 


इस प्रकार मृतिका रुगाकर पुनः स्नान करे । फिर 
विधिवत्‌ आचमन करके उठे ओर शुद्ध सफेद धोती एवं 
चर धारण कर त्रिकोकीको तृप्त करनेके स्यि तर्पण करे । 
सबसे पह ब्रह्मा, विष्णु, सुद्र ओर प्रजापतिका तर्पण 
क्रे । तत्पश्चात्‌ देवता, यक्ष, नाग, गन्धन, श्रेष्ठ अप्सरा 
क्रूर सर्प, गरुड पक्षी, वृक्ष, जम्भक आदि असुर, 
विद्याधर, मेघ, आकाराचारी जीव, निराधार जीव, पापी 
जीव तथा धर्मपरायण जीवको तृप्र केके छि मै जल 
देता ह--यह कहकर उन सबको जलाञ्जलिः दे ।* 
देवताओंका तर्पण करते समय यज्ञोपवीतको नायं कंधेपर 
ड रे, तत्पश्चात्‌ उसे गलेमें मालाकी भति कर ठे ओर 
मनुष्यो, ऋषियों तथा ऋषिपुत्रौका भक्तिपूर्वक तपण करे । 
"सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु ओर 
पञ्चरिख- ये सभी मेरे दिये जकसे सदा तृप्त हां । एसी 
भावना करके जल दे।† इसी प्रकार मरीचि, अत्रि 
अङ्िरा, पुलस्त्य, पु, क्रतु, परचेता, वसिष्ठ, भृगु, नारद 
तथा- सम्पूर्ण देवर्षियों एवं ब्रह््षिर्योका अशक्षतसहित 
जलके द्वारा तर्पण करे । इसके बाद यज्ञोपवीतंको दाये 
कंधेपर करके नाये घुटनेको पुथ्वीपर टेककर बेठे; फिर 
अग्निघ्ठा्त, सौम्य, हविष्मान्‌, ऊष्मप, सुकाली, बहिषद्‌ 
तथा आज्यप नामके पितरोका तिर ओर चन्दनयुक्त 
जलसे भक्तिपूर्वकं तर्पण करे । इसी प्रकार हाथों कुरा 
लेकर पवित्रभावसे परलेकवासी पिता, पितामह आदि 
ओर मातामह आदिका, नाम-गोत्रका उच्चारण करते हुए 
तर्पण करे । इस क्रमसे विधि ओर भक्तिके साथ सबक 
तर्पण करके नि्नाङ्कित मन्रका उच्चारण करे-- 
येऽबान्धवा बान्धवा ये येऽन्यजन्मनि बान्धवाः ।' 
ते तृपधिमखिला यान्तु येऽप्यस्मत्तोयका्खिणः । 


(२० । १६९७०) 





* देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरसो वराः ॥ 
क्रूराः सपः सुपर्णाश्च तरवो जम्भकादयः । विद्याधर 








निरधारश्च ये जीवा पपे ध्म साथ त ¦ 
2 सुरथैव वोदुः पञ्चरिखस्तथा ॥ ` ` 


“जो लोग मेरे बान्धव न हो, जो मेरे बान्धव हों तथा 
जो दूसरे किसी जन्ममे मेरे बान्धव रहे हा, वे सब मेरे दिये 
हए जकसे तृप्त हो । उनके सिवा ओर भी जो कोड प्राणी 
मुञ्चसे जलकी अभिलाषा रखते हो, वे भी तृप्ति खभ 
कर" [एेसा कहकर उनके उदेर्यसे जरु गिराये ।] 

तत्पश्चात्‌ विधिपूर्वकं आचमन करके अपने अगे 
पष्प ओर अश्षतोसे कमरकी आकृति बनाये । फिर 
यन्नूर्वक सूर्यदेवके नारमोका उच्चारण करते हुए अक्षत, 
पुष्प ओर रक्तचन्दनमिश्रित जकसे अर्घ्य दे। 
अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है-- 


नमस्ते विश्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे । 
सहस्रहमये नित्य नमस्ते सर्वतेजसे ॥ 
नमस्ते रुद्रवपुषे नमस्ते भक्तवत्सल ॥ 
पदानाभ नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदभ्रूषित ॥। 


नमस्त सर्वलोकेषु सुप्तोस्तान्‌. प्रतिबुध्यसे 1 
सुकृते दुष्कृते चैव सर्व॑ पयसि सवदा ॥ 
सत्यदेब नमस्तेऽस्तु पसीद मम॒ भास्कर । 
दिवाकर नमस्तेऽस्तु भ्रभाकर नमोऽस्तु ते॥। 
` = (२०1 ९७२७५) 

“भगवान्‌ सूर्यं ! आप विश्वरूप ओर ब्रह्मस्वरूप है 
इन दोनों रूपेम आपको नमस्कार है । आप्‌ सहस्र 
किरणे सुदोभित ओर सबके तेजरूप है, आपको सद्‌ 


नमस्कार है। भक्तवतसर ! रु्ररूपधारी आप पसमेश्चरको 
बारम्बार नमस्कार है! कुण्डल ओर अङ्गद आदिः 
आभूषणणोसे विभूषित पद्मनाभ ! आपको नमस्कार हे। 


जगति है आपको मेरा प्रणाम है \ आप सदा सबके 
पाप-प॒ण्यको देखा करते द । सत्यदेव ! आपको 


। 
भगवन्‌ ! आप सम्पूर्णं लोकके सोये हुए जीर्वोको | 
| 


नमस्कार है । भास्कर ! मुञ्षपर प्रसन्न होडये । दिवाकर ! ` 


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| इस प्रकार सूर्यदेवको नमस्कार करके तीन बार 
(| उनकी प्रदक्षिणा करे । फिर द्विज, गौ ओर सुवर्णका स्पर्हा 
करके अपने घरमें जाय ओर वहाँ भगवानक्री पावन 
॥| प्रतिमाका पूजन करे। [तदनन्तर भगवान्‌को भोग 
1 रूगाकर बलिवैश्वदेव करनेके पात्‌] पहठे ब्राह्मणोंको 
' ॥! (| भोजन करा पीछे स्वयं भोजन करे । इस विधिसे नित्य- 
|. कर्म करके समस्त ऋषियोनि सिद्धि प्राप्त की है। 
॥ ^ पुलस्त्यजी कहते हँ राजन्‌ ! पूर्वकारूकी बात 
॥ है बृहत्‌ नामक कल्पमें धर्ममूर्ति नामके एक राजा थे. 
५ जिनकी इन्द्रके साथ मित्रता थी । उन्होने सहस्नों दैत्योका 
| वध किया था । सूर्यं ओर चन्द्रमा भी उनके तेजके सामने 
^ अभाहीन जान पड़ते थे । उन्होने सैकड़ों शातरओंको परास्त 
~ किया था। वे इच्छानुसार रूपं धारण कर सकते थे। 
| मनुष्योसे उनकी कभी पराजय नहीं हुई थी । उनकी 
पलीका नाम था भानुमती । वह त्रिभुवनमें सबसे सुन्दरी 
थी । उसने लक्ष्मीक भाति अपने रूपसे देवसुन्दरियोको 
भी मात कर दिया थां। भानुमती ही राजाकी पटरानी 
थी । वे उसे म्राणेोसे भीःबटृकर मानते थे। एक दिन 
 राजसभामे बैठे हए महारोज धर्ममूर्तिन विस्मय-विमुग्ध 
(। हो अपने पुरोहित मुनिश्रेष्ठ ` वसिष्ठको प्रणाम करके 
4. पूछा--“भगवन्‌ ! किस `धर्मके प्रभावसे मुञ्चे सर्वोत्तम 
¢  र्ष्मीकी भरि हुई है 2 मेरे शरीरम जो सदा उत्तमः ओर 
||| : वसिष्ठजीने १ ष्ठजीने कहा राजन्‌ ! प्राचीनं काले एक 
(| ठी नामकी वेडया थी, जो सदा भगवान्‌ राङ्करके 
 . भजनमें . तत्पर रहती, थी । एक बार उसने पुष्करमे 
चतर्दडीको. 4 नमकका = करा पहाड़ जनाकर सोनेकी बनी 



























८० * अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ + 


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॥ ॥ आपको नमस्कार हे । प्रभाकर ! आपको नमस्कार है।' अत्यन्त सुन्दर तथा शोभासम्पन्न थीं 4 





| सेकिपत 


समज्लकर उसने उन परतिमाओकि पित #, 
टी थी । उस नमकके पर्वतपर जो सेनक च ॥ 
गये थे, उन्हें उस सुनारकी खनि तपाकर 
दिया था। [सुनारकी पली भी 
परिचारिकाका काम करती थी ।] उन्हीं दोनेनि 
सेवासे ठेकर सारा कार्य सम्पन्न किया था । 
दीघं कारके पश्चात्‌ लीलावती वेया सब पापे 
होकर रिवुजीके धामको चटी गयी तथा वह सुनार 
दरिद्र होनेपर. भी अत्यन्त -सात्तिक था ओर जिस | 
वेर्यासे मजदूरी नहीं टी थी, आपः ही है । उसी पुय 
प्रभावसे आप सातं द्रीपोकि स्वामी तथा हाये सु 
समान तेजस्वी हुए हँ । सुनारकी ही भांति उसकी पती 
भी सोनेके वृक्षों ओर देवमूर्तियोको कान्तिमान्‌ बनव ` 
था, इसके वही आपकी महारानी भानुमती हई र। 
प्रतिमाओंको जगमग बनानेके कारण महारानीका स्प 
अत्यन्त सुन्दर हुआ हे । ओर उसी पुण्यके प्रभावसे अप ` 
मनुष्यलोके अपराजित हए हँ तथा आपको अगिव 
ओर सोभाग्यसे युक्त राजलक्ष्मी प्राप्त हुई है; इसल्वि ` 
आप भी विधिपूर्वक धान्य-पर्वत आदि दस प्रकार , 
पर्वत बनाकर उनका दान कीजिये । | 
पुलस्त्यजी कहते है--राजा धर्ममूर्तिनि बह | 
अच्छा' कहकर वसिष्ठजीके वचर्नोका आदर किवा +` । 
अनाज आदिके पर्वत बनाकर उन सबका विधिपू्व | 
दान किया। तत्प्ात्‌ वे देवताओंसे पूजित ही | 
महादेवजीके परम धामको चङे गये। जो मनुष्य ई 
म्रसङ्गका भक्तिपूर्वक श्रवण करता हे, वह भी 
हो स्वर्गलोके जाता है। राजन्‌ ! अन्नादि ह 
दानका पाठमात्र करनेसे दुःस्वपरोका नाडा हो 
फिर जो इस पुष्कर क्षेत्रमे शान्तचित्त होकर स्‌ ४. 
पर्वतोका स्वयं दान करता है, उसको 


देखनेम क्या वर्णन हो सकता हे । 





सृष्टिखण्ड ] + भरीमद्रादङ्षी-त्रतका विधान * ८९ 


न सि कक... 41.1.11... 4.4.04. 4.4 444 1.11. 1.1.4.4.6. 6. 4.4.444... 4.4.44. ०.1. 4.4.4.1.4 4.1 {4.4.4.44.4 6 


भीमद्वादङ्ची-त्रतका विधान 


भीष्मजीने कहा- विप्रवर ! भगवान्‌ शङ्के परिचय देता हूं। उस दिन निभ्नाङ्कित विधिसे उपवास 
जिन वैष्णव-धर्मोका उपदे किया है, उनका मुञ्चसे करके तुम श्रीविष्णुके परम धामको प्राप्त करो । जिस दिन 
वर्णन कीजिये । वे कैसे ह ओर उनका फल्‌ क्या है 2 माघ मासकी दामी तिथि आये, उस दिन समस्त इारीरमे 
पुलस्त्यजी बोके-- राजन्‌ ! प्राचीन रथन्तर घी रूगाकर तिलमिश्रित जलसे खान करे तथा “ॐ नमो 
कल्पकी बात है, पिनाकधारी भगवान्‌ राङ्कर मन्दराचर- नारायणाय इस मन््रसे भगवान्‌ श्रीविष्णुका पुजन करे । 
पर विराजमान थे । उस समय महात्मा ब्रह्माजीने स्वयं ही "कृष्णाय नमः' कहकर दोनों चर्णोकी ओर “सर्वात्मने 
उनके पास जाकर पूछा-- "परमेश्वर ! थोड़ी-सी तपस्यासे नमः" कहकर मस्तककी पूजा करे । "वैकुण्ठाय नमः 
मनुष्यो मोक्षकी ग्राध्ि कैसे हो सकती है 2" बरह्माजीके इस मन््रसे कण्ठकी ओर श्रीवत्सधारिणे नमः* इससे 
नमः', “गदिते नमः', "वरदाय नमः' तथा “सर्व 
नारायणः" (सब कुछ नारायण ही है) - एेखा कहकर 
आवाहन आदिके क्रमसे भगवानकी पूजा करे । इसके 
= श 0, द्ध नाद्‌ "दामोदराय नमः. कहकर उद्रका, -पञ्छजनाय 
€> £ 1 नमः' इस मन््रसे कमरका, *सौभाग्यनाथाय नमः' 
इससे दोनों जका, “भूतधारिंणे नमः' से दोनों 
घुटनोका, "नीलाय नमः" इस म॒नत्रसे पिडकियों (घुटनेसे 
नीचेके भाग) का ओर “विश्वसृजे नमः' इससे पुनः दोनों 
चररणोका पूजन करे। तत्श्चात्‌. देव्यै नमः, “दन्त्य 
नमः, "ल््यै नमः',. भ्ियै लमः", तुष्टयै नमः, 
'ुष्टयै नमः, व्युष्य नमः'--इन मन््रोसे भगवती 
लक्ष्मीकी पूजा करे । इसके नाद्‌ “वायुवेगाय नमः › 
"पक्षिणे नमः," 'विषप्रमथनायं नमः, “विहङ्खनाथाय 
इस प्रकार भ्रश्च करनेपर जगत्की उत्पत्ति एं वृद्धि नमः' --इन मरके द्वार गरुड़की पूजा करनी चाहिये 1 










ध करि) 


कसेवाङे विश्ातमा उमानाथ रिव मनको त्रिय लगने- इसी प्रकार गन्धः पुष्प, धूप तथा नाना प्रकारके 
वारे वचन बोले । पकवानेद्रारा श्रीकृष्णकी, महादेवजीकी तथा 


महादेवजीने कहा--एक समय द्वासकाकी सभामे गणेडाजीकी भी पूजा करे फिर गोके दूघकी बनी हई 

अमिततेजस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्ण वृष्णिवेडी परुषो, खीर ठेकर घीके साथ मोनपूर्वक भोजन करे । भोजनके २ 
| विद्वन, कौरवो ओर देव-गन्धवेकि साथ बैठे हए  । अनन्तर विद्वान्‌ पुरुष सौ पग चकर बरगद अथवा 
धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाटी पौराणिक कथार्पे हो रही थीं । खैरेकी दांतन ठे उसके दारा टाताको साफ वरि.-पिरि 
इती समय भामसेने मगवानसे परमपद प्रे धीकर आचमन कन । त ह जाद्‌ च रभिमुल 
्रीवासुदेवने बैठकर सायङ्कारुकी सन्ध्या करे । उसके अ तमे यह 


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कहे- "भगवान्‌ श्रीनारायणको नमस्कार हे! भगवन्‌! 
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१.२.६.२.२.८.१ प चन 
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म आपकी शरणमे हु ।' 
मँ आया हूँ ।'* [इस प्रकार प्रार्थना चोडा ओर उतना ही गहरा 


करके रात्रिम शायन करे ।] 
तीन मेखला बनवाये उसमें 
दूसरे दिन एकादञ्ीको निराहार रहकर भगवान्‌ मुखके चिह्न बनवाये । ब्राह्मण 


केशवकी पूजा करे ओर रातभर बैठा रहकर रोषक्ायी 





, देवाधिदेव भगवा | 
4 अपने मलक 
पू धाराको धारण करे । घीकी धारा मर | 
दारके बराबर मोटी होनी चाहिये । परन्तु दूष ओ 
जलकी धाराको अपनी इच्छाके अनुसार मोटी य॒ पततं 
किया जा सकता हे । ये धारा रातभर अविच्छिन हय 
गिरती रहनी चाहिये। फिर जल्से भरे हए तेर 
कठखोकी स्थापना करे। वे नाना 


जाकर प्रसनतापूलंक स्नान करे । पाखण्डियोकि संसर्गे 
दूर रहे । विधिपूर्वक सन्ध्योपासन करके पितरोका तर्पण 
करे। फिर शेषशायी भगवान्‌को प्रणाम करके घरके 
सामने भक्तिपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये । उसके 
भीतर चार हाथकी सुन्दर वेदी बनवाये । वेदीके ऊपर 


धारण करे । वेदवेत्ता ब्राह्मणोने धाराओंकी अधिकताके वैष्णव-सामका गायन करते रहे । उपर्युक्त बारे 


अतुपातसे फर्म भी अधिकता बतल्रयी है; इसके त्राह्मणोको वख, पुष्प, चन्दन, अंगूठी, के, सेनक 
न्त करनेवाछे द्विजको चाहिये कि प्रयलपूर्वक उसे धारण जंजीर, वस्र तथा राय्या आदि देकर उनका पूर्णं सत्क ` 
। करे । दक्षिण दिराकी ओर अर्धचनदरके समान, पञश्चिमकी करे । इस कार्यम धनकी कृपणता न करे । 
4  . ओर गोर्‌ तथा उत्तरकी ओर पीपरके पत्तेकी आकृतिका 

(1 ( क । (८ मण्ड्‌ बनवाये । वैष्णव द्विजको मध्यमे कमुके व्यतीत करे । उपाध्याय (आचार्य या पुरोहित) को ब | 
| आकारा मण्डर जनवाना चाहिये । पूर्वक्री ओर जो व्र अनय बराद्णोकी उपेक्षा दूनी मतरामे अर्पण क 












°= क्म स्थान ह, उसके दक्षिण ओर भी एक दूसरी वेदी रत्रिके बाद जब निर्मर प्रभातका उदय हो, तन रायने 
नवाब । भगवान्‌ श्रीविष्णुके ध्यानम तत्पर हो पूर्वोक्तं उठकर [नित्यकर्मके पश्चात्‌] तेरह गरे दान करी 
7 नराबर मस्तकपर धारण करता रहे। चाहिये। उनके साथकी समस्त सामग्री सोनेकी 

स्थापनाके खयि हो । उसके ऊपर चाहिये । वे सब-की-सब दुध देनेवाटी ओर ९८ 



















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शी, आकृति बनाये ओर उसके हों । उनके सग सोनेसे ओर खुर चोदीसे २६ 
त्तम विराजमान करे । उनके तथा उन सबको व्र ओढ़ाकर चन्दनसे विभूषित ह 






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दस हाथका तोरण रगाये। फिर सुदुढ़ खंभोके पदार्थो युक्त ओर श्वेत वसखरोसे ध | 
आवारर एक कलश रखे, उसमें नीचेकी ओर उड़दके उनके साथ च॑दोवा, उदुम्बर-पात्र तथा पञ्चरलका हेन 
दानेके जराबर छद कर दे । तदनन्तर उसे जरसे भरे ओर भी आवक्यक है । वहा चार ऋग्वेदी ब्राह्मण सतं 
स्वयं उसके नीचे काल मृगचर्म बिच्कर बैठ जाय । ओर मुख करके हवन करं चार यजुर्वेदी कि 
कलसे गिरती हुई धाराको सारी रात अपने मस्तकपर रुद्राध्यायका पाठ करे तथा चार सामवेदी ब्रा ` 


इस प्रकार गीत ओर माङ्गलिक न्दोकि साथ ए 


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सुष्टिखण्ड ] 


* आदित्य-शयन आदि व्रत, तडागकी श्रतिष्ठा ओर वृक्षारोपणकी विधि * < 


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चाहिये । गोदानके पश्चात्‌ ब्राह्मणको भक्तिपूर्वकं 
भक्ष्य-भोज्य पदार्थोसि तप्र करके नाना प्रकारके वख दान 
करे । फिर स्वयं भी क्षार रुवणसे रहित अन्नका भोजन 
करके ब्राह्मणोको विदा करे । पुत्र ओर खरीके साथ आठ 
पगतक उनके पीछे-पीछे जाय ओर इस प्रकार प्रार्थना 
करे “हमारे इस कार्यसे देवताओंके स्वामी भगवान्‌ 
श्रीविष्णु, जो सबका छरा दूर करनेवारे है, प्रसन्न हो । 
श्रीरिवके हृदयम श्रीविष्णु है ओर श्रीविष्णुके हदयमें 
श्रीरिव विराजमान हँ । म इन दोरनोमिं अन्तर नही 
देखता-इस धारणासे मेरा कल्याण हो.।* यह 
कहकर उन कलरों, गोओं, राय्याओं तथा वस्नोको सब 
ब्राह्यणोके घर पर्हैचवा दे । अधिक शाय्यां सुभ न हो 


तो गृहस्थ पुरुष एक ही राय्याको सब सामानसे ` 


सुसञ्नित करके दान करे । भीमसेन ! वह.दिन इतिहास 


इसका स्मरण ओर कीर्तनमात्र करनेसे देवराज ईन्रका 
सारा पाप नष्ट हो गया था । इसीके अनुष्ठानसे मेरी प्रिया 
सत्यभामाने सुञ्चे पतिरूपमें प्राप्त किया। इल 
कल्याणमयी तिथिको सूर्यदेवने सहं धाराओसि स्नान 
किया था, जिससे उन्हें तेजोमय इारीर्की प्रापि हुई । 
इन्द्रादि देवताओं तथा करोड दैत्योनि भी इस त्रतका 
अनुष्ठान किया है । यदि एक मुखमें दस हजार करोड़ 
(एक खर) जिह्वं हं तो भी इसके फरका पूरा वर्णन 
नहीं किया जा सकता । 

महादेवजी कहते रै त्रह्यन्‌ ! कचछियुगके 
पापोको नष्ट करनेवाली एवं अनन्त॒ फर ब्रदान 
करनेवाटी इस कल्याणमयी तिथिकी महिमाका वर्णन 
यादवराजकुमार भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने श्रीमुखसे ` 
करो । जो इसके त्रतका अनुष्ठान करता है, उसके 


ओर पुराणोके श्रवणमें ही बिताना चाहिये । अतः तुम भी 
सत्वगुणका आश्रय ठे, मात्सर्यका त्याग करके इस 
व्रतका अनुष्ठान करो । यह बहुत गुप् व्रत है, किन्तु 
स्रेहवदा मैनि तुम्हे बता दिया है । वीर ! तुम्हारे द्वार 
इसका अनुष्ठान होनेपर यह व्रत तुम्हारे ही नामसे परसिद्ध 
होगा । इसे लोग "भीमद्वादशी" करगे । यह भीमद्रादी 


नसकमें पड़े हए पितररोका भी यह उद्धार कमे समर्थं 
है । जो अत्यन्त भक्तिके साथ इस कथाको सुनता तथा 
दूसरोके उपकारके कछ्यि पढ़ता है, वह भगवान्‌. 
श्रीविष्युका भक्त ओर इन्द्रका भी पूज्य होता हे । पूर्वं 
कल्पमे जो माघ मासकी द्रादरी परम पूजनीय 
कल्याणिनी तिथिके नामसे प्रसिद्ध थी, वही याण्डुनन्दन 
सन पापको हसनेवाली ओरं शुभकारिणी होगी । प्राचीन भीमसेनके त्रत कसनेपर अनन्त पुण्यदायिनी 
कल्पेमिं इस व्रतको "कल्याणिनी" व्रत कहा जाता था। ` भीमद्रादी"के नामसे प्रसिद्ध होगी! ` 
=== + = 
आदित्य-दायन ओर रोहिणी-चन्द्र-रायनःत्रत, तडागकी अतिष्ठा, वृश्षारोपणकी विधि 
` तथा सोभाग्य-शयन-त्रतका वर्णन 
भीष्मजीने पूछा -- ब्रह्मन्‌ ! जो अभ्यास न होनेके जिस्म दिनभर उपवास करके रात्रिम भोजनका विधान 
कारण अथवा रोगवङ्ञा उपवास कसेमे असमर्थ है हे; मे एसे महान्‌ त्रतका पस्चिय देता है सुनो। उस 
किन्तु उसका फक चाहता ह, उसके सि कौन-सा त्रत त्रतका नाम है--आदित्य-रायन। उसमे विधिपूतैक 
` उत्तम है--यह बताइये । भगवान्‌ दाङ्र्की पूजा की जाती हे । पुराणेकि ज्ञाता ` 
पुलस्त्यजीने कहा--राजन्‌ ! जो लोग उपवास महि जिन नक्षत्रकि योगमे इस व्रतका उपदेरा करते है! 
कसे असमर्थ है, उनके ल्यि वही त्रत अभीष्ट है, उन्हे बताता हं । जब सप्तमी तिथिको हस्त नश्षत्रके साथ 



















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 . हिवस्य हदये वि्ुर्वष्णोश्च हदये रिवः। यथान्तरे न पड्यामि तथा मे स्वस्ति चायुषः ॥ 


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८ | » अर्चयस्व हषीकेहों यदीच्छसि घरं पदम्‌ + ॥ 


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रविवार हो अथवा सूर्यकी संक्रान्ति हो, वह तिथि समस्त॒ तथा वीत ५५५५०. | 
कामनाओंको पूर्ण करनेवाली होती है । उस दिन सूर्यके है ।'# "गयासुर कएनवाले भ्रोमहादेवजीको नमस्कार ` 
नामोंसे भगवती पार्वती ओर महादेवजीकी पूजा करनी 9 त्रिपुर ओर अन्धकासुर | 


| आदिक विनाराके 
| चाहिये । सूर्यदेवकी प्रतिमा तथा रिवलिङ्खका भी भक्ति- हे † इत्यादि व शरशिवको भरणम 
1 पूर्वक पूजन करना उचित हे । हस्त नक्षत्रे “सूर्याय पूजा करनेके पश्चात्‌ स ध अर्को 
९ 


नमः'का 7 करके सूर्यदेवके चरणोंकी, चित्रा मस्तकका पूजन करना चाहिये । तदनन्तर 
॥ नक्षत्रम "अर्काय नमः" कहकर उनके गुल्फं करना उचित ह । भोजनम तेल ओर अन्ने भोजन 
ह क्षत्रमें ; नमकका 
) (खुदधियो) की, स्वाती न पुरुषोत्तमाय नमः'से सम्पर्क नहीं रहना चाहिये । मस ओर ब 
॥ पिडकि््योकी, विाखामें “धात्रे नमः'से घुटनोंकी तथा कदापि सेवन न कर | न 
॥.. अनुराधामें “सहस्रभानवे नमः"से दोनों ज्घोकी पूजा राजन्‌ ‹ इस प्रकार रात्रिम शुद्ध भोजन करके 
करनी चाहिये । ज्येष्ठा नक्षत्रम “अनङ्गाय नमः' से गुह्य पुनर्वसु नक्षत्रे दान करना चाहिये । किसी बर्तनमे 
`  प्रदेराकी, मूलम “इन्द्राय नमः' ओर “भीमाय नमःसे सेर अगहनीका चावल, गूलरकी लकडीका पात्र श 
कटिभागकी, पूर्वाषाढा ओर उत्तराषाढामें "त्वष्ट नमः' घृत रखकर सुवर्णके साथ उसे ब्राह्मणको दान करे। 
ओर ` 'सप्ततुरङ्गमाय नमः'से नाभिकी, श्रवणे सातवें दिनके पारणमें ओर दिनोंकी अपेक्षा एक जोडा 
 तीक्ष्णांशवे नमः'से उद्रकी, धनिष्ठामें “विकर्तनाय वख अधिक दान करना चाहिये । चौदहवें दिनके पारणये 
नमः से दोनों बगरछोकी ओर रातभिषा नक्षत्रम गुड़, खीर ओर घृत आदिके द्वारा ब्राह्मणको भक्तमूर्वक 
ध्वान्तविनाडानाय नमः*"से सूर्यके वक्षःस्थरकी पूजा भोजन कराये । तदनन्तर कर्णिकासहित सोनेका अष्टदल 
करनी चाहिये । पूर्वा ओर उत्तरा भाद्रपदामें “चण्डकराय कमर बनवाये, जो आठ अङ्गुलका हो तथा जिसमे 
नमः*से दोनों भुजाओंका, रेवतीमे “साश्नामधीडाय पद्यरागमणि (नीलम) की पत्तियां अङ्कति की गयी हें । 
न्ः*से दोनों हार्थोका, अश्चिनीमें “सप्राश्चधरुरन्धराय फिर सुन्दर ₹दाय्या तैयार करावे, जिसपर सुन्दर बिन 
जमः" से नखोंका ओर भरणीमे "दिवाकराय नमः'से निछ्छकर तकिया रखा गया हो ओर ऊपरसे ्चदोवा तना 
। भगवान्‌ सूर्यके कण्ठका पजन करे । कृत्तिकामें ग्रीवाकी, हो। राय्याके ऊपर पेखा रखा गया हो । उसके 
रोहिणीमें ओठेंकी, मृगरिरामें जिह्वाकी तथा आर्द्रं आस-पास खड़ाऊं, जूता, -छत्र, चवर, आसन ओर 
“हरये नमसे सू्वदेवके दतकी अर्चना के । पुनर्वसुमे दर्पण रखे गये हों । फल, वसन, चन्दन तथा आभूषणसे 
| | < । {& | सवित्रे अवि 8 नमः"से इाङ्करजीकी नासिकाका, पुष्यमे वह रय्या सुशोभित होनी चाहिये । ऊपर बताये हए 
॥ “अम्भोरुहवल्लभाय नमः'से रृकाटका तथा सोनेके कमुको उस इाय्यापर रख दे । इसके बाद 
` ्द्ारीरधा तेतं ` जमःये बालका, | आरकेषायें मन््रोच्चारणपूर्लक दूध देनेवाटी अत्यन्त सीधी कपिला : 4 
४ वुधा रय - = मः ष्से मस्तकका मघा दोनों गोका दान करे। वह गौ उत्तम गुणि १८ | 
। का्नोका, पूर्व फालगुनीमे “गोबराहमणनन्दनाय नमः'से वलाभूषणेसे सुरोभित (4 चाहिये ` 
। , राम्भुके सम्पूर्णं ॐ गं अ ता तथा उत्तर फाल्गुनी नक्षत्रम. उसके खुर चदीसे ओर सीग सोनसे ढे टन दिनके ` 
लयं मः सवत ॑ दोनों = भर्हाका पूजन उ न करे। तथा उसके साथ कांसीकी दोहनी होनी चाहिय । 
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सृष्टिखण्ड ] न आदित्य-शायन आदि त्रत, तडागवकी भ्रतिष्ठा ओर वृक्षारोपणकी विधि * ८५ 


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कदापि नहीं करना चाहिये । हइाय्यादानके पश्चात्‌ इस 
प्रकार प्रार्थना करे--“सूर्यदेव ! जिस प्रकार आपकी 
ङाय्या कान्ति, धृति, श्री ओर पुष्टिसे कभी सूनी नही 
होती, वैसे ही मेरी भी वृद्धि. हो । वेदेकिं विद्वान्‌ आपके 
सिवा ओर किसीको निष्पाप नहीं जानते, इसि आप 
सम्पूर्ण दुःखोसे भरे हुए इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार 
कीजिये ।' इसके पश्चात्‌ भगवानक्ती प्रदक्षिणा करके उन्हं 
प्रणाम करनेके अनन्तर विसर्जन करे । इाय्या ओर गौ 
आदिको ब्राह्यणके घर पर्हुचा दे । | 
भगवान्‌ राङ्करके इस त्रतकी चच दुराचारी ओर 
दम्भी पुरुषके सामने नहीं करनी चाहिये । जो गो, ब्राह्मण, 
देवता, अतिथि ओर धार्मिक पुरुषोंकी विरोषरूपसे 
निन्दा करता है, उसके सामने भी इसको प्रकट न करे । 
भगवानके भक्त ओर जितेन्द्रिय पुरुषके समक्ष ही यह 
आनन्ददायी एव॑ कल्याणमय गूढ़ रहस्य प्रकारित 
करनेके योग्य है । वेदवेत्ता पुरुषोंका कहना है किं यह 
त्रत महापातकी मनुष्योकि भी पार्पोका नारा कर देता हे । 
जो पुरुष इस त्रतका अनुष्ठान करता है, उसका बन्धु, 
पुत्र, धन ओर सीसे कभी वियोग नहीं होता तथा वह 
देवता्ओंका आनन्द बढानेवाला माना जाता हे। इसी 
प्रकार जो नारी भक्तिूर्वक इस व्रतका पालन करती है 
उसे कभी रोग, दुःख ओर मोहका शिकार नहीं होना 
पड़ता । प्राचीन कालमे महर्षिं वसिष्ठ, अर्जुन, कुबेर तथा 
इन्द्रने इस व्रतका आचरण किया था। इस व्रतके 
कीर्तनमात्रसे सारे पाप नष्ट हो जाते है, इसमे तनिक भी 
सन्देह नहीं है । जो पुरुष इस आदित्यदडायन नामकं व्रतके 
माहाल्य एवं विधिका पाठ या श्रवण कर्ता है, वह 
इनद्रकः प्रियतम होता है तथा जो इस त्रतका अुष्ठान 
करता है, वह नरके भी पड़े हुए समस्त पितरयोको 
सवर्गलोकमें पर्हुचा देता है । “५ 
भीष्मजीने कहा-मुने ! अब आप चन््रमाके 


 त्रतका वर्णन कीजिये 1 | | 
` पुलस्त्यजी बोके--राजन्‌ ! तुमने बडी उत्तम 


बात पूञ्ठी है । अन मेँ तुमह वह गोपनीय त्रत बताता 





ह जो अक्षय सर्गकी प्राति करनेवाला है तथा जिसे 


पुराणवेत्ता विद्वान्‌ ही जानते हँ । इस लोकें “रोहिणी - 
चनद्र-शायन' नामक त्रत बड़ा ही उत्तम हे। इसमें 
चन्द्रमाके नामोद्रारा भगवान्‌ नारायणकी प्रतिमाका पूजन 
करना चाहिये । जब कभी सोमवारे दिन पूर्णिमा तिथि 
हो अथवा पूर्णिमाको रोहिणी नक्षत्र हो, उस दिन मय्य 
सेर पञ्चगव्य ओर सरसेकि दानेसि युक्तं जरसे स्नान 
करे तथा विद्वान्‌ पुरुष “आप्यायस्व इत्यादि मन्त्रको 
आठ सौ बार जपे । यदि शुद्र भी इस व्रतको करे तो 
अत्यन्त भक्तिपूर्वकं “सोमाय नमः', “वरदाय नमः * 
भविष्णवे नमः'--इन ` मन््रोका , जप करे ओर 
पाखण्डियोसे--विधर्मियोसे बातचीतः न करे जप 
करनेके पश्चात्‌ घर ,आकर फल-फूरू आदिके द्वारा 
भगवान्‌ श्रीमधुसूदनकी पूजा करे । साथ ही चन्द्रमाके 
नामका उच्चारण करता रहे ! “सोमाय शान्ताय नमः. 
कहकर भगवानक्रे चरणोका, “अनन्तधाञ्ने नमः का 
उच्चारण करके उनके घुटनों ओर पिडखि्योका, 
'जल्ोदराय नमः से दोनों जर्धोका, “कामसुखब्रदाय 

नमः'से चनद्रसखरूप भगवानके करटिभागका, 
'अमृतोद्राय नमः'से उदरका, “शख्ाङ्काय नमः से. 
नाभिका, “चन्द्राय नमः'से मुखमण्डरुकाः 
'द्विजानामधिपाय नमः' से दतिंका, “चन्द्रमसे नमः' से 
हका, *कौमोदवनभ्रियाय नमः "से ओटोका, 
"'वनोषधीनामधिनाथाय नमः'से नसिकाका, 
'आनन्दबीजाय नमसे दोनों भोर्हाका, 
"इन्दीवरव्यासकराय नमः'से भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
कमल-सद्हा नेत्रोका, ` “समस्तासुरवत्दिताय | 
दैत्यनिषूदनाय नमः'से दोनों कानोका, “उदधि्रियायं 
नमः'से चन्द्रमाके ललाटका, सुषुम्नाधिपतये नमः'से 
केदोका, राज्ाङ्काय नमः'से ` मस्तकका ओर 
"विश्ेश्वराय नमः'से भगवान्‌ मुरारिके किरीटका पूजन ` 
करे । फिर “सोहिणीनामधेयलश्मीसोभाग्यसोख्यामृत त~ ` 
सागराय पदाश्रिये नमः' (रोहिणी नाम धारण कसे- 
वाली लक्ष्मीक सौभाग्य ओर सुखरूप अमृतके समुद्र . 
तथा कमरुकी-सी कन्तिवारे भगवानको नमस्कार ` 


उच्चारण ५ 
। 
। 

























^ ` | 2 वन्याननदयाकाि ज्काये । तत्पश्चात्‌ सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य ओर धूप 
आदिक द्वारा इन्दुपली रोहिणी देवीका भी पूजन करे । 
| | इसके बाद त्रिके समय भूमिपर इायन करे ओर 
। । ` सनेरे उठकर सनानके पश्चात्‌ 'पापविनाहाय नमः'का 
। । उच्चारण करके ब्राह्मणको घृत ओर सुवर्णसहित जलसे 
| भरा कलशा दान करे । फिर दिनभर उपवास कसनेके 
| पश्चात्‌ गोमूत्र पीकर मांसवर्जित एवं खारे नमकसे रहित 
। ¦ अन्नके इकतीस रास घीके साथ भोजन करे । तदनन्तर 
 । दो घड़ीतक इतिहास, पुराण आदिका श्रवण कर । 
१३ राजन्‌ ! चन्द्रमाको कदम्ब, नीरू कमल, केवडा, जाती 
। अ, कमर्‌, रातपन्रिका, बिना कुम्हलाये कुब्जके फूल, 
| सिन्दुवार, चमेटी, अन्यान्य श्वेत पुष्प, करवीर तथा 
। चम्पा--ये ही फू चढ़ाने, चाहिये । उपर्युक्त फू्की 
। . जातियेमेसे एक-एकको श्रावण आदि महीनोमिं रमाः 
। अर्पण करे । जिस महीनेमें त्रत रुरू किया जाय, उस 
| समय जो भी पुष्प सुरुभ हों, उन्हीके द्वारा श्रीहरिका 
| | पूजन करना चाहिये । 
क इस प्रकार एक वतक इस व्रतका विधिवत्‌ 
| अनुष्ठान करके समापिके समय डायनोपयोगी सामग्रियोके 
। ` साथ शय्यादान करे । रोहिणी ओर चन्द्रमाकी सुवर्णमयी 
| ` मूर्तिं बनवाये । उनमें चन्रमा छः अङ्गुरूके ओर रोहिणी 
(^ ` चार अङ्गुलकी होनी चाहिये । आठ मोतियोंसे युक्त धेत 
 ने््रोनारी उन प्रतिमाओंको अश्षतसे भरे हए काँसीके 
। ~ पात्रमे र्लकर दुगधपूरणं कलदाके ऊपर स्थापित कर दे। 
फिर वज्ञ ओर दोनीके साथ दूध देनेवाली गो, शङ्क 
` दन्यतीको जुलाकर उन्हे आभूषणोते अलङ्कत कर तथा 
 मनमे यह भावना रते कि ब्राह्ण-दम्पतीके रूपमे ये 
 -रोहिणीसहित च द्रम ` ही विराजमान है । तत्पश्चात्‌ इनकी 


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सभी तीन-तीन मेखलाओंसि सुखोभित 





विनय करके रय्या, प्रतिमा तथा धेनु 
ब्राह्यणको दान कर्‌ दे। ] 


राजन्‌ ! जो संसारसे भयभीत 
इच्छा रखता हे, उसके स्मि व हः 
यह रूप ओर आरोग्य प्रदान करनेवाला है । यही 
सव॑दा प्रिय है। जो इसका अनुष्ठान का 
त्रिभुवनका अधिपति होकर इक्कीस सौ कल्पोतकं ५ 
कमे निवास करता है । उसके बाद ष. 
हो जाता है। चन्द्रमाके नाम-कीर्तनद्रारा भगवा्‌ 
श्रीमधुसूदनकी पूजाका यह प्रसङ्ग जो पठता अथवा 
सुनता हे, उसे भगवान्‌ उत्तम बुद्धि 
वेह भगवान्‌ श्रीविष्णुके धाममें जाकर देवसमूहके द्वग 
पूजित होता है । 


भीष्मजीने कहा--त्रह्यन्‌ ! अब मुञ्चे तालाब, ` 


बगीचा, कुआं, बावली, पुष्करिणी तथा देवमन्दिरकी 
प्रतिष्ठा आदिका विधान.बतलाइये । 


पुलस्त्यजी बोले- महाबाहो ! सुनो; ताखब ¦ 


आदिकी म्रतिष्ठाका जो विधान है, उसका इतिहास- 
पुराणोमिं इस प्रकार वर्णन है । उत्तरायण आनेपर शुभ 


राख पक्षमें ब्राह्मणद्वारा कोई पवित्र दिन निश्चित कर 
के। उस दिन ब्राह्यणोंका वरण करे ओर तालाबके ` 
समीप, जहाँ कोई अपवित्र वस्तु न हो, चार हाथ ठम्बी , 


प आदि सबे कु | 


पानक 
स्वेति है। ` 


विद्युत्‌ होकर मुक्त ` 


प्रदान करते हैँ तथा ` 






ओर उतनी ही चौडी चौकोर वेदी बनाये । वेदी सब ओर . 


समतल हो ओर चारों दिदाओमें उसका मुख हो । फिर 
सोह हाथका मण्डप तैयार कराये । जिसके चार ओर 
एक-एक दरवाजा हो । वेदीके सब ओर कुण्डोका निर्माण 
कराये । कुण्डोकी संख्या नौ, सात या पांच होनी चाहिये । 
कुण्डोकी लम्बाई-चौडाई एक-एक रल्िकी हो तथा वे 
हों । उनमें 
यथास्थान योनि ओर मुख भी बने होने चाहिये । य र) 
लम्बाई एक वित्ता ओर चौडाई छः-सात अंगुखकी 





[क । , क ध १ क १ क १ त र 












हि ~) त 7 त 7 1 













मेखला तीन पर्वः ऊंची ओर एक हाथ लनी हन | 


सुष्टिखण्ड ] 


१.६... 4.4.444... 4.4.641... 6.1.49... 1.4. 4.4.44. 1.4.44. 4.4.44. 4 4.444.444 44444944 वि ,.१.4..1.4.4.4.1.1. 1.4.14. 1.4.1.4. 1.4. 4.4... 4.4... 44.5.11. 1.111.144... 4.444.444. 4.448.444... 1.9.44... 4 ॥..4.4 





चाहिये । वे चारों ओरसे एक समान-एक रगकी 
बनी हों । सबके समीप ध्वजा ओर पताकार्पँ रूगायी 
जाय । मण्डपके चारों ओर क्रमराः पीपर, गुर, पाकड़ 
ओर बरगदकी राखाओकि द्रवाजे बनाये जार्यै । वहाँ 
आठ होता, आठ द्वारपारु तथा आठ जप करनेवाले 
ब्राह्मणोंका वरण किया जाय । वे सभी ब्राह्मण वेदोके 
पारगामी विद्वान्‌ होने ` चाहिये । सब प्रकारके शुभ 
लक्ष्णोसे सम्पन्न, मन्त्रोके ज्ञाता, जितेन्दिय, कुटीन, 
रीलवान्‌ एवं श्रेष्ठ ब्राह्यर्णोको ही इस कार्यम नियुक्त 
करना चाहिये । प्रत्येक कुण्डके पास कठरा, यज्ञ- 
सामग्री, निर्मल आसन ओर दिव्य एवं विस्तृत ताम्रपात्र 
प्रस्तुत रहें । 

तदनन्तर प्रत्येक देवताके छ्य नाना प्रकारकी बलि 
(दही, अक्षत आदि उत्तम भक्ष्य पदार्थ) उपस्थित करे । 
विद्वान्‌ आचार्य मन्त्र पढ़कर उन सामगप्रियोकि द्वारा 
पुथ्वीपर सब देवताओंके स्वि बक समर्पण करे । 
अरलिके बराबर एक यूप (यज्ञस्तम्भ) स्थापित किया 
जाय, जो किसी दूधवाटे, वृक्षकी रशाखाका बना हुआ 
हो । एश्वर्य चाहनेवाे पुरुषको यजमानके डारीरके 
बराबर ऊँचा यूप स्थापित करना चाहिये । उसके बाद्‌ 
पच्चीस ऋत्विजोंका वरण करके उन्हे सोनेके आभूषणोसे 
विभूषित करे। सोनेके बने कुण्डल, बाजुबेद, कड 
गूटी, पवित्री तथा नाना प्रकारके वख--ये सभी 
आभूषण प्रत्येक ऋत्विजको बराबर-बराबर दे ओर 
आचार्यको दूना अर्पण करे । इसके सिवा उन्हें रय्या 
तथा अपनेको प्रिय रूगनेवाटी अन्यान्य वस्तुं भी प्रदान 
करे ।. सोनेका बना हआ कष्कुआ ओर मगर, चांदीके 
मत्स्य ओर दुन्दुभ, तबेके कंकड़ा ओर मेढक तथा 


केके दो संस बनवाकर सनको सोनेके पात्रमे रखे । 


इसके नाद यजमान वेदज्ञ विद्वानकी बतायी हुई विधिके 

अनुसार सर्वषधि-मिश्रित जसे स्नान करके धेत वस्र 

जर श्वेतं माल्य धारण करे । फिर धेत चन्दन रूगाकए 

पली ओर पुत्र-पौतरोके साथ पश्चिमद्रारसे यज्ञ-मण्डपमें 

अवेदा करे । उस समय माङ्गछिक शाब्द होने चाहिये ओर 
शेर आदि बाजे बजने चाहिये । 





* आदित्य-रायन आदि ब्रत, तडागकी प्रतिष्ठा ओर वृक्षारोपणकी विधि * 





८७ 





तदनन्तर विद्वान्‌ पुरुष पांच रगके चूर्णेसि मण्डलः 
बनाये ओर उसमें सोह असोसे युक्त चक्र चिहित करे । 
उसके गर्भम कमकूका आकार बनाये । चक्र देखने 
सुन्दर ओर चौकोर हो । चारों ओरसे गोरु होनेके साथ 
ही मध्यभागमें अधिक डोभायमान जान पडता हो । उस 
चक्रको वेदीके ऊपर स्थापित करके उसके चारों ओर 
प्रत्येक दिरामें मन्त्र-पाठपूर्वक गहं ओर रोकपालरंकी 
स्थापना करे । फिर मध्यभागमें वरुण-सम्बन्धी मर््रोका 
उच्चारण करते हुए एक कठा स्थापित करे ओर उसीके 
ऊपर ब्रह्मा, हिव, विष्णु, गणे, ठक्ष्मी तथा पार्वतीकीं 
भी स्थापना करे । इसके पश्चात्‌ सम्पूर्ण रोकोंकी शान्तिके 
ल्य भूतसमुदायको स्थापित करे! इस प्रकार पुष्प, 
चन्दन ओर फलके द्वारा सबकी स्थापना करके 
कलडोकि भीतर पञ्चरल छोडकर उन्हें वरस्नोसि आवेष्टित 
कर दे। फिर पुष्प ओर चन्दनके द्वारा उन्हं अलङ्कृत 
करके द्वाररक्षाके चख्ि नियुक्तं ब्राह्यणोसे वेदपाठ 
करनेके छिय कहे ओर स्वये आचार्यका पूजन करे । पूर्व 
दिङाकी ओर दो ऋग्वेदी, दश्षिणद्रारपर दो यजुर्वेदी, 
पञ्चिमद्रारपर दो सामवेदी तथा उत्तरद्वारपर दो अथर्ववेदी 
विद्वानोंको रखना चाहिये । यजमान मण्डलक दक्षिण- 
भागमें उत्तराभिमुख होकर बैठे ओर द्ाररक्षक विद्रानोंसे 
कहे-“आपल़ोग वेदपाठ करर फिर यज्ञ करानेवाके 
आचार्यसे कहे-- “आप यज्ञ प्रारम्भ करायें 1' तत्पश्चात्‌ 
जप करनेवाले ब्राह्य्णोसे कहे-*आपलोग उत्तम 
मन्त्रका जप करते रहे ।' इस प्रकार सबको प्रेरित करके 
मन््रज्ञ पुरुष अभिक प्रज्वलित करे तथा मन्त्र-पाठपूर्वक 
घी ओर समिधाओंकी आहति दे। ऋत्विजेको ` भी 
वरुण-सम्बन्धी मन्त्रोद्वारा सब आओरसे हवनं | | 
चाहिये ।. मरहोके निमित्त विधिवत्‌ आहुति देकर उस ` 
यज्ञकर्ममें इन्द्र, रिव, मरुदरण ओर लोकपारके निमित्त ` 
भी विधिपूर्वक होम करे । ५: 

ूर्वद्वारपर नियुक्तं वेदी ब्राह्मण शान्ति, रद्र, ` 
पवमान, सुमङ्गरू तथा पुरुषसम्बन्धी सूक्तोका पथक्‌- ` 
पृथक्‌ जप करे । दक्षिणद्वारपर स्थित यजुर्वेदी 1 विद्वान्‌ दरान्‌ ` 
इद्र, द्र, सोम, कूष्माण्ड, अभि तथा सूर्य-सम्बन्धी 













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ब्राह्मण वैराजसाम, पुरुषसूक्त, सुपर्णसूक्त, रुद्रसंहिता, 
शिडुसूक्त, पञ्चनिधनसूक्त, गायत्रसाम, ज्येष्ठसाम, 
वामदेव्यसाम, बृहत्साम, रौरवसाम, रथन्तरसाम, गोत्त 
विकीर्ण, रक्षोघ्र ओर यम-सम्बन्धी सामोंका गान करं । 
उत्तर द्वारक अथर्वविदी विद्धान्‌ मन-ही-मन भगवान्‌ 
वरुणदेवकी इरण ठे रान्ति ओर पुष्टि-सम्बन्धी मन््रोका 
जप करे । इस प्रकार पहले दिन मन्त्रोद्रारा देवताओंकी 
स्थापना करके हाथी ओर घोड़ेके पैरोके नीचेकी, जिसपर 
रथ चरता हो-एेसी सड़ककी, नँनीकी, दो नदियोके 
संगमकी, गोडालखाकी तथा साश्तात्‌ गौओकि पैरके 
नीचेकी मिड़ी लेकर कलदोमिं छोड़ दे । उसके बाद्‌ 
सर्वौषधि, गोरोचन, सरसोके दाने, चन्दन ओर गग भी 
छोडे। फिर पञ्चगव्य (दधि, दूध, घी, गोबर ओर 
गोमूत्न) मिलकर उन कलरोके जसे यजमानका 


` विधिपूर्वक अभिषेक करे । अभिषेकके समय विद्धान्‌ 
` पुरुष वेदमन्त्रोका पाठ करते रहे । 


9 इस भ्रकार राखविहित कर्मके द्वारा रात्रि व्यतीत 
करके निर्मरु प्रभातका उदय होनेपर हवनके अन्तमें 


` ब्राह्मणोको सो, पचास, छन्तीस अथवा पचीस गौ दान 
करे। तदनन्तर राद्ध एवे सुन्दर रग्न आनेपर वेदपाठ, 
' . संगीत तथा नाना प्रकारके बाजोकी मनोहर ध्वनिके साथ 
एक कर : गोको ठे 7 सुवर्णसे अल्ङ्कत करके तालखानके जलम 








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पात्र ओर 


चाहिये । फिर मण्डपको भी विभाजित नी 
ओर डाय्या किसी नाह्मणको दान कर दे । इसके 
अपनी शक्तिके अनुसार हजार, एक सौ आठ, पचास 


अथवा बीस ब्राह्मणोको भोजन कराये । पुराणोपे 
तालरबकी प्रतिष्टाके स्यि यही विधि बतल्रयी गयी है। 
कओं, बावली ओर पुष्करिणीके छियि भी यही विधि है। ` 
विधान 
चाहिये । मन्दिर ओर बगीचे आदिके म 
केवर मन्रोका ही भेद है । विधि-विधान प्रायः एकमे , 
ही हे । उपर्युक्त विधिका यदि पूर्णतया पालन कसक 


देवताओंकी प्रतिष्ठामे भी एेसा ही 





शक्ति न हो तो आधे व्ययसे भी यह कार्य सम्पन्न हो 


सकता है । यह बात ब्रह्याजीने कही हे । 


जिस पोखरमे केवर वर्षाकालमें ही जर रहता है ` 
वह सौ अग्िष्टोम यज्ञोके बराबर फल देनेवाला होता है। 


जिसमें इारत्कालतक जट रहता हो, उसका भी यही 


फल हे । हेमन्त ओर शिरिरकालतक रहनेवाला जल 


क्रमाः वाजपेय ओर अतिरात्र नामक यज्ञका फल देता 


हे । वसन्तकारुतक रिकनेवाठे जलको अश्वमेध यज्ञके ` 


समान फलदायक बतलाया गया है तथा जो जल ग्रीष्म- 
कारुतक मौजुद रहता है, वह राजसूय यज्ञसे भी अधिक 


फल देनेवाला होता हे । 

` महाराज ! जो मनुष्य पृथ्वीपर इन विहोष धर्मोका 
पालन करता है--विधिपूर्वक कुआं, बावली, पोखरा 
आदि खदवाता है तथा मन्दिर, बगीचा आदि बनवाता 
है, वह शुद्धचित्त होकर ब्रह्माजीके लोके जाता दै ओर 
वहाँ अनेकों कल्पोतक दिव्य आनन्दका अनुभ करता 
है । दो पराद्धं (ब्रह्माजीकी आयु) तक वक सुखं 
भोगनेके पश्चात्‌ ब्रह्माजीके साथ ही य योगबलसे 


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भ्रीष्यजीये ॥ 
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# § ४ 9 0 
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को मिनि दितिः = = = क 







सुष्टिखण्ड ] 


+ आदित्य-हायन आदि त्रत, तडागकी भतिष्ठा ओर वृक्षारोपणकी विधि * 


८९ 


1.4.444. 4.1.141... 1.114.241... 11.41.41... 1.1.411 4.4.44. 4.4.444 44.4.44 44.44.444 449 सि 4. 4.4.4.4.2.4.4.1.1.2..1 1.4 1 4.4.41... 1.4.141 1.144.411... 1.44 1.4... 4.4.444... 6.4.4 44.4.44. 048. 17. 1.4.4..4.4.4. 4 १ 1. ८.६.1.4.4.4.4.0.4..1 





पुलस्त्यजी बोले- राजन्‌ ! बगीचेमें वृक्षोकि 
ठगनेकी विधि मैं तुम्हे बताता हूं। तालाबकी 
प्रतिष्ठाके विषयमे जो विधान बतलरया गया है, उसीके 
समान सारी विधि पूर्ण करके वृक्षके पौधोको सर्वैषधि- 
मिश्रित जसे सींचे । फिर उनके ऊपर दही ओर अक्षत 
छोड । उसके बाद उन्हं पुष्प-मालाओंसे अलङ्कत करके 
वस्मे लपेट दे । वहाँ गुगकका धूप देना श्रेष्ठ माना गया 
है । वृक्षोको पृथक्‌-पृथक्‌ ताम्रपात्रे रखकर उन्हें 
सप्तधान्यसे आवृत करे तथा उनके ऊपर वख ओर 
चन्दन चदाये । फिर प्रत्येक वुक्षके पास कलङा स्थापन 
करके उन कलर्होकी पूजा करे । ओर रातमें द्विजातिर्यो- 


द्वारा इन्द्रादि लोकपाल तथा वनस्पतिका विधिवत्‌ 
अधिवास कराये । तदनन्तर दूध देनेवाी एक गोको 
लाकर उसे श्वेत वस्र ओढाये । उसके मस्तकपर सोनेकी 
कलगी गाये, सीगोको सोनेसे मढा दे । उसको दुहनेके 
ल्य कोंसेकी दोहनी प्रस्तुत करे 1 इस प्रकार अत्यन्त 
शोभासम्पन्न उस गौको उत्तराभिमुख खडी करके वृक्षोके 
लीचसे छोडे। तत्पश्चात्‌ श्रेष्ठ ब्राह्मण बाजों ओर 
मङ्कलगीतोंकी ध्वनिके साथ अभिषेकके मनत्र- तीनों 
वेदोकी वरुणसम्बन्धिनी ऋचा पढते हुए उक्त कठरोकि 
जलसे यजमानका अभिषेक करं । अभिषेकके पश्चात्‌ 
नहाकर यज्ञकती पुरुष शेत वख धारण करे ओर अपनी 
सामर्थ्यके अनुसार गौ, सोनेकी जंजीर, कंडे, अगूटी, 
पवित्री, वख, हाय्या, राय्योपयोगी सामान तथा 
चरणपादुका देकर एकाग्र चित्तवाठे सम्पूण ऋत्विजोका 
पूजन करे । इसके नाद्‌ चार दिरनोतक दुधसे अभिषेक 
तथा घी, जौ ओर काठ तिस होम करे । होममें पलारा 
(ढाक) की ककड उत्तम मानी गयी है । वृक्षारोपणके 
पश्चात्‌ चौथे दिन विरोषं उत्सव करे। उसमे अपनी 
शाक्तिके अनुसार पुनः दक्षिणा दे । जो-जो वस्तु अपनेको 
अधिक प्रिय हो, ईषया छोडकर उसका दान करे। 
आाचार्यको दूनी दक्षिणा दे तथा प्रणाम करके यज्ञकीं 





विधिसे 9 क्षारोपणका ति ि 4 
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अश्षय फलका भागी होता है । राजेन्द्र ! जो इस प्रकार 
वृक्षकी प्रतिष्ठा करता है, वहः जबतक तीस हजार इन्र 
समाप हो जाते है, तबतक खर्गलोकमें निवास करता हे । 
उसके शरीरम जितने रोम होते है, अपने पहर ओर 
पीछेकी उतनी ही पीठिर्योका वह उद्धार कर देता है तथा 
उसे पुनरावृत्तिसे रहित परम सिद्धि प्राप्त होती है । जो 
मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसङ्गको सुनता या सुनाता हे, वह 
भी देवताओंद्रारा सम्मानित ओर ब्रह्मलोके प्रतिष्ठित 
होता है । वृक्ष पुत्रहीन पुरुषको पुत्रवान्‌ होनेका फर्‌ देते 
हे । इतना ही नहीं, वे अधिदेवतारूपसे, तीर्थमिं जाकर 
वृक्ष लगानेवारको पिण्ड भी देते हे । अतः भीष्म ! तुम 
यलपूर्वक पीपरूके वृक्ष रुगाओ । वह अकेला ही तुम्हं 
एक हजार पुत्रका फर देगा । पीपलरूका पेड़ रूगानेसे 
मनुष्य धनी होता है । अोक रोकका नारा करनेवाखा 
है । पाकड़ यज्ञका फर देनेवाला बताया गया हे 1 
नीमका वृक्ष आयु प्रदान करनेवाला माना गया हे । 
जामुन कन्या देनेवाला कहा गया है 1 अनारका वृक्ष पली 
प्रदान करता है । पीपर रोगका नाराक ओर पलाडा 
ब्रह्मतेज प्रदान करनेवाला है । जो मनुष्य बहेडेका वृक्ष 
कगाता है, वह प्रेत होता है । अङ्खोरु रुगानेसे वंराकी 
वद्धि होती है। खैरका वृक्ष रगानेसे आयोम्यकी प्रापि 
होती है। नीम छगानेवाल्रौपर भगवान्‌ सुर्य प्रसन्न होते 
है । बेलक वृक्षे भगवान्‌ शङ्करका ओर गुलाबके पेड्में 
देवी पार्वतीका निवास है। अरोक वृक्षे अप्सरा ओर 
कुन्द (मोगरे) के पेड्मे श्रेष्ठ गन्धर्वं निवासं करते हे । 
बतका वृक्ष लुटेरोको भय प्रदान करनेवाला हे । चन्दन 
अर कटहक्के वक्ष क्रमराः पुण्य ओर रक्ष्मी देनेवाले 
है । चम्पाका वृक्ष सौभाग्य मरदान करता है । ताडका वृक्ष ` 
सन्तानका नाडा करनेवाला है । मौरुसिरीसे कुरुकी वृद्धि ` 
होती है। नारियक रगानेवाला अनेक चिर्योका पति ` 
















होता है । दाखका पेड़ सर्वाङ्गसुन्दरी स्त्री भदान करनेवाला ॥ ५ ४ } 


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1 नः ह की 


॥ 








९०७ 


क क र ~ 


घुलस्त्यजी कहते हैँ राजन्‌ ! इसी प्रकार एक 
 । दूसय व्रत बतल्रता ह जो समस्त मनोवाञ्छित फरेको 
॥ | देनेवाल है। उसका नाम है-सौभाग्यरायन । इसे 
॥ पुराणोके विद्वान्‌ ही जानते हें । पूर्वकारमें जब भूलोक, 
भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्त्रक आदि सम्पूर्ण लोक 


^ दग्ध हो गये, तब समस्त पराणिर्योका सौभाग्य एकत्रित 


होकर वैकुण्ठमें जा भगवान्‌ श्रीविष्णुके वक्षःस्थले 
स्थित हय गया। तदनन्तर दीर्घकारूके पश्चात्‌ जब पुनः 
सृष्टि-रचनाका समय आया, तब प्रकृति ओर पुरुषसे 


^ ` युक्त सम्पूर्णं .ोकोके अहङ्कारसे आवृत हो जानेपर 


श्ब्रह्माजी तथा भगवान्‌ श्रीविष्णुमें स्पर्धा जामत्‌ हुईं । 
॥ उस समय एक पीठे रगकी भयङ्कर अग्निज्वाला प्रकट 
॥ हुई । उससे भगवान्‌का वक्षःस्थरू तप उठा, जिससे वह 
॥.  सौभाग्यपुञ्ज वहांसे गक्िति हो . गया। श्रीविष्णुके 
\/  . वक्षःस्थलका वह सोभाग्य अभी रसरूप होकर धरतीपर 
/ गिरने नहीं पाया था कि ब्रह्माजीके बुद्धिमान्‌ पुत्र दक्षने 
। उसे आकारामें ही रोककर पी छया । दक्षके पीते ही वह 
| ˆ अद्भुत रूपम ओर लावण्य प्रदान करनेवाला सिद्ध 
` हआ । प्रजापति दक्षका बू ओर तेज बहुत बढ़ गया । 
उनके पीनेसे बचा हुआ जो अदा पुथ्वीपर गिर पड़ा, वह 
॥ आठ भागे बट गया। उनमेसे सात भागोसे सात 
 .  सोभाग्यदायिनी ओषधियाँ उत्पन्न हुई, जिनके नाम इस 
/  भ्रकार है-ईख, तरूराज, निष्पाव, राजधान्य (दार या 
|, अगहनी), गोक्षीर (क्षीरजीरक), कुसुम्भ ओर कुसुम । 









€ ~ 
भ्दति नः ~ 
| 












सोभाग्य प १ म . 
ध = „~: ३ 
२ सती „ ६. नामकी २, । 
4. त २ न्ट ५५ 
(५ प 84 9 ५ 44 0 ५ 
+ न्वै शरि ५८१ (४ 8 9 । 
ह, न > 30 - ४४: ध, ज 1६ 
( ४ वि + 44 प) १ मनोहर न 3 ~ ~ १ 
च ५ म डारीरवाटी वह लोकें 
५ ~| = 1 
+ ५ ( । ८ क्रन्या 
4; प्रसिद्ध 
णब = हे 
सद्ध हं । पिनाकधारी भगवान्‌ 
१५४ 
८4 द देवीके - 40 


+ ॥ ० 
१ 1 [६ 116 | 11 ९ [. (५ ८१ 


न= अन  --क 


1 वःरद्छः : 


+ अर्चयस्व हषीके यदीच्छसि परं पदम्‌ * 


[ 1 (4.4.84. 4.4.81 ५.९७ 


[ सक्षिप्न पद्मपुराण 





भीष्मजीने पृषछा-- मुने! जगद्धात्री 
आराधना कैसे की. जाती है ? जगत्की शान्तिके छियि ` 
जो विधान हो, वह मुञ्चे तानेकी कृपा कीज्यि। 
पुलस्त्यजी बोले--चैत्र मासके शुक पक्षकौ 
तृतीयाको दिनके पूर्व भागम मनुष्य तिलमिश्रित जसे 
स्नान करे। उस दिन परम सुन्दरी भगवती सतीका 
विश्वात्मा भगवान्‌ दाङ्करके साथ वैवाहिक मन्त्रोद्रर 
विवाह हुआ था; अतः तृतीयाको सती देवीके साथ ही 
भगवान्‌ शाङ्करका भी पूजन करे । पञ्चगव्य तथा चन्दन- 
मिश्रित जलके द्वारा गोरी ओर भगवान्‌ चन्द्ररोखरकी 
प्रतिमाको स्नान कराकर धूप, दीप, नैवेद्य तथा नाना 
प्रकारके फलद्वारा उन दोनोंकी पूजा करनी चाहिये। 
“पार्वतीदेव्यै नमः,* “शिवाय नमः' इन मन्त्रोसे क्रमराः 
पार्वती ओर रिवके चरर्णोका; "जयायै नमः, “शिवाय 
से दोनोकी घुदधिरयोका; “त्रयम्बकाय नमः, 
"भवान्यै नमः' से पिडक्ियोंका; “भद्रे्राय नमः, 
विजयायै नमः'से घुटनोंका; "हरिकेशाय नमः", 
"वरदायै नमः' से जरघका; “ईशाय शङ्कराय नमः", 
“रत्यै नमः' से दोनोके कटिभागका; "कोटिन्यै नमः", 
'दुलििने नमः'से कुक्षिभागका; “च्ूलपाणये नमः", 
"मङ्गलायै नमः'से उदरका; “सर्वात्मने नमः', “इरान्यै 
नमः' से दोनों स्तनोंका; “चिदात्मने नमः', “रुद्राण्यै 
नमः' से कण्ठकाः त्रिपुरघ्ाय नमः! “अनन्तायै नमः" से 
दोनों हार्थोका; “त्रिलोचनाय नमः, “कालानलप्रियायै 
नमः" से बोहोका;ः “सोभाग्यभवनाय नमः' से 
आभूष्णोका; “स्वधायै नमः", “इश्चराय नमः" से दोनेकि 
मुखमण्डकरूका; “अहोकवनवासिन्यै नमः'- इस 
मन्रसे रेश्र्यं प्रदान करनेवाठे ओठोका; “स्थाणवे 
नमः', “चच्रमुखप्रियायै नमः" से र्महका; 
-अर्धनारीश्चराय नमः', “असिताङ्त्यै नमः' 
नासिकाका; “उग्राय नमः', "ललितायै नमः" से दोनों 
भरहिका; “शर्वाय नमः', "वासुदेव्यै नमः" से केका 





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सुष्टिखण्ड । 


* तीर्थमहिमाके प्रसङ्गमे वामन-अवतारकी कथा * 


९१ 


कक... 1:11 
11 11 


विधिवत्‌ पूजा करके उनके आगे सौभाग्याष्टक रखे । 
निष्पाव, कुसुम्भ, क्षीरजीरक, तरूराज, इक्षु, रवण, कुसुम 
तथा राजधान्य-- इन आठ वस्तु्ओंको देनेसे सौभाग्यकी 
प्राप्ति होती है; इसखि्यि इनकी “सौभाग्याष्टक' संज्ञा है । 
इस प्रकार शिव-प्रार्वतीके आगे सब सामग्री निवेदन 
करके चैतमें सिंघाड़ा खाकर रातको भूमिपर रायन करे । 
फिर सबेरे उठकर स्नान ओर जप करके पवित्र हो माल 
वख ओर आभूषणोके द्वारा ब्राह्यण-दम्पतीका पूजन करे । 
इसके बाद सोभाग्याष्टकसहित हिव ओर पार्वतीकी 
सुवर्णमयी प्रतिमाओंको रुकिता देवीकी प्रसन्नताके ख्य 
ब्राह्मणको निवेदन करे । दानके समय इस प्रकार कहे- 
"ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, रिवा 
वासुदेवा, गोरी, मङ्गला, कमला, सती ओर उमा- ये 
प्रसन्न हों । 

लारह महीनोकी प्रत्येक द्रादज्ञीको भगवान्‌ 
श्रीविष्णुकी तथा उनके साथ लक्ष्मीजीकी भी पूजा करे । 
इसी प्रकार परलोकमें उत्तम गति चाहनेवाले पुरुषको 
प्रत्येक मासकी पूर्णिमाको सावित्रीसहित ब्रह्माजीकी 
विधिवत्‌ आराधना करनी चाहिये। तथा रेर्यकी 
कामनावाठे मनुष्यको सोभाग्याष्टकका दान भी करना 
चाहिये । इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिपूर्क 
अनुष्ठान करके पुरुष, स्री या कुमारी भक्तिके साथ रत्रिमे 
दिवजीकी पूजा करे । व्रतकी समापिके समय सम्पूण 


सामग्रियोसे युक्त इाय्या, हिव-पार्वतीकी सुवर्णमयी 
प्रतिमा, वैर ओर गौका दान करे । कृपणता छोडकर दुढ्‌ 
निश्चयके साथ भगवान्‌का पूजन करे । जो सनी इस भकार 
उत्तम सौभाग्यदायन नामक व्रतका अनुष्ठान करती हे, 
उसकी कामनार्ँ पूर्णं होती हैँ । अथवा [यदि वह निष्काम- 
भावसे इस व्रतको करती है तो] उसे नित्यपदकी प्राप्ति 
होती है । इस व्रतका आचरण करनेवाङे पुरुषको एक 
फलठका परित्याग कर देना चाहिये । प्रतिमास इसका 
आचरण करनेवाला पुरुष यरा ओर कीर्ति प्राप्त करता हे । 
राजन्‌ ! सौभाग्यङायनका दान करनेवाला पुरुष कभी 
सौभाग्य, आरोग्य, सुन्दर रूप, वस्र, अलङ्कार ओर 
आभूष्णोसे वञ्चित नहीं होता । जो बारह, आठ या सात 
वर्षोतक सौभाम्यङायन व्रतका अनुष्ठान करता है, वह 
ब्रह्मलोकनिवासी पुरुषोंद्रारा पूजित होकर दस हजार 
कर्पोतक वहाँ निवास करता है। इसके बाद वह 
विष्णुलोक तथा रिवलोकमे भी जाता है । जो नारी या 
कुमारी इस ्रतका पालन करती है, वह भी ुक्ितादेवीके 
अनुग्रहसे रकित होकर पूर्वोक्तं फरको प्राप्त करती हे । जो 
इस व्रतकी कथाका श्रवण करता हे अथवा दूसरयोको इसे 
करनेकी सख्खह देता है, वह भी विद्याधर होकर चिरकाल- 
तक स्वर्गलोकमें निवास करता है । पूर्वकारमे इस अद्भुत 
व्रतका अनुष्ठान कामदेवने, राजा रातधन्वाने, वरुणदेवने, 
भगवान्‌ सूर्यने तथा धनके स्वामी कुबेरने भी किया था। 


=-= + = 
तीर्थमहिमाके प्रसङ्खमे वामन-अवतारकी कथा, भगवानक्ता लाष्ककिि देत्यसे 
त्रिलोव्छीके राज्यका अपहरण 


भीष्मजीने -कहा- ब्रह्मन्‌! अब मै तीर्थाका 

अदभुत माहात्म्य सुनना चाहता &? जिसे सुनकर मनुष्य 

संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है । आप विस्तारके साथ 
उसका वर्णन करो । 

ब्लोे-राजन्‌ ! एसे अनेकां पावन 

तीर्थ ह जिनका नाम ठेनेसे भी बड़े-बड़ पातकोका नारा 

हो जाता है। तीर्थोका दर्दन कसना उनमें स्नान करना 








वहाँ जाकर बार-बार इबकी रूगाना तथा समस्त | 


तीर्थोका स्मरण करना-ये मनोवाञ्छित फलरूको 
देनेवाठे हँ । भीष्म ! पर्वत, नदियां, क्षेत्र, आश्रम ओर 
मानस आदि सरोवर-खभी तीर्थं कहे गये है जिनमें ` 
तीर्थयात्राके उदेड्यसे जनेवाठे पुरुषको पग-पगपर 

अशधमेध आदि यज्ञोका फल होता है- इसमे तनिक भीं 
सन्देह नहीं है। - 



































8 


इीघ्र ही कोई उपाय कीजिये । संसारसे वेदपाठ ओर 


९२ 


* अर्चयस्व हषीकेड यदीच्छसि परं पदम्‌ * 


[ संक्षिप्न पद्यपुराण | 


"~~~ र च च 1.1.144... 4.4.44... 4.44. 4.4.444... 8.4.41. 4.4.84. ८..4.4.4.4.4. 4.4.444... 41.4.44... 1.1..4.1.1. 4.44 .4.1.4. 4.4.51... 2 4 ..४.२.६. ३१ २५१ ५५ 


सर्वव्यापक श्रीविष्णुने यज्ञ-पर्वतपर जा वहाँ अपने चरण 
रखकर किस दानवका दमन किया था ? महामुने ! ये 
सारी बातें मुस्े नताइये 1 ` 
` पलस्त्यजी बोले वत्स ! तुमने बड़ी उत्तम बात 
पछी है, एकाग्रचित्त होकर सुनो । प्राचीन सत्ययुगकी 
बात है- नकि दानवोनि समूचे स्वर्गपर अधिकार जमा 
ख्या था। इन्द्रसहित सम्पूर्णं देवताओंको जीतकर उनसे 
त्रिभुवनका राज्य छीन लिया था । उनमें बाष्कल नामका 
दानव. सबसे बलवान्‌ था। उसने समस्त दान्वोको 
यज्ञका भोक्ता बना दिया । इससे इन्द्रको बड़ा दुःख 
हआ। वे अपने जीवनसे निरारा हो चले। उन्होने 
सोचा-- ब्रह्माजीके वरदानसे दानवराज बाष्कर्ि मेरे 
तथा सम्पूर्णं देवताओके स्थि युद्धम अवध्य हो गया 
हे। अतः मेँ ब्रह्मलोकमे चकर भगवान्‌ ब्रह्माजीकी ही 
शरण दगा । उनके सिवा ओर कोई मुञ्चे सहारा देनेवाल 
नहीं हे । एेसा ` विचार कर देवराज . इन्द्र॒ सम्पूर्ण 
देवताओको साथ छ “तुरंत उस स्थानपर गये, जहां 
भगवान्‌ ब्रह्माजी विराजमान थे। 
इन्द बोके-देव ! क्या आप हमारी ददा नहीं 


जानते, अब हमारा जीवन कैसे रहेगा ? प्रभो ! आपके 
 बरदानसे देत्येनि हमारा सर्वस्व छीन छिया । मै दुरात्मा 


बाष्कलिकी सारी करतूत पहके ही आपको बता चुका हू 
पितामह ! आप ही हमारे पिता है । हमारी रक्षाके छि 












पुलस्त्यजी कहते हँ उस समय 
समाधिम स्थित हो गये। उनके चिन्तन करनेप 
ध्यानमात्रसे चतुर्भुज भगवान्‌ श्रीविष्णु थोडे ही समयमे 
सबके देखते-देखते वहां आ पचे । 

भगवान्‌ विष्णु बोके- ब्रह्मन्‌ ! इस ध्यानको ` 
छोड़ो । जिसके छियि तुम ध्यान करते हो, वही मै साक्षात्‌ ` 
तुम्हारे पास आ गया हँ | 

ब्रह्माजीने कहा --स्वामीने यहाँ आकर मुहे 
दान दिया, यह बहुत बड़ी कृपा हुई । जगत्के छि्यि 
जगदीधरको जितनी चिन्ता है, उतनी ओर किसको हो 
सकती हे । मेरी उत्पत्ति भी आपने जगत्के छि ही कौ 
थी ओर जगत्की यह दरा है; अतः उसके लियि 
भगवानका यह शुभागमन वास्तवमें कोई आश्चर्यकी बात 
नहीं हे । प्रभो ! विश्वके पालनका कार्य आपके ही 
अधीन हे । इस इन्द्रका राज्य बाष्कलिने छीन छया है। 
चराचर प्राणिर्योकि सहित त्रिखोकीको अपने अधिकारमे 
कर छया है। केदराव । अब आप ही सलाह देकर 
अपने इस सेवककी सहायता कीजिये । 

भगवान्‌ श्रीवासुदेवने कहा- ब्रह्यन्‌ ! तुम्हारे 
वरदानसे वह दानव इस समय अवध्य है, तथापि उसे 
लुद्धिके द्वारा बन्धनमें डालकर परास्त किया जा सकता 
हे । मै दान्वोका विनादा करनेके छ्य वामनरूप धारण 
करूगा । ये इन्द्र मेरे साथ बाष्कक्िके घर चङे ओर वहां 
पर्हुचकर मेरे किये इस प्रकार वरकी याचना कर 
"राजन्‌ ! इस बोने ब्राह्मणक स्यि तीन पग भूमिका दान 
दीजिये । महाभाग ! इनके छिये मै आपसे याचना करता 
हू ।' एेसा कहनेपर वह दानवराज अपना प्राणतक दे 
सकता हे । पितामह ! उस दानवका दान स्वीकार करके 
पहले उसे राज्यसे वञ्चित करूगा, फिर उसे बांधकर 
पाताकुका निवासी नागा । 

यों कहकर भगवान्‌ श्रीविष्णु अन्तर्धान हो गये। 














सृष्टिखण्ड । 


ककव .५.८.1.1.4.1.1. 





उस दिन स्वच्छ वायु बहने ठगी । सम्पूर्ण प्राणी बिना 
किसी उपद्रवके अपने-अपने इच्छित पदार्थ प्राप्न कसे 
रगे । वृक्षास फूल्की वर्षा होने रगी, समस्त दिशाँ 
निर्म हो गयीं तथा सभी मनुष्य सत्य-परायण हो गये । 
देवी अदितिने एक हजार दिव्य वर्षोतक भगवानूको 
गर्भमें धारण किया। इसके बाद वे भूतभावन प्रभु 
वामनरूपमें प्रकट हए । उनके अवतार ठेते ही नदि्योका 
जरु खच्छ हो गया । वायु सुगन्ध बिखेरने लगी । उस 
तेजस्वी पुत्रके प्रकट होनेसे महर्षि कर्यपको भी बडा 
आनन्द हआ । तीनों लोकम निवास करनेवाले समस्त 
प्राणियोके मनम अपूर्वं उत्साह भर गया । भगवान्‌ 
जनार्दनका प्रादुर्भाव होते ही स्वर्गलरेकमें नगारे बज उडे । 
अत्यन्त हर्षोल्लासके कारण त्रिखोकीके मोह ओर दुःख 
नष्ट हो गये । गन्धवेनि अत्यन्त उच्च स्वरसे संगीत आरम्भ 
किया । कोई ऊँचे स्वरसे भगत्रानकी जय-जयकार करने 
लगे, कोई अत्यन्त हर्षम भरकर जोर-जोरसे गर्जना करते 
हुए बारम्बार भगवानक्तो साधुवाद देने रुगे तथा कुछ 
लोग जन्म, भय, बुढ़ापा ओर मृत्युसे छुटकारा पानेके 
स्प्यि उनका ध्यान करने कगे । इस प्रकार यह सम्पूरणं 
जगत्‌ सब ओरसे अत्यन्त प्रसन्न हो उठा । 
देवतालरोग मन-ही-मन विचार करने रुगे-- ये 
साक्षात्‌ परमात्मा श्रीविष्णु है । ब्रह्माजीके अनुरोधसे 
जगत्की र्षाके लिये इन जगदीश्रने यह छोटा-सा 
हरीर धारण किया है । ये ही ब्रह्मा, ये ही विष्णु ओर ये 
ही महेश्वर है । देवता, यज्ञ ओर सर्ग--सब कुछ ये ही 
है इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । यह सम्पूणं चराचर 
जगत्‌ भगवान्‌ श्रीविष्णुसे व्याप्त है । ये एकं होते हुए भी 
पृथक्‌ छारीर धारण करके ब्रह्माके नामसे विख्यात ह । 
जिस प्रकार बहुत-से रेगोवाटी वस्तुओंका सान्निध्य 
होनिपर स्फटिक मणि विचित्र-सी प्रतीत होने कुगती है, 
वैसे ही मायामय गुणेकि संसर्गसे स्वयम्भू परमात्माकी 
नाना रूपामि रतीति होती है । जैसे एक ही गाहपत्य अगि 
` दक्षिणाम्नि तथा आहवनीयामि आदि भिन्नभिन 
संज्ञाओंको प्रप्त होती है, उसी प्रकार ये एक ही शरविष्यु 





। क, +, च कि > त * ङः 
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¢ ॥ = 1 द ॥ न~ = व ४ * वि वि १९४५१ म्‌ 
ऋ - 
चवा त # अ = ब, + ~ + >. न्क ऋ केक त 


* तीर्थमहिमाके प्रसङ्खमें वामन-अवतारकी कथा * 


॥.4..४..4.4.4. 4.4.12... 1 ~+ १ ११४ ॐ ४ कन ---------- 11 
2.६.11 ` 8. 
,.५.६..4.4.1.1. ८.44 क 


` = 74 
^ ४ 


९२ 


भगवान्‌ सन तरहसे देवताओंका कार्य सिद्ध करेगे । 
इद्ध चित्तवाके देवगण जब इस प्रकार सोच रहे 
थे, उसी समय भगवान्‌ वामन इनद्रके साथ बाष्कङ्िकि 
घर गये । उन्होने दूरसे ही बाष्कङिकी नगरीको देखा, जो 
परकोटेसे धिरी थी। सनं प्रकारके रलनोसे सजे हए 
ऊैचे-ऊैचे सफेद महल, जो आकादाचारी प्राणियेकि 
खयि भी अगम्य थे, उस पुरीकी रोभा बढ़ा रहे थे। 
नगरकी सडक बडी ही सुन्दर एवं क्रमनद्ध बनायी गयी 
थीं । कोई ेसा पुष्प नही, एेसी विद्या नही, एेसा हिल्प 
नहीं तथा एेसी कला नहीं, जो बाष्कङ्िकी नगरीमें मजुद 
न रही हो । वहीं रहकर दानवराज बाष्कल चराचर 
प्राणियोसहित समस्त व्रिछोकीका पालन करता था । वह 
धर्मका ज्ञाता, कृतज्ञ, सत्यवादी ओर  जितेन्दिय था । 
सभी प्राणी उससे सुगमतापूर्वक मिरु सकते थे। 
न्याय-अन्यायका निर्णय कसनेमे उसकी बुद्धि बडी ही 
कुडा थी । वह ब्राह्य्णोका भक्त, उारणागर्तोका रक्षक 
तथा दीन ओर अनार्थोपर दया करनेवाला था 1 म्र 
इाक्ति, प्रभु-हाक्ति ओर उत्साहशक्ति-इन तीनों 
हाक्तियेसि वह सम्पन्न था 1 सन्धि, विग्रह, यान, आसनः, 
द्ेधीभाव ओर समाश्रय-राजनीतिके इन छः गुर्णोका 
अवसरके अनुकूल उपयोग करनेम उसका सदा उत्साह 
रहता था । वह सबसे मुसकराकर बात करता था । वेद्‌ 
ओर वेदाङ्खोके तत्तका उसे पूर्ण ज्ञान था । वह य्ज्ञोका 
अनुष्ठान करनेवाख्, तपस्या-परायण, उदार, सुशीर, 
संयमी, भ्राणिर्योकी हिसामे विरत, माननीय पुरु्षोको 
आदर देनेवाला, शुद्धहदय, प्रसन्नमुख, पूजनीय पुरु्षोका 
पूजन करनेवाला, सम्पूर्ण विषर्योका ज्ञाता, दुर्दमनीय, 


सोौभाग्यदाटी, देखनेमें सुन्दर, अन्नका बहुत बड़ा संग्रह 
रखनेवारा, बड़ा धनी ओर बहुत बडा दानी था । वह 


धर्म, अर्थं ओर काम-तीनोके साधनम संय रहता 


था । बाष्ककिि त्रिरोकीका एक श्रेष्ठ पुरुष था । वह सदा 
अपनी नगरीमें ही रहता था । उसमें देवता ओर दानवेकि 
भी घर्मडको चूर्णं कसेकी र्ति थी। पसे गुणेसे 
विभूषित होकर वह त्रिभुवनकी समस्त भ्रजाका पालन ¦ 
करता था । उस दानवराजके राज्यम कोई भी अधर्म र नही 











॥1 नक क कका ता चकरपयोताा ्कन "जाक क कक्‌ क 











९ #* अर्चयस्व हषीकेडां यदीच्छसि परं पदम्‌ # 


4.4.44... 9.4.44... 4.4.444... 1.4.1.1.1.1.1.1.1.1. 4.41... 4... 4.4. 4.4.44... 4. 4.4.444. 4.4. 4.4.414. 1.1. 4.4... 2.1... - -----~------~~-~- न  ्न .४.५.2.1.२ क १ 
४ 


होने पाता था। उसकी प्रजामें कोई भी ेसा नहीं था जो 
दीन, रोगी, अल्पायु, दुःखी, मूर्ख, कुरूप, दर्भाग्यडाटी 
ओर अपमानित हो । 

इन्द्रको आते देख दान्वोने जाकर राजा बाष्कछिसे 
कहा--“प्रभो ! बडे आश्र्यकी बात है कि आज इन्द्र 
एक नोने ब्राह्मणके साथ अकेठे ही आपकी पुरीमें आ 
रहे हे । इस समय हमारे स्यि जो कर्तव्य हो, उसे रीघ् 
बताइये ।' उनकी बात `सुनकर बाष्कल्िने कहा- 
'दानवो ! इस नगरमे देवराजको आदरके साथ ठे आना 
चाहिये । वे आज हमारे पूजनीय अतिथि हैँ । 

पुलस्त्यजी कहते हे--दानवराज बाष्कल 
दानवंसे एेसा कहकर फिर स्यं इन्द्रसे मिलनेके चयि 
अकेला ही राजमहलसे बाहर निकल पड़ा ओर अपने 
रोभा-सम्पत्त नगस्की सातवीं ङ्योढीपर जा पर्चा । 
इतनेमें ही उधरसे भगवान्‌ वामन ओर इन्द्र भी आ 
पहुचे । दानवराजने बडे प्रेमसे उनकी ओर देखा ओर 
श्रणाम करके अपनेको कृतार्थं माना । वह हर्षम भरकर 
सोचने क्गा-- मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है, 
वयोकरि आज में त्रिभुवनकी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न होकर 
इद्रकी याचकके रूपमे अपने घरपर आया देखता हँ 
ये मुस कु याचना करेगे । घरपर आये हए इनद्रको मै 
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अपनी खी, पुत्र, महर्‌ तथा अपने प्राण भी दे डर्टूगा 
फिर त्रिलोकीके राज्यकी तो बात ही क्या है| यह 
सोचकर उसने सामने आ इन्द्रको अङ्कमे भरकर बे 
आदरके साथ गते गाया ओर अपने राजभवनकै 
भीतर ठे जाकर अर्घ्यं तथा आचमनीय आदिसे उन 
दोनोंका यलपूर्वक पूजन किया । इसके बाद बाष्कलि 
नोरा- “इन्द्र ! आज भै आपको अपने घरपर स्वयं 
आया देखता हुः इससे मेरा जन्म सफर हो गया, मेर 
सभी मनोरथ पूर्ण हो गये । प्रभो ! मेरे पास आपका 
किस ॒प्रयोजनसे आगमन हआ ? मुञ्चे सारी बात 
नताइये । आपने यहांतक अनेका कष्ट उठाया, इसे मै 
बड़े आश्चर्यकी बात समञ्ता हू ।' 

इन्द्रने कहा- बाष्कल! मै जानता हू 
दानव-वंडाके श्रेष्ठ पुरुषोमें तुम सनसे प्रधान हो । तुम्हारे 
पास मेरा आना कोई आश्र्यकी बात नहीं है । तुम्हा 
घरपर आये हुए याचक कभी विमुख नहीं लोटते । तुम 
याचकोके लिये कल्पवृक्ष हो । तुम्हारे समान दाता कोई 
नहीं हे। तुम प्रभाम सूर्यके समान हो । गम्भीरतामें 
सागरकी समानता करते हो । क्षमारीरताके कारण 
तुम्हारी पृथ्वीके साथ तुरना की जाती है। ये 
ब्राह्मणदेवता वामन करयपजीके उत्तम कलमे उत्पन्न है । 
इन्होंने मुञ्ञसे तीन पग भूमिके खयि याचना की है; किन्तु 
बाष्कठे । मेरा त्रिभुवनका राज्य तो तुमने पराक्रम करके 
छीन खया है। अब मँ निराधार ओर निर्धन हूं । इन 
देनेके छिये मेरे पास कोई भूमि नहीं है । इसख्णयि तुमसे 
याचना करता हू । याचक मेँ नहीं, ये है । दानवेन्द्र ! यदि 
तुं अभीष्ट हो तो इन वामनजीको तीन पग भूमि दे दो। 

बाष्कलिने कहा देवेन्द्र ! आप भके पधार, 
आपका कल्याण हो । जरा अपनी ओर तो देखिये, आप 
ही सनके परम आश्रय हैँ । पितामह ब्रह्माजी त्रिभुवनकी 
रक्षाका भार आपके ऊपर डारुकर सुखसे बैठे है ओर 
ध्यान-धारणासे युक्तं हो परमपदका चिन्तन करते है । 


` भगवान्‌ श्रीविष्णु भी अनेकों संग्रामोंसे थककर जगत्कती 


1 
„1 


चिन्ता छोड़ आपके 














सुष्टिखण्ड । 


~ = 


* तीर्थमहिमाके षसङ्गमें वामन-अवतारकी कथा # ९५ 


1.4.444... 4.2.411. कुक 3 
८.: 
४.४.४1... 4.4.11. 4.3.1.1. 1.441.444... 77121221 1.1.144... 4444994 


प 1111111 


आपको ही सारा भार सौपकर कैलास पर्वतपर विहार 
करते हें । मुङ्से भिन्न बहुत-से दानर्वोको, जो बल्वानेये 
भी बलवान्‌. थ, आपने अकेठे ही मार गिराया । लारह 
आदित्य, ग्यारह रुद्र, दोनों अश्चिनीकुमार आट वसु तथा 
सनातन देवता धर्म-- ये सब लोग आपके ही बाहुबरूका 
आश्रय ठे स्वगलोकमें यज्ञका भाग ग्रहण करते हे। 
आपने उत्तम ॒दक्षिणाओंसे सम्पन्न सौ यज्ञोद्वारा 
भगवानक्ता यजन किया हे । वृत्र ओर नमुचि-- आपके 
ही हाथसे मारे गये हें । आपने ही पाक नामक दैत्यका 
दमन किया हे । सर्वसमर्थं भगवान्‌ विष्णुने आपकी ही 
आज्ञासे दैत्यराज हिरण्यकरिपुको अपनी जांधपर 
बिठटाकर मार डाला था। आप एेरावतके मस्तकपर 
बैठकर वज्र हाथमे छियि जब संग्राम-भूमिमे आते है, उस 
समय आपको देखते ही सब दानव भाग जाते है । 
पर्वकालमे आपने बड़े-बड़े बलिष्ठ दानवोंपर विजय पायी 
हे । देवराज ! आप एेसे प्रभावराटी हैँ । आपके सामने 
मेरी क्या गिनती हो सकती है । आपने मेरा उद्धार करनेकी 
इच्छासे ही यहाँ पदार्पण किया है । निस्सन्देह मै आपकी 
आज्ञाका पालन करूगा । में निश्चयपूर्वक कहता हूं 
आपके छ्य अपने प्राण भी दे दुगा । देवेश्वर ! आपने 
मुञ्ञसे इतनी-सी भूमिकी नात क्यो कही 2. यह खी, पुत्र, 
गौर्पँ तथा ओर जो कुछ भी धन मेरे पास है, वह सब एवं 
त्रिलोकीका सारा राज्य इन ब्राह्मणदेवताको दे दीजिये । 
आप एेसा करके म॒ञ्ञपर तथा मेरे पूर्वजपर कृपा करगे, 
इसमें तनिक भी संडाय नहीं है । क्योकि भावी प्रजा 
कदेगी-- पूर्वकाले राजा बाप्कलिने अपने घरपर 
आये हए इनदरको त्रिरोकीका राज्य दे दिया था। [आप 
ही वयो, ] दूसरा भी कोई याचक यदि मेरे पास आय तो 
वह सदा ही मुञ्ञे अत्यन्त प्रिय होगा । आप तो उन सनमे 
मेरे छियि विंरोष आदरणीय दैः अतः आपको कुच भी 
देनमे मुञ्े कोई विचार नहीं करना है । पस्तु देवराज , 
मुञ्चे इस बातसे बड़ी क्ल्ना हो रही हे किन 
ब्राह्मणदेवताके विरोष प्रार्थना करनेपर आप ४ त 
ही पग भूमि मांग रहे है । मै इन् अच्छे-अच्छे गाव दगा 


ओर आपको सवर्गका राज्य अर्पण कर दगा । ह 8 


खरी ओर भूमि दोनों दान करूगा । आप मुञ्चपर कृपा 
करके यह सन स्वीकार करं । 

पुलस्त्यजी कहते है राजन्‌ ! दानवराज 
बाष्कक्िकि एसा कहनेपर उसके पुरोहित शुक्राचार्यने 
उससे कहा-- "महाराज ! तुम्हें उचित-अनुचितका 
बिलकुल ज्ञान नहीं है; किसको कब क्या देना चाहिये-- 
इस बातसे तुम अनभिज्ञ हो । अतः मन्त्रियेकि साथ 
भलीभोति विचार करके युक्तायुक्तका निर्णय करनेके 
पश्चात्‌ तुम्हँं कोई कार्य करना चाहिये । तुमने इन्द्रसहित 
देवताओंको जीतकर त्रिरोकीका राज्य प्राप्त किया हे। 
अपने वचनको पूरा करते ही तुम बन्धनम पड़ जाओगे 
राजन्‌ ! ये जो वामन हे, इन्हें साक्षात्‌ सनातन विष्णु ही 
समञ्ञो । इनके छ्य तुम्हें कुछ नहीं देना चाहिये; क्योकि 
इन्होनि ही तो पहले तुम्हारे वंदाका उच्छेद कराया है ओर 
आगे भी करार्येगे । इन्हेनि मायासे दानवोंको परास्त किया 
है ओर मायासे ही इस समय बने ब्राह्यणका रूप 
बनाकर तुग्हं दर्रान दिया है; अतः अब बहुत कहनेकी, 
आवङयकता नहीं है । इन्हें कुछ न दो । [तीन पग तो 
बहुत है,] मक्खीके पैरके बराबर भी भूमि देना न 
स्वीकार करो। यदि मेरी बात नहीं मानोगे तो रीघ् 
ही तुम्हारा नारा हो जायगा; यह मैं तुम्हें सच्ची बात 
कह रहा हू । । 

ल्ाष्कलिनि कहा-- गुरुदेव ¦ मैने घर्मकी इच्छासे 
इन्हे सब कुछ देनेकी प्रतिज्ञा कर ली है 1 प्रतिज्ञाका 
पालन अवर्य करना चाहिये, यह सत्पुरु्षोका सनातन 
धर्म है । यदि ये भगवान्‌ विष्णुं हे ओर मुञ्जसे दान छेकर 
देवताओंको समृद्धिशाटी जनाना चाहते है, तब तो मेरे 
समान धन्य दूसरा कोई नहीं होगा । ध्यान-परायण योगी 
निरन्तर ध्यान करते रहनेपर भी जिनका दर्न जल्दी नहीं 
पाते, उन्न ही यदि मुञ्चे दर्शन दिया है, तब तो इन 
देवेश्वसे मुञ्चे ओर भी धन्य बना दिया । जो खोग हाथमे 


कुरा ओर जर केकर दान देते है, वे भी “सेर दानसे 
सनातन परमातमा भगवान्‌ विष्णु सन्न हँ" इस वचनके ` 


} १ ॥ ५